हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनता दिल्ली विश्वविद्यालय: जीत सिंह सनवाल

Guest post by JEET SINGH SANWAL

केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का राजकीय शिक्षा नीतियों से लेकर शिक्षण संस्थाओं के क्रियाकलापों में बढ़ता हस्तक्षेप किसी से छुपा नहीं है। शिक्षा नीति में बदलाव लाने व इस बाबत मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सुझाव व विश लिस्ट सौंपने में संघ ने काफी तत्परता दिखाई है। कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार संघ ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से उनके लिए काम करने वाले तमाम लोगों की लिस्ट सरकार को भेजकर शैक्षिक व सांस्कृतिक संगठनों में उनकी नियुक्ति की मांग की। आशा के अनुरूप पिछले दस माह के भाजपा सरकार के कार्यकाल में विभिन्न संगठनों मेें कई सरकारी नियुक्तियां की गयी और संघ विचाराकों को अपेक्षा से अधिक सम्मान देकर ताजपोशी की गयी। नागपुर के एक प्रतिष्ठित संस्थान में डायरेक्टर पद पर नियुक्ति पाने के लिए तो एक व्यक्ति ने अपने संघ से जुड़े होने के प्रमाण प्रस्तुत करते हुए संबंधित मंत्री को नियुक्ति हेतु आवेदन किया। आशा के अनुरूप मंत्रालय ने भी उन्हीं की नियुक्ति की।

शैक्षिक व सांस्कृतिक संगठनों में इस प्रकार के हस्तक्षेप के पीछे संघ की बुनियादी रणनीति है। प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता राम पुनियानी के अनुसार संघ पहले से ही प्रगतिशील शैक्षिक व सांस्कृतिक विमर्श को बदलकर अपना राजनैतिक आधार मजबूत करने में विश्वास रखता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो0 अपूर्वानन्द के अनुसार संघ की यह रणनीति शिक्षा के अज्ञानीकरण की ओर जाता है। भा.ज.पा. को पूर्ण बहुमत मिलने व संघ के प्रचारक का प्रधानमंत्री बन जाना, उनकी इस रणनीति को आगे बढ़ाने के लिए मुफ़ीद है। विभिन्न शैक्षणिक व सांस्कृतिक संगठनों में पिछले कुछ महीनों से हो रहे इन बदलावों में दिल्ली विश्वविद्यालय का उदाहरण काफी अलग है। संघ दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध, शिक्षण के साथ-साथ छात्रों के मोबिलाईजेशन के जरिये, अपने विवादास्पद एजेंडे को धार देने का प्रयास कर रहा है। संघ की विचारधारा व उनके कार्यक्रम पहले से ही विवादों में रहे हैं। उनके उग्र हिन्दुत्व व अल्पसंख्यकों से वैमनस्य किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय में संघ की बढ़ती औपचारिक व अनौपचारिक सक्रियता, विश्वविद्यालय व बौद्विक जगत के लिए चिंता का विषय है। 

दिसम्बर 2014 में विश्वविद्यालय के ’ज्ञानोदय‘ कार्यक्रम में संघ नेताओं को शामिल करने पर विवाद हुआ था। पिछले वर्ष ज्ञानोदय के तहत् विश्वविद्यालय के छात्रों का दल उत्तर पूर्व के राज्यों के भ्रमण पर गया था। इस भ्रमण से पूर्व छात्रों को उत्तर पूर्व राज्यों की जानकारी देने के नाम पर संघ के संयुक्त सचिव कृष्ण गोपाल को विश्वविद्यालय ने आमंत्रित किया। अपने संबोधन में गोपाल ने हिन्दू देवी देवताओं व देवस्थालों का उल्लेख करते हुए छात्रों को उत्तर पूर्व में हिन्दू तीर्थ स्थलों का भ्रमण करने व उससे संबंधित जानकारी ही दी। विश्वविद्यालय के इस शैक्षणिक कार्यक्रम को संघ के जरिये तीर्थ यात्रा का स्वरूप देने पर काफी सवाल उठे थे। इसके अलावा विश्वविद्यालय प्रशासन भिन्न-भिन्न विषयों पर छात्रों व फेकल्टी को व्याख्यान देने के लिए संघ के लोगों को बुला रहा है। 2007 में हुए अजमेर दरगाह धमाके के आरोपी संघ नेता इन्द्रेश कुमार को भी कई बार व्याख्यान के लिए बुलाया जा चुका है।

विश्वविद्यालय को दिये जाने वाले शोध परियोजनाओं में भी संघ के अजेंडा को प्रमुखता मिलने लगा है। संघ पहले से ही प्रचलित व प्रमाणित ‘आर्य इन्वेजन थ्योरी‘ को नकारता रहा है। संघ का दावा है कि आर्य इसी देश के मूल निवासी हैं, वे बाहर से नहीं आये हैं। अपनी इस थ्योरी को अमली जामा पहनाने के लिए भी संघ ने दिल्ली विश्वविद्यलय को ही चुना। इंडियन काउन्सिल आॅफ हिस्टाॅरिकल रिसर्च के निदेशन के पद पर संघ के विवादास्पद नेता सुदर्शन राव की नियुक्ति के तुरंत बाद, काउन्सिल ने दिल्ली विश्वविद्यालय को यह सिद्ध करने का प्रोजेक्ट दिया कि आर्य बाहरी लोग नहीं हैं। इतिहास के इस विषय पर संस्कृति विभाग को शोध के लिए कहना भी अपने आप में कई प्रश्नों को खड़ा करता है। इस प्रोजेक्ट पर विभाग ने भी काफी दिलचस्पी दिखाते हुए  कई सेमिनार आयोजित कर दिये, जिसमें भारत से लेकर अमरीका के हिन्दू दक्षिण पंथी लेखकों व विचारकों को शामिल किया, लेकिन प्रख्यात भारतीय इतिहासकारों को दरकिनार किया गया।

शैक्षिक व शोध गतिविधियों में हस्तक्षेप के अलावा अब संघ ने सीधे छात्रों को भी टारगेट बनाने का मन बनाया है। इस क्रम में संघ ने पिछले सप्ताह विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों को सात दिवसीय हिन्दुत्व का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण में छात्रों से संघ की विचारधारा व हिन्दुत्व पर बातचीत का कार्यक्रम था। मीडिया में आयी खबरों के अनुसार इन प्रशिक्षित छात्रों को अपने-अपने काॅलेजों में जाकर संघ की शाखाओं का आयोजन करने की जिम्मेदारी दी जायेगी। अपने इस अभियान के जरिये संघ छात्रों में उग्र हिन्दुत्व के विचारों के प्रति आकर्षित करने का प्रयास करेगा। एक निजी टेलीविजन को दिये गये बयान मे,ं संघ विचारक राकेश सिन्हा कहते हैं कि यह किसी तरह से गलत नहीं है, क्योंकि संघ पहले से ही अलग अलग संस्थानों में शाखाओं का आयोजन करता रहा है, और अब दिल्ली विश्वविद्यालय में भी शुरू किया गया। इस दौरान संघ की छात्र इकाई ए0बी0वी0पी0 भी दिल्ली विश्वविद्यालय में मजबूत हुई है। संगठन ने विश्वविद्यालय में संघ के विवादास्पद मुद्दों को हवा देने का काम बखूबी निभाया है। लव जेहाद और गौहत्या सहित व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने के लिए ए0बी0वी0पी0 ने काफी आक्रमकता दिखाई है।

विश्वविद्यालय में संघ की औपचारिक व अनौपचारिक सक्रियता एक नियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। तमाम घटनाओं व प्रक्रियाओं से ऐसा लगता है कि संघ अपने विवादास्पद सिद्धांतों व मनगढ़ंत मिथकों को देश की प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के जरिए प्रमाणित करने का प्रयास कर रहा है। वहीं दूसरी ओर संघ अपने जमीनी स्तर के कार्यक्रमों को विश्वविद्यालय परिसर में क्रियान्वित कर प्रयोग भी करना चाहता है। इसके अलावा भी कई अन्य शैक्षणिक, शोध व सांस्कृतिक संगठनों में भी संघ हावी हो रहा है लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय की अर्जित ख्याति व इसकी लोकेशन का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भरपूर लाभ लेना चाहता है।

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जीतसिंह सनवाल राजीव गांधी इन्स्टीट्यूट फाॅर कन्टम्परेरी स्टडीज नई दिल्ली, में सीनियर रिसर्च एशोसिएट हैं.

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