हम सब पानसरे


अभी पिछले साल की बात है जब जनवरी के मध्य में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में ‘डा दाभोलकर की हत्या और तर्कशीलता/विवेकवाद’ विषय पर बोलते हुए कामरेड गोविन्द पानसरे, ने एक अहम बात कही थी कि अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्षरत रहे डा दाभोलकर की हत्या इसी वजह से हुई क्योंकि वह विवेकवादी थे। उनका कहना था कि

‘ऐसे सभी लोग जिन्होंने तर्कशीलता का रास्ता अपनाया, उसका प्रचार किया, उन तमाम लोगों को कुर्बानी देनी पड़ी है। तर्कशीलता की बलिवेदी पर अपने आप को न्यौछावर करनेवाले डा दाभोलकर न पहले शख्स हैं और न आखरी। तर्कशीलता और तर्कशीलता विरोध का यह संघर्ष आदिम काल से चल रहा है और उसमें बदल करना है या नहीं इसके बारे में आप को फैसला लेना होगा।’

निश्चित ही उस वक्त़ किसे यह गुमान हो सकता था कि महज एक साल के अन्दर शहीदों की इस गौरवशाली परम्परा में उनका नाम भी जुड़ जाएगा।

20 फरवरी 2015 को मुंबई के ब्रीच कैण्डी अस्पताल में कम्युनिस्ट पार्टी के इस वरिष्ठ नेता ने अपनी अन्तिम सांस ली। 16 फरवरी को सुबह जब वह अपनी पत्नी उमा के साथ सुबह टहलते हुए लौट रहे थे, तब मोटरसाइकिल सवार युवकों ने उन पर गोलियां चलायी थी। अपनी लम्बी जिन्दगी लेखन से लेकर आन्दोलन, संगठन निर्माण से लेकर रचनात्मक काम आदि तमाम मोर्चों पर एक साथ सन्नद्ध रहा यह सेनानी, चार दिन जिन्दगी और मौत से संघर्ष कर, यह जंग हार गया। इसे विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि डा दाभोलकर की मौत और उनकी मौत के तरीके में भी एक समानता थी, मोटरसाइकिल पर सवार युवकों ने दोनों पर तभी गोलियां चलायी गयीं जब वह सुबह टहल कर लौट रहे थे।

अगले दिन कोल्हापुर शहर में हजारों लोगों के जनसमूह ने अपने इस प्रिय नेता को अपना आखरी लाल सलाम पेश किया। ‘जो हिटलर की चाल चलेगा, वह हिटलर की मौत मरेगा’ ‘कामरेड पानसरे अमर रहे’ जैसे नारों के बीच बिना किसी धार्मिक विधि के सम्पन्न उनके अन्तिम संस्कार में उनकी बेटी स्मिता, बहू मेघा और पोतों ने उनकी चिता में अग्नि प्रज्वलित की। इस हत्या के विरोध में और अपराधियों की गिरफतारी की मांग को लेकर कोल्हापुर और महाराष्ट के तमाम हिस्सों में स्वयंस्फूर्त बन्द का आयोजन किया गया।

जिला नगर के ग्राम कोल्हार में जनमे /26 नवम्बर 1933/ कामरेड पानसरे की महाविद्यालयीय शिक्षा प्रिन्स शिवाजी मराठा बोर्डिंग में हुई, बाद में उन्होंने राजाराम कॉलेज से स्नातक की पदवी ली और फिर नौकरी करते हुए कानून की परीक्षा भी पास की। और 1952 से ही कम्युनिस्ट पार्टी का काम शुरू किया। और गोवा मुक्ति संग्राम से लेकर संयुक्त महाराष्ट आन्दोलन, महंगाई के खिलाफ आन्दोलन या बांधपीड़ितों की लड़ाई या अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्ष जैसे तमाम कामों में वह लगातार सक्रिय रहे। बहुत कठिन परिस्थिति में पले बढ़े पानसरे ने जीविका चलाने के लिए कभी अख़बार बिक्रेता और नगरपालिका में चपरासी जैसी नौकरी भी की। बाद में वह कोल्हापुर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी बने, शिवाजी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग में वह कुछ समय तक सहयोगी व्याख्याता के तौर पर भी सक्रिय रहे।

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सूबा महाराष्ट के बाहर उनकी लोकप्रियता बनने में शिवाजी के इतिहास पर लिखी उनकी छोटी पुस्तिका का अहम योगदान रहा जिसका शीर्षक है ‘शिवाजी कौन था’? दरअसल सत्तर के दशक के बाद महाराष्ट के हिन्दुत्ववादी संगठनों में जिस तरह शिवाजी को अपनी जनद्रोही राजनीति में समाहित करने की, उसे ‘हिंदू राजा’ के तौर पर प्रचारित करने की कोशिशें जब तेज हुईं, तब उसका प्रतिवाद करने के लिए और शिवाजी के असली स्वरूप को सामने लाने के मकसद से उन्होंने गहन अध्ययन कर शिवाजी की वास्तविक छवि लोगों के सामने पेश की। कई अन्य भाषाओं मे अनूदित इस पुस्तिका की मराठी में एक लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। हिन्दुओं और मुसलमानों – दोनों के बीच साम्प्रदायिक तत्वों की असलियत को रेखांकित करनेवाली उनकी आवाज़ इन दोनों समुदायों को अपने साझे इतिहास को देखने पर भी जोर डालती है। एक जगह वह लिखते हैं:

हिन्दुओं के दंगाई धर्मांध हैं, उसी तरह मुसलमानों के बीच भी दंगाई हैं। कुछ मुसलमान अपने आप को शहेनशाह का वारिस समझते हैं और यह सोचते हैं कि उन्होंने इस मुल्क में राज किया। बताइये, इस देश में जब मुसलमानों की हुकूमत थी तबभी सारे मुसलमान कोई बिरयानी का स्वाद नहीं ले रहे थे, शराब नहीं पी रहे थे। उनका बहुलांश गरीब ही था। इसके अलावा, शिवाजी का स्वराज्य कायम करने में जिन मुसलमानों ने अपनी कुर्बानी दी, उनका खून भी तो आप के पूर्वजों का ही खून था। या आप कहेंगे कि औरंगजेब आप का पुरखा और /शिवाजी का अभिन्न साथी/ मदारी मेहतर आप का कोईभी नहीं। आदिलशाह आप का पूर्वज और शिवाजी के सेनापतियों इब्राहिम खान, दौलतखान और काज़ी हैदर से आप को कुछ भी रिश्ता नहीं है ? शिवाजी ने जिस स्वराज्य को कायम किया वह महज हिन्दुओं के लिए नहीं था, वह यहां के मुसलमानों के लिए भी था। फिर महाराष्ट के मुसलमानों को शिवाजी पर अपना दावा ठोंकना चाहिए या नहीं ? जिस तरह शिवाजी का नाम लेकर मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं, उसी तरह दलितों पर भी हमले हो रहे हैं। आरक्षित सीटों का विरोध करनेवाले भी शिवाजी महाराज की जय का उदघोष करते हैं और भूल जाते हैं कि शिवाजी ने सचेत ढंग से अपनी नौकरियों में दलितों को स्थान दिया। आज शिवाजी के नाम पर और शिवाजी का उदघोष करते हुए हिन्दु और मुसलमानों के बीच दंगे हा रहे हैं। इन धर्म के जूनूनियों को बताना होगा कि शिवाजी खुद धर्म को लेकर जूनूनी नहीं था। हिन्दू धर्म पर आस्था रखता था, मगर मुसलमानांे का द्वेष नहीं करता था। श्रद्धालु था मगर अंधश्रद्धा का हिमायती नहीं थी।

जनता को जगाने के मकसद से उन्होंने कई अन्य किताबो ंकी रचना की। जैसे ‘द्विवर्णीय शिक्षा व्यवस्था’, मार्क्सवाद का परिचय, मुस्लिम तुष्टीकरण का सच या राजर्षि शाहू की विरासत आदि। हाल के समय में वह रोड टोल के मसले पर आन्दोलन की अगुआई कर रहे थे। उनका मानना था कि टोल की उगाही न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि अन्तहीन भ्रष्टाचार की जड़ है, जो राजनेताओं को मालामाल करती है।

ध्यान रहे कि हाल के वर्षों में यह तीसरी बड़ी घटना है जब जनता को संगठित करने में मुब्तिला अग्रणियों को महाराष्ट्र में गोलियों का शिकार होना पड़ा। पांच साल पहले सूचना अधिकार कार्यकर्ता सतीश शेटटी – जो अपने काम के चलते भूमाफियाओं के आंखों की किरकिरी बने थे – उन्हें मार दिया गया था तो डेढ साल पहले अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के डा दाभोलकर, जिनकी सक्रियताओं ने तमाम बाबाओं के ही नहीं बल्कि सूबे मे रूढिवादी एवं हिन्दुवादी तबकों की बेचैनी बढ़ा दी थी, वह मार दिए गए थे और अब पानसरे की शहादत। न आज तक सतीश शेटटी के हत्यारों का पता लग सका और न ही दाभोलकर के हमलावर पकड़े जा सके।

एक ऐसा सूबा जिसने फुले अम्बेडकर रमाबाई ताराबाई शिन्दे जैसे महान समाजविद्रोहियों को पैदा किया, जिनकी विरासत के दावेदार शेष मुल्क में भी फैले हैं, उसके जनमानस के एक अहम हिस्से के सावरकर-हेडगेवार-गोलवलकर के मुरीदों में रूपान्तरण को आखिर कैसे समझा जा सकता है। यह समझना इस वजह से भी मुश्किल जान पड़ सकता है क्यांेकि आजादी के बाद के बहुत छोटे अन्तराल को छोड़ दें जिस दौरान घोषित साम्प्रदायिक पार्टियां सत्ता में थी या सत्ता में साझीदार थीं, अधिकतर दौर उसी पार्टी की हुकूमत रही है जो अपने आप को घोषित तौर पर सेक्युलर कहती है। आखिर सेक्युलर निज़ाम में साम्प्रदायिक शक्तियां किस तरह ताकत हासिल करती गयी हैं।

वैसे इस चर्चा के बहाने हम उस हकीकत से भी रूबरू होते हैं कि हिन्दोस्तां का यही वह इलाका है जो हिन्दुत्व का लाइटहाउस पहले से ही बना हुआ है। आखिर एक ऐसा क्षेत्र जहां मुसलमानों की आबादी दस फीसदी के करीब है, जो खुद कभी मुस्लिम बादषाहों की कथित ज्यादतियों का शिकार नहीं हुआ, यहां तक मुगल सम्राट औरंगजेब के वर्चस्व को यहां शिवाजी महाराज के रूप में एक चुनौती मिली, वह आखिर इस अल्पसंख्यकविरोधी परियोजना का ‘लाईटहाऊस’ क्यों बना ? उदाहरण के तौर पर ‘स्वातंत्रयवीर’ सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर, देवरस और हमारे अपने वक्त़ में बाल ठाकरे। ये चारों नाम हिन्दोस्तां के इसी विशिष्ट भौगोलिक इलाके – सूबा महाराष्ट्र से हैं।

आम तौर पर ऐसी घटनाओं के हो जाने पर प्रबुद्ध जन प्रगतिशील महाराष्ट्र के विलोप की चर्चा करने लगते हैं। अपनी मौत के कुछ समय पहले दिए अपने एक व्याख्यान में कामरेड पानसरे ने श्रोताओं को आवाहन किया था कि आज की तारीख में

‘प्रगतिशील महाराष्ट्र की बात करना एक तरह से भ्रम में जीना है। जितना जल्दी हो सके, लोग इससे मुक्त हों और सूबे तथा मुल्क में फैलती दक्षिणपंथी तंजीमों के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करें उतना ही अच्छा रहेगा।’

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