द्वार पर नीरो !

नरम फासीवाद के सौंदर्यीकरण के वक्त़ में

(To be published in the next issue of ‘ Samakaleen Teesari Dunia’)

 

जनसंहार को अंजाम देने वाले लोग क्या बीमार मस्तिष्क और परपीड़क होते हैं।

अपनी बहुचर्चित किताब ‘आईशमैन इन जेरूसलेम: ए रिपोर्ट आन द बॅनालिटी आफ इविल’ में जर्मन-अमेरिकी दार्शनिक हाना अरेन्डट इस प्रश्न का जवाब देने की कोशिश करती हैं। एक नात्सी सैन्य अधिकारी एडॉल्फ आइशमैन जो हिटलर की हुकूमत में चली नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम के अग्रणी सूत्राधारों में से था, उस पर चले मुकदमे की चर्चा करते हुए वह बताती हैं कि किस तरह ऐसे घिनौने अपराधों को अंजाम देनेवाले अक्सर सामान्य, साधारण लोग होते हैं जो अपने काम को नौकरशाहाना दक्षता के साथ अंजाम देते हैं।

एक ऐसे समय में जबकि 2002 के स्याह दौर को – जब राज्य के कर्णधारों की अकर्मण्यता और संलिप्तता के चलते हजारों निरपराधों को जान से हाथ धोना पड़ा – और कुछ लाख लोग अपने मुल्क में ही शरणार्थी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो चले हैं, को भुला देने की, उनका साफसुथराकरण करने की कोशिशें तेज हो चली हैं, और विकास का एक ऐसा शगूफा खड़ा किया जा रहा है जिसके तले असहज करनेवाले तमाम प्रश्न दफन हो जाएं तो इन सारे सवालों से रूबरू होने की जरूरत बनती है।

इसी पृष्ठभूमि में हम 2014 के चुनावों की आजाद भारत के इतिहास में अहमियत पर गौर कर सकते हैं और इस बात को समझ सकते हैं कि क्यों उसकी तुलना जर्मनी के 1933 के चुनावों से की जा रही है, जिसने हिटलर के आगमन का रास्ता सुगम किया था।

वजह साफ है कि आज़ादी के बाद पहली बार ऐसी घड़ी आयी है जब तमाम अनुदारवादी, संकीर्णमना, असमावेशी ताकतें – जिन्होंने हमेशा ही संविधान के बुनियादी मूल्यों की मुखालिफत की है- आज नयी वैधता हासिल कर जनता के एक हिस्से को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब होती दिख रही हैं। और इस मुहिम की अगुआई वही शख्स कर रहा है जो खुद एक अकार्यक्षम मुख्यमंत्राी है जिसकी अकर्मण्यता या संलिप्तता के चलते उसका सूबा साम्प्रदायिक दावानल में झुलस गया था, और यह इल्जाम महज विपक्षी पार्टियों ने ही उसकी पार्टी के वरिष्ठतम नेता ने ही लगाया है कि वह कठिन समय में ‘राजधर्म’ निभाने में असफल रहा था।

पिछले दिनों अग्रणी राजनीति विज्ञानी कान्ति वाजपेयी ने अपने एक आलेख ‘जर्नी टूवर्डस साफ्ट फैसिजम’ में मुल्क में जो हवाएं चल रही हैं उसे देखते हुए ‘नरम फासीवाद’ के आगमन के खतरे को रेखांकित किया है। आखिर इसकी क्या विशिष्टताएं हैं ? उनके मुताबिक फासीवाद राज्य अधिनायकवाद, कानून के बाहर खड़े समूहों द्वारा दमन, अंधराष्ट्रवाद, एक ‘महान’ नेता के समक्ष व्यक्तियों एवं संगठनों का समर्पण और सामाजिक जीवन के प्रति डार्विनवादी नज़रिया अर्थात ताकतवर की ही जीत होती है, आदि से चिन्हित किया जा सकता है। उनके मुताबिक भारत जैसे विशाल मुल्क में जो तमाम प्रांतों एवं शहरों में बंटा हुआ है, वहां उसकी विविधता, विशालता और बहस मुबाहिसे की लम्बे समय से चली आ रही परम्परा के मद्देनज़र फिलवक्त उसके लिए नरम फासीवाद अधिक आकर्षक लग सकता है, मगर बाद में यह सख्त फासीवाद के लिए भी रास्ता सुगम करेगा।

विदित है कि भारतीय समाज के प्रबुद्ध तबके के एक छोटे हिस्से में लोकतंत्रा की कथित अराजकता को समाप्त करने के नाम पर किसी तानाशाह के प्रति जबरदस्त सम्मोहन हमेशा रहा है, हिटलर की आत्मकथा ‘माइन काम्फ’ अर्थात मेरा संघर्ष की बिक्री में कभी कोई कमी नहीं आयी है। हाल के समयों में हम नोट कर सकते हैं कि संसदीय लोकतंत्र का परित्याग कर निर्णय प्रक्रिया को विशेषज्ञों के हवाले करने, राजनेताओं के बजाय विशेषज्ञों को जिम्मा सौंपने को लेकर यह रूझान बढ़ा है।

अपने एक आलेख में क्रिस्टोफ जाफरलो ‘सीएसडीएस’ (सेन्टर फार द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसायटीज) के सर्वेक्षण का हवाला देते हुए इसकी ताईद करते हैं। उनके मुताबिक ‘दक्षिण एशिया में जनतंत्रा की स्थिति’ पर केन्द्रित सीएसडीएस के सर्वेक्षण में 2008 में जहां ‘‘अभिजात’’ तबके के 51 फीसदी ‘‘बेहद मजबूती के साथ सहमत’’ जबकि 29 फीसदी इस प्रस्ताव पर ‘‘सहमत’’ दिखे कि ‘मुल्क के बारे में सभी प्रमुख निर्णयों को विशेषज्ञों द्वारा न कि राजनेताओं’ द्वारा लिया जाए। इसके बरअक्स ‘‘आम जनता’’ के 29 फीसदी इस प्रस्ताव के प्रति ‘‘मजबूती से सहमत’’ दिखे। स्पष्ट था कि वे जनतंत्र में संख्या की अपनी ताकत को कम करके नहीं आंकते थे। पांच साल बाद हम देखते हैं कि मध्यम वर्ग में लोकतंत्र की लोकप्रियता और कम हुई है। उनके मुताबिक ‘सीएसडीएस’ ने हाल में जो आंकड़े जारी किए हैं उनके मुताबिक जनतंत्र के कामकाज को लेकर पहले अगर 55 फीसदी लोग ‘सन्तुष्ट’ थे तो आज यह आंकड़ा 46 फीसदी तक आया है।

ध्यान रहे कि इस चुनावी दंगल का वास्तविक नतीजा मई माह के मध्य में ही पता चल सकेगा, यह भी मुमकिन है कि 2004 में जिस तरह ‘इंडिया शाइनिंग’ का गुब्बारा पंक्चर होता दिखा था, उसी तरह भारत का समझदार मतदाता कुछ ऐसे निर्णय सुना दें जिसका आकलन किसी मतदाता सर्वेक्षण में आया हो। मगर कोईभी इस बात से सहमत हो सकता है कि 80 के दशक के उत्तरार्द्ध में जिस दक्षिणपंथी राजनीतिक परियोजना का आगाज़ हुआ था, जिसने भारत के जनतांत्रिक राजनीति की मध्यभूमि को जिस तरह पुनर्परिभाषित किया था या शिफ्ट किया था, वह स्थिति अब स्थायी हो चली दिखती है। बकौल सुहास पलशीकर (इंडियन एक्स्प्रेस, ‘मूविंग द मिडल ग्राउण्ड’ 22 नवम्बर 2014)

‘रामजन्मभूमि आन्दोलन भले ही विलुप्त हो गया हो, मगर उसने जिन राजनीतिक संवेदनाओं को जन्म दिया वह तत्कालीन मध्यभूमि के लिए नयी थी। राष्ट्रीयता के विचार का नया तसव्वुर/कल्पना, एक बहुसंख्यकवादी राजनीतिक समुदाय को जनतंत्रा की बुनियाद के तौर पर पेश करना, धार्मिक-सांस्कृतिक दावेदारी को जनतांत्रिक अभिव्यक्ति का दर्जा देना, इस नयी मध्यभूमि को चिन्हित कर रही थी।’’

वह आगे बताते हैं कि किस तरह आज बाकी पार्टियां भी किस तरह भाजपा के हिन्दुत्व की आलोचना करते हुए एक तरह से ‘‘प्रतिद्धंद्धात्मक बहुसंख्यकवादी तुष्टिकरण’’ करती दिखती हैं’’ और किस तरह राष्ट्रीय राजनीतिक भावविश्व ‘‘अधिक हिन्दू (धार्मिक सन्दर्भों) मे हो चला है और आज बहस इस बात पर है कि अच्छा हिन्दू कौन है और कौन ‘अच्छा हिन्दू’ होने के नाते गैरहिन्दुओं की हिमायत करता है।’

निश्चित ही मध्यभूमि में होने वाले ऐसे स्थित्यंतरों से वापसी बहुत मुश्किल होती है। अगर आपातकाल भारत में वह कालखण्ड दिखता है जहां आजादी के बाद कायम लिबरल जनतंत्रा पर पहली चोट पड़ी थी, बाबरी मस्जिद विध्वंस के नाम पर चले व्यापक जनान्दोलन ने इसे और नुकसान पहुंचाया था तो मोदी ब्राण्ड हिन्दुत्व और हिन्दुत्व की सियासत इस पर तीसरी बड़ी चोट के तौर पर सामने आ रही है जहां जनतंत्र को ‘विविधता विरोधी बहुसंख्यकवाद’ के घोल के साथ पेश किया जा रहा है।

इस ‘नरम फासीवाद’ का रास्ता सुगम करने में कार्पोरेट सेक्टर भी एक मुहिम की तरह जुटा हुआ है। गुजरात में आयोजित सालाना वायब्रेंट समिट में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से लेकर मोदी के ‘मॉडल’ की खुल्लमखुल्ला तारीफ करने तक यहां तक कि उन्हें ही ‘प्रधानमंत्राी पद के लिए सबसे सुयोग्य प्रत्याशी’ घोषित करने तक लेकर इसके कई रूप सामने आ रहे हैं। इतनाही नहीं मोदी के प्रति आलोचनात्मक रूख रखनेवाले सम्पादकों या अग्रणी पत्रकारों की जिस तरह हाल के दिनों में छुट्टी की गयी, वह इसी बात का एक संकेत हैं।

दरअसल कार्पोरेट इंडिया के मोदी के प्रति सम्मोहन की जड़ें उनके मुताबिक ‘‘चाइनीज मॉडल’’ के प्रति मोदी के आकर्षण से उपजा है। आखिर इस चीनी मॉडल की क्या विशिष्टताएं देखी जा सकती हैं – यह ऐसा मॉडल है जो बकौल सिद्धार्थ वरदराजन (मोदी एण्ड द कल्ट आफ क्रोनिजम, सेमिनार अप्रैल 2014) ऐसा प्रारूप है जहां जमीन, खदानों और पर्यावरण के लिए क्लीअरेन्स कोई मायने नहीं रखते, ‘जहां गैस की कीमतों को लेकर असहज करनेवाले प्रश्न पूछे नहीं जाते’। अपने इस आलेख में वह मद्रास स्कूल आफ इकोनोमिक्स के एन एस सिद्धरथन को उद्धृत करते हैं

‘‘मौजूदा बिजनेस वातावरण में सम्पत्ति को संकेन्द्रित करने का रास्ता मैनुफैक्चर के जरिए नहीं बल्कि सरकारी मिल्कियत के तले होने वाले संसाधनों के दोहन से जुड़ा है।’’

उदाहरण के लिए संसाधनों का वरीयता के आधार पर आवंटन कम्पनियों के फायदे के लिए बड़ा स्त्रोत बन चुका है, जो अपने उत्पादन के रोजमर्रा के खेल से बेहद ‘सामान्य’ रिटर्न पा सकते हैं। और इन संसाधनों में महज कोयला या स्पेक्ट्रम या लोह अयस्क जैसी चीजें शामिल नहीं है बल्कि अहम बात पानी और जमीन भी है।

सूबा गुजरात में टेªड यूनियन गतिविधियों को किस कदर अंकुश में रखा गया है, वह बात भी पूंजीपतियों को आकर्षित करती है। अम्बानी के मिल्कियत वाली रिलायन्स टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज को उदाहरण गौरतलब है, जहां पांच हजार से अधिक मजदूर काम करते हैं। कम्पनी का टर्नओवर 44 बिलियन डॉलर के करीब है तो उसका मुनाफा 3.6 बिलियन डॉलर तक पहुंचा है। यह अलग बात है कि वहां कार्यरत 1100 स्थायी कर्मचारियों और 4,000 अस्थायी कर्मचारियों के लिए विगत बीस सालों में -जबकि कम्पनी का मुनाफा दस गुना बढ़ा – तनखाह लगभग उतनीही बनी हुई है। स्थायी कामगारों केा 5 से 6 हजार तो दिहाड़ी पर कामगारों को 85 रूपए से लेकर 100 रूपए तक मिलते हैं। 

स्पष्ट है कि जनतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए इतनी बड़ी ‘लोकप्रिय चुनौती’ इसके पहले कभी उपस्थित नहीं थी। वे सभी जो संविधान के बुनियादी मूल्यों पर विश्वास करते हैं, उन्हें पुरजोर कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी असमावेशी ताकतें जो 2002 के जनसंहार में अपनी संलिप्तता के तमाम प्रमाणों के बावजूद उसके साफसुथराकरण में लगी हैं, उन्हें कैसे शिकस्त मिले।

जनतंत्र के बुनियादी सिद्धान्तों को बहुसंख्यकवाद के दहलीज पर समर्पित करने का जो सिलसिला तेज हो रहा है उसे हर सूरत में रोका जाना चाहिए। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत के शासन के अलावा जनतंत्र का मतलब होता है, अल्पमत के जीवन के अधिकारों एवं मतों की सुरक्षा और अधिक महत्वपूर्ण, यह कानूनी सम्भावना कि आज का राजनीतिक अल्पमत भविष्य में चुनावी बहुमत हासिल करेगा और इस तरह शान्तिपूर्ण तरीके से व्यवस्था को बदल देगा।
हमारी अपनी आंखों के सामने जनतंत्रा को खोखला करने की इन तमाम कोशिशों पर हमें गौर करना ही होगा।

इसमें कोई दोराय नहीं कि यह एक स्याह दौर है, और केवल भारत ही नहीं दक्षिण एशिया के इस हिस्से में स्थितियां वाकई बेहद विपरीत दिखती हैं। बहुसंख्यकवाद का उभार हर तरफ दिखाई देता है। एक दिन भी नहीं बीतता जब हम पीड़ित समुदायों पर हो रहे हमलों के बारे में नहीं सुनते। दक्षिण एशिया के इस परिदृश्य की विडम्बना यही दिखती है कि एक स्थान का पीड़ित समुदाय दूसरे इलाके में उत्पीड़क समुदाय में रूपान्तरित होता दिखता है।

अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षित करने में अहमियत इस बात की होगी कि हम जनतंत्र के बुनियादी मूल्य को अपनाएं और तहेदिल से उस पर अमल करे ताकि हम ऐसे शासन का निर्माण कर सकें जहां धर्म और राजनीति में स्पष्ट फरक हो। राज्य की धर्मनिरपेक्षता और नागरिक समाज का धर्मनिरपेक्षताकरण हमारा सरोकार बनना चाहिए।

यह पूछा जा सकता है कि जनतंत्र को गहरा करने और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने पर जोर क्यों देना चाहिए। इसका एकमात्र कारण यही है कि जिस दिन हम अपने इस ‘ध्रुवतारे’ को भूल जाएंगे, फिर वह दिन दूर नहीं होगा जब हम भी अपने पड़ोसी मुल्क के नक्शेकदम पर चलेंगे जिसने राष्ट्र के आधार के तौर पर धर्म को चुना और जो आज विभिन्न आंतरिक कारणों से अन्तःस्फोट का शिकार होता दिख रहा है।

 

 

2 thoughts on “द्वार पर नीरो !”

  1. (इंडियन एक्स्प्रेस, ‘मूविंग द मिडल ग्राउण्ड’ 22 नवम्बर 2014)
    इस दिनांक मे कुछ त्रुटी है है या तो वर्ष की या फिर माह की कृपया इसे ठीक कर दे

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