नाथद्वारा से मार्कण्डेय तक : भेदभाव के प्रार्थनास्थल

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(image courtesy : jaibheem.net)

21 वीं सदी की दूसरी दहाई में जबकि संविधान लागू हुए साठ साल बीत गया हो और अस्पृश्यता को उसके तमाम रूपों में समाप्त करने को लेकर आधिकारिक ऐलान किया गया हो, तब क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि किसी प्रार्थनास्थल पर बाकायदा बोर्ड लगा कर अनुसूचित तबके के लोगों के प्रवेश पर पाबन्दी की बात लिखी गयी हो। अपने विपुल रचनासंसार से एक अलग छाप छोड़ने वाले साहित्यकार एस आर हरनोट पिछले दिनों इसी मसले को लेकर चर्चा में आए, जब उन्होंने हिमाचल के एक चर्चित मन्दिर में ऐसे ही बोर्ड देखे।

देश के अग्रणी दैनिक (द हिन्दू) में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक श्री हरनोट ने बिलासपुर जिले के प्रख्यात मार्कण्डेय मंदिर के प्रबन्धन के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करानी चाही क्योंकि वह अनुसूचित जातियों के सदस्यों के साथ खुल्लमखुल्ला भेदभाव कर रहे थे । एक बयान में उन्होंने बताया कि मंदिर प्रबन्धन कमेटी ने दलितों के मंदिर प्रवेश पर पाबन्दी को लेकर बाकायदा बोर्ड लगाए हैं।

उनके मुताबिक दो साल पहले उनके हस्तक्षेप के बाद मंदिर प्रबन्धन ने बोर्ड हटा दिए थे, मगर अब वह फिर दिख रहे हैं और जिला प्रशासन खामोशी अख्तियार किए हुए है। जाननेवाले बता सकते हैं कि सूबा हिमाचल में यह कोई अपवाद नहीं है। अनुसूचित जातियों के लिए बने राष्ट्रीय आयोग के मुताबिक उसके पास हिमाचल प्रदेश के 35 मंदिरों को लेकर शिकायतें आयी हैं कि जिन सभी में अनुसूचित जातियों का प्रवेश वर्जित है।

चर्चित मार्कण्डेय मंदिर की तरह पड़ोस के राज्य राजस्थान के नाथद्वारा मंदिर का किस्सा है। कुछ समय पहले एक अग्रणी अंग्रेजी अखबार में इस मंदिर को लेकर यह टिप्पणी प्रकाशित हुई थी।

‘ नाथद्वारा के वैष्णवों में अस्पृश्यता व्याप्त है – उन लोगों में भी जो यहां रहते हैं और उनमें भी जो यहां दर्शन करने आते हैं। श्रीनाथजी के मन्दिर के अन्तर्भाग में उन सभी लोगों को प्रवेश वर्ज्य है जिन्होंने ‘पवित्र स्नान’ नहीं किया है या जो पारम्पारिक ढंग से वस्त्र नहीं पहने हैं। वैसे कोई सम्पन्न अवैष्णव वहां के पुरोहितों से सांठगांठ करके अन्दर भी पहुंच सकता है।’

आज से नौ साल पहले जब दलितों की स्वाधिकार रैली यहां पहुंची थी, तब दलितों की इस रैली में शामिल लोगों को मंदिर प्रवेश करने से बाकायदा रोका गया था। तब यह बात राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मीडिया में सूर्खियां भी बनी थी। यह आलम तो तब है जबकि आज से लगभग तीस साल पहले स्वामी अग्निवेश तथा अन्य लोगों की अगुआई में नाथद्वारा मन्दिर में दलितों के प्रवेश के लिए लम्बा आन्दोलन चला था, जिसमें आन्दोलनकारियों को हिंसा का शिकार भी होना पड़ा था। इसके बाद उच्च न्यायालय ने सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि वह दलितों के लिए प्रवेश की गारंटी करे और अगर कोई इसे रोकता है कि संविधान की धारा 17 के तहत सख्त कार्रवाई करे। हकीकत यही नज़र आती है कि अदालती आदेश भी कागज़ी बाघ में ही रूपान्तरित हुआ, जमीन पर कुछ भी नहीं बदला।

गौरतलब है कि वर्णव्यवस्था से जुड़े चिन्तन का दबदबा इस कदर व्याप्त है कि न ऐसी ख़बरें अधिक स्थान पर जगह पाती है, न ऐसे मसलों पर कोई बात हो पाती है। औपचारिक तौर पर भले सभी समान घोषित किए गए हों, मगर अनौपचारिक स्तर पर सदियों पुरानी विषमता – जिसे दैवी स्वीकृति प्राप्त हो – चलती रहती है। मंदिर प्रवेश पर रोक अगर इस विषमता का पुराना रूप है, मगर नए जमाने के साथ भेदभाव के नए रूप भी सामने आए हैं।

उदाहरण के तौर पर, पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित नेशनल ट्रिब्युनल में अनुसूचित तबकों के खिलाफ जारी भेदभाव के नए रूप भी सामने आए। आठ सदस्यीय जूरी के सामने देश के विभिन्न हिस्सों से आए 45 पीड़िताओं ने अपनी आपबीती रखी थी। (द हिन्दू, 2 अक्तूबर 2013) उदाहरण के तौर पर गुजरात के मेहसाणा जिले में दलित अपने दूध को कोआपरेटिव्ज को बेच नहीं सकते हैं क्योंकि वह ‘दलित’ गायों का होता है। राजस्थान के अजमेर में एक दलित महिला को डायन घोषित कर उसे न केवल मारा पीटा गया बल्कि गांव से भी बहिष्कृत कर दिया, उड़िसा के कंधमाल में एक दलित युवती को वेश्याव्यवसाय में ढकेलने के लिए उसका अपहरण किया गया तो पड़ोसी राज्य हरियाणा में आए दिन दलित लड़कियां वर्चस्वशाली जातियों के हाथों सामूहिक बलात्कार का शिकार होती हैं। और जबभी जातीय अत्याचार के यह पीड़ित शिकायत दर्ज करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें धमकाया जाता है और उनके खिलाफ तथा उनको इन्साफ दिलाने के लिए सक्रिय संगठनों एवं वकीलों के खिलाफ उल्टे केस लादे जाते हैं। बलात्कार से पीड़ितों की मेडिकल रिपोर्टों में भी गड़बड़ी की जाती है और पुलिस सही प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर करने से भी इन्कार करती है। ट्रिब्युनल के सामने पेश सुझावों में यह बात प्रमुखता से सामने आयी कि इन नए किस्म के भेदभावों को – जो ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, स्वास्थ्य की सुविधाएं, ठेेके, टेण्डर तथा जमीन वितरण आदि में सामने आ रहे हैं – सम्बोधित करने के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम में उचित तब्दीलियां आवश्यक हैं।

चर्चित साहित्यकार दया पवार ने दलित साहित्य सम्मेलन के दौरान मराठी के महान साहित्यकार बाबुराव बागुल को उद्धृत करते हुए लिखा थाः

भले ही हमारे यहां जनतंत्र को शासकीय सत्ता पर रखा गया हो, भले ही मनु को अंधेरे में फेंक दिया गया हो, वह मरा नहीं है। वह आज किताबों में, पवित्रा ग्रंथों में, मन्दिरों में मौजूद है। वह मनों में बसा है। समाज की जिस संरचना का उसने निर्माण किया वह आज हमारे पास है। वह इतना महान है कि समाज की संरचना उसके नियंत्राण में है। और सिर्फ उसे प्रिय लगनेवाले लोग सत्ता के केन्द्र में हैं। इसलिए आज भारत में दो दुनिया, दो सत्ताएं, दो परम्पराएं मौजूद हैं।
सवाल यह उठना लाजिमी है कि इस स्थिति को बदलने के लिए क्या किया जाए ?

नाथद्वारा से मार्कण्डेय तक जारी यह सिलसिला बरबस चकवाड़ा प्रसंग की याद ताजा करता है। डा अम्बेडकर की ऐतिहासिक रचना ‘जातिभेद का उन्मूलन’ में इस गांव का किस्सा छपा था, जब उन दिनों गांव के वर्चस्वशाली जातियों ने दलित बस्ती पर हमला किया था क्योंकि अपने यहां शादी की दावत में दलितों ने काफी अच्छे इन्तजाम किए थे, जो बात उन्हें नागवार गुजरी थी। एक दशक से अधिक समय पहले चकवाड़ा फिर सूर्खियों में था, जब इलाके के सार्वजनिक तालाब पर प्रवेश पर पाबन्दी को लेकर दलितों ने आन्दोलन चलाया था। आन्दोलन का दबाव बना कि सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। गांव का तालाब सभी के लिए खोल दिया गया। मगर यह खुशी चन्द माह बनी रही। एक अन्य पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस ‘अपमान’ से आहत वर्चस्वशाली जाति के लोगों ने अपने घरों की नालियों के मुंह तालाब की तरफ मोड दिए थे और देखते ही देखते वह तालाब एक गन्दे जलाशय में रूपान्तरित हुआ था।

(साप्ताहिक ‘शुक्रवार’ में प्रकाशित लेख का अविकल रूप)

One thought on “नाथद्वारा से मार्कण्डेय तक : भेदभाव के प्रार्थनास्थल”

  1. ‘ नाथद्वारा के वैष्णवों में अस्पृश्यता व्याप्त है – उन लोगों में भी जो यहां रहते हैं और उनमें भी जो यहां दर्शन करने आते हैं। श्रीनाथजी के मन्दिर के अन्तर्भाग में उन सभी लोगों को प्रवेश वर्ज्य है जिन्होंने ‘पवित्र स्नान’ नहीं किया है या जो पारम्पारिक ढंग से वस्त्र नहीं पहने हैं। वैसे कोई सम्पन्न अवैष्णव वहां के पुरोहितों से सांठगांठ करके अन्दर भी पहुंच सकता है।’

    Mujhe nahi pata ki aap khud gae the ke aapko kisi ne yeh baat batai hai, main ek Vaishnav hu jo Nathdwara gaya hu.

    Shayad aapko pata nahi hai k Srinath Ji ke ek darshan hote hain “Mangla” jiske lie aapko nahaane ki bhi zaroorat nahi hai (Pavitra Snan door ki baat hai).

    Now I do know that people do still believe in untouchability, it would be appropriate that rather than stereotyping an entire community of people you mention your point in a more object manner.

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