मुकदमा क्या सिर्फ मीना कुमारी पर चले ?: अपूर्वानंद

मीना कुमारी पुलिस हिरासत में हैं.उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 120 के तहत मामला दर्ज किया गया है. यानी उन पर छपरा के गंडामन गाँव के नवसृजित प्राथमिक विद्यालय में पढने वाले तेईस बच्चों की ,जो स्कूल का मध्याह्न भोजन खाने के बाद मारे गए, इरादतन ह्त्या और उनकी ह्त्या के लिए आपराधिक षड्यंत्र का आरोप है.उन पर मुकदमा चलने और साक्ष्यों के स्थापित होने के  पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने दल के कार्यकर्ताओं के समक्ष शिक्षा मंत्री के षड्यंत्र के सिद्धांत को दुहराया है. आज , जब मैं जनसत्ता में छपी अपनी टिप्पणी को देख रहा हूँ, मुख्यमंत्री ने इसे दुर्घटना मानने से इनकार किया है. लेकिन वे इसे बाहरी साजिश का नतीजा मानते हैं. पहले ही इशारे किए जा चुके हैं. मीना कुमारी के पति के राष्ट्रीय जनता दल से सम्बन्ध की बात बार-बार कही जा रही है. कहा जा रहा है कि दुर्घटना वाले दिन वह स्कूल आया था और यह भी कि भोजन सामग्री की खरीदारी वही किया करता था. पहले यह खबर लगातार चलाई गई कि भोजन-सामग्री उसकी दुकान से खरीदी जाती थी. सच यह है कि उसकी कोई दुकान नहीं है. यह भी कोई  नहीं पूछ रहा कि आखिर मीना कुमारी का पति  सामान न खरीदता तो और कौन था यह काम करने वाला? क्या यह काम भी मीना कुमारी को ही करना चाहिए था?

मीना कुमारी की तस्वीर खलनायिका की बन चुकी है: रसोई बनाने वाली के संदेह के बावजूद  खाना उसी तेल में बनाने और फिर बच्चों की हिचक के बाद भी उन्हें खाने को मजबूर करने वाली औरत हत्यारी नहीं तो और क्या हो सकती है!

मुख्यमंत्री का यह कहना ठीक है कि यह दुर्घटना नहीं. लेकिन उस वजह से नहीं जिसकी ओर वे संकेत करना चाहते है. इस वजह से कि बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में यह कभी भी हो सकती थी और आश्चर्य इस बात का होना चाहिए कि ऐसी दुर्घटना एक ही बार क्यों हुई! लेकिन मुख्यमंत्री सवाल के इस तरह पूछे जाने पर चोट खाए प्रेमी की तरह शिकायत करने लगते हैं.

इधर उनके शिक्षा मंत्री ने यह भी कहा है कि बिहार के सत्तर हजार स्कूलों में दिए जा रहे भोजन की गुणवत्ता की गारंटी करना असंभव है. उन्होंने यह कहा कि किस स्कूल में कब कौन अपराधी घुस कर खाने में जहर मिला दे, कैसे जाना जा सकता है.इस अक्षम्य वक्तव्य से उन्होंने पूरे राज्य में स्कूलों के  मध्याह्न भोजन को लेकर अभिभावकों के मन में संदेह और भय पैदा  कर दिया है. इस बयान के बाद कौन माँ-बाप अपने बच्चों को सरकारी स्कूल का खाना खाने देने को तैयार होगा? अगर अभी भी स्कूलों का खाना बिहार के बच्चे खा रहे हैं तो इसका एक ही कारण है: उनकी दुस्सह गरीबी और भूख से पैदा हुई लाचारी जो विरोध को भी मार डालती है. जो सरकार स्कूलों में अपने बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेवारी लेने से  इस दंभ के साथ इनकार करती है, उसे बने रहने का अधिकार कैसे है, समझना मुश्किल है.

इसके पहले कि  मीना कुमारी को फांसी देने की मांग उठे, हम कुछ तथ्य जान लें जिनसे शायद  गंडामन के बच्चों की मौत की परिस्थितियों को  बेहतर समझने में हमें मदद मिले . पहले कुछ स्थानीय तथ्य :

  • मारे गए तेईस बच्चे नव-सृजित प्राथमिक विद्यालय के छात्र थे जो हाल ही में गाँव में पहले से स्थित मध्य विद्यालय को तोड़कर बनाया गया था.
  • इसमें गड्ढों वाले फर्श का एक कमरा भर है.
  • यहाँ न खाना बनाने को अलग कमरा है, न भण्डार. साफ़ पेयजल का इंतजाम नहीं है. बाहर के चापाकल से खारा पानी आता है.
  • अभियुक्त मीना कुमारी कोई प्रधानाध्यापिका नहीं थीं. वे इस विद्यालय की प्रभारी शिक्षिका भर थीं.
  • उन्हें मिला कर यहाँ केवल दो शिक्षिकाएं थीं जिनमें से एक दुर्घटना के समय छुट्टी पर थीं. यानी मीना कुमारी को पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को पढ़ाने, उनके मध्याह्न भोजन का इंतजाम करने से लेकर दूसरे  प्रशासकीय काम अकेले ही करने थे.
  • मीना कुमारी नियोजित शिक्षिका हैं जिन्हें छह हजार तीन सौ रुपए का बंधा महीना मिलता है. हमारी जानकारी के  मुताबिक़ वे प्रशिक्षित भी नहीं हैं.
  • विद्यालय की विद्यालय प्रबंधन समिति का अस्तित्व नहीं है जो शिक्षा के अधिकार के क़ानून के अनुसार अनिवार्य है.
  • अब तक किसी शिक्षा विभाग के या मध्याह्न भोजन की निगरानी करने वाले  किसी अधिकारी ने इस विद्यालय का निरीक्षण नहीं किया था.
  • भारत की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार इस गाँव में अनुसूचित जाति के लोग कुल आबादी के सताईस  प्रतिशत हैं जबकि यह आंकड़ा बिहार के लिए पंद्रह  प्रतिशत है.गाँव की अड़तीस प्रतिशत आबादी साक्षर है और सिर्फ उन्नीस प्रतिशत स्त्रियाँ साक्षर हैं. बिहार की आबादी की  अड़तालीस  प्रतिशत आबादी  खेती पर आधारित श्रमिकों की है जबकि  इस गाँव की अट्ठावन प्रतिशत.

अब हम किंचित व्यापक परिदृश्य को देखें:

  • बिहार सरकार मध्याह्न भोजन के लिए केंद्र से मिली राशि में से पचास-साठ  प्रतिशत ही खर्च कर पाती है.
  • मध्याह्न भोजन के लिए दिए गए अनाज का मात्र तैंतालीस  प्रतिशत ही पिछले वित्त-वर्ष में बिहार सरकार खर्च कर पाई है .
  • पिछले वित्त-वर्ष में खाना बनाने और भंडारण के लिए कमरा बनाने को केंद्र से मिली रकम से तकरीबन पाँच सौ  करोड़ रुपए बिहार सरकार ने तब वापस किए जब इन ये मौतें हो रही थीं.
  • बिहार के अधिकतर नव-सृजित विद्यालयों में साफ़ पेय जल, शौचालय, खाने बनाने और भण्डार का इंतजाम नहीं है.
  • बिहार के अधिकांश प्राथमिक शिक्षक अप्रशिक्षित या अर्ध-प्रशिक्षित हैं.इनकी तनख्वाह दयनीय है और उनकी सेवा अनियमित है.
  • सरकार ने शिक्षा के अधिकार संबंधी क़ानून के मुताबिक़ अनिवार्य विद्यालय प्रबंधन समितियों का गठन  नहीं होने दिया है. नियमानुसार पिछले विधान सभा के चुनाव से पहले  ही उनके लिए चुनाव हो जाने थे जो नहीं कराए गए.

अब कुछ अतिरिक्त तथ्य:

  • जनता दल(यू) और भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कोई  डेढ़ लाख पारा-शिक्षकों (शिक्षा मित्र)की नियुक्ति सत्ता संभालते ही बिना किसी नियमित प्रक्रिया के की थी.उस समय उनकी योग्यता देखना ज़रूरी नहीं समझा गया था.
  • इसके पहले राष्ट्रीय जनता दल की सरकार ने एक लाख पारा-शिक्षकों की बहाली की थी. इस सरकार ने उन्हें भी नियोजित कर लिया लेकिन नियमित शिक्षक के दर्जे से काफी नीचे रखा.
  • इन शिक्षकों की बहाली पंचायतों ने  बिना  किसी नियमित चयन-प्रक्रिया के की थी.
  • इनमें  से अधिकतर अप्रशिक्षित और अपेक्षित योग्यता से विहीन हैं.
  • विद्यालयों में खाना बनाने वालों को अधिकतम मासिक तनख्वाह एक हजार रुपए मिलती है. सफाई और बड़ी संख्या में बच्चों के लिए भोजन बनाने का कोई प्रशिक्षण उन्हें नहीं है.
  • प्राथमिक शिक्षा और मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता का अध्ययन करने को  केंद्र सरकार की ओर से चुनी गई संस्थाओं ने बिहार में  मध्याह्न भोजन की व्यवस्था से जुड़ी कमियों को विशेष तौर पर  चिह्नित किया था और उनकी रिपोर्ट में बिहार सरकार को भंडारण, खाना बनाने की अलग जगह , सफाई , आदि को लेकर चेताया गया था.
  • जहरीले भोजन के शिकार बच्चे जब नजदीक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे तो वहाँ सिर्फ एक डॉक्टर था. दो और अनियमित डॉक्टर इस केंद्र में नियुक्त हैं. पहले डॉक्टर गलत दवा चलाते रहे और सिविल सर्जन की सलाह के बाद ही सही दवा दे पाए.निकट के छपरा मुख्य हस्पताल और पटना मेडिकल कॉलेज ले जाने के लिए  एम्बुलेंस सेवा निहायत नाकाफी थी. इससे बच्चों के सही इलाज में घातक देरी हुई. ध्यातव्य है कि हाल-हाल तक स्वास्थ्य विभाग सरकार की सहभागी भारतीय जनता पार्टी के पास ही था जो अभी सरकारी सेवाओं की बदइंतजामी के लिए सरकार का इस्तीफा माँगने को  गला फाड़ रही है.

इन तथ्यों के आधार पर बिहार का कौन सा यथार्थ हमारे सामने उभरता है? यह एक अत्यंत क्षीण प्रशासनिक क्षमता वाले राज्य का यथार्थ है जो अपने बच्चों के लिए मिले संसाधन और पैसे का  इस्तेमाल कर पाने में नाकाबिल है. यह एक ऐसे राज्य का यथार्थ है जिसमें राजकीय योजनाओं के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने लिए सुपरिभाषित निगरानी की प्रक्रियाओं का अभाव है. यह एक ऐसे राज्य का यथार्थ है जिसमें किसी भी आकस्मिक स्थिति का सामना करने की तैयारी शून्य है. यह एक ऐसे राज्य का यथार्थ है जिसकी अलग-अलग प्रशासनिक शाखाओं में कोई तालमेल और संवाद नहीं है. इसमें फौरन प्रतिक्रिया की क्षमता बिलकुल नहीं है. निगरानी की बाहरी रिपोर्ट को समझ न पाने से पता चलता है कि सरकार में मौके की फौरी ज़रूरत को समझ पाने की लियाकत की सख्त कमी है. केंद्र सरकार के इस वक्तव्य पर कि मध्याह्न भोजन की वैसी कमियों को लेकर बिहार सरकार को चेतावनी दी गई थी  जो इन बच्चों  के लिए घातक साबित हुईं, जिस तरह बिहार के मंत्री और अधिकारियों ने आश्चर्य व्यक्त किया है और शिक्षा मंत्री ने जिस तरह किसी भी व्यवस्थागत कमी को स्वीकार करने से इंकार किया, उससे इस सरकार की  दंभपूर्ण असंवेदनशीलता  का पता चलता है.

गंडामन की सामाजिक संरचना से यह पता चलता है कि शासकीय मामलों में हस्तक्षेप की उसकी क्षमता बहुत कम है. अमर्त्य सेन द्वारा स्थापित संस्था प्रतीची ने अपने अध्ययन के द्वारा बिहार के स्कूलों में, विशेषकर मध्याह्न भोजन के प्रसंग में कमियों का लगातार उल्लेख किया है. इन सबका तात्पर्य यह है कि जिन इलाकों में स्थानीय समुदायों की हस्तक्षेपकारी क्षमता कम है, वहाँ राजकीय और बाहरी समाज का सहारा बहुत ज़रूरी है जिससे उन्हें ताकत मिल सके. यह ट्रेजेडी यह भी बताती है कि बिहार में इसका भी सख्त अभाव है. किसी प्रकार का सहयोगी सामाजिक आन्दोलन तो नहीं ही है, राजनीतिक दलों की प्राथमिकता सूची में शिक्षा बहुत नीचे है. बिहार में विद्यालय प्रबंधन समितियों का न होना  मुद्दा नहीं है, इससे उस तिक्त उदासीनता का पता चलता है जो इन मामलों को लेकर समाज में फैली हुई है.सांस्थानिक प्रक्रियाओं को लेकर भी घोर लापरवाही समाज में है जिसके चलते  निहित सामाजिक और राजनीतिक स्वार्थ का गठजोड़ अनौपचारिक यथास्थिति से लाभ उठा रहा है.

अब हम कुछ सवाल करने की स्थिति में हैं. वे इस प्रकार हैं:

  • गंडामन के मध्य विद्यालय को तोड़ कर बिना किसी सुविधा वाले इस नव-सृजित विद्यालय के निर्माण का फैसला किसने और किस स्तर पर किया ?
  • इस विद्यालय में ( और दूसरी जगहों पर भी) मध्याह्न भोजन के सुचारु  संचालन के लिए निगरानी की कोई  व्यवस्था क्यों नहीं थी ?
  • एक अकेले शिक्षक से भोजन सामग्री खरीदने , उसका सुरक्षित भंडारण करने , खाना बनवाने और साठ से अधिक बच्चों को खिलाने के साथ- साथ पहली से पांचवी तक की कक्षाओं को पढ़ाने के अपेक्षा कैसे की जा रही थी?
  • बिहार में विद्यालय प्रबंधन समितियां क्यों नहीं हैं?
  • प्रतीची समेत अन्य संस्थाओं की चेतावनी के बाद कमियों को दुरुस्त करने के लिए बिहार सरकार ने क्या कदम उठाए?
  • बिहार के  शिक्षक अर्ध-शिक्षक क्यों हैं? उनकी यह दुर्दशा क्यों है?
  • बिहार के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र किसी आकस्मिक स्थिति का सामना करने में नाकाबिल क्यों हैं? वहाँ प्राण-रक्षक दवा क्यों  नहीं थी? क्यों छपरा का प्रमुख जिला हस्पताल भी इन बच्चों का इलाज न कर पाया? स्वास्थ्य सेवा में आम तौर पर यह बदइंतजामी क्यों है?
  • मंत्री को बिना जांच के बच्चों की मौत के पीछे किसी साजिश का पता कैसे चल गया? इस विद्यालय और अन्य विद्यालयों की अव्यवस्था के लिए उन्होंने खुद कोई  जिम्मेवारी अब तक क्यों नहीं कबूल की है?
  • मारे गए बच्चों के परिजनों के पास इस दुःख की घड़ी में खड़े रहने की बात तो दूर , मुख्यमंत्री को उनके प्रति संवेदना के दो बोल भी क्यों महंगे लगे? अगर उनका अंगूठा टूट गया था और वे छपरा नहीं जा सकते थे तो क्या पटना मेडिकल हस्पताल जाना भी उन्हें भारी था? वैसे, कोसी की भयंकर बाढ़ हो या फारबिस गंज का गोली काण्ड, मानवीय त्रासदी में ये मुख्यमंत्री कभी इंसान की तरह पेश नहीं आ सके हैं, हमेशा उनकी प्रतिक्रिया ठंडी नौकरशाही प्रतिक्रिया ही रही है.
  • इस विपदा में गाँव वालों की क्या मदद राजनीतिक दलों ने की?संकट के उस क्षण में जब बच्चे मर रहे थे, बंद का क्या औचित्य था? क्या उन्होंने कभी स्कूली शिक्षा या स्वास्थ्य को लेकर कोई  आन्दोलन बिहार में किया है?फिर इन गाँव वालों की ओर से क्रोध दिखाने का उनका क्या अधिकार है?

मीडिया को अचानक बिहार के स्कूलों और हस्पतालों की बदहाली दिखाई देने लगी है.पिछले आठ सालों में तो स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया में  एक-दूसरे से नीतीश सरकार का सर्वतोमुखी गुणगान करने में  प्रतियोगिता चलते ही हमने देखी है.बिहार सरकार के आमंत्रण पर भ्रमणकारी बौद्धिक भी,जो आगे बढ़ कर उसे सुशासन का  ही नहीं सामाजिक परिवर्तन का प्रमाण पत्र  देते  रहे हैं और इस प्रकार उन्होंने आलोचनात्मकता के बौद्धिक कर्तव्य का जो पूरा त्याग कर दिया है, उसके बारे में अब क्या कहना चाहेंगे? क्या बिहार सरकार की जनता के प्रति अंहकारपूर्ण लापरवाही के लिए वे भी कुछ जिम्मेवार नहीं?

इस घटना के  बाद नवादा में छात्रों द्वारा शिक्षकों पर हमले की खबर आई. एक दूसरे स्कूल में रसोइए के न आने के कारण छात्रों की मांग पर उन्हें जलेबी खिलाए जाने पर एक अध्यापिका से जवाब तलब का समाचार भी छपा. मीना कुमारी ने आत्मसमर्पण कर ही दिया है.लेकिन अगर हमने इन सवालों को पूछना जारी नहीं रखा और इस त्रासदी की सारी कड़ियों को नहीं पहचाना तो इस तरह की और खबरों  के  लिए  हमें तैयार रहना चाहिए.

(  A slightly expanded version of the earlier piece published in English by Rediff.Com and in Hindi by Jansatta)

4 thoughts on “मुकदमा क्या सिर्फ मीना कुमारी पर चले ?: अपूर्वानंद”

  1. This tragedy would be responsible for increasing mistrust on Mid Day meal scheme in whole country. even if, we will accept Bihar Government’s statements of planned conspiracy then also its responsibility of government itself to check and monitor Mid day meal or any other such scheme and more then that at least they should accept their faults of lack of well functioning of scheme. Government is directly responsible for this tragedy and not only Mina Kumari. I think at least governments of other states should also take lessons from this tragedy because cases of unconsciousness, vomiting in children after eating mid day meal and insects and worms are common in almost all places.

  2. अभी करीब एक पखवाड़े पहले अपने गांव गया था। वहां नौ बजे सुबह शुरू होने वाले स्कूल से ग्यारह बजे लौटते बच्चों को देखा तो तीन दिन में करीब सौ बच्चों से बात की। पूछा कि अभी क्यों लौट रहे हो, सबने बताया कि सुबह आठ बजे घर से निकलते हैं, भूख लग जाती है, इसलिए लौट रहे हैं। मैंने पूछा- स्कूल में खाना…? उन्होंने बताया कि दो बजे बनना शुरू होता है। मैंने पूछा- मास्टर रोकता नहीं है? बच्चों ने कहा कि नहीं। सारा हिसाब समझ में आ गया। भूख की वजह से आधे बच्चे दोपहर की छुट्टी के पहले निकल जाते हैं। उन्हें देख कर पच्चीस फीसद और निकल जाते हैं। लगभग तीन बजे बच जाते हैं महज पच्चीस फीसद बच्चे… दोपहर का खाना खाने के लिए। कौन जानता है कि यह हर रोज बनाई जाने वाली दस-बीस फीसद ज्यादा हाजिरी के अलावा हो! कौन मास्टर कितना स्कूल आता है, गांवों में जाकर देखिए। सब फिक्स है। अपूर्वानंद जी ने ठीक लिखा है। जांच के लिए कोई तंत्र है भी तो सब फिक्स। मामला जितना नीचे दिखता है, वह सीधे ऊपर तक जाता है। इसलिए मीना कुमारी को फांसी पर चढ़ाने की कवायद इसी तंत्र को जिंदा रखने की कवायद है।
    29 अक्‍टूबर 2009 को जनसत्ता में मैंने “बदलते बिहार का वितंडा” (http://charwakshesh.blogspot.in/2010/04/blog-post_7052.html) शीर्षक से एक लेख लिखा था तो मुझ पर पूर्वाग्रही और यहां तक दुराग्रही होने के आरोप लगाए गए थे। तब बिहार और देश के मीडिया में नीतीश-भक्ति का दौर चल रहा था और “ट्रांसफॉरमेंट बिहार” और “बदल गया बिहार” जैसे विश्लेषणों का राज था। लेकिन तब भी यही सच था कि स्कूलों-अस्पतालों का रंग-रोगन करा कर दुनिया को बताया जा रहा था कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में शिक्षा अमेरिका (या दुनिया के किसी भी उस देश के, जहां की शिक्षा सबसे अच्छी हो) के बराबर और स्वास्थ्य सेवाएं क्यूबा के बराबर हो गई हैं!!! सवाल है कि इस तरह घटनाओं की जमीन जब बन रही थी, तब इसी मीडिया की आंखों पर नीतीशिया पट्टी किसने चढ़ा दी थी। इसका खुलासा देखना है तो बिहार में नरेंद्र मोदी के फर्जी मुद्दे पर नीतीश कुमार के भाजपा से अलगाव के बाद के बिहार के अखबारों का अध्ययन कर लीजिए। फिर प्रेस काउंसिल की रिपोर्ट में मीडिया को एक तरह से बख्श कर सिर्फ सरकारी ब्लैकमेलिंग को कठघरे में पेश करने की हकीकत दिख जाएगी। दरअसल, बिहार में (देश भर में) मीडिया का जो सामाजिक और आर्थिक चरित्र है, उसमें इससे ज्यादा कुछ होना भी नहीं था। इक्के-दुक्के उदाहरणों से हमारे देश के सत्ता-तंत्र के पुर्जे यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि हमारा लोकतंत्र बराबरी के उदारवाद पर जिंदा है। इस परदे के पीछे क्या-क्या ढका गया है, यह तब सामने आता है जब हवा का कोई तेज झोंका उसे थोड़ा उड़ा देता है। छपरा (गंडामन) की घटना उसका एक उदाहरण भर है। इस बहाने परदे के पीछे की कई तस्वीर लोगों को देखने को मिली।

    1. “ट्रांसफॉरमेंट बिहार” की जगह कृपया “बिहार ट्रांस्फॉर्म्ड” पढ़ें। (सॉरी)

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