आज्ञाकारिता की संस्कृति

कुछ वक्त पहले देश के एक बड़े शिक्षा संस्थान की विद्वत् परिषद् ने कोई एक साल पहले पाठ्यक्रम में की गई बड़ी और महत्वाकांक्षी तब्दीली को खारिज करते हुए पुराने पाठ्यक्रम को वापस बहाल करने का फैसला किया. यह वही परिषद् थी जिसने पहले के पाठ्यक्रम की आलोचना को दरकिनार करते हुए पिछला परिवर्तन किया था.उस वक्त इस निर्णय की आलोचना करने वाले अध्यापकों से राजनीतिक और शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने प्रश्न किया था: यह निर्णय अत्यंत शिक्षित,अपने ज्ञान-क्षेत्रों में सुपरिचित विद्वानों ने सुचिंतित ढंग से किया क्यों किया जब आप इसे अकादमिक दृष्टि से कमजोर बताते हैं? एक तरह से विश्वविद्यालय के अकादमिक समुदाय ने स्वेच्छा से यह फैसला किया. लेकिन  भिन्न परिस्थिति में इसी निर्णय को इसी परिषद् ने फिर उतने ही निर्द्वन्द्व भाव से कैसे रद्द कर दिया?

अभी दो महीने हुए, देश के प्रधानमंत्री ने शिक्षक दिवस के दिन बच्चों से सीधे बात करने का निर्णय किया. केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह कोई सरकारी फरमान नहीं है, स्वैच्छिक है. लेकिन केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा समिति, केंद्रीय विद्यालय संगठन,आदि ने इसे लागू करना अनिवार्य कर दिया. अनेकानेक निजी विद्यालयों ने भी, जो अपने काम-काज में सरकार से आज़ाद हैं,इसे अपने बच्चों के लिए निर्विकल्प कर दिया.

गुजरे दो अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने पुनः बापू-जयंती के दिन, जो पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के बाद देश का एक मात्र राष्ट्रीय अवकाश है, स्वच्छता अभियान चलाने का निर्णय किया. अवकाश रद्द नहीं किया गया था. लेकिन प्रायः सभी सरकारी और स्वायत्त संस्थाओं ने अपने यहाँ छुट्टी प्रायः रद्द कर दी और अपने कर्मचारियों को उस दिन दफ्तर आना अनिवार्य सा कर दिया. यही नहीं, कुछ जगहों पर उच्च पदाधिकारी झाड़ुओं की छीना झपटी करते हुए देखे गए और गर्वपूर्वक झाडू को ध्वज या तलवार की तरह लहराते हुए घूमते देखे गए.

1960 में इस्राइल की खुफिया संस्था मोसाद ने अडोल्फ़ इशमैन को अर्जेंटीना में गिरफ्तार किया.  उस पर पंद्रह आपराधिक मामलों में मुकदमा चलाया गया जिनमें यहूदियों की ह्त्या, मानवता के विरुद्ध अपराध शामिल थे. मुकदमे के दौरान उसे यह जान कर बहुत ताज्जुब हुआ कि लोग और खासकर यहूदी उससे नफरत करते हैं क्योंकि उसका ख्याल यह था कि उसने तो मात्र अपने अधिकारियों के आदेश का पालन किया था. नाजियों का पीछा करने के लिए प्रख्यात साइमन वीजेंथल ने कहा कि इस मुकदमे से यह साफ हो गया है कि लाखों लोगों की ह्त्या के लिए दिमागी तौर पर बीमार,सैडिस्ट या खूँखार होना आवश्यक नहीं है.उसके लिए अपना कर्तव्य करने को व्यग्र एक वफादार अनुयायी होना काफी है.

चारों उदाहरणों में एक बात सामान्य है: ये आज्ञाकारिता के परिणाम हैं. पहले तीन में किसी को शारीरिक नुकसान पहुँचने का कोई खतरा न था, अंतिम उदाहरण एक अतिवादी छोर का है. इसमें लाखों लोगों की जान का सवाल था. प्रश्न यह है कि ऊपर के तीन प्रसंगों में शामिल लोग अगर इशमैन की स्थिति में होते तो क्या वे उससे अलग फैसला करते?

इसके बारे में कुछ संकेत एक और घटना से मिलता है. पहले उदाहरण वाले विश्वविद्यालय में ही जब कुछ अध्यापकों और विद्वानों ने पाठ्यक्रम-परिवर्तन का विरोध किया तो उनके बयान के अगले दिन ही उनपर तीखा हमला करते हुए पचास से ऊपर प्रोफेसरों और डीन का वक्तव्य प्रकाशित हुआ जिसमें आलोचक अध्यापकों को आलसी, कुर्सीतोड़ , नाकारा, अड़ंगेबाज, आदि कहा गया था. जिनके दस्तखत से यह वक्तव्य छपा था, उनमें से कम से कम दो से जब पूछा गया कि उन्होंने अपने सहकर्मियों पर ऐसा भयानक हमला क्यों किया, तो उन्होंने अपने ओहदे की मजबूरी का हवाला दिया और कहा कि वे तो मात्र अपने अधिकारियों के आदेश का पालन कर रहे थे.

इस उदाहरण से यह नतीजा निकालना बहुत गलत न होगा कि इशमैन की स्थिति कोई अपवाद नहीं है. अपने सहकर्मियों पर, बिना उनके विरुद्ध किसी व्यक्तिगत द्वेष के, शाब्दिक आक्रमण करने वाले पद की बाध्यता के कारण,अधिकारियों का आदेश मिलने पर उनपर शारीरिक आक्रमण करने में कितनी दूर तक हिचक पाते?

यह कैसे होता है कि सैनिक निहत्थे लोगों को घेर कर उन्हें मार डालते हैं? कश्मीर हो या मणिपुर,फिलस्तीन हो या वियतनाम, रूस हो या चीन, निरस्त्र लोगों की सैन्य बलों की ह्त्या के उदाहरण अनेक हैं. सभ्य संसार के नेतृत्व का दावा करने वाले अमरीका ने पिछली सदी के साठ के दशक में जब वियतनाम पर हमला किया तो दक्षिणी वियतनाम के माई लाइ इलाके में कैप्टेन मेदिना के नेतृत्व में अमरीकी फौज की एक टुकड़ी ने तकरीबन चार सौ वियतनामियों की ह्त्या की. इस कुख्यात माइ लाई जन-संहार ने भी मनोवैज्ञानिकों को उतना ही विचलित किया जितना नाज़ी जर्मनी में हुए जन-संहार ने किया था.

पचास साल पहले येल यूनिवर्सिटी के अध्यापक स्टेनले मिलग्राम ने एक प्रयोग किया जिसमें शामिल लोगों को कहा गया कि उन्हें कुछ लोगों को दंडित करने के लिए उन्हें बिजली के झटके देने हैं.यह प्रयोगशाला की नियंत्रित स्थिति थी और दंड देने वालों को इसकी छूट थी कि वे झटके देना बंद कर सकते हैं. उन्हें झटका देते समय चीखें सुनाई देती थीं जिनसे मालूम हो कि दंड का भागी कष्ट की किस अवस्था में है. मिलग्राम ने पाया कि अपने शिकार की भयंकर चीखों के बावजूद चालीस में से पचीस ने चार सौ पचास वाल्ट की तीव्रता तक के,जो तीव्रता का उच्चतम स्तर था,झटके देना तय किया.अमरीका यह जान कर स्तब्ध हो गया कि तकरीबन दो-तिहाई अमरीकी आदेश मिलने पर किसी भी निर्दोष व्यक्ति को यातना देने को तत्पर होंगे.वे इससे हिचकिचाएंगे नहीं कि उनकी यातना से उनके शिकार की मृत्यु तक हो सकती है.

यह प्रयोग बाद में दूसरे ढंग से दुहराया गया. जेरी बर्जर ने अपने प्रयोग में जेंडर का भी ध्यान रखा.नतीजे लगभग समान थे.

आज्ञाकारिता एक ऐसा गुण या अवगुण है, जो संस्कृतियों, जेंडर और शिक्षा के स्तर से परे, मानवीय समाज में आम तौर पर पाया जाता है.कुछ की समझ है कि जापान या चीन अथवा कोरिया, जहाँ बौद्ध धर्म का प्रभुत्व है या कंफ्युशियस-मत प्रभावशाली है, अधिक आज्ञाकारी समाज हैं. लेकिन मिलग्राम ने साबित किया कि अमरीकी इस मामले में भिन्न नहीं हैं.क्या हम भारतीय अलग हैं?

बचपन से ही बड़ों की आज्ञा मानने के लिए शिक्षित किए जाने वाले समाज से बाद में आज्ञा के औचित्य पर विचार की अपेक्षा करना शायद ज्यादती है. आज्ञा कई मर्तबा सीधे दी भी नहीं जाती,ऐसा भ्रम होता है कि यह वस्तुतः हमारा अपना निर्णय है. आज्ञाकारिता का अर्थ चुनाव की स्वतंत्रता का अभाव नहीं है. यह प्रायः स्वैच्छिक है. आज्ञा मानने पर पुरस्कार की आशा और न मानने पर नुकसान की आशंका भी सहज ही है.

मनोवैज्ञानिक योसेफ ब्रौडी के अनुसार आज की उपभोक्तावादी संस्कृति के लिए आज्ञाकारिता अत्यंत उपयोगी और आवश्यक है. इसलिए बाज़ार एक ऐसा इंसानी दिमाग चाहता है जो विज्ञापनों की आज्ञा मानता रहे, बावजूद उन चेतावनियों के कि इस जीवन पद्धति का अर्थ है, सामूहिक और अनिवार्य विनाश. यह मिलग्राम के प्रयोग की तरह ही है जहाँ चेतावनी के बावजूद लोगों ने बिजली के झटके देना जारी रखा.

जो यह मानते हैं कि सेना का काम आज्ञाकारिता के बिना नहीं चलता, वे ऊपर के उदाहरणों के कारण इस पर विचार करना चाहेंगे कि क्या सामान्य तौर पर समाज का या सत्ता का काम आज्ञाकारिता के बिना चलता है?

आज से सौ साल पहले एक व्यक्ति अफ्रीका से भारत लौटा और उसने कहा कि आज़ाद समाज और आज़ाद व्यक्ति आज्ञाकारी नहीं होता. स्वतंत्रता का स्रोत है सत्ता के प्रति अवज्ञा. सत्ता की मांगों से अनुकूलित दिमाग नहीं, बल्कि उसकी अवज्ञा करने वाला समाज अधिक परिष्कृत समाज है. अपनी स्वायत्तता को उपलब्ध करने के लिए सविनय अवज्ञा का औजार देने वाले इस व्यक्ति को आज राज्य के एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.

किसी भी समाज के स्वास्थ्य का पता आज्ञाकारी होने की उसकी प्रस्तुति के स्तर से किया जा सकता है. प्रत्येक सत्ता आज्ञाकारिता चाहती है लेकिन उसकी निरंकुशता के स्तर का पता हम इस बात से लगा सकते हैं कि कब हम आज्ञा के स्वरूप पर विचार करने में खुद को असमर्थ पाने लगते हैं. और सजग  समाज वह है जो असमर्थता के अंतिम बिंदु तक लुढ़क न जाए. क्या इसके लिए आज्ञाकारिता-सूचकांक जैसी किसी चीज़ की कल्पना की जा सकती है?

One thought on “आज्ञाकारिता की संस्कृति”

  1. इसी मानसिकता पर चोट करने के लिए Hannah Arendt ने “Banality of Evil ” की प्रस्थापना दी थी उन्होंने कहा था
    “The sad truth is that most evil is done by people who never make up their minds to be good or evil.”
    ― Hannah Arendt
    Ravinder Goel

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