साम्प्रदायिक फासीवाद की चुनौती – नयी ज़मीन तोड़ते हुए

यहुदी तथा ईसाई, हिन्दू तथा मुस्लिम ‘मूलवादी/बुनियादपरस्त’ श्रेष्ठ भिन्नता (सुपीरिअर डिफरेन्स) की बात करते हैं। हरेक का मुक़ाबला एक कनिष्ठ और डरावने अन्य से होता है। हरेक असमावेश की राजनीति में सक्रिय रहता है। इसलिए हरेक अपने दायरे में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए खतरे के तौर पर उपस्थित होता है।.. मुस्लिम मिलिटेण्ट के लिए ‘अन्य’ यहुदी होते हैं, कभी ईसाई होते हैं और दक्षिण एशिया में हिन्दू, ईसाई और अहमदी होते हैं। मैं ऐसे किसी धार्मिक-राजनीतिक संगठन को आज नहीं जानता जिसके सामने एक दानवीकृत, डरावना अन्य नहीं है।

अन्य हमेशा एक सक्रिय निषेध (active negation) होता है। ऐसे तमाम आन्दोलन नफरत की लामबन्दी करते हैं और अक्सर इसके लिए अभूतपूर्व सांगठनिक प्रयास करते हैं।..
हिंसा का सम्प्रदाय और दुश्मनों का विस्तार भिन्नता की विचारधाराओं में निहित होता है। सभी अन्य के प्रति अपनी नफरत को संगठित ंिहंसा के जरिए अभिव्यक्त करते हैं। सभी धर्म और इतिहास की दुहाई देते हुए अपनी हिंसा को वैधता प्रदान करते हैं। लगभग सभी मामलों में दुश्मनों की संख्या बढ़ती जाती है। पहले भारतीय परिवार के निशाने पर मुस्लिम अन्य रहता था और अब उसने ईसाइयों को उसमें शामिल किया है।
( प्रोफाइल आफ द रिलीजियस राइट – इकबाल अहमद, 1999)

1.
मुखौटा और आदमी

बच्चों की फन्तासियां अनन्त एवं अकल्पनीय होती हैं।

वह शेर का मुखौटा पहनेगा और अपने आत्मीयों को अपनी गुर्राहट से ‘डराने’ लगेगा और दूसरे ही क्षण वह स्पाइडरमैन का मुखौटा पहन कर कल्पना करेगा कि वह हवा में उड़ रहा है। आप ने किसी वयस्क को शायद ही कहीं देखा हो जो बच्चे की उन शैतानियों से परेशान हो उठे, भले ही उसके लिए वह बच्चा बिल्कुल अजनबी हो।

क्या होगा कि किसी अलसुबह आप को वयस्कों का एक समूह या उसी तरह शरीर से दृष्टपुष्ट लोग सड़कों पर घुमते मिलें जिन्होंने उसी किस्म के या वही मुखौटे पहनें हों ? आप निश्चित ही उन बुजुर्गों की मानसिक स्थिति को लेकर चिन्तित होंगे और उन्हें यह सलाह देना चाहेंगे कि वह नजदीकी मनोवैज्ञानिक से अवश्य मिल लें।

जनाब नरेन्द्र मोदी के सियासत में आगमन – पहले गुजराती हिन्दुओं के एक नेता के तौर पर, जिस वक्त ‘गुजरात का शेर’ के तौर पर उन्हें सम्बोधित किया जाता था और बाद में ‘भारत माता के शेर’ के तौर पर राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण – के साथ हम ऐसे ही मुखौटा पहननेवाले वयस्कों से रूबरू हैं जो एक ऐसे चेहरे में अपनी पहचान ‘विलीन’ कर देना चाहते हैं जो 21 वीं सदी में सबसे ध्रुवीकृत करनेवाली छवियों में शुमार की जाती है। इस शख्स के गल्पनुमा प्रलापों के प्रति उनकी उन्मादी प्रतिक्रियाएं दरअसल इस बात को पुष्ट करती हैं कि उनके व्यवहार में कोई बालकनुमा बात नहीं है और अगर मौका मिले तो शरीर से दृष्टपुष्ट लोगों का उनका जूनून बगल के किसी झोपडपट्टी के निवासियों पर बरपा हो सकता है या बगल के मकानों की कतार को दूसरी ‘गुलबर्ग सोसायटी’ में रूपान्तरित कर सकता है। वैसे 24 7 चैनलों ने इस समूचे मंज़र को हमारे बेडरूम में ‘सजीव अर्थात लाइव’ पहुंचाया है, मगर यहां इस बात पर जोर देना जरूरी है कि यह सब उसी परम्परा का जारी सिलसिला है जिसके अन्तर्गत इलाकाई/राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने अपने असमावेशी एजेण्डा को आगे बढ़ाने में जनोन्माद को हवा दी है। शायद हम ‘लौहपुरूष’ के तौर पर नवाज़े गए लालकृष्ण आडवाणी की अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध और नब्बे के दशक के पूर्वार्द्ध की भूमिका को देख सकते हैं जोे उन्होंने उस बहुसंख्यकवादी आन्दोलन में निभायी थी जिसकी परिणति बाबरी मस्जिद के विध्वंस में हुई थी ( उस कथित ‘षडयंत्र’ केस में अभी भी वह एक अभियुक्त हैं) या हम दिवंगत बाल ठाकरे के कैरियर पर निगाह डाल सकते हैं जिन्होंने (बकौल श्रीकृष्ण आयोग) ‘92 के अन्त एवं ‘93 की शुरूआत के दिनों में अल्पसंख्यकविरोधी हिंसा में कमाण्डर की भूमिका निभायी थी।

कोई भी सन्तुलित मस्तिष्क व्यक्ति इस बात से सहमत हो सकता है कि जो स्थितियां हमारे सामने मौजूद हैं वह उस उदितमान संकट का संकेत मात्रा है, जो हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है। हममें से कइयों के सामने फौरी तौर पर अभी एजेण्डा पर यही है कि 2014 में जब चुनाव सम्पन्न होंगे तब क्या नतीजा निकलेगा, मगर हम इस सच्चाई से बच नहीं सकते कि इसके पीछे गहरे कारण निहित हैं और जिसका परिणाम है कि ऐसा शख्स जिसे आधुनिक जमाने का नीरो कहा जा सकता है, वह कइयों के लिए ‘ह्नदय सम्राट’ के रूप में आज प्रिय है।

क्या इस समूचे परिदृश्य के लिए कार्पोरेट कर्णधारों को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जो एक ‘मजबूत नेता’ चाहते हैं जो उनके मुताबिक इस दलदल से हमें बाहर निकाल सकते हैं जिसमें कथित तौर पर हम लिप्त हैं ? क्या यह स्थिति इस वजह से आ पड़ी है कि वर्णमानसिकता के प्रभाव वाले मीडिया सम्राटों पर ‘मोदी का जादू’ हावी है और वह 2002 की उनकी नफरत भरी छवि का साफसुथराकरण करने में तथा ‘विकास’ पुरूष के तौर पर उनका रूपान्तरण करने में मुब्तिला है या इसे हम अन्तरराष्ट्रीय जनसम्पर्क एजेंसी एप्को या उसकी किसी सहयोगी कम्पनी के कदमों का नतीजा मान सकते हैं या अन्ततः भारत की ‘ग्रेण्ड ओल्ड पार्टी’ कांग्रेस के दिवालियापन का नतीजा कह सकते हैं जिसने खानदान की सियासत के नए सिलसिले को आगे बढ़ाया है।

प्रधानमंत्रा पद के प्रत्याशी के तौर पर नरेन्द्र मोदी का आगमन – जिनकी अपनी अपील परिवार के दायरे के बाहर तक पहंुची दिखती है और जिस तरह ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ इस मामले में सक्रिय है, वह इसी किस्म के कई ऐसे सवालों को उठाता दिख रहा है।

अगर हम भारतीय परिस्थिति को करीब से देखें तो हम कह सकते हैं कि ऐसे अधिनायकवादी, असमावेशी प्रवृत्तियों/संगठनों/जनोत्तेजकों के उभार के लिए हमारे समाज और संस्कृति में पर्याप्त आधार मौजूद है।

शायद अब वक्त़ आ गया है कि हिन्दुत्व के विचार को जिस तरह हम समझते हैं उससे नए सिरेसे रूबरू हुआ जाए।

2.
धार्मिक कल्पितों के परे

हिन्दुत्व के विचार और सियासत को आम तौर पर धार्मिक कल्पितों (religious imaginaries) केे रूप में प्रस्तुत किया जाता है, समझा जाता है। (एक छोटा स्पष्टीकरण यहां हिन्दुत्व शब्द को लेकर आवश्यक है। यहां हमारे लिए हिन्दुत्व का अर्थ हिन्दु धर्म से नहीं है, पोलिटिकल हिन्दुइजम अर्थात हिन्दु धर्म के नाम से संचालित राजनीतिक परियोजना से है। सावरकर अपनी चर्चित किताब ‘हिन्दुत्व’ में खुद इस बात को रेखांकित करते हैं कि उनके लिए हिन्दुत्व के क्या मायने हैं।)
उसके हिमायतियों के लिए वह ‘हिन्दू राष्ट्र’ – जो उनके मुताबिक बेहद पहले से अस्तित्व में है – के खिलाफ विभिन्न छटाओं के ‘आक्रमणकर्ताओं’ द्वारा अंजाम दी गयी ‘ऐतिहासिक गलतियों’ को ठीक करने का एकमात्रा रास्ता है। यह बताना जरूरी नहीं कि किस तरह मिथक एवं इतिहास का यह विचित्रा घोल जिसे भोले-भाले अनुयायियों के सामने परोसा जाता है, हमारे सामने बेहद खतरनाक प्रभावों के साथ उद्घाटित होता है।

इस असमावेशी विचार का प्रतिकारक, उसकी कार्रवाइयों को औचित्य प्रदान करते ‘हम’ और ‘वे’ के तर्क को खारिज करता है, धर्म के आधार पर लोगों के बीच लगातार विवाद से इन्कार करता है, साझी विरासत के उभार एवं कई मिलीजुली परम्पराओं के फलने फूलने की बात करता है। इसमें कोई अचरज नहीं जान पड़ता कि धार्मिक कल्पितों के रूप में प्रस्तुत इस विचार के अन्तर्गत साम्प्रदायिक विवादों का विस्फोटक प्रगटीकरण यहां समुदाय के ‘चन्द बुरे लोगों’ की हरकतों के नतीजे के तौर पर पेश होता है, जिन्हें हटा देना है या जिनके प्रभाव को न्यूनतम करना है। इस समझदारी की तार्किक परिणति यही है कि धर्मनिरपेक्षता को यहां जिस तरह राज्य के कामकाज में आचरण में लाया जाता है, वह सर्वधर्मसमभाव के इर्दगिर्द घुमती दिखती है। राज्य और समाज के संचालन से धर्म के अलगाव के तौर पर इसे देखा ही नहीं जाता।

इस तथ्य को मद्देनज़र रखते हुए कि विगत लगभग ढाई दशक से हिन्दुत्व की सियासत उठान पर है – निश्चित ही इस दौरान कहीं अस्थायी हारों का भी उसे सामना करना पड़ा है – और उसके लिए स्टैण्डर्ड/स्थापित प्रतिक्रिया अब प्रभाव खोती जा रही है और उससे निपटने के लिए बन रही रणनीतियां अपने अपील एवं प्रभाव को खो रही हैं, अब वक्त़ आ गया है कि हम इस परिघटना को अधिक सूक्ष्म तरीके से देखें। अब वक्त़ है कि हम स्टैण्डर्ड प्रश्नों से और उनके प्रिय जवाबों से तौबा करें और ऐसे दायरे की तरफ बढ़े जिसकी अधिक पड़ताल नहीं हुई हो। शायद अब वक्त़ है कि उन सवालों को उछालने का जिन्हें कभी उठाया नहीं गया या जिनकी तरफ कभी ध्यान भी नहीं गया।

क्या यह कहना मुनासिब होगा कि हिन्दुत्व का अर्थ है भारतीय समाज में वर्चस्व कायम करती और उसका समरूपीकरण करती ब्राह्मणवादी परियोजना का विस्तार, जिसे एक तरह से शूद्रों और अतिशूद्रों में उठे आलोडनों के खिलाफ ब्राह्मणवादी/मनुवादी प्रतिक्रान्ति भी कहा जा सकता है। याद रहे औपनिवेशिक शासन द्वारा अपने शासन की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए जिस किस्म की नीतियां अपनायी गयी थीं – उदाहरण के लिए शिक्षा के दरवाजे शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए खोल देना या कानून के सामने सभी को समान दर्जा आदि – के चलते तथा तमाम सामाजिक क्रान्तिकारियों ने जिन आन्दोलनों की अगुआई की थी, उनके चलते सदियों से चले आ रहे सामाजिक बन्धनों में ढील पड़ने की सम्भावना बनी थी।

आखिर ब्रिटिशों की जीत ने अछूतों का क्या भला किया है ? शिक्षा में कुछ भी नही ; नौकरियों में कुछ भी नहीं ; सामाजिक ओहदे में, कुछ भी नहीं । एक ही चीज़ है जिसमें उन्होंने कुछ हासिल किया है और वह है कानून के सामने समानता का अधिकार। ..कानून के सामने समानता का सिद्धान्त अछूतों के लिए विशेष लाभ का रहा है वह महज इसी वजह से कि ब्रिटिशों के आगमन के पहले उनके पास ऐसा अधिकार नहीं था। मनु के कानून समानता का सिद्धान्त स्वीकारते नहीं हैं। मनु के कानूनों की आत्मा है असमानता। वह जीवन के सभी क्षेत्रों में, सभी सामाजिक रिश्तों में और राज्य के सभी इदारों में व्याप्त थी। उसने हवा को प्रदूषित किया था और अछूतों का बस दमन होता था। कानून के सामने समानता के सिद्धान्त ने एक दोषनाशक का काम किया है। उसने हवा को साफ किया है और अछूत के लिये यह मुमकिन हुआ है कि वह आज़ादी की सांस ले सके। यह अछूतों के लिए वास्तविक लाभ है और प्राचीन अतीत को मद्देनज़र रखते हुए कोई छोटा फायदा नहीं है।
(‘द अनटचेबल्स एण्ड द पॅक्स ब्रिटानिका’ में – डाक्टर भीमराव अम्बेडकर )

आखिर हम हिन्दुत्व के विश्वदृष्टिकोण उभार को मनुवाद के खिलाफ सावित्राीबाई एवं जोतिबा फुले तथा इस आन्दोलन के अन्य महारथियों – सत्यशोधक समाज से लगायत सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेण्ट या इंडिपेण्डट लेबर पार्टी तथा रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया, या जयोति थास, अछूतानन्द, मंगू राम, अम्बेडकर जैसे सामाजिक विद्रोहियों की कोशिशों के साथ किस तरह जोड़ सकते हैं ?

इस सन्दर्भ में यह प्रश्न उठना भी लाजिमी है कि पश्चिमी भारत का वर्तमान महाराष्ट्र का इलाका – जो उन दिनों सूबा बम्बई में शामिल था- जहां अल्पसंख्यकों की आबादी कभी दस फीसदी से आगे नहीं जा सकी है और जहां वह कभी राजनीतिक तौर पर वर्चस्व में नहीं रहे हैं आखिर ऐसे इलाके में किस तरह रूपान्तरित हुआ जहां हम तमाम अग्रणी हिन्दुत्व विचारकों – सावरकर, हेडगेवार और गोलवलकर – के और उनके संगठनों के उभार को देखते हैं, जिन्हें व्यापक वैधता भी हासिल है। एक क्षेपक के तौर पर यह भी बता दें कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती भी आज के गुजरात में, जो उन दिनों बम्बई प्रांत का हिस्सा था – पैदा हुए थे और अपने आर्य समाज की नींव उन्होंने बम्बई में ही डाली थी।

इस प्रश्न का सन्तोषजनक जवाब तभी मिल सकता है जब हम हिन्दुत्व के उभार को लेकर प्रचलित तमाम धारणाओं पर नए सिरेसे निगाह डालें और उन पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हों। दूसरे शब्दों में कहें तो हमें (बकौल दिलीप मेनन) ‘जाति, धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के बीच के अन्तरंग सम्बन्धों की पड़ताल करने के प्रति जो आम अनिच्छा दिखती है’ (पेज 2, द ब्लाइंडनेस आफ साइट, नवयान 2006) उसे सम्बोधित करना होगा। वे लिखते हैं:

हिन्दुधर्म की आन्तरिक हिंसा काफी हद तक मुसलमानों के खिलाफ निर्देशित बाहरी हिंसा को स्पष्ट करती है जब हम मानते हैं कि ऐतिहासिक तौर पर वह पहले घटित हुई है। सवाल यह उठना चाहिए: आन्तरिक अन्य अर्थात दलित के खिलाफ केन्द्रित हिंसा किस तरह (जो अन्तर्निहित असमानता के सन्दर्भ में ही मूलतः परिभाषित होती है) कुछ विशिष्ट मुक़ामों पर बाहरी अन्य अर्थात मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण ( जो अन्तर्निहित भिन्नता के तौर पर परिभाषित होती है) में रूपान्तरित होती है ? क्या साम्प्रदायिकता भारतीय समाज में व्याप्त हिंसा और असमानता के केन्द्रीय मुद्दे का विस्थापन/विचलन (डिफ्लेक्शन) है ? (वही)

3
वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

एक हिन्दू पुरूष या स्त्राी, जो कुछ भी वह करते हैं, वह धर्म का पालन कर रहे होते हैं। एक हिन्दू धार्मिक तरीके से खाना खाता है, पानी पीता है, धार्मिक तरीके से नहाता है या कपड़े पहनता है, धार्मिक तरीके से ही पैदा होता है, शादी करता है और मृत्यु के बाद जला दिया जाता है। उसके सभी काम पवित्रा काम होते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष नज़रिये से वह काम कितने भी गलत क्यों न लगें, उसके लिए वह पापी नहीं होते क्योंकि उन्हें धर्म के द्वारा स्वीकृति मिली होती है। अगर कोई हिन्दू पर पाप करने का आरोप लगाता है, उसका जवाब होता है, ‘ अगर मैं पाप करता हूं, तो मैं धार्मिक तरीके से ही पाप करता हूं।’
(‘द अनटचेबल्स एण्ड द पॅक्स ब्रिटानिका’ – जिसे डाक्टर भीमराव अम्बेडकर )

ऐहिक/लौकिक से आध्यात्मिक तक विस्तारित हिंसा पर थोड़ा गौर करें।

दरअसल हिंसा का सवाल विभिन्न स्तरों पर चल रही बहसों में बार बार उभरता रहता है। हम इस मसले पर कथनी और करनी के बीच बहुत अन्तराल पाते हैं। हम सामान्य दिखनेवाले लोगों से मिलते हैं जो औपचारिक तौर पर हर किस्म की हिंसा की निन्दा करने को तैयार होंगे मगर उसी सांस में जिसे ‘वैध’ हिंसा कहा जाता है उसके प्रति अपनी सहमति जाहिर करने में संकोच नहीं करेंगे। यह वही मानसिकता है जो बुद्ध को उंचा दर्जा देती है और साथ ही साथ राज्य द्वारा अपनी ही जनता के खिलाफ मामूली वजहों से अंजाम दी जा रही ंिहंसा को औचित्य प्रदान करती है। इस बात को नोट किया जाना चाहिए कि एक ऐसा मुल्क जो अहिंसा के सन्त की महानता की बात करता है, वहां एक किस्म की हिंसा को न केवल ‘वैध’ कहा जाता है बल्कि उसे पवित्राता का भी दर्जा दिया जाता है। दलितों, स्त्रिायों और समाज के अन्य उत्पीड़ित तबकों के खिलाफ हिंसा को आदिम काल से धार्मिक स्वीकृति मिलती रही है और आधुनिकता के आगमन ने भी व्यापक परिदृश्य में कोई तब्दीली नहीं की है।

गौरतलब है कि ऐसी कई प्रथाओं एवं श्रेणीबद्धताओं का प्रभाव जिनकी जड़ हिन्दु धर्म में देखी जा सकती है, वह अन्य धर्मावलम्बियों के व्यवहार में भी नज़र आती है। इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध धर्म में जातिभेद – जिसकी कल्पना बाहर नहीं की जा सकती है उसका यहां के लोगों के जीवनविश्व में वजूद बना हुआ है। अपने आप परिवार भी जबरदस्त हिंसा का स्थान है। भारत एकमात्र ऐसा मुल्क है जहां एक विधवा को अपने मृत पति की चिता पर जलाया जाता रहा है। अगर पहले नवजात बेटी को अधिक बर्बर तरीके से मारा जाता था आज की तारीख में माता पिता टेक्नोलोजी में आयी तरक्की के सहारे यौनकेन्द्रित गर्भपात का सहारा लेते हैं। यह अकारण नहीं है कि भारत एकमात्रा मुल्क है जहां अभी भी 330 लाख महिलाएं गायब हैं।

तीस साल का वक्त़ होने को है जब इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्तर पर सिखों को हमले का निशाना बनाया गया था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गणराज्य की राजधानी दिल्ली में एक हजार से अधिक निरपराध जलती टायरों को गले में डाल कर बर्बर ढंग से मारे गए। हर कोई जानता है कि वह कोई स्वतःस्फूर्त हिंसा नहीं थी, वह बेहद संगठित, सुनियोजित हिंसा थी जिसे तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के लीडरों की अगुआई में अंजाम दिया गया था। आज भले ही बहुत कम लोग उस रक्तरंजित दौर के याद करना चाहें मगर यह सच है कि उन दिनों समाज के प्रबुद्ध तबके के हिस्सों ने शासक पार्टी की शह पर अंजाम दी गयी इस हिंसा को औचित्य प्रदान किया था और उसे लोगों की ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ कहा था। तत्कालीन प्रधानमंत्राी राजीव गांधी ने यह विवादास्पद वक्तव्य दिया था जिसमें कहा गया था कि ‘जब पेड़ गिरता है तो धरती का हिलना स्वाभाविक है’ जिसे जनसंहारों को ‘वाजिब’ ठहरानेवाला समझा गया था। वर्ष 2002 में सूबा गुजरात में सत्ताधारी पार्टी की शह पर अंजाम दी गयी हिंसा को भी उसके अंजामकर्ताओं ने उसी तरह ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ के आवरण में पेश किया था।
जहां एक तरह हिंसा सर्वव्यापी दिखती है, मगर यह बात सर्वमान्य नहीं है। इसके विपरीत लोगों को हमारी संस्कृति में सहिष्णुता की कथित महान परम्परा के गुणगान करने में संकोच नहीं होता और एक विषमतामूलक, श्रेणीबद्ध सामाजिक प्रणाली के अन्तर्गत जो रोजमर्रा की पाशविकता और सतत संगठित हिंसा दिखती है, उसकी पड़ताल करने की भी कोशिश नहीं होती। एक ऐसा समाज जहां लोगों का एक छोटा हिस्सा जो रक्त की शुद्धता और उच्च कुल में जनम का दावा करता हो, जिसे अपनी हरकतों के लिए दैवी स्वीकृति हासिल हो और जिसमें अन्यों के – मेहनतकश अवाम का विशाल हिस्सा, शूद्रों, अतिशूद्रों का – अमानवीयकरण करने का सिलसिला यथावत जारी रहता हो, कटघरे में खड़ा होने से बच निकलता है।

4.
इतिहास का गैरमनुवादीकरण

अपनी चर्चित किताब ‘डिब्राह्मनाइजिंग हिस्टरी’ (मनोहर, दिल्ली) में ब्रज रंजन मणि एक महत्वपूर्ण बात उठाते हैं। उनके मुताबिक

‘‘अन्य का दानवीकरण करने में प्रयुक्त शब्दों में राक्षस एवं असुर के अलावा म्लेच्छ शब्द – अस्वच्छ और गन्दा अन्य – भी शामिल है, जिसका रोमिल्ला थापर के हिसाब से एक इतिहास है, जो ईसापूर्व 800 सदी तक पहुंचता है और जो किसी वैदिक रचना में पहली बार दिखता है। हिन्दुत्व के इस दावे के विपरीत, जो इस शब्द के पहली दफा इस्तेमाल को आक्रमणकारी, बर्बर विदेशियों विशेषकर मुसलमानों के सन्दर्भ में जोड़ कर पेश करते हैं, यह देखने में आता है कि इसका इस्तेमाल उंची जातियों द्वारा शूद्रों और अतिशूद्रों के सन्दर्भ में – जिन्हें दुश्मन समझा जाता था- पहले अक्सर होता रहा है। थापर के मुताबिक दुश्मन का दानवीकरण/राक्षसीकरण – इस बात की चिन्ता किए बगैर की दुश्मन कौन है – दरअसल कई सारे पूर्वइस्लामिक दुश्मनों के सन्दर्भ में अक्सर दिखता है, जो पहले से चला आ रहा है।’’ (पेज 22-23)

इस बात को आगे बढ़ाते हुए वह जोड़ते हैं कि वह जोड़ते हैं कि शूद्र, जो

‘पाप करने के लिए जनमा है’ उसका दानवीकरण मनुवादी शब्दावलीें में निरन्तर जारी रहता है और उसे इतनी अक्षमताओं से लाद दिया जाता है कि अन्ततः वह अपनी मानवी स्थिति खो बैठता है।

‘दुनिया की समृद्धि के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का ब्रह्मा के मुख, हाथ, जांघ और पैरों से निर्माण किया गया।’ …‘कोई शूद्र अगर किसी द्विज का गाली देकर अपमान करे, तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए: क्योंकि वह निम्न कुल का है।’मनुस्मृति जो आंशिक तौर पर धर्म, नैतिकता और कानूनी किताब है खुल्लमखुल्ला ऐलान करती है ‘ शूद्र द्वारा सम्पत्ति संग्रहण का दृश्य ही ब्राह्मण को हानि पहुंचाता है।’ और ज्ञान हासिल करने के लिए शूद्र द्वारा किया गया प्रयास अपराध है। अगर ऐसा निम्न कुल में जनमा व्यक्ति पवित्रा ग्रंथों के पाठ को महज सुन भी लेता है तो उसके कान में गरम सीसा डाल देना चाहिए ; अगर वह पवित्र ग्रंथों का उच्चारण करता है, तो उसकी जीभ खींच लेनी चाहिए और अगर वह उन्हें याद कर लेता है तो उसके शरीर को काट देना चाहिए। ब्राह्मण दैवी आधारों पर शूद्र को अपमानित करने, पीटने और उसे गुलाम बनाने का अधिकारी है। धर्मशास्त्रों के मुताबिक एक ब्राह्मण द्वारा शूद्र की हत्या कुत्ता, मेढक, चिपकली, उल्लू की हत्या के समकक्ष है।’ उनके मुताबिक ‘अपनी आत्मकथा ‘माइन काम्फ’ में हिटलर यहुदियों के लिए इसी तरह जानवरों के समकक्ष उपमाओं का इस्तेमाल करता है।

पुरोहित तबके, पंडितों एवम मौलानाओं, के इस नियंत्रण को पहली दफा चुनौती ब्रिटिश काल में मिली। विभिन्न स्तरों पर उनके हस्तक्षेप ने – अपने शासन को मजबूत बनाने के लिए और व्यापक जनता से वैधता हासिल करने के लिए, जिसे उन्होंने आधे मन से ही हाथ में लिया – ऐसी परिस्थितियां निर्मित की कि सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर उत्पीड़ित समुदायों से धीमी गति से अपनी दावेदारी की बात सामने आने लगी। स्थानाभाव के कारण यहां सामाजिक क्रान्तिकारियों के प्रयासों के बारे में चर्चा नहीं की जा सकती, मगर यहां निचोड के रूप में बताया जा सकता है कि उन्होंने न केवल पुरोहित तबके के वर्चस्व को चुनौती दी बल्कि राष्ट्रनिर्माण को लेकर एक वैकल्पिक विमर्श भी प्रस्तुत किया। समाज में पहले से वर्चस्वशाली तबकों के लिए नीचले तबके से मिल रही इस चुनौति ने अभूतपूर्व परिस्थिति का निर्माण किया।

लोकमान्य तिलक, जिन्हें ‘भारतीय असन्तोष का जनक’ कहा जाता है और जो ‘कांग्रेस के रैडिकल हिस्से की नुमाइन्दगी करते हैं’ हमारे समक्ष ऐसा क्लासिक उदाहरण पेश करते हैं जो राजनीतिक आजादी के लिए संघर्षरत लोगों में सामाजिक सुधारों को लेकर व्याप्त गहरी चिन्ताओं को दर्शाता है। शादी के लिए ‘सहमति की उम्र का बिल’ (जिसके अन्तर्गत बारह साल से कम उम्र की लड़की से शादी को गैरकानूनी घोषित करने की कोशिश की गयी थी) के प्रति उनके जबरदस्त विरोध को बहुत लोग जानते हैं, मगर यह बात कम चर्चित है कि 1895 में कांग्रेस पार्टी के सम्मेलन के वक्त नेशनल सोशल कान्फेरेन्स का आयोजन करने की रानडे की योजना – जैसी कि तब तक परिपाठी चली आ रही थी – का उन्होंने विरोध किया और यह धमकी भी दी थी कि अगर सोशल कान्फेरेन्स हुआ तो पण्डाल को ‘आग भी लग सकती है।’

अपने लम्बे निबंध ‘एजुकेट वूमेन एण्ड लूज नेशनेलिटी’ (परिमल वी राव, क्रिटिकल क्वेस्ट, 2010) लेखिका महाराष्ट्र में चार दशकों के राष्ट्रवादी विमर्श पर निगाह डालती हैं जिसमें यह कहा जा रहा था कि

‘‘..महिलाओं और गैरब्राह्मणों को शिक्षित करने से राष्ट्रीयता को हानि पहुंच सकती है। बाल गंगाधर तिलक की अगुआई में राष्ट्रवादियों ने 1881-1920 के दरमियान लड़कियों के लिए अलग स्कूलों की स्थापना, गैरब्राह्मणों को शिक्षा प्रदान करना और अनिवार्य शिक्षा जैसे कदमों का विरोध किया। अनिवार्य शिक्षा को लागू करने के प्रस्ताव को ग्यारह में से नौ नगरपालिकाओं में शिकस्त देने में वह कामयाब हुए। ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ की राष्ट्रवादियों की मांग जिसके जरिए उन्होंने सुधारकों द्वारा हिमायत की जा रही अनिवार्य शिक्षा के अर्थ और दायरे को एक अलग ढंग से ढालने की कोशिश की थी, उसके अन्तर्गत राष्ट्रीय शिक्षा में धर्मशास्त्रों की शिक्षा और कुछ तकनीकी कुशलताएं शामिल थीं।’’

सनातनियों, रूढिवादियों की चिन्ताएं महज शिक्षा के क्षेत्र तक सीमित नहीं थीं। वे इस चुनौती से भी रूबरू थे कि दलित और बहुजन समाज के अन्य सदस्य धीरे धीरे ‘साझी विरासत’ के उत्सवों के- खासकर भारत के उस भाग में मुहर्रम के जुलूसों में – प्रभाव में आते दिख रहे थे। यहां इस बात को रेखांकित करना जरूरी नहीं कि जाति आधारित हिन्दु धर्म, जो शुद्धता और प्रदूषण के तर्क पर टिका है, उसने कभी भी ऐसे उत्सवों के सार्वजनिक प्रदर्शन को प्रोत्साहित नहीं किया था।
इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए, तिलक ने गणेश पूजा को गणेश चतुर्थी पूजा में रूपान्तरित करने (1894) का फैसला लिया। एक तरफ वह मुहर्रम के उत्सव का प्रतिस्थापन था और दूसरी तरफ, लोगों को (हिन्दुओं) एकत्रित करने की रणनीति का भी हिस्सा था। यह कहा जाता है कि गणेश चतुर्थी की शुरूआत के बाद, हिन्दुओं ने मुहर्रम के जुलूसों में शामिल होना छोड़ दिया और 1894 और 1895 में पुणे और धुले से दंगों के समाचार मिले जब गणेश उत्सव की झांकियां गाना गाते मस्जिदों के सामने से निकलीं।

इन आयोजनों के दौरान गाए जानेवाले गीत का नमूना प्रस्तुत है:

‘अरे ! तुमने हिन्दू धर्म का क्यों परित्याग किया है ?
क्या तुम गणपति, शिवा और मारूति को भूल गए हो ?
ताबूत की पूजा करके तुम्हें क्या लाभ हुआ है ?
अल्लाह ने तुम्हें क्या आशीर्वाद दिया है
कि तुम आज मुसलमान बन गए हो
ऐसे धर्म से दोस्ती ना करो जो पराया है
अपने धर्म का परित्याग ना करो
कभी ताबूतों पर श्रद्धा मत करो
गाय हमारी माता है, उसे मत भूलो।’

(http://netunm.blogspot.in/2009/05/lokmanya-bal-gangadhar-tilak.html)

उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में शामिल उंची जाति के अभिजातों की हरकतों के साम्प्रदायिक रूझानों को यहां आसानी से देखा जा सकता है। यहां फिर एक बार दिलीप मेनन को उद्धृत करना समीचीन होगा (वही, पेज 8):

‘अगर मैं अपनी बात को आगे बढ़ा दूं तो हम देखते हैं कि 1850 और 1947 के दरमियान, साम्प्रदायिक हिंसा का सिलसिला अक्सर दलितों और अन्य अधीन जातियों की गतिशीलता और दावेदारी के बाद सामने आया है। जैसे जैसे अधीनीकरण की संरचनाओं को गांवों में चुनौती मिलने लगी, अधीनीकृत जातियों के खिलाफ हिंसा को अंजाम देने में दिक्कतें सामने आने लगीं जिसका परिणाम हिन्दु धर्म के अन्दर – एकता के प्रतीकों जैसे 19 वीं सदी में गाय के इस्तेमाल और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को विस्थापन के जरिए- एकता लाने की कोशिशों के रूप में सामने आया। 90 के दशक की शुरूआत में मंडल (आरक्षण विरोधी दंगे) और मस्जिद (मुस्लिम विरोधी दंगे) का सिलसिला इसी लम्बे, ऐतिहासिक पैटर्न का हिस्सा था।’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जनम को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। संघ के संस्थापक सदस्य हेडगेवार की आधिकारिक जीवनी ‘संघवृक्ष के बीज’ – लेखक सी पी भिशीकर – इसके उदय पर रौशनी डालती है। संघ की स्थापना (1925) के कारणों को स्पष्ट करते हुए हेडगेवार दो बातों की चर्चा करते हैं: एक, मुसलमानों का खतरा और दो, निम्न जातियों की दावेदारी/एसर्शन।

‘विभिन्न समुदायों में संघर्ष शुरू हुए थे। ब्राह्मण-गैरब्राह्मण विवाद खुल कर सामने आ रहा था।’

हम आसानी से देख सकते हैं कि उन्होंने ‘निम्न जातियों’ की दावेदारी को ‘मुस्लिम खतरे’ के समकक्ष रखा है।

दरअसल यहां यह बात कहना मुनासिब होगा कि संघ की बुनियाद, जो मनुवादी विश्वदृष्टिकोण पर आधारित हिन्दु राष्ट्र की चाहत रखती है, वह शूद्रों-अतिशूद्रों-स्त्रिायों की दावेदारी के प्रति अन्तर्निहित विरोध पर टिकी है। रेखांकित करनेवाली बात यह है कि हिन्दुत्व ब्रिगेड के मूल और विस्तार के तमाम अध्ययनों ने उसकी नींव के अल्पसंख्यकविरोध पर ही जोर दिया है और असावधानी से या अनजाने से उसके दलित विरोधी या शूद्रविरोधी, स्त्राी विरोधी पहलू की उपेक्षा की है जिसके चलते यह स्थिति आ पहुंची है कि हिन्दुत्व की राजनीति की बुनियाद पर संकेन्द्रित हमला करना सम्भव नहीं हो सका है।

सांस्कृतिक वर्चस्ववाद और साम्प्रदायिक राजनीति के इस सहजीवन के बारे में मणि लिखते हैं (डिब्राह्मनाइजिंग हिस्टरी, पेज 237)

फुले अम्बेडकर की विचारधारा दरअसल हिन्दुत्व की इस बुनियादी अवधारणा को ही खारिज करती है जिसके अन्तर्गत हिन्दू उसे कहा जाता है जिसकी पुण्यभूमि और पितृभूमि भारत ही हो। इसमें कोई आश्चर्य जान नहीं पड़ता कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने फुले-अम्बेडकरवाद को निशाना बनाया और यह सिद्धान्त पेश किया कि ऐसे आन्दोलन विभाजक ‘जाति मानसिकता’ से निकलते हैं।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पूर्ववर्ती संस्करणों की तरह, संघ वर्णाश्रम धर्म के सिद्धान्त को स्वीकारता है, मगर जाति के विरोध का ढोंग करता है।.. हिन्दू एकता कायम करने का संघ का पाखण्ड दरअसल मुसलमानों के खिलाफ उसके विरोध पर टिका है – जैसा कि अम्बेडकर ने एक बार रेखांकित किया था ‘एक जाति को दूसरी जाति से जुड़े रहने की भावना सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम दंगे के वक्त़ की दिखती है।’ संघ का ‘जातिवाद विरोध’ एक तरफ, मनुवादी छाते के अन्तर्गत निम्न जाति के लोगों को समेटे रखने में और दूसरी तरफ, हासिल की गयी इस एकता के जरिए मुसलमानों के खिलाफ लड़ने, जैसे दोहरे उद्देश्य को पूरा करता है।

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यह बात हमें भूलनी नहीं चाहिए कि आज़ादी के वक्त जब नया संविधान बनाया जा रहा था, तब संघ ने उसका जोरदार विरोध किया था और उसके स्थान पर मनुस्मृति को अपनाने की हिमायत की थी। संघ के अपने मुखपत्रा के जरिये इस विरोध को लगातार जुबां दी थी, यहां तक कि सड़कों उतर कर भी उसे कमजोर करने की कोशिशें की थी। इस विरोध की बानगी ही यहां दी जा सकती है। अपने मुखपत्र ‘आर्गेनायजर’, (30 नवम्बर, 1949, पृष्ठ 3) में संघ की ओर से लिखा गया था कि

‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गयी थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’ में उल्लेखित है, विश्वभर में सराहना की जाती रही है और यह स्वतःस्फूर्त धार्मिक नियम -पालन तथा समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।’’

अब सभी जानते हैं कि बाबासाहब अम्बेडकर ने ‘मनुस्मृति की ‘मानवद्रोही अन्तर्वस्तु को देखते हुए’ 25 दिसम्बर 1927 को महाराष्ट्र के महाड में मनुस्मृति जलायी थी और अपने इस इन्कलाबी कदम की तुलना फ्रांसीसी क्रांति द्वारा किये गये मानवाधिकारों की घोषणा से की थी। लेकिन हिन्दुत्व के कारिन्दों के लिए उसी की ‘उपेक्षा’ करने पर दिक्कत हो रही थी। मनुस्मृति के प्रति इस सम्मोहन को वे संविधान के लागू होने के बाद भी अभिव्यक्त करने से चूके नहंीं।

हिन्दुत्व के प्रस्तोताओं की तंगनज़री का मामला महज संविधान निर्माण के लिये विरोध करने तक सीमित नहीं रहा है । वह उस वक्त भी खुल कर सामने आया जब उन्हीं दिनों हिन्दू कोड बिल के जरिये हिन्दू महिलाओं से जुड़े सम्पत्ति, विरासत आदि हकों को योजनाबद्ध करने की कोशिशें भी शुरू हो गयी थीं। हम यह भी जानते हैं कि सनातनी तत्वों ने इन कोशिशों का जबरदस्त विरोध किया था। इस मामले में संविधान समिति के अध्यक्ष तथा इस बिल के शिल्पकार बाबासाहब डा अम्बेडकर के घर पर भी कई बार प्रदर्शन हुए थे कि वे इस मामले में पहल लेकर ‘भारतीय संस्कृति को छिन्न भिन्न कर रहे हैं।’ काबिलेगौर मसला यह था कि इस सवाल पर तरह तरह के साधुओं से लेकर सियासतदानों का जो साझा मोर्चा बना था उसमें एक छोर पर अगर करपात्राी महाराज थे तो दूसरे छोर पर अटल के राजनीतिक गुरू तथा जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी थे जिनको करपात्राी की तरह ही इस बिल के जरिये अपने ‘गौरवशाली अतीत’ पर चोट पड़ती दिख रही थी। यह वही श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे जिनके हाथों में गोलवलकर गुरूजी ने भारतीय जनसंघ की बागडोर सौंपी थीं।

70 के दशक के पूर्वार्द्ध तक संघ परिवार अपने उस पुराने नक्शे पर ही चल रहा था जिसके तहत दलितों-पिछड़ों की संघ से दूरी बनी हुई थी, यहां तक कि सूबा महाराष्ट्र में जहां उसका जनम हुआ वहां पर वह चित्पावन ब्राहमणों का संगठन समझा जाता था। लेकिन इसके बाद संघ ने अपनी रणनीति में परिवर्तन कर इन तबकों को साथ जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की। इस सन्दर्भ में देखें तो संघ परिवार के अन्दर ही हिन्दू एकता कायम करने की समझदारी में गहरा परिवर्तन आया है। हेडगेवार-गोलवलकर के दिनों की तुलना में यह एक गुणात्मक परिवर्तन है जिसमें वर्णाश्रम की चौखट को अक्षुण्ण रखते हुए, ब्राहमणवाद के वर्चस्व को पूरी तरह बनाये रखते हुए ही ‘निम्न जातियों’ को उसमें जगह दी गयी है। इसे महज प्रतीक नहीं माना जा सकता कि यही वह दौर रहा है जब तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने नागपुर स्थित दीक्षाभूमि पर जाकर बाबासाहेब आम्बेडकर की स्मृति में पहली बार श्रद्धांजलि अर्पित की। यही वह स्थान था जहां 1956 में बाबासाहब ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की थी। वैसे संघ के मुख्य कार्यालय से महज चन्द किलोमीटर दूर स्थित दीक्षाभूमि पहुंचने में हिन्दुत्व के इन कारकूनों को के बाद भले ही 17 साल लगे, लेकिन यही वह मुकाम था जिसने अपनी स्थापना के बाद से लगभग पांच दशक तक भारतीय राजनीति-समाजनीति के हाशिये पर पड़े इस संगठन के लिये सत्ता के दरवाजे खोलने की प्रक्रिया शुरू की।

(Note : This is a Hindi translation of the write-up ‘1933 of 2014 : Time to Break New Grounds in Confronting Communal Fascism’ which appeared on this blog sometime back)

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