श्रीलंका और हम

श्रीलंका अभी खबरों में है. लेकिन ज़्यादातर हिंदी अखबारों को पढ़ने से आपको अंदाज़ नहीं मिलेगा कि सुदूर दक्षिण में स्थित इस नन्हें-से मुल्क में क्या कुछ हो रहा है जिससे हमारा भी रिश्ता है.वहाँ अभी‘कॉमनवेल्थ’ देशों का सम्मलेन हो रहा है और हमारे प्रधानमंत्री उसमें शामिल नहीं हो पा रहे हैं.श्रीलंका ने कहा है कि वह उनकी मजबूरी समझता है. तमिल राजनेताओं के हंगामे की वजह से प्रधानमंत्री ने अपनी जगह विदेश मंत्री को इस सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व करने को कहा है. इस सम्मलेन में श्रीलंका को अगले दो साल के लिए ‘कॉमनवेल्थ’ का नेतृत्व करने को कहा जाएगा. इस पर भारत को ऐतराज नहीं है और अब तक किसी और मुल्क ने भी अपनी आपत्ति दर्ज नहीं कराई है.

इस स्तम्भ में श्रीलंका के लगभग साठ वर्षों के ‘सिंहली-बौद्ध’ प्रभुत्व और ‘तमिल(हिंदू)-मुस्लिम’ दमन के ब्योरे का अवकाश नहीं है. जिनकी दिलचस्पी हो,वे ‘कोलम्बो टेलीग्राफ’ में सिंहली बुद्धिजीवी ब्रायन सेनेविरत्ने का लेख पढ़ सकते हैं और काफ़िला में इस विषय पर  प्रकाशित अनेक लेख देख सकते हैं.

जिन्होंने इंग्लैंड के ‘चैनल फोर’ के कैलम मक्रे की फिल्म ‘नो फायर जोन’ देखी है वे जानते हैं कि ‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ को ध्वस्त करने वाले युद्ध के दौरान  तमिल आबादी के ऊपर श्रीलंका की सेना ने जो कहर बरपा किया उसे सिर्फ और सिर्फ मानवता के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में ही डाला जा सकता है.लाखों तमिलों की ह्त्या, हज़ारों को गायब कर दिया जाना, तमिल औरतों के साथ लगातार बलात्कार,तमिल इलाके पर कब्जा और अब वहाँ सिंहली-बौद्ध आबादी को बसाया जाना,तमिल-हिंदू मंदिरों को तोड़ कर बौद्ध स्तूपों में बदल देना…,ज़ुल्म की फेहरिस्त बहुत लंबी है.

तमिल इलाके को फौजी छावनी में बदल दिया गया है और वहाँ के बाशिंदे जैसे एक बड़ी जेल में ज़िंदगी बसर कर रहे हैं.लंका की सेना कब्जा कर लिए गए स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है. पूरी तरह से बर्बाद कर दिए गए इस इलाके के पुनर्निर्माण में अब देशों और पूंजीपतियों को अपने लिए व्यावसायिक संभावनाएं दीख रही हैं जिन्हें वे ‘मानवता’ जैसे भावुक विचार के आगे गँवाना नहीं चाहते. इन अपराधों के बारे में हमारा रवैया क्या है?हमारा राजनीतिक वर्ग इनकी चर्चा भी नहीं करना चाहता. इसे सिर्फ तमिल संवेदना के सन्दर्भ में ही समझा जाता है. खुद तमिलनाडु में पिछले वर्षों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया को चालाक अवसरवादिता से ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता.श्रीलंका को हमारे ‘सुरक्षा विशेषज्ञ’ रणनीतिक महत्त्व का मानते हैं.इस बात पर दुःख मनाया जा रहा है कि हमारी निष्क्रियता का फायदा चीन उठाए ले जा रहा है.

‘नो फायर जोन’ को देखना हमारे राजनेताओं ने ज़रूरी नहीं समझा. इंग्लैंड के प्रधान मंत्री डेविड कैमरून ने, जो श्रीलंका में हैं और जाफ़नाका दौरा कर आए हैं, इसे देखने के बाद कहा, “ मैंने जो वृत्तचित्र देखे हैं उनमें से सबसे दिल दहलाने देने वाले चित्रों में से एक है ‘नो फायर जोन.’… मैं राष्ट्रपति राजपक्षे  से मिलने पर अपनी चिंताओं से उन्हें अवगत कराऊँगा. मैं उनसे कहूँगा कि अगर श्रीलंका ( इस युद्ध में हुए अपराधों की) स्वतंत्र जांच की गारंटी नहीं देता तो अंतर्राष्ट्रीय जगत को निश्चित करना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय जांच हो.” उनके देश को काफी प्रायश्चित करना है उस पाप का जो उसने किए और जिनका परिणाम श्रीलंका की तमिल और मुस्लिम जनता भोग रही है. हमारा देश इतना भी नहीं कह पाया है.क्या इसलिए कि खुद हमारे हाथों पर श्रीलंका के तमिलों का खून लगा है और इस जुर्म के हम साझीदार रहे हैं?क्या यह सब कुछ तमिल राजनीतिक दलों की जानकारी में नहीं हो रहा था और क्या एक समय उन्होंने रणनीतिक खामोशी नहीं ओढ़ ली थी?

किसी भी देश के अंदरूनी मामलों से तटस्थ रहने के पक्ष में स्वतंत्र देश की संप्रभुता का हवाला दिया जाता है. लेकिन संप्रभुता का सिद्धांत उसी स्थिति में सार्थक होता है जब वहाँ की आबादी के हर हिस्से के साथ न्यायपूर्ण समानता का व्यवहार वह राज्य सुनिश्चित करे.जब ऐसा लगने लगे और इसके लिए पर्याप्त प्रमाण हों कि उस देश में आतंरिक रूप से ऐसी कोई संभावना नहीं बची है तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत के साथ हस्तक्षेप करना ही चाहिए.ऐसा उसने दक्षिण अफ्रीका के मामले में नस्लवादी शासन के खात्मे के लिए किया. और चूँकि इस्राईल के मामले में यह करने से वह हिचकिचाता रहा है, फिलिस्तीनियों पर उसका दमन बढ़ता जा रहा है.

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने खुद को असीमित अधिकार दे दिए हैं, उनके भाई के हाथ में वहाँ की रक्षा व्यवस्था है,2009 में समाप्त हुए युद्ध में जिन फौजी अधिकारियों पर युद्ध-अपराध के आरोप हैं, उनमें से अधिकतर अब दूसरे देशों में श्रीलंका के राजदूत बना कर भेज दिए गए हैं. इनमें से एक तो संयुक्त राष्ट्र सभा में श्रीलंका का प्रतिनिधि है.श्रीलंका की मुख्य न्यायाधीश को महाभियोग लगा कर राजपक्षा हटा चुके हैं.पत्रकारों के लिए श्रीलंका सबसे खतरनाक देश बन चुका है.सत्ता-विरोधियों का गायब हो जाना,उनकी ह्त्या सामान्य घटना है.क्या यह सत्ता’ खुद उन अपराधों की जांच कर सकती है जो उसने जारी रखे हैं?

’कॉमनवेल्थ’ सम्मलेन एक मौक़ा हो सकता था जब अंतर्रराष्ट्रीय समुदाय श्रीलंका की राजपक्षा सरकार को सख्त सन्देश देता कि उसकी सार्वजनिक मान्यता इस पर निर्भर है कि वह अपने यहाँ हुए इन अपराधों की जांच निष्पक्ष तरीके से करने के उपाय करे. यह न हो सका.

क्यों यह जांच ज़रूरी है,इसका एक कारण मालूम होगा जब हम ‘नो फायर जोन’के निर्देशक और उनके साथियों के साथ श्रीलंका में हुए बर्ताव को देख लें. इंग्लैंड की इस शर्त के चलते कि सम्मलेन के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को काम करने की छूट होगी, ‘नो फायर जोन’ की टीम को वहाँ आने की इजाजत राजपक्षा सरकार को देनी पड़ी.उन्हें यह भी कहा गया कि वे जहां जाना चाहें, जा सकते हैं, उस पर कोई रोक नहीं होगी. यह टीम ट्रेन से तमिल इलाकों के लिए रवाना हुई. कुछ दूर ट्रेन के बढ़ने के बाद ही सैकड़ों सिंहली लोगों की भीड़ ने रेलवे ट्रैक पर इकठ्ठा होकर उसे आगे बढ़ने से रोक दिया.घंटों तक ट्रेन रुकी रही क्योंकि प्रदर्शनकारी कह रहे थे कि इसमें लंका विरोधी फिल्म बनाने वाली टीम जब तक रहेगी, इसे आगे बढ़ने नहीं दिया जाएगा. अधिकारियों ने टीम को कहा कि आगे के सभी स्टेशनों पर प्रदर्शनकारी इकट्ठा हैं और उनके रहते इस ट्रेन का आगे जाना मुमकिन नहीं होगा. यह देखते हुए कि उनके चलते ट्रेन के बाकी मुसाफिरों को भी तकलीफ हो रही है, टीम ने ट्रेन से उतर जाना ही उचित समझा. फिर वह श्रीलंका की फौज और पुलिस के संरक्षण में वापस लौट पाई.

कोलम्बो में ‘नो फायर जोन’ के निर्देशक को लंका की आक्रामक राष्ट्रवादी मीडिया का सामना करना पड़ा.इस पर भारतीय मीडिया की क्या प्रतिक्रिया थी?अगले दिन खंगालने पर भी किसी ‘राष्ट्रीय’ पत्र के अंतर्राष्ट्रीय पृष्ठ पर यह यह खबर न मिली.दक्षिण भारत से निकलने वाले एक प्रमुख दैनिक में इसे एक बड़ी खबर के अंदर दबा दिया गया था.हमारे अंतर्राष्ट्रीय मामलों के हमारे विशेषज्ञों में किसी को यह टिप्पणी के योग्य भी नहीं लगी है. दक्षिण एशिया के लेखकों का एक मंच भी है जो सालाना जलसे करता है और पुरस्कार आदि दिया करता है. वह भी शायद इसे ’राजनीतिक’ मानकर निर्वाक है.

भारत ने तो ‘नो फायर जोन’ के निर्देशक को यहाँ उस फिल्म के प्रदर्शन के समय उपस्थित होने के लिए ज़रूरी वीजा भी नहीं दिया. हमारी जानकारी के मुताबिक़ सेंसर बोर्ड की ओर से इसे प्रमाण पत्र इसलिए नहीं दिया गया कि लंका में कॉमनवेल्थ सम्मलेन की रौशनी में यह फिल्म संवेदनशील हो सकती थी.

श्रीलंका की घटनाओं को गौर से देखना और उनका अभिप्राय समझना हमारे अपने नैतिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है. बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद धर्म, जाति या भाषा के नाम पर, क्या कर सकता है, इसका जीता जागता नमूना हमारे बिलकुल करीब है. वह साधारण जनता के मनोजगत को किस तरह अनुकूलित कर सकता है, यह हम लंका की सिंहली-बौद्ध जनता के व्यवहार से समझ सकते हैं. धीरे-धीरे उस समाज में किसी भी वैकल्पिक स्वर की जगह छीजती जाती है और वह पूरा समाज उस अवस्था में पहुँच जाता है जिसके लिए अभी तक हमारे पास एक ही शब्द है: फासिज़्म! यह अवस्था बिना बहुसंख्या को राजकीय अपराध का सक्रिय भागीदार बनाए नहीं आती. और यह अचानक नहीं आती.यह मुखर समाज की उदासीनता का लाभ उठा कर वैधता हासिल करती है. फिर एक समय ऐसा आता है कि सबके सब उसके हिस्सेदार हो जाते हैं. श्रीलंका पर भारत की खामोशी उसे अपने भीतर की ऐसी प्रक्रिया को देखने से बचने की वजह से भी है.

( An  slightly expanded version of the column published in Jansatta on 17 November,2013)

3 thoughts on “श्रीलंका और हम”

  1. किसी भी देश के अंदरूनी मामलों से तटस्थ रहने के पक्ष में स्वतंत्र देश की संप्रभुता का हवाला दिया जाता है. लेकिन संप्रभुता का सिद्धांत उसी स्थिति में सार्थक होता है जब वहाँ की आबादी के हर हिस्से के साथ न्यायपूर्ण समानता का व्यवहार वह राज्य सुनिश्चित करे.जब ऐसा लगने लगे और इसके लिए पर्याप्त प्रमाण हों कि उस देश में आतंरिक रूप से ऐसी कोई संभावना नहीं बची है तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत के साथ हस्तक्षेप करना ही चाहिश्रीलंका की घटनाओं को गौर से देखना और उनका अभिप्राय समझना हमारे अपने नैतिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है. बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद धर्म, जाति या भाषा के नाम पर, क्या कर सकता है, इसका जीता जागता नमूना हमारे बिलकुल करीब है. वह साधारण जनता के मनोजगत को किस तरह अनुकूलित कर सकता है, यह हम लंका की सिंहली-बौद्ध जनता के व्यवहार से समझ सकते हैं. धीरे-धीरे उस समाज में किसी भी वैकल्पिक स्वर की जगह छीजती जाती है और वह पूरा समाज उस अवस्था में पहुँच जाता है जिसके लिए अभी तक हमारे पास एक ही शब्द है: फासिज़्म! यह अवस्था बिना बहुसंख्या को राजकीय अपराध का सक्रिय भागीदार बनाए नहीं आती. और यह अचानक नहीं आती.यह मुखर समाज की उदासीनता का लाभ उठा कर वैधता हासिल करती है. फिर एक समय ऐसा आता है कि सबके सब उसके हिस्सेदार हो जाते हैं. श्रीलंका पर भारत की खामोशी उसे अपने भीतर की ऐसी प्रक्रिया को देखने से बचने की वजह से भी है

  2. विदेश में होने वाले सम्‍मेलनों की कवरेज के लिए अखबार ‘एजेंसी’ पर निर्भर होते हैं। एजेंसी वाले अपनी खबर के अलावा ‘रायटर’, बीबीसी, एपी, एएफपी .. जो चला दें, उसी का अनुवाद हिन्‍दी अखबारों में ठेला जाता है। अब सर एजेंसी के नाम पर देश में केवल एक ही एजेंसी है पीटीआई । बाकी तो मर गई हैं इसलिए केवल उसी की बात हिन्‍दी पट्टी में चलती है। आशय यह है कि ‘खबरों’ के मामलों में हिन्‍दी पट्टी में ‘ निरकुंशता’ है। लोकतंत्र की मासूम हिस्‍से आज सूख रहें हैं और कुछ सालों में इसके दुष्‍परिणाम सामने आयेंगें। लोकतंत्र की जान विकल्‍प होना है। लेकिन खबरों का लोकतंत्र नष्‍ट हो गया है और यह इतना चुपके से हैं कि आम लोगों को पता तक नहीं चलता।

We look forward to your comments. Comments are subject to moderation as per our comments policy. They may take some time to appear.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s