क्या निराश हुआ जाए?

क्या निराश हुआ जाए? कल सुबह से हजारी प्रसाद द्विवेदी  का एक अन्य  प्रसंग में किया गया यह प्रश्न मन में घूम रहा है. चुनाव नतीजों के पहले ही चरण में पिता ने फोन पर कहा: “यह तुम्हारा पहला कड़ा इम्तहान है.”पिता ने, जो अब जीवन की सांध्य वेला में हैं, कहा, “हम तो किनारे पर खड़े लोग हैं, तुम सब अभी इस जिंदगी के रेले के ठीक बीचो-बीच हो, भागने का न तो कोई उपाय है और ऐसी कोई भी इच्छा कायरता होगी. इसका सामना करो और इसे समझो.” हजारीप्रसाद जी और अपने पिता को कहना चाहता हूँ, वह जो रवींद्रीय ब्रह्मांडीय उदारहृदयता का स्वप्न आप सबने दिखाया था, कामकाजी रोजमर्रापन की तेज रौशनी में खो गया जान पड़ता है. शायद हम सब अब तक सो रहे थे,अचानक जगा दिए गए हैं. निराश या हताश होने की सुविधा नहीं है. समझने की कोशिश ही शायद इस यथार्थ का सामना करने के साधन देगी!

कौन जानता था कि मुक्तिबोध की आशंका उनकी और उनके प्रिय जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पचासवें वर्ष में ही सच साबित होती दिखलाई पड़ेगी? क्या वह एक फैंटेसी न थी? लेकिन यह भी सच है कि कम से कम पिछले दो वर्ष से इसके पर्याप्त संकेत मिल रहे थे,जिनका अर्थ व्यापक जनता को बताने का जी-तोड़ और वीरतापूर्ण बौद्धिक प्रयास एक छोटे से तबके ने किया ज़रूर था.लेकिन वह प्रयास अपर्याप्त था : दयनीय रूप से अपर्याप्त, यह स्वीकार करना ही होगा. उसका मुकाबला एक ऐसे भयंकर और विराट प्रचार तंत्र से था जिसकी पहुँच और शोर का मुकाबला करना उसके लिए नामुमकिन था.

यह भी स्वीकार करना होगा कि यह जनता का अपना चुनाव है. ठीक है कि इस बार कॉरपोरेट दुनिया ने एक राजनेता को अपने लिए चुना और उसे एक रामबाण के रूप में जनता को पेश किया लेकिन यह भी उतना ही ठीक है कि जनता ने ही उसे संजीवनी माना, उस पर कोई जबर्दस्ती नहीं की गई.लेकिन आशंका भी तो इसी की थी!

बौद्धिक बेईमानी और नैतिक बेपरवाही के मेल ने असंभव को संभव कर दिखाया है.यह क्योंकर हो सका?इसका उत्तर देने के पहले यह भी मान लेना चाहिए कि,हालाँकि अभी मतों का विश्लेषण शेष है, इस निर्णय में स्त्री-पुरुष,उच्च,मध्य और निम्न वर्ग, शहरी और ग्रामीण,सभी जाति और इक्का-दुक्का को छोड़ कर सभी भाषा और सांस्कृतिक समुदाय शामिल हैं. यह सच्चे मायनों में एक अखिल भारतीय परिघटना है. इस नई अखिल भारतीयता का आशय समझना ही होगा.

विगत दो दशकों से केंद्रीय राजनीति के संदर्भ में किसी अखिल भारतीय तत्व के महत्त्व से ही इनकार किया जा रहा था. जाति और प्रदेश के दलों और नेताओं के उदय के आधार पर कहा जा रहा था कि अब किसी केंद्रीय और राष्ट्रीय राजनीति की संभावना समाप्त हो गई है.इस बार भी नतीजों के एक दिन पहले तक यही कहा जा रहा था कि केंद्र में सत्ता के लिए क्षेत्रीय दलों के हाथ में कुंजी होगी. एक कमजोर और ढीली-ढाली केंद्रीय सत्ता प्रत्येक लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी का आदर्श भी बन गई थी. यहाँ तक कि इस बात में स्वयं कांग्रेस पार्टी भी यकीन करने लगी थी और उसने जगह जगह खुद को क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के हवाले कर दिया था. कांग्रेस पार्टी ने अपने विचार की अखिल भारतीयता पर विश्वास करना छोड़ दिया था जैसे वामपंथी दलों ने भी, जोकि खुद को अन्तरराष्ट्रीयतावादी कहते हैं.

केंद्र के लोप के ‘उत्तर आधुनिक’ भ्रम में सिर्फ एक ही संगठन नहीं था.उसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. अखिल भारतीयता को या भारतीयता मात्र के विचार को, जो किनारे फ़ेंक दिया गया था,उसने उठा ही नहीं लिया उसका एकमात्र पोषक और संरक्षक बन गया . यह भारतीयता वस्तुतः भिन्न जातीय, धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक समूहों के साहचर्य की एक आकांक्षा भी थी.इस साहचर्य का सिद्धांत क्या होगा ?वह शुष्क आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनी केंद्रीय योजनाओं पर टिकी भारतीयता होगी?ऐसा कांग्रेस पार्टी ने समझा:मनरेगा,राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना, राष्ट्रीय शहरी विकास योजना,राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा योजना, राष्ट्रीय उच्च शिक्षा योजना: अनेक राष्ट्रीय योजनाओं की शुरुआत करके उसने मान लिया आज के आर्थिक उदारवाद (!) के इस युग में पूरे देश को संबोधित करने की यही सार्वभौम भाषा है.

शीला भट ने उत्तर प्रदेश में अमित शाह के अभियान का विश्लेषण करते हुए बताया है कि उनकी रणनीति थी : उत्तर प्रदेश का हर व्यक्ति किसी न किसी तरह नरेंद्र मोदी के स्पर्श का अनुभव प्राप्त करे.भारतीय जनता पार्टी और संघ ने एक प्रामाणिक स्पर्श-बोध का निर्माण किया.वे ही जानते हैं कि राजनीति दरअसल स्पर्श का, संपर्क का खेल है. उनके अलावा और किसी दल ने इसका इतना अभ्यास नहीं किया है. रामशिला पूजन अभियान, रामजन्म भूमि यात्रा और उसके बाद की अखिल भारतीय यात्राओं को याद कीजिए: भारतीय जन को सीधे छूने सिर्फ एक ही विचार पहुँचा, बाकी सब अपनी वस्तुपरक वैज्ञानिकता या प्रशासकीय व्यापकता के अहंकार में बैठे रहे.

भारतीय विचार का आधिकारिक प्रवक्ता सिर्फ एक ही व्यक्ति दिखलाई पड़ा और लंबे अरसे बाद स्पर्शाकांक्षा से पीड़ित भारतीय जन ने उसके आलिंगन में खुद को सौंप दिया. उसे अभी इसकी परवाह नहीं कि इस धृतराष्ट्र आलिंगन में उनका वजूद पिघल जाए या चकनाचूर हो जाए.

लेकिन क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि इस साहचर्य और अखिल भारतीय स्पर्श सृजन में एक अन्य अखिल भारतीय तत्व शामिल नहीं है? गुजरात में जो अहंकारपूर्ण घोषणा एक दशक पहले की गई थी, “मुझे मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए” और गुजरात में चुनाव-दर-चुनाव उनकी आशंका, उनकी शिकायत और उनका अस्तित्व जिस तरह अप्रासंगिक बना दिया गया था, क्या अखिल भारतीय राजनीति में उसकी शुरुआत हो चुकी है? इसकी हद का तब पता लगता है जब हम देखें कि ‘मुस्लिम परस्त ’ कांग्रेस गुजरात में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती.

एक अंग्रेज़ी दैनिक ने चुनाव परिणामों का इंतज़ार करते हुए गोधरा ट्रेन आगजनी में आरोपी के तौर पर पकड़े गए और सजा झेल रहे लोगों के परिवारों से बात की. उनमें से एक ने कहा, “खुदा इतनी बेरहम नहीं हो सकता कि उस शख्स को हमारा हाकिम बना दे जो हमारी इस जिल्लत के लिए जवाबदेह है.” खुदा बेरहम हो या न हो , अभी जो अखिल भारतीयता प्रकट हुई है, वह ज़रूर इस बात से बेपरवाह लगती है कि उसने एक बड़े तबके की फिक्र को नज़रअंदाज कर दिया है.

अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद से मुक्ति के दौरान और संविधान निर्माण में जिस भारतीयता को गढ़ा गया था वह भारत के विभिन्न समुदायों का एक दूसरे से वादा भी था : एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता का वादा.यह एक नैतिक सूत्र था हम सबको एक दूसरे से जोड़ने का.क्या आज वह तोड़ डाला गया है?

पिता ने मतगणना के बीच ही कहा कि एक अर्थ में यह वास्तविक परिवर्तन के आरंभ का जनादेश है.जो संगठन भारतीय राष्ट्र की संवैधानिक कल्पना से निरंतर असंतोष प्रकट करता रहा था, वह अब अपने एक प्रचारक के माध्यम से सीधे सत्ता में है.एक ख़याल है कि जिस तरह गुजरात में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अप्रासंगिक बना दिया गया, वैसे ही उसकी गति राष्ट्रीय स्तर पर होगी. फिर क्या उसने आत्महत्या के लिए इतना भीषण प्रयास पिछले दिनों किया है?इसके उलट क्या उसका विचार नए सिरे से लोकप्रिय नहीं हो उठा है?

पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास यह मौक़ा है कि वह भारत के विचार का पुनर्विन्यास करे.यह नहीं किया जाएगा,इस खुशफहमी या गफलत में रहना खतरनाक है.

यह कहना चाहिए कि भारत के जनता ने एक तानाशाह को चुना है. इस जनता ने किसी एक स्वर्णिम भविष्य या एक शक्तिशाली पिता की खोज में एक खतरनाक दांव चला है.परीक्षा अब उसकी नहीं है जिसे चुना गया है क्योंकि वह भी जानता था कि ,जैसे उसके चारण, वह एक विराट मिथ्या की सृष्टि है.जिसने यह दांव चला है उसे इसका अहसास होना ही चाहिए कि बाजी वापस उसके हाथ आना इतना आसान न होगा.

तो क्या निराश हुआ जाए? किन्तु क्या यह सच नहीं कि निराश होने का समय भी बीत चुका है? खेल शुरू हो चुका है और हम सब उसमें शामिल हैं.

(जनसत्ता के 18 मई,2014 के अंक में प्रकाशित)

नोट: मैं हजारी प्रसाद द्विवेदी के हिज्जे के लिए माफ़ी चाहता हूँ. हजार कोशिश के बाद भी वह दुरुस्त न किया  जा सका.

5 thoughts on “क्या निराश हुआ जाए?”

  1. Khel toh shuru ho hi chuka hai aur issme shaamil hona ab humari majboori nahi…balki zarurat hai apni insaaniyat ko saabit karne aur usse banaye rakhne ke liye…..par phir bhi dukhad hai aise khel mein shaamil hona jiske paase insaani haddiyoon ke bane ho aur jinke aapas mein takraane pe har baar jane kitani cheekein sunayi dengi…..

  2. हमारी लापरवाही ने ही इस मक़ाम पर हमें छोड़ा है । फिर से संघर्ष करने की सख़्त ज़रूरत है । असली परिश्रम अभी बाकी है ।

    1. Very good for what, Sir? Shri Apoorvanand is a slightly different kind of blogger than many others in Kafila. Unfortunately I had missed this article, and thanks to you that I got directed to it after more than a year. And felt commenting as the opening sentence in the essay cites Shri Hazari Prasad Dviwedi, a literary giant, whom I went to see during Indian Science Congress in Jan 1966, in Chandigarh, and touched his feet to pay respect. He felt awkward, as he perhaps thought a scientist would not know his contribution to Hindi literature which was nor true. Since I find a convergence with Shri Apoorvanand on his respect for Shri Dviwedi, I expect him to rise much above the other bloggers on this site who write on expected lines. The question is not whom the people of India elected in May 2014, but whom they should have elected, particularly as PM. An intellectual must point towards the right road, rather than just pointing towards the wrong one. I know Shri Apoorvanand has visited US, but not sure he did the Soviet Union. I have. Therefore I know first hand why the Bolshevik revolution was a bloody one, but no one sacrificed him/herself to protect it several decades later. Should one not expect from intellectuals like Shri Apoorvand to guide us to a socio-political path that India should follow, rather than dwelling on what it should not? Are most Kafila blogger not doing the later job? Should Mr Apoorvand remain on the same track, only the surrounding or context being a bit different?

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