वाम मोर्चे की करुण विदाई: ईश्वर दोस्त

Guest post by ISHWAR DOST

ममता की संघर्ष गाथा जीत का जश्न बन कर कोलकाता की जिस राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश कर रही है, उसके गलियारों में कुछ वक्त के लिए ही सही, सन्नाटा-सा तैर गया होगा। यादें उभर आई होंगी। चौंतीस साल का साथ पत्थरों तक के लिए कम नहीं होता। वे मूक दीवारें एक इतिहास की गवाह हैं। एक अपराजेय-से लगते लंबे दौर की; जिसने चुनावों के सात समंदर पार किए; अभेद्य लाल दुर्ग के तिलिस्म को खड़ा किया। अब लोकतंत्र में सबसे लंबे शासन का एक अंतर्राष्ट्रीय कीर्तिमान विदा हो गया। विदाई इतनी करुण और क्रूर कि पिछले मुख्यमंत्री विधानसभा की ड्योढ़ी तक नहीं पहुंच पाए। तैंतीस में से पच्चीस मंत्री विधानसभा से बेदखल हो गए। माकपा बंगाल विधानसभा में कांग्रेस से भी छोटी पार्टी हो गई।

2008 से एक के बाद एक पंचायत, संसद, नगरपालिका चुनाव हारने के कारण इस नतीजे में आश्चर्य की कोई बात नहीं बची थी। सड़क चलते राहगीर तक को पता था क्या होने वाला है। मगर व्यापक वाम से जुड़े बुद्धिजीवियों और पार्टी के भीतर के ही बौद्धिकों तक के आलोचनात्मक विश्लेषण माकपा की आंखें नहीं खोल सके। वाम मोर्चे को बंगाल में अपनी अपरिहार्यता के तर्क पर इतना यकीन था कि उसने अपने लिए आश्चर्य और धक्के का सृजन कर लिया। उसके लिए यह ‘अभूतपूर्व उलटफेर’ हो गया। आलोचकों को मुंहतोड़ जवाब देने की फितरत माकपा को आखिरकार जिस आश्चर्यलोक और रंजो-गम के गढ़हे में ले गई, उससे सावधान रहने की चेतावनी देते हजारों लेख अखबारों, पत्रिकाओं, ब्लॉगों में कदम-कदम पर बिछे थे।

पार्टी का अपनी मशीनरी, और सबक लेने तक की क्षमता पर भरोसा ही भ्रम बन गया। मीडिया के फैलाए जा रहे दुष्प्रचार, दक्षिणपंथियों की साजिश जैसे कई तर्कों ने पार्टी के अपने आकलन के चारों तरफ सुरक्षा घेरा खड़ा कर दिया! माकपा ने खुद से यह नहीं पूछा कि आज तक की जीतों में बुर्जुआ मीडिया क्यों बाधा नहीं बना। यह उतना ही हास्यास्पद तर्क है जितना माकपा विरोधियों का यह विचार कि माकपा बूथ-कब्जा और धांधली कर सत्ता में आती थी। जब वाम मोर्चा जनता की नजरों से गिरने लगा तब यह ‘योग्यता और प्रबंधन’ कहां गया। ये दोनों तर्क लोकतंत्र और जनता पर अविश्वास को ही दर्शाते हैं।

हारने की आदत चले जाने के लिए चौंतीस साल बहुत होते हैं। अवसर के अनुकूल रस्मी शालीनता और गरिमा ओढ़ने तक में दिक्कत होने लगती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंत तक माकपा नेता ईंट का जवाब पत्थर से देते रहे। विमान बोस नतीजों के एक दिन पहले तक बोले मीडिया को अपना थूका हुआ चाटना पड़ेगा। आश्चर्य है कि माकपा के कई साथी अब तक नकारवादी रुख पर अड़े हैं। उन्हें मतों का इकचालीस फीसदी का आंकड़ा राहत दे रहा है। वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि वाम मोर्चा और तृणमूल मोर्चा 2006 में मतों के प्रतिशत की एक-दूसरे की स्थिति पर पहुंच गए हैं।

हार के कारणों के पिछले ‘विशद’ विश्लेषणों और पार्टी के शुद्धिकरण की कवायद प्रभावी नहीं हो पाई, क्योंकि किसानों और गरीबों के पार्टी से दूर जाने के मुख्य मुद्दे को ठीक से नहीं संबोधित किया गया। माकपा मान रही थी कि जनता उसकी बौद्धिक क्षमता से अभिभूत है, जो ममता में है ही नहीं। आखिरी छह महीने के दृश्य देखें। माकपा नेता जब कोई जबरदस्त विश्लेषण करते थे या कोई चमकती हुई पंक्ति उच्चारते थे तब दर्प चेहरे पर झिलमिला जाता था और दर्द भी कि इतनी श्रेष्ठ बुद्धि की कदर न मीडिया वाले कर रहे हैं और न बाकी लोग। वे भूल गए कि जनता के बीच कम्युनिस्टों की जगह बुद्धिबल के चलते नहीं बल्कि जनसंघर्षों और जननीतियों से बनती है। यह अलग बात है कि नीतियां और संघर्ष की रूपरेखा बनाने में बुद्धि की जरूरत भी पड़ सकती है। 2009 के बाद से माकपा को अपने कामों से ज्यादा दीदी के अस्थिर चित्त पर यकीन था। सोचा था कि दो साल बहुत होते हैं। दीदी जरूर कोई मौका देगी, जनता की नजरों में वाममोर्चे की वापसी की।

माकपाई अहंकार के कई कारण हैं, मगर इसे व्यक्तिगत अहंकार से परे जाकर देखा जाना चाहिए। यह सांस्थानिक और संरचनागत अहंकार है। वैसे तो लगातार जीत किसी का भी माथा खराब कर सकती है। तिस पर वे लोग जीतते रहे हों, जिन्हें इतिहास ने प्रगतिशील राह पर आगे बढ़ने के लिए हिरावल पार्टी के रूप में खुद ही ‘चुना’ हो तो मामला और नाजुक हो जाता है। मगर इस अहंकार का मुख्य स्रोत बड़ा कारुणिक है। इसे ढूंढने के लिए प्रश्न किया जाना चाहिए कि वाम मोर्चे के नेताओं का अहंकार 2008 के पहले जनता को क्यों नहीं अखरता था और सिंगूर-नंदीग्राम के बाद अचानक क्या हो गया कि यह चुभने लगा।

वामपंथ के विरोधियों को भी यह मानना चाहिए कि मोर्चा बंगाल की सत्ता में हजारों कुर्बानियों और लंबे जमीनी संघर्ष के बाद आया था। सत्ता में आने पर भूमिसुधार, पंचायती राज को सशक्त करने जैसे कामों ने गांवों की जनता और वाम मोर्चे के बीच एक अनूठे अभिभावकीय संबंध को पैदा कर दिया। माकपा ने जिस तरह भूमिहीनों को जोतदार और किसानों को राजनीतिक कर्ता बना दिया था, उसके चलते जनता ने पार्टी को अपना बड़ा भाई, संरक्षक मान लिया था। अभिभावक को काफी हद तक अहंकार और नियंत्रण का अधिकार भारतीय पारिवारिक संबंधों में होता है।

मगर सिंगूर और नंदीग्राम की भूमि अधिग्रहण की कवायदों और पछतावा-रहित राजकीय हिंसा के बाद इस रिश्ते में दरार पड़ने लगी। गांवों की जनता वाम मोर्चे से खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगी। मगर यह अजीब है कि पंचायत, संसद चुनावों में हार के बाद मोर्चा भी जनता के दिए ‘धोखे’ से ठगा सा रह गया। संरक्षितों के विद्रोह को अभिभावक स्वीकार नहीं कर पाते! मोर्चे के प्रति ग्रामीण जनता की राजनीतिक वफादारी को सामंती लहजे में हमेशा के लिए अर्जित मान लिया गया था। ग्रामीण जन पार्टी की बदली प्राथमिकताओं से चकित थे। वहीं जिन ग्रामीणों के लिए पार्टी ने इतने संघर्ष किए, जिन्हें आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से इतना सबल किया, उनके अविश्वास से पार्टी स्तंभित थी।

2006 में उद्योगीकरण का नारा लगाया तो बुद्धदेव को तीन-चौथाई बहुमत मिला। मगर इसके एक साल बाद ही यही उद्योगीकरण माकपा के पांव का पत्थर बन गया। बुद्धदेव 2001 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तब वे ज्योति बसु की पसंद थे। माकपा के पुराने सामाजिक-जनवादी ढर्रे से नाता नहीं तोड़ सके थे। 2006 में चुनाव की और जाते हुए एक नए बुद्धदेव थे उद्योगीकरण के नारे के साथ। शायद बिना यह अहसास किए कि 1977 से 2001 तक बंगाल उद्योगीकरण के रास्ते पर नहीं बढ़ पाया तो इसकी वजह सामाजिक न्याय का विशिष्ट बंगाल मॉडल भी था, जो भूमिसुधार ही नहीं, मजदूरों के ट्रेडयूनियन अधिकारों की हिफाजत पर भी आधारित था। जिसके चलते दीगर समस्याओं के रहते हुए भी चुनाव-दर-चुनाव लाल पताका फहराती रही।

जब बुद्धदेव वाम सरकार के नेता बने तब तक नवउदारवाद ने तमाम सरकारों के जेहन में अपनी अनिवार्यता का तर्क उतार दिया था। केंद्र सरकार राज्य सरकारों को पूंजी निवेश पर अपने स्तर पर फैसला करने की छूट देने लगी थी। रही-सही कसर सोवियत संघ के विघटन के बाद चीन की बाजार पूंजीवाद की तरफ लंबी छलांग ने पूरी कर दी। विचारधारा के स्तर पर उत्पादक शक्ति के ऊंचे स्तर और विज्ञानवाद की फंतासी थी ही। 2006 में उद्योगीकरण के नारे से शहरों में माकपा मजबूत हुई, वहीं गांवों में वाम समर्थन की यथास्थिति बनी रही। गांवों की जनता को सिंगूर और नंदीग्राम के बाद ही अहसास हुआ कि उद्योगीकरण का उनकी आजीविका के नष्ट होने से क्या रिश्ता है।

ये आंदोलन बंगाल में नवउदारविरोधी जनउभार थे, जिनका दायरा फैलता ही गया। ममता ने जिसका नेतृत्व संभाल कर राजनीतिक परिवर्तन की संभावना पैदा कर दी। बंगाल की राजनीति की वाम जगह को वाम ने जैसे ही खाली करना शुरू किया, ममता ने अपने लड़ाकू तेवरों से वह जगह भर दी। जो वाम विचारों की पार्टी है, वह राज्य के भीतर पूंजीवादी निवेश, नवउदारवादी भूअधिग्रहण की चैंपियन बन कर उभरी और जो पूंजीवादी विचारों और एलानिया तौर पर वाम-विरोध से जुड़ी पार्टी है, वह किसानों और जन-सरोकारों की पक्षधर बन कर उभरी!

गांव तो छूटे ही शहरों की जनता में माकपा की लोकप्रियता नहीं बढ़ी। आधुनिकतम टेक्नोलॉजी आधारित उद्योगीकरण के रोजगार से कमजोर रिश्ते को लेकर आम लोग बिलकुल अनजान हों, ऐसा नहीं है। फिर नवउदारवादी उद्योगीकरण और ट्रेड यूनियन के जुझारूपन में छत्तीस का आंकड़ा उस प्रदेश में अहम हो जाता है, जहां हर चीज की यूनियन है और उसकी सामाजिक मान्यता है। बंगाल के कलाकार और बुद्धिजीवी मजदूरों-किसानों के आंदोलनों से पारंपरिक रूप से जुड़े रहे हैं। इसलिए नंदीग्राम के तुरंत बाद राजकीय हिंसा के वैधीकरण की कोशिशों और पार्टी के अहंकार की अभिव्यक्ति के चलते बहुत-से बुद्धिजीवी तृणमूल के साथ हो गए, जिससे ममता के पक्ष की बौद्धिक चमक कुछ बढ़ी।

लेकिन क्या बंगाल की जनता नवउदारवाद के खिलाफ सचमुच चुनाव जीत गई है? हमारे लोकतंत्र पर नवउदारवाद की लंबी छाया कुछ इस तरह पड़ रही है कि जनता जीत कर भी हार जाती है। जनता सरकारों को चुनती है और सरकारें फिर नवउदारवाद को। चाहे वह इंडिया शाइनिंग की हार हो या आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू के सत्ता परिवर्तन। पता नहीं, ममता फिक्की और कांग्रेस के नवउदारवाद और अपने ऊपर आयद कर दी गई नववामपंथी उम्मीदों के बीच संतुलन बनाने में कहां तक कामयाब हो पाएंगी। वह भी प्रशासन की चौंतीस सालों के ठहराव के दौरान पनपी पार्टीमुखी संस्कृति के बीच। तृणमूल इस जीत को दूसरी आजादी बता रही है। 1977 के बाद से माकपा और वाम मोर्चे की तमाम उपलब्धियों के नकार से ममता को सावधान रहना चाहिए। यह नकार और अति-आत्मविश्वास के उसी रास्ते पर कदम रख देना होगा, जिस पर हाल के सालों में वाम मोर्चा चल पड़ा था। वैसे भी 2009 या 2011 की हार के कारणों की खोज 1977 में नहीं की जानी चाहिए।

यह भी देखने की बात होगी कि माओवादियों से ममता कैसा रिश्ता रखती हैं। अब तक माकपा कार्यकर्ताओं की हत्याएं देश के स्तर पर बड़ा मुद्दा नहीं बन पाईं तो इसकी वजह माकपा का सत्ता में होना और उस पर राजनीतिक हिंसा के संगठन का आरोप रहा है। मगर तृणमूल के सत्ता में आते ही स्थिति बदल गई है। अब माओवादी पहले की तरह माकपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना जारी रखते हैं तो राज्य सरकार की जवाबदारी या भागीदारी का सवाल जरूर उठेगा।

इस लेख का एक संक्षिप्त रूप आज के जनसत्ता में छपा है।

9 thoughts on “वाम मोर्चे की करुण विदाई: ईश्वर दोस्त”

  1. AApka aalekh waise to adhura hi mere hisse aya, par bahut dilchasp tha…Jansatta ki khoj kar rahi hoon…par kab milega jan ko satta? Ya milega bhi?

  2. Ishwar bhai, in sab baton ke saath-saath mujhe ye bhi lagta hai ki Bengal ke aawam ko youn bhi lagne laga tha ki Left front ko harana namumkin hai. varna tasvir shayad ek-do election pahle hi badal jati. Ye to unhe last parliament aur municipal election ke baad ehsaas hua ki is pahalwan ko giraya bhi ja sakta hai aur mauka milte hi patak diya. Dusre, Mamta ke hote huye bhi vikalp ki kami thi.Mamta ko apni merit ki vajah se nahi balki left ki demerit ki vajah se satta sukh naseeb hua hai….

    1. कामरेड अश्विनी: आपने बिलकुल सही मुद्दा उठाया कि तस्वीर शायद एक-दो इलेक्शन पहले ही बदल सकती थी। वाम मोर्चे की लोकप्रियता में कमी 1996 के चुनाव से ही आ गई थी। मगर यथास्थिति का एक संतुलन बना हुआ था। (वैसे यह ऐतिहासिक भौतिकवाद के नजरिए से मजेदार बात हो सकती है कि वामपंथी, जो बदलाव के पक्षधर माने जाते थे, उनकी सरकारों में भी यथास्थिति पैदा हो सकती है, जिसके खिलाफ अवाम को जूझना होता है. खैर ऐसा ही सोवियत अनुभव था…)। आपकी यह बात भी ठीक है कि सिंगूर और नंदीग्राम के बाद ही जनता को यह अहसास हुआ कि वाम फ्रंट को भी हराया जा सकता है। यह बात भी एकदम सही है कि ममता के होते हुए भी विकल्प की कमी थी। एक वजह बीच में ममता का भाजपा की संगत की तरफ भटक जाना थी, जो बंगाल की अब तक की मोटे तौर पर बनी हुई सेकुलर परंपरा में स्वीकार नहीं थी। मगर ममता के भाजपा को छोड़ देने के बाद और नंदीग्राम के बाद के नवउदारवाद विरोधी जनउभार में ममता शायद इस वजह से नेतृत्व में उभर कर आ गई कि उसने कई सालों से अपनी सुसंगत माकपा-विरोधी लड़ाकू छवि बनाई हुई थी, फिर भी ज्यादा बड़ा कारण, जैसा कि आपने कहा लेफ्ट की डिमेरिट ही है।

  3. शानदार विश्लेषण है . बहुत से नए सवाल खड़े करता है . दोस्त तुम ने ऐसी मानसिकता को पकड़ने की कोशिश की है जिस की दूसरी उदाहरण दुनिया में शैद ही कहीं मिले. कया माकपाई अहंकार इस करुण विदाई के बाद भी विदा हो पाएगा ?इसी अहंकार से माकपा का जन्म हुआ था और इस के होने का तर्क तो कब का गैब हो चूका है.

  4. अगस्त 2010 में आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक में सीताराम येचुरी ने कहा था , ‘जो महानुभाव पार्टी की पश्चिम बंगाल इकाई को कोस रहे हैं, उन्हें याद रहे कि यदि पश्चिम बंगाल में हमारी सरकार 30 साल राज न करती तो शायद आप और हम यहां बैठ कर पार्टी की बात ही न कर रहे होते। पार्टी होती ही नहीं।’

  5. कृष्णा दी: आलेख पसंद करने के लिए शुक्रिया। आपने बड़ा सवाल उठा दिया है कि जन को सत्ता कब मिलेगी? या मिलेगी भी? समस्या यही है कि जन की तरफ से जो सत्ता लेते हैं वे अभिजन क्यों हो जाते हैं। वाम और अवाम के रिश्ते भी किसी पितृसत्तात्मक कुटुंब की तरह जटिल हैं।

  6. ਕਾਮਰੇਡ ਚਰਨ: ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਬਹੁਤ ਬਢਿਯਾ ਤਰਜੁਮੇ ਵਾਸਤੇ ਸ਼ੁਕ੍ਰਿਯਾ.
    कामरेड चरण: लेख का बहुत अच्छी पंजाबी में तर्जुमा कर अपने ब्लॉग ‘ਮੁੱਖ ਧਾਰਾ مُخ دھارا Mukh Dhara’ में लगाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। जो साथी इसे पंजाबी में पढ़ना चाहते हैं वे http://satdeepgillrachna.wordpress.com/ साइट पर जाकर ਖੱਬੇ ਮੋਰਚੇ ਦੀ ਕਰੁਣ ਵਿਦਾਈ : ਈਸ਼ਵਰ ਦੋਸਤ को खोल सकते हैं।
    आपने माकपा के अंहकार के ऐतिहासिक स्रोत की बात ठीक उठाई है। इसी तरह की मिसालें दुनिया की कुछ और स्टालिनवादी पार्टियों में भी शायद हों। वैसे तो वामपंथ वस्तुगत सत्य के एकमात्र एजेंट होने के नाते और अपनी ऐतिहासिक भूमिका, (जिसे काफी हद तक ईश्वरीय मान लिया गया ..जैसे इतिहास के परम पिता ने हिरावल पार्टी के महासचिव के कान में फुसफुसाकर कह दिया हो कि इस भोली-भाली जनता को कुछ समझ नहीं आएगा, तुझे ही एक चरवाहे की तरह इन बिचारों को समाजवाद तक हांक कर ले जाना है…), आदि के चलते हर तरह के वाम में अंहकार की प्रखरता और तेजस्विता दिखती है। हालांकि वाम परंपरा में ही कभी पीसी जोशी जैसे लोग भी थे। मगर जो बात माकपा को बाकी सब से अलग करती है, वह है स्टालिनवाद का ‘सामाजिक जनवाद” (और अब नवउदारवाद से भी…भले ही पूरी तरह से नहीं, और कुछ जगहों पर ज्यादा बुरे रूप में..) से अनोखा मेल। इससे दूसरों के लिए ही नहीं खुद के लिए भी भ्रम उपजता है। नवउदारवाद के चलते लगता है कि वाह हम कितने उदार हैं, वहीं कोई भटकाव की बात करे तो स्टालिनवाद की ढाल से बचाव हो सकता है कि देखो तो सही हम विरासत पर डटे हुए हैं। इसलिए आपका यह सवाल माकूल है कि क्या माकपाई अहंकार इस करुण विदाई के बाद भी विदा हो पाएगा? लगता तो नहीं है। आपको याद होगा कि संसद चुनावों के तुरंत बाद काफिला में ‘वाम के खिलाफ अवाम’ पर चली बहस में एक सवाल के जवाब में मैंने लिखा था “…सीपीआइ को तो आत्म आलोचना की थोडी-बहुत प्रेक्टिस है, पर हमेशा सही रहनी वाली सीपीएम अचानक यह कर नहीं पायेगी. ममता, कांग्रेस, टाटा विरोधी उद्योगपतियों और सम्प्रदायवादी वाम विरोधी ताकतों का एक साथ मिल जाना, तीसरे मोर्चे की नाकामी जैसे ‘कारण’ उनके जेहन में रह-रह कर उभरेंगे. संकट आँखें खोलता ही नहीं है, कई बार बंद भी कर देता है।…” हालांकि इस बार कुछ माकपा साथियों ने (फोन या मेल पर) दो टूक आत्मालोचना की, मगर एक तो वे बंगाल के नहीं हैं, दूसरे उनकी तादाद पार्टी में बहुत कम है। ज्यादातर माकपा साथी अब तक उनकी किसी भी तरह की आलोचना को सीआईए की साजिश बताने जैसी मानसिकता से नहीं उबर पा रहे हैं, ऐसा लगता है। आलोचना मात्र से इतना डर और चिढ़ रहेगा तो फिर आत्मालोचना की क्वालिटी पर भी असर तो पड़ेगा ही, क्योंकि आत्मालोचना भी एक तरह की आलोचना ही है, फर्क सिर्फ इतना है कि इसे खुद करना होता है। एक इतनी बड़ी पार्टी में यह ‘खुद’ कौन है, इसे भी महासचिव ही तय करने लगते हैं।

  7. i think a basic theoritical link was missing that is the diffrence betweem social democracy and socialist democracy can we really call pariamentary left as comminists

  8. असित: सामाजिक जनवाद और समाजवादी जनवाद में फर्क जरूर है।
    मैंने इस लेख में कहा है कि “बुद्धदेव 2001 में … माकपा के पुराने सामाजिक-जनवादी ढर्रे से नाता नहीं तोड़ सके थे।” काफिला में ही आए 2009 में लिखे लेख ‘वाम के खिलाफ अवाम’ में लिखा था “…1977 में बंगाल की जनता ने वाम मोर्चे को सत्ता में पहुंचाया था तो कम्युनिस्ट क्रांति के लिए नहीं, बल्कि भूमि सुधार, सामाजिक न्याय और मजदूर-किसान के जीवन की बेहतरी के सामाजिक-जनवादी एजेंडे के लिए। माकपा और सहयोगी पार्टियों के नाम में भले कम्युनिस्ट जुड़ा हुआ हो, लेकिन वे बंगाल में जिस वाम जगह को घेरती हैं, उसकी अंतर्वस्तु कम्युनिस्ट नहीं है। यह अंतर्वस्तु पूंजीवादी या सामाजिक जनवादी ही है। यही माकपा का पार्टी कार्यक्रम कहता है। यही तर्क माकपा के एक पैरवीकार प्रभात पटनायक ने ‘इकोनॉमिक ऐंड पोलिटिकल वीकली’ में बुद्धदेव का बचाव करते हुए दिया था।…”।

    मगर जहां तक समाजवादी जनवाद का सवाल है, यह है कहां? शायद मार्क्स के पेरिस कम्यून, गोथा कार्यक्रम और अन्य रचनाओं में वाक्यों के बीच में लेनिनवादी-स्टालिनवादी पाठ के डर से कहीं दुबका पड़ा हो। या फिर रोजा लक्जेमबर्ग या ग्राम्शी की उपेक्षित पड़ी कुछ प्रस्थापनाओं में मिल जाए। मुझे नहीं लगता कि स्वयं को कम्युनिस्ट करने वाले दलों की समाजवादी जनवाद में कोई गहरी रुचि बची है। इसीलिए यह अवधारणा डेढ़ सौ साल से ज्यादा से साकार होने के लिए तड़पड़ा ही रही है। कुछेक बुद्धिजीवी और वामपंथी इस तड़प को समझते हुए गम गलत करते रहते हैं।

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