तर्क और विचारों से कौन डरता है ? – दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की शहादत के बहाने चन्द बातें

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Photo : Courtesy – http://www.newslaundry.com

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आग मुसलसल जेहन में लगी होगी
यूं ही कोई आग में जला नहीं होगा

दोस्तों

कातिल के पिस्तौल से निकली ऐसी ही आग का शिकार हुई तीन अज़ीम शख्सियतों की याद में हम सभी लोग ‘कलम विचार मंच’ की पहल पर यहां जुटे हैं। विगत दो साल के अन्तराल में हम लोगों ने डा नरेन्द्र दाभोलकर, कामरेड गोविन्द पानसरे और प्रोफेसर कलबुर्गी को खोया है। गौरतलब है कि सिलसिला यहीं रूका नहीं है। कइयों को धमकियां मिली हैं। ऐसा समां बनाया जा रहा है कि कोई आवाज़ भी न उठाए, उनके फरमानों को चुपचाप कबूल करे। दक्षिण एशिया के महान शायर फैज़ अहमद फैज़ ने शायद ऐसे ही दौर को अपनी नज्म़ में बयां किया था। ‘निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन, के जहां ; चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले..’

और इसी माहौल के मददेनज़र हम इसी अदद मसले पर आपस में गुफतगू करना चाह रह हैं कि आखिर तर्क और विचार से इस कदर नफरत क्यों दिख रही है ? कौन हैं वो लोग, कौन हैं वो ताकतें जो विचारों से डरती हैं, तर्क करने से खौफ खाती हैं ? चन्द रोज लखनउ की सड़कों पर उतर कर भी आप ने ऐसे हत्यारों के खिलाफ आवाज़ बुलन्द की थी। और एक तरह से समूचे देश के विभिन्न नगरों, कस्बों में जो इस मसले पर जो बेआरामी, बेचैनी देखने को मिली थी, उसके साथ अपनी आवाज़ जोड़ी थी। आज की यह चौपाल, आज की यह गोष्ठी दरअसल इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। हम उन चिन्ताओं को आपस में साझा करना चाह रहे हैं ताकि यह जो माहौल बन रहा है, जो गतिरोध की स्थिति बनती दिख रही है उसमें थोड़ी हरकत पैदा की जा सके।

इसे दिलचस्प संयोग कहेंगे कि इस गोष्ठी का आयोजन बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के महान सामाजिक विद्रोही पेरियार रामस्वामी नायकर / 17 सितम्बर 1879-24 दिसम्बर 1973/ के 139 वें जन्मदिन के महज एक दिन बाद हो रहा है। कल ही देश के तर्कशील समूहों, संगठनों ने, विचारों की अहमियत जाननेवाले तमाम लोगों ने उनका जन्मदिन मनाया, वही पेरियार जिन्होंने ताउम्र तार्किकता, आत्मसम्मान, महिला अधिकार और जातिउन्मूलन के सिद्धान्तों का प्रचार किया और आन्दोलन किए। मालूम हो कि तमिल लिपि में नए बदलावों के जनक पेरियार समाजवादी रूस की उपलब्धियों से भी प्रभावित थे और उन्होंनेे नास्तिकता एवं तर्कशीलता के प्रचार के लिए अभिनव मुहिमों का आयोजन किया था।

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जैसा माहौल बन रहा है कि उसे देखते हुए यही पूछने का मन करता है कि एक ऐसे समाज के बारे में क्या कहेंगे जहां लेखकों को बन्दूक की गोलियों से टकराना पड़ता है और सांस्क्रतिक कार्यक्रमों पर पत्थर या बम बरसाये जाते हैं ? शायद ऐसा समाज जो अपनी ‘आध्यात्मिक मौत’ की तरफ बढ़ रहा है या ऐसा समाज जो अंधेरे की गर्त में अपना भविष्य देख रहा है।

दुनिया के सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलानेवाले भारत में दो साल के अन्दर तर्कशील विचारक, कार्यकर्ता की तीसरी मौत की घटना हमारे सामने ऐसे ही सवाल खड़े कर देती है। अगस्त 2013 में पुणे की सड़कों पर तर्कशील आन्दोलन के कार्यकर्ता एवं लेखक नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या, फरवरी 2015 में कोल्हापुर की सड़क पर अपनी पत्नी के साथ टहल कर लौट रहे कम्युनिस्ट आन्दोलन के अग्रणी नेता कामरेड पानसरे की हत्या और अब धारवाड, कर्नाटक में अपने घर के अन्दर वामपंथी विचारक एवं कन्नड भाषा के प्रकांड विद्वान 77 वर्षीय कलबुर्गी की हत्या /30 अगस्त 2015/ ऐसे ही सवालों से हमें रूबरू कराती है।

बिजापुर जिले के किसान परिवार में जनमे प्रोफेसर मल्लेशप्पा माडिवालप्पा कलबुर्गी ने, जिन्होंने अपनी मेधा एवं लगन से कन्नड भाषा को सम्रद्ध किया, लिंगायत सम्प्रदाय पर मौलिक अनुसंधान किया जिसका बाईस जुबानों में अनुवाद हुआ, एक सौ तीन किताबें लिखीं, सैकड़ों लेख लिखें और अंधश्रद्धा एवं अतार्किकता के खिलाफ जिन्दगी भर आवाज़ बुलन्द करते रहे, उन्होंने यह सपने में नहीं सोचा होगा कि जिला धारवाड का उनका अपना घर ही उनके झंझावाती जीवन का आखरी मुक़ाम साबित होगा। ‘सर’ से मिलने के नाम पर अन्दर घुसा हमलावर – जिसके लिए उन्होंने खुद दरवाजा खोला था – वह उनका काल बन कर उपस्थित होगा। वह अपने घर के अन्दर एक अतिवादी की गोली का शिकार होंगे।

चाहे प्रोफेसर कलबुर्गी हों, कामरेड पानसरे हों या डा नरेन्द्र दाभोलकर हों, तीनों के झंझावाती जीवन में एक समानता यह रही है कि उन्हें साम्प्रदायिक ताकतों की तरफ से, जनद्रोही शक्तियों की तरफ से – ऐसे लोग जो लोगों के दिमागों पर ताले रखना चाहते हैं – लगातार धमकियां मिलती रहीं। मूर्तिपूजा की मुखालिफत करने के लिए कुछ समय पहले प्रोफेसर कलबुर्गी के घर पर हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पथराव भी किया था। अतिवादियों के बढ़ते मनोबल के चलते उन्हें सुरक्षा भी प्रदान की गयी थी, मगर कुछ माह पहले उन्होंने उसे लौटा दिया था। उनका कहना था कि विचारों की रक्षा के लिए संगीनों एवं बायनेटों की जरूरत नहीं होती है। उनका दावा था कि उनके विचारों में इतना ताप है कि उनके न रहने के बाद भी उसकी लौ तमाम चिरागों को रौशन करती रहेगी।

गौरतलब है कि तीनों की हत्याओं का तरीका एक ही रहा है, मोटरसाइकिल पर सवार दो हमलावर और एक का गोली चलाना। भारत में पश्चिमी भाग में सक्रिय एक अतिवादी संगठन के कार्यकर्ताओं की तरफ – जो इसके पहले भी आतंकी घटनाओं में शामिल हो चुके हैं – सन्देह प्रगट किया जा रहा है, मगर अभी भी आधिकारिक तौर पर न दाभोलकर के हत्यारे पकड़े गए है और न ही पानसरे के कातिल गिरफत में आए हैं। फिलवक्त यह कहना मुश्किल है कि क्या प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या में भी यही सिलसिला दोहराया जाएगा ?

प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या के विरोध में धारवाड ही नहीं कर्नाटक के तमाम हिस्सों में प्रदर्शन हुए हैं। बंगलुरू के टाउन हाल के सामने एकत्रित प्रदर्शनकारियों में कार्यकर्ताओं या आम जनों के अलावा कन्नड भाषा में तमाम अग्रणी हस्ताक्षर मौजूद थे। वहां एक प्रदर्शनकारी का बैनर सभी के आकर्षण का केन्द्र बना था ‘कल बसवन्ना और आज कलबुर्गी’।

गौरतलब है कि 12 वीं सदी के महान समाजसुधारक बसवन्ना – जो लिंगायत सम्प्रदाय के संस्थापक समझे जाते हैं – जिन्होंने तत्कालीन कन्नड समाज की कुप्रथाओं के खिलाफ जबरदस्त आवाज़ बुलन्द की, जातिप्रथा को शिकस्त देने की अपने ढंग से कोशिश की और जिन्हें अपने वक्त़ के रूढिवादी तत्वों से लगातार जूझना पड़ा, के दौर के साहित्य को लेकर प्रोफेसर कलबुर्गी ने मौलिक अनुसंधान किया था। कलबुर्गी कई मायनों में बसवन्ना की तरह ही थे, जो समाज की अतार्किकता, बन्ददिमागी के खिलाफ खुल कर बोलते थे, लिखते थे, मूर्तिपूजा के प्रति लोगों के सम्मोहन की आलोचना करते थे, और शायद यही वजह थी कि लगातार रूढिवादी ताकतों के निशाने पर वह रहे थे। बसवण्णा के बारे में यह मशहूर है कि बारहवीं सदी में उन्होंने अनुभव मंडप, नाम से एक सार्वजनिक सभा का आयोजन करना शुरू किया जहां अपने जमाने में तमाम लोग एकत्रित होते थे और उनके सामने मौजूद आध्यात्मिक, आर्थिक और सामाजिक सवालों पर आपस में बहस मुबाहिसा करते थे, ।

बसवण्णा की रचनाओं में हम अक्सर ‘स्थावर’ और ‘जंगम’ के बीच अर्थात ‘क्या स्थिर है’ और ‘क्या सचल है’ इसक बीच निरन्तर विरोधाभास देखते हैं। उनके मुताबिक मंदिर, प्राचीन किताबें स्थिर की श्रेणी में शुमार होंगी जबकि काम, चर्चा ‘सचल’ में शुमार होगा। एक रचना मंे वह लिखते हैं

अमीर लोग/ शिव के लिए मंदिर बनाएंगेॅ
मैं एक गरीब आदमी/ क्या करूंगा ?
मेरे पैर खम्भे हैं/मेरा शरीर ही तीर्थ है
और सिर सोने का बर्तन है
सुनो ऐ नदियों के देवता
जो चीजें खड़ी रहती हैं वह गिर जाती हैं
मगर जो चीजें चलती हैं वह/ टिकी रही जाती हैं।

जिस तरह बसवण्णा अपने वक्त़ के उनके विरोधियों के हाथों मार दिए गए थे, वही हाल इक्कीसवीं सदी के उनके सबसे मशहूर शिष्य का हुआ है।

एक विद्वान लेखक से विचारों से निपटने के बजाय उनके विरोधियों ने बन्दूक की गोलियों से ही उनको समाप्त करना चाहा। शायद हमलावर भूल गए थे कि विचार कभी मरते नहीं हैं। 30 अगस्त के पहले अगर कलबुर्गी का नाम कर्नाटक तक सीमित था तो आज अपने मानवद्रोही हमलावरों को चुनौती देता हुआ यह नाम दक्षिण एशिया के इस हिस्से के उन बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं की कतार में शुमार हुआ है, जिन्होंने सुकरात की तरह विचारों की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दी।

‘अगर सत्ताधारी ताकतें गलत हों तो सही होना खतरे से खाली नहीं होता’।

फं्रास के महान क्रांतिकारी दार्शनिक वोल्टेयर के इस कथन से बखूबी परिचित प्रोफेसर कलबुर्गी जिन्होंने अभिव्यक्ति के तमाम खतरे उठा लिए की अस्वाभाविक मौत पर लिखे अपने लेख में इंडियन रैशनेलिस्ट एसोसिएशन के प्रमुख सनल एरमाकुदू, जो खुद ईसाई कटटरपंथियों की कार्रवाइयों के चलते पिछले कुछ सालों से आत्मनिर्वासन में यूरोप में हैं, /व्हाट इफ दयानंद सरस्वती लिवड इन अवर टाईम्स, इंडियन एक्स्प्रेस, 1 सितम्बर 2015/ लिखा है कि

किस तरह विगत सदियों में तमाम हिन्दु सुधारकों ने मूर्ति पूजा की जबरदस्त आलोचना की थी। क्या हिन्दू धर्म की वह सहिष्णु धारा अपना असर खोती जा रही है जिसने विचारों की बहुविध परम्पराओं का लगातार सम्मान किया जिसमें ‘वेदनिन्दक’ कहे गए चार्वाक और लोकायत भी शामिल थे ? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह धारा पीछे ढकेली जा रही है और असहिष्णुता ने सर उठाया है और ऐसे आलोचक जिनका जवाब नहीं दिया जा सकता उन्हें गोलियां चला कर खामोश किया जा रहा है। ..कल्पना करें कि आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती /1824-1883/ जिन्होंने मूर्तिपूजा की मुखालिफत की और धार्मिक कर्मकाण्डों की आलोचना की, हमारे समय में जीवित रह रहे होते ! क्या मोटरसाइकिल पर सवार इन अपराधियों ने उनके जैसे सुधारक को भी बख्शा होता।’

आखिर ऐसी क्या बात थी कि साहित्य अकादमी से लेकर तमाम सम्मानों से नवाज़ा गया कन्नड भाषा के विद्वान प्रोफेसर कलबुर्गी, जिन्होंने हम्पी विश्वविद्यालय कुलपतिपद के दौरान कई नए अनुसंधानों की शुरूआत की थी और प्रकाशन किए थे और जो वचना साहित्य में प्राधिकार समझे जाते थे कटटरपंथियों के निशाने पर आए थे।

दरअसल पहला विवाद 1980 के दशक में हुआ था जब वह कर्नाटक की प्रभावशाली लिंगायत समुदाय के निशाने पर आए थे, अपनी किताब मार्ग 1 में लिंगायत सम्प्रदाय के संस्थापक बसवेश्वर के बारे में उनके अनुसंधान से उनके निष्कर्षों से लिंगायतों के एक तबके की ‘भावनाएं आहत होने’ की बात की गयी थी, मामला इस कदर बढ़ा था कि किसी लिंगायत पीठ के सामने उन्हंे बाकायदा बुलाया गया था और उन्हें अपने नज़रिये के लिए खेद प्रगट करना पड़ा था, जिसे उन्होंने अपनी ‘बौद्धिक आत्महत्या’ घोषित किया था और कहा था कि अपने परिवार को बचाने के लिए उन्होेंने यह किया था।

2014 में वह एक बार अन्य विवादों में घेरे गए जब कन्नड के चर्चित लेख यू आर अनंतमूर्ति द्वारा मूर्तिपूजा का विरोध किए जाने का उन्होंने भी समर्थन किया था और हिन्दुधर्म में मूर्ति पूजा की आलेाचना की थी। इसके बाद दक्षिणपंथी हिन्दूवादी संगठनों ने उनके घर पर प्रदर्शन भी किए थे और उनके घर पर पत्थर तक फेंके गए थे।

मालूम हो कि प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या के चंद घंटों बाद ही उनकी हत्या को अपने टिवट के जरिए औचित्य प्रदान करने तथा हिट लिस्ट पर अगला नाम मैसूर विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर के एस भगवान का है, यह लिखने के लिए एक अतिवादी हिन्दू को गिरफतार किया गया है, जो बजरंग दल या ऐसी ही किसी संगठन का कारिन्दा बताया जाता है। तर्कशील स्वतंत्रामना विचारकों – जो हर किस्म की यथास्थिति को चुनौती देते रहते हैं – की हत्या का सिलसिला यहीं नहीं रूकनेवाला है यह इस बात से भी स्पष्ट होता है कि उनकी हत्या के एक दिन बाद डा भगवान के अलावा निदुमामीदी मठ के बीरभद्रा चेन्नामल स्वामीजी – को भी हिन्दू कर्मकाण्डों की आलोचना करने के लिए धमकियां मिली हैं। ख़बर यह भी आयी है कि भगवान को निशाना बनाने की मुहिम में अब भाजपा भी जुड़ गयी है, उसने भी उन अतिवादी तत्वों की इस मांग का समर्थन किया है कि प्रोफेसर भगवान को दिए गए पुरस्कार को राज्य सरकार वापस ले।

यह बात रेखांकित करनेवाली है कि प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या एक ऐसे समय में हुई है जब दक्षिण एशिया के इस हिस्से में बहुसंख्यकवादी ताकतें अपने अपने इलाकों में कहीं धर्म तो कही समुदाय के नाम पर स्वतंत्रामना आवाजों को खामोश करने में लगी हैं। कलबुर्गी की हत्या के चन्द रोज पहले ढाका में निलोय चक्रवर्ती नामक ब्लॉगर के घर में घुस कर इस्लामिस्ट अतिवादियों ने उनकी बर्बर ढंग से हत्या की थी। मालूम हो कि विगत दो साल में सेक्युलर मानवतावादी ब्लागरों में शुमार पांचवें ब्लागर की यह हत्या है जिसका सिलसिला फरवरी 2013 में अहमद राजिब हैदर नामक ब्लॉगर की ढाका की सड़को ंपर हत्या के साथ शुरू हुआ था। दो साल पहले बांगलादेश में जब युद्ध अपराधियों को सज़ा दिलाने तथा युद्ध अपराधों में शामिल जमाते इस्लामी के कर्णधारों को दंडित करने के लिए जो ऐतिहासिक शाहबाग आन्दोलन खड़ा हुआ था, उसकी लामबन्दी में इन सेक्युलर मानवतावादी ब्लागर्स ने अविस्मरणीय भूमिका अदा की थी, जिसके चलते वह इस्लामिस्टों के निशाने पर लगातार रहे हैं। अहमद राजिब हैदर के बाद अविजित रॉय, फिर वयासिकुर रहमान, फिर अनंत विजोय दास। यूं तो अविजित रॉय पर हमले में उनकी पत्नी रफीदा अहमद बोन्या भी बुरी तरह घायल हुई थीं।

ध्यान रहे कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी स्वतंत्रामना ताकतें, लोग जो तर्क की बात करते हैं, न्याय, प्रगति एवं समावेशी समाज की बात करते हैं, वे भी कटटरपंथ के निशाने पर हैं। ईशनिन्दा के नाम पर जेल में बन्द आसियाबी का समर्थन करने पहुंचे पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर – जिन्होंने ईशनिन्दा कानून का विरोध किया था और वहां के मंत्राी शाहबाज बटटी इसी तरह अतिवादी इस्लामिस्टों के हाथों मारे गए थे। इतनाही नहीं वहां शिया मुसलमानों, अहमदी मुसलमानों पर भी हमले हो रहे हैं, इतनाही नहीं कटटरपंथी तत्व पोलियो का टीका लगाने में मुब्तिला कर्मचारियों को भी अपने हमले का निशाना बना रहे हैं। पाकिस्तान के बदतर होते हालात पर जानेमाने भौतिकीविद एवं पाकिस्तान में मानवाधिकार आन्दोलन के कार्यकर्ता प्रोफेसर परवेज हुदभॉय की यह टिप्पणी गौरतलब है:

.. दुनिया में किसी भी अन्य इलाके की तुलना में पाकिस्तान एवं अफगाणिस्तान में अतार्किकता तेजी से बढ़ी है और ख़तरनाक हो चली है। लड़ाइयों में मारे जानेवाले सिपाहियों की तुलना में यहां पोलियो कर्मचारियों की उम्र कम होती है। और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, इस हक़ीकत को देखते हुए स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय युवा मनों का प्रबोधन करने के बजाय उन्हें कुचलने में लगे हैं, अतार्किकता के खिलाफ संघर्ष निश्चित ही यहां अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है।

(http://hoodbhoy.blogspot.in/p/dr-pervez-hoodbhoy-complete-repository.html)

अगर हम श्रीलंका को देखें तो वहां भी वातारकिया विजिथा थेरो जैसे विद्रोही बौद्ध भिक्खु, जिन्होंने बोण्डु बाला सेना जैसे बौद्ध उग्रवादी समूहों के निर्देशों को मानने से इन्कार किया, उन पर हमले हुए हैं और उन्हें मरा हुआ मार कर छोड़ा गया है, बर्मा में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने में विराथू जैसे बौद्ध सन्त – जिन्हें बर्मा का ‘बिन लादेन’ कहा जाता है – ही आगे हैं। उधर पंजाब के अन्दर डा पशौरा सिंह और डा हरजोत ओबेरॉय जैसे सिख विद्धानों को सिख परम्परा के ‘रखवालों’ की तरफ से प्रताडित किया जा रहा है।

प्रोफेसर कलबुर्गी और दक्षिण एशिया के इस हिस्से में सक्रिय ऐसे तमाम तर्कशीलों, स्वतंत्रामना, प्रगतिकामी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हमें इस बात पर अवश्य सोचना चाहिए कि क्या ऐसा समाज कभी वास्तविक तौर पर तरक्की के रास्ते, प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकता है जहां सन्देह करने की, सवाल उठाने की, तर्क करने की, विचार करने की आज़ादी पर ताले लगे हों।

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सही बात है कि एक अज़ीब से दौर से हम फिलवक्त़ गुजर रहे हैं जब एक अलग तरह की हिट लिस्ट की बातें अधिकाधिक सुनाई दे रही है।

पहले ऐसी बातें दूर से सुनाई देती थीं। जब साठ के दशक के उत्तरार्द्ध या सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध में कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन अपने उरूज पर था, जब उसने सत्ता को चुनौती दी थी तब बंगाल और आंध्र के रैडिकल छात्रा युवाओं के, या अन्य इन्कलाबियों के नामों की फेहरिस्त लिए पुलिस बल के लोग या उनके पिटठू घुमते रहते थे। जिन लोगों ने महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘हजार चौरासी की मां’ पढ़ा होगा या उस पर बनी एक हिन्दी फिल्म देखी होगी, वह उस दौर का बखूबी अनुमान लगा सकते हैं।

उधर जब अस्सी के दशक में खालिस्तानी आन्दोलन का रक्तरंजित सिलसिला चल पड़ा तो फिर एक बार हिट लिस्ट की बातें सूर्खियां बनीं। फरक महज इतना था कि एक तरफ पुलिस-सुरक्षा बलों की हिट लिस्ट होती थी, जिसमें उन लोगों के नाम शामिल रहते थे जेा उनके हिसाब से खालिस्तानियों से ताल्लुक रखते थे तो उधर खालिस्तानी उन लोगों को ढूंढते रहते थे जो उनकी खूनी सियासत के मुखालिफ होकर इन्सानियत के हक़ में खड़े होते थे। चाहे कम्युनिस्ट इन्कलाबी आन्दोलन का दौर रहा हो या खालिस्तानी आन्दोलन का रक्तरंजित दौर ऐसे तमाम बेशकीमती लोग मारे गए हैं, जो समाजी बेहतरी एवं बराबरी की लड़ाई में मुब्तिला थे।

आज 21 वीं सदी की दूसरी दहाई में जबकि आज़ाद भारत की पचहत्तरवीं सालगिरह मनाने की तरफ हम बढ़ रहे हैं, तब इस अलग किस्म की लिस्ट जारी हुई है। दरअसल इस लिस्ट में ऐसे लोगों के नाम शामिल हैं जो कलम चलानेवाले लोग है, भारत के संविधान के दायरे में रह कर अपनी सक्रियताओं के चलते यहां के जनतंत्रा को सम्रद्ध बनाने में मुब्तिला लोग हैं, नफरत एवं अलगाव की राजनीति के खिलाफ अलग जगानेवाले लोग हैं, जो मजलूम हैं जो मुफलिस है उसके हक़ में आवाज़ बुलन्द करनेवाले लोग है। तमाम बाबाओं, बापूओं और साधुमांओं द्वारा बेवकूफ बनाये जा रही आबादी को सच्चाई बताने में मुब्तिला लोग हैं।

इसी हिट लिस्ट का परिणाम है कि दो साल में अपने में से कमसे कम ऐसे तीन अज़ीम शख्सियतों को हमने खोया है, जिनका रहना इस जनतंत्रा को और सम्रद्ध करता और स्पंदित बनाता। चिन्तित करनेवाली बात यहभी है कि यह अन्त नहीं है।

इस हिट लिस्ट में और कइयों के नाम शामिल बताए जाते हैं।

कर्नाटक के दो अग्रणी लेखकों के मकानों को ध्वस्त करने की श्रीराम सेने के कार्यकर्ताओं ने बाकायदा प्रेस कान्फरेन्स करके धमकी दी है, जिन्होंने कलबुर्गी की हत्या में कथित तौर पर उसके कार्यकर्ताओं की संलिप्तता की बात कही थी। अभी चन्द रोज पहले दिल्ली के जनाब जान दयाल – जो अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए लगातार संघर्षरत रहते हैं – उन्हें भी धमकी दिए जाने की बात सुनाई दी है।

दाभोलकर पानसरे की शहादत के बाद सूबा महाराष्ट के तीन लोगों को – डा नरेन्द्र दाभोलकर के भाई दत्तप्रसाद दाभोलकर और श्रमिक मुक्ति दल के नेता एवं वामपंथी विचारक-कार्यकर्ता भारत पाटणकर और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखक भालचंद्र नेमाडे को धमकी मिली है। दत्तप्रसाद दाभोलकर, दक्षिणपंथियों के निशाने पर इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के जीवन एवं कार्य को अलग ढंग से व्याख्यायित करने की कोशिश की है, जिसका बुनियादी स्वर होता है विवेकानन्द को जिस तरह दक्षिणपंथ द्वारा अपने ‘आयकॉन’ के रूप में में समाहित किया गया है, उनकी खास किस्म की हिन्दूवादी छवि को प्रोजेक्ट किया गया है, उसकी मुखालिफत करना। इस मसले पर वह जगह जगह व्याख्यान भी देते हैं। मार्क्स एवं फुले अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित कामरेड भारत पाटणकर विगत लगभग चार दशक से मेहनतकशों एवं वंचित-दलितों के आन्दोलन से सम्बद्ध हैं और साम्प्रदायिक एवं जातिवादी राजनीति का विरोध करते हैं। जनता की सांस्क्रतिक चेतना को जगाने के लिए ‘बलीराजा’ जैसे पुराने प्रतीकों को भी उन्होंने नए सिरेसे उजागर करने का काम किया है।

ताज़ा समाचार यह भी है कि कामरेड गोविन्द पानसरे की हत्या में कथित तौर पर शामिल होने को लेकर जबसे ‘सनातन संस्था’ के कार्यकर्ता पकड़े गए हैं तबसे महाराष्ट के वरिष्ठ पत्राकार निखिल वागले, तर्कशील आन्दोलन के श्याम सोनार, मशहरू डाक्युमेंटरी निर्माता आनंद पटवर्धन को भी धमकी मिली है।

अगर ऐसी खुल्लमखुल्ला धमकियां मिलने के बाद भी अगर सरकार एवं पुलिस बल नहीं चेता और इनमें से किसी के जान को कुछ खतरा हुआ तो यह बात पुख्ता हो जाएगी कि हुकूमत में बैठे लोग भले ही दावे जाति एवं साम्प्रदायिक तनाव मुक्त भारत के निर्माण के करते हों, मगर हक़ीकत में उनका आचरण कहीं न कहीं ऐसी ताकतों को शह देना है। और अब यह हुकूमत में बैठे लोगों को तय करना है कि वह इन कातिलों को पकड़ने में पूरी चुस्ती बरतेंगे या बस कदमताल करते रहेंगे।

77 वर्षीय कलबुर्गी ने अपनी लम्बी उम्र में विचारों के जगत में नए दरवाजे खोलने की लगातार कोशिश की थी। यहभी कहा जाता है कि अपने हत्यारे के लिए कलबुर्गीजी ने खुद दरवाज़ा खोला था, जो ‘सर’ से मिलने घर के अन्दर दाखिल हुआ था।

अतिथियों के लिए दरवाज़े खोलना, हर सभ्य समाज की निशानी होती है। कलबुर्गी के इन्सानद्रोही हत्यारों ने उस बुनियादी शिष्टाचार को भी कलंकित कर दिया है। मुझे सुदर्शनजी की कहानी ‘हार की जीत’ याद आ रही है, जब वह डकैत बीमार होने का बहाना बना कर साधु का घोड़ा चुरा कर ले जाता है और साधु उसे जाते हुए कहता है कि किसी को यह न कहना कि तुमने घोड़ा कैसे चुराया क्योंकि आईन्दा कोई व्यक्ति किसी बीमार को सहायता नहीं करेगा। मैं चाहता हूं कि कलबुर्गी के जीवन के इस अन्तिम प्रसंग की भी कमसे कम चर्चा हो ताकि ऐसा न हो कि अजनबियों को देख कर हम अपने दरवाजे खोलना बन्द कर दें।

हम यहां जुटे इसलिए हैं क्योंकि विचारों के जगत में नए नए दरवाजे खोलने, नयी जमीन तोड़ने की जो रवायत सदियों से चली आ रही है, जिसके सच्चे वाहक कलबुर्गी थे, वह परम्परा मजबूती के साथ आगे बढ़े। अंधेरे की वह ताकतें जो इसमें खलल डालना चाहती हैं, वह फिर एक बार शिकस्त पाएं।

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हिटलर एवं मुसोलिनी के बारे में कहा जाता है कि वह विचार में नहीं एक्शन में विश्वास रखते थे।

निश्चितही उन्हीं की सन्तानों ने – या आप उन्हें नथुराम गोडसे की औलाद भी कह सकते हैं, जिस आतंकी ने इसी तरह एक निहत्थे बुजुर्ग व्यक्ति की हत्या की थी, जब वह प्रार्थना में जा रहा था , क्योंकि उनके विचारों से वह सहमत नहीं था – इन हत्याओं को अंजाम दिया है।

विचारों के खिलाफ चल रहा यह युद्ध दरअसल कई छटाओं को लिए हुए है। आप कह सकते हैं कि एक स्पेक्टचम ;ेचमबजतनउद्ध की तरह पसरा है। तर्क की मुखालिफ, विचारों की विरोधी ताकतों द्वारा यह जो मुहिम छेड़ी गयी है उसके एक छोर पर अगर हम चलती पिस्तौल की गोलियों को देख सकते हैं जो कभी किसी दाभोलकर, किसी अयासिकुर रहमान तो किसी कलबुर्गी के कपाल को भेदती जाती दिखती है तो उसके दूसरे छोर पर हम कलम या विचार के हिमायतियों, विचार जगत में विचरण करनेवाले बुद्धिजीवियों, विद्वानों को अपमानित करने जैसी स्थितियों को भी देख सकते हैं। इनमें सबसे ताज़ा प्रसंग नेहरू म्युजियम मेमोरियल लाइब्रेरी के निदेशक पद से प्रोफेसर महेश रंगराजन जैसे विद्वान को दबाव डाल कर हटाने से जुड़ा है, जब संस्क्रति मंत्राी महेश शर्मा ने एक तरह से उनके खिलाफ मुहिम सी छेड़ दी।

और इन दो छोरों के बीच तमिल लेखक पेरूमल मुरूगन जैसों पर पड़े प्रचण्ड दबावों को देख सकते हैं, जिन्होंने हिन्दुत्ववादी संगठनों की पहल एवं जातिवादी संगठनों की हुडदंगई तथा प्रशासन के समझौतापरस्त रवैये से तंग आकर अपने एक उपन्यास को वापस लेने और ‘लेखक की मौत’ की घोषणा की।कांचा एल्लेैया जैसे बहुजन लेखक के खिलाफ दर्ज देशद्रोह के मुकदमे को देख सकते हैं या मल्यालम के लेखक एम.एम.बशीर को हिन्दुत्ववादियों द्वारा मिली धमकियों को देख सकते हैं , जिसके चलते उन्हे अपना कॉलम बन्द करना पड़ा। अख़बार में इसके बारे में विवरण छपे हैं कि किस तरह इन चरमपंथियों ने बशीर पर दबाव डाला कि ‘मुसलमान होने के बावजूद राम पर वह क्यों लिख रहे हैं ?’ और जिसकी वजह से बशीर ने अपना कॉलम बन्द कर दिया।
दरअसल हिटलर मुसोलिनी के इन वारिसों को विचारों से इस कदर खौफ है कि वह बेलगाम हो गए हैं और कुछ भी प्रलाप किए जा रहे हैं। यह अकारण नहीं था कि पिछले दिनों उन्होंने विश्व हिन्दी सम्मेलन के बहाने समूचे साहित्यिक बिरादरी को अपमानित करने में संकोच नहीं किया। न केवल देश के अग्रणी साहित्यकारों को उसमें न्यौता दिया गया, वे साहित्यकार भी बुलाए नहीं गए जो संघ परिवार के करीबी माने जाते हैं और सम्मेलन के एक दिन पहले एक काबिना मंत्राी – जो खुद जब सेना में उच्चतम पद पर था, तब अपनी उम्र कम दिखा कर एक साल और सर्विस कराने के लिए अदालत पहुंचा था और वहां से लौटा दिया गया था – ने एक वाहियात बयान दिया।

इसकी एक वजह साफ है। दरअसल वह जानते हैं कि हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्थान के नाम से वह जिस तरह संघ के विश्वनज़रिये के तहत हिन्दी की पुनर्रचना करना चाह रहे हैं, उसमें सबसे बड़ा रोड़ा हिन्दी पटटी के साहित्यकार ही बन सकते हैं। और अपनी असलियत से तो वह अच्छी तरह वाकीफ हैं कि उनकी तमाम कवायदों के बावजूद, पद एवं प्रतिष्ठा के तमाम लालीपॉप दिखाने के बावजूद कोईभी बड़ा साहित्यकार, कलमकार अभी तक उनके खेमे से जुड़ा नहीं है, उनके यहां पैदा होेने की बात ही छोड़ दें।

5.

अभी आप के बीच यहां खड़ा हूं और विचारों के जगत पर, तर्कशीलता की रवायत पर जो स्याह छायायें पड़ती दिख रही हैं, इस पर अपने मन की किवाड़ पर दस्तक दे रही बातें साझा कर रहा हूं और मुझे बरबस मेरे प्रिय कवि राजेश जोशी की वह कविता ‘जो सच सच बोलेंगे मारे जाएंगे’ याद आ रही है जिसमें वह कहते हैं कि

‘ जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएंगे / कठघरे मे खडे् कर दिए जाएंगे जो विरोध में बोलेंगे/जो सच सच बोलेंगे मारे जाएंगे।’
…..
‘धकेल दिए जाएंगे कला की दुनिया से बाहर/ जो चारण नहीं होंगे / जो गुण नही गाएंगे मारे जाएंगे / धर्म की ध्वजा उठाने जो नहीं जाएंगे जुलूस में /गोलियां भून डालेंगीं उन्हें काफिर करार दिए जाएंगे।’

दो दशक से भी पुरानी यह कविता आज के दौर के लिए भी बहुत मौजूं जान पड़ती है।

यह कविता आप की तरह मैंने उस वक्त सुनी थी जब बाबरी मस्जिद के विध्वंस की तैयारियां सूर्खियों में थी। संघ परिवारी जमातें पूरे मुल्क के पैमाने पर खूनी उन्माद फैलाने की फिराक़ में थी। यही वह वक्त़ था जब संघ के अनन्य प्रचारक/स्वयंसेवक आडवाणी ने जापानी कम्पनी टोयोटा से बनी विशेष कार में ‘सोमनाथ से अयोध्या’ तक की अपनी रथयात्रा निकाली थी, जो अपने पीछे मासूमों के खून के निशान छोड़ते आगे बढ़ी थी। उस वक्त़ का दौर मुझे अभीभी भूलता नहीं है जब वाराणसी के दुर्गाकुण्ड में अपने किराये के घर की छत पर बैठ कर चारों तरफ उठी जलती हुई मशालों के बीच मैंने अपने आप को जबरदस्त अकेला महसूस किया था। आप को याद होगा कि विध्वंस में जुटे इस गिरोह ने लोगों का आवाहन किया था कि राम मंदिर निर्माण के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए वह अपने घर की छत पर खड़े होकर मशालें जलायें।

वह दौर बीत गया। बीच का यह दौर संमिश्र रहा।

आज जब यहां जुटे हैं तो पुरानी तमाम बातें किसी फिल्म के फलेशबैक की तरह याद आ रही है।

मित्रों, निश्चित ही हम सभी यहां स्यापा करने के लिए नहीं जुटे हैं और न अपने ग़म को सामूहिक तौर पर भुलने के लिए एकत्रित हुए हैं। दरअसल इन मौतों से उपजे ग़म को नयी संकल्पशक्ति में बदलने के लिए यहां एकत्रित हैं।

कलबुर्गी की शहादत के बाद एक बात देखने को मिली जो बहुत ताकत दे गयी और वह था देश के विभिन्न भागों में, महज कर्नाटक में नहीं बल्कि उत्तर भारत के तमाम शहरों में सामने आयी जनपहलकदमी, जगह जगह हुए प्रदर्शन एवं आयोजित की गयी रैलियां। दिल्ली के जिस कार्यक्रम में मैं शामिल था, जिसमें लगभग पांच सौ लोगों ने शिरकत की थी, उसमें साहित्यकार, कवियों, सांस्क्रतिक कर्मियों से लेकर राजनीतिक कर्मी शामिल थे। 30 अगस्त के पहले कलबुर्गी का नाम भले कर्नाटक की सीमाओं तक मुख्यतः सीमित था , मगर आज आलम यह है कि महज भारत ही नहीं दक्षिण एशिया के पड़ोसी मुल्कों में भी यह नाम पहुंचा है। प्रोफेसर कलबुर्गी का नाम इस बात की ताईद करता दिख रहा है कि 2014 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद जब एक प्रगट हिन्दूवादी पार्टी ने हुकूमत सम्भाली है, तबसे कैसी अनुदारवादी आंधी चल पड़ी है।

निश्चित तौर पर हमारी कोशिश रहेगी कि हम इस कदर जनमत का दबाव बनाएं कि महज कलबुर्गीजी के ही नहीं बल्कि डा दाभोलकर के, कामरेड पानसरेजी के असली कातिल पकड़े जाए,ंमामला यही न रूकें, जांच की आंच इन कारिन्दों के मुखिया लोगों तक पहुंचें, तंजीमों के लीडरानों तक पहुंचे।

अपने आप को आध्यात्मिक संस्था कहलानेवाली ‘सनातन संस्था’ – जो दुष्टों के दमन को आध्यात्मिक आचरण घोषित करती है – के कार्यकर्ताओं की इन हत्याओं में कथित संलिप्तता को लेकर कहीं बात भी सुनने को मिली थी, कुछ दिन पहले सनातन के कुछ कारिन्दों की गिरफतारी के बाद यह सवाल नए सिरेसे मौजूं हो उठा है। मगर हमारा अधिक प्रभावी कदम होगा, विचारों की जो लड़ाई, तर्कशीलता का जो संघर्ष – आहत भावनाओं की ब्रिगेड की खूनी हरकतों के चलते – मद्धिम पड़ने का खतरा है, उसे अधिक उरूज पर ले जाने की तैयारी में जुटना।

6.

दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी

इस त्रिमूर्ति को हम सुकरात की सन्तानें कह सकते है, ब्रूनो के वारिस कह सकते हैं। वही सुकरात जिसने विचारों की अहमियत के लिए कुर्बानी कबूल की थी, वही ब्रूनो जिसने गणित के अपने ज्ञान के आधार पर यही कहा था कि प्रथ्वी सूर्य के इर्दगिर्द घुमती है, न कि सूर्य प्रथ्वी के इर्दगिर्द घुमता हैं।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि तवारीख उन लोगों के नाम नहीं जानती जिन्होंने सुकरात को जहर का प्याला पीने के लिए मजबूर किया था और न ही उन लोगों का नाम इतिहास की यादों में दर्ज है जिन्होंने ब्रूनो को जिन्दा जला दिया था।

सदियां गुजरने के बाद भी अगर हम किसी को सुकरात की सन्तानें कह रहे हैं, ब्रूनो के वारिस कह रहे हैं, आज के दौर के बसवण्णा कह रहे हैं तो यह उसी इतिहास की इस सच्चाई को उजागर करता है कि हर दौर में अंधेरे की ताकतों के खिलाफ, बन्ददिमागी के अलम्बरदारों के खिलाफ, विचार को राज्य, धर्म, अर्थ, श्रद्धा या रूढि के बंधन में जकड़े रखने के खिलाफ संघर्ष होता रहा है, और उसमें हमेशा ही रौशनी के दीवानों को जीत मिली है, विचारों के वाहकों ने फतह हासिल की है।

हम यहां जुटे इसलिए हैं ताकि हम सभी पुरयकीं हैं कि भले लड़ाई के एक चरण में हमें शिकस्त अवश्य मिली है, भले ही देश के कर्णधार के तौर पर ऐसी ताकतें हावी हुई हैं तो अनुदारवादी हैं ; मगर लम्बी लड़ाई में जीत अपनी ही होगी।

फैज अहमद फैज़ ने कहा नहीं था

‘यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क/न उनकी रस्म नयी है, न अपनी रीत नयी
यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल / न उनकी हार नयी है, न अपनी जीत नयी।

7.

कहा जाता है कि जंग सिर्फ जोश के सहारे नहीं जाती, होश भी बेहद जरूरी होता है।

इसलिए विचारों की इस जंग में अपनी जीत के बारे में पुरयकीं होने के बावजूद, तर्कशीलता की मशाल को मंज़िल तक हम सभी पहुंचा सकेंगे इसका भरोसा होने के बावजूद, वंचना, विपन्नता, अशिक्षा, अन्याय, अत्याचार और शोषण पर टिके इस समाज के अधिक समतामूलक, इन्साफपसंद, शोषणहीन बनने के बारे में भरोसा होने के बावजूद, हमें बेहद ठंडे दिमाग से कुछ बातों पर विचार करना होगा।

आखिर हम इस मुक़ाम तक पहुंचे कैसे ?

नेहरू से नरेन्द्र मोदी तक की यात्रा कैसे मुमकिन हुई ? आज से लगभग सत्तर साल पहले जब नवस्वाधीन भारत धर्मनिरपेक्ष जनतंत्रा के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा था, वह एक ऐसा वक्त़ था जब भारतीय जनता का बहुलांश अशिक्षित था, वहीं आज जबकि पढ़े लिखे लोगों की तादाद देश की कुल आबादी में बहुसंख्या के तौर पर उपस्थित है, और यह पढ़ी लिखी जनता अनुदारवाद की हिमायत करती दिख रही है, देश को आगे धर्म की बुनियाद पर , धर्म एवं राजनीति के बीच मौजूद विभाजन को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

क्या यह सोचने का सवाल नहीं कि ऐसे लोग, ऐसी ताकतें मुल्क के मुस्तकबिल, इस देश के भविष्य को तय करने के हालात में कैसे पहुंच सकीं, जिनके पुरखों ने आज़ादी के आन्दोलन के दिनों में बर्तानवी ताकतों के खिलाफ संघर्षों से दूरी बनाए रखी थी, उल्टे जनता की व्यापक एकता को कमजोर करने की कोशिश लगातार की थी। बंटवारे के बाद जब भारत की सरहद के अन्दर साम्प्रदायिक ताकतें सर उठा रही थीं, तब धर्मनिरपेक्षता के हिमायती नेहरू बार बार आगाह करते थे कि ऐसी ताकतें भारत को एक ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बनाने का इरादा रखती हैं। आज यह हम सभी के सामने है कि ऐसी संभावना को अब पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। कोई यह भी कह सकता है कि अभी तो धर्मनिरपेक्षता का महज आवरण बचा है, अन्दर से यह मुल्क हिन्दू राष्ट बनने की ओर तेजी से अग्रसर है।

आज जबकि धर्मनिरपेक्षता का हमारा संघर्ष मद्धिम पड़ता दिख रहा है और धर्म एवं सियासत के घोल से राजकाज चलाने में यकीं रखनेवाली ताकतें आगे बढ़ती दिख रही हैं तो हमें यह तो सोचना होगा कि ऐसा क्यों हो सका ? हमें अपने गिरेबां में झांकना ही होगा।

और क्या ऐसे हालात इस मुल्क की सरहद के अन्दर ही मौजूद हैं और बाहर बिल्कुल अमन चैन है या ऐसी सर्द हवाएं बाहर भी चल रही हैं ?

मुल्क की सरहद के इर्दगिर्द झांक कर हम देख सकते हैं कि किस तरह दक्षिण एशिया में बहुसंख्यकवाद – सर चढ़ कर बोल रहा है। चाहे मायनामार/बर्मा हो या बांगलादेश, पाकिस्तान हो या श्रीलंका, वास्तविक जनतंत्रा की हिमायती ताकतें बहुसंख्यकवादी धारा के खिलाफ जूझती दिख रही हैं।

7.

पता नहीं कितने लोगों ने हयूमन राइटस वॉच नाम एक अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन द्वारा बर्मा (माइनामार) के रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर जारी रिपोर्ट की चर्चा सुनी होगी। वह इस हकीकत को उजागर करती है कि किस तरह रोहिंग्या मुसलमानों को राज्यविहीन घोषित कर उन्हें बर्मा से खदेड़ने की कोशिशें चल रही हैं और किस तरह उनके नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम चल रही है, उनकेे प्रार्थनास्थलों को जलाया जा रहा है, मकानों पर कब्जा किया जा रहा है।

प्रस्त्तुत रिपोर्ट के प्रकाशित होने के एक रोज पहले लन्दन से निकलनेवाले अख़बार ‘गार्डियन’ ने अपने आप को ‘बर्मा का बिन लादेन’ कहलानेवाले एक बौद्ध भिक्खु विराथू पर स्टोरी छापी थी, जिस पर यह इल्जाम है कि वह बर्मा अर्थात माइनामार में धार्मिक घृणा फैलाने की मुहिम का सूत्राधार है। मण्डाले के अपने मासोयिन मठ से – लगभग 2500 भिक्खुओं की अगुआई करनेवाले विराथु के फेसबुक पर हजारों फालोअर्स हैं। सैनिक तानाशाही द्वारा हाल तक जबरदस्त अंकुश रखे बर्मा के बढ़ते खुलेपन के साथ 6 करोड़ की बौद्ध आबादी वाले इस मुल्क में मुस्लिम विरोधी भावना तेजी से गति पकड़ रही है और जिनके पीछे विराथू का हाथ बताया जाता है।

कहां बौद्ध का अहिंसा एवं आपसी सद्भाव का सन्देश और कहां उसके इक्कीसवीं सदी के इन अनुयायियों का नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम में साथ देना। वैसे माइनामार कोई अकेला स्थान नहीं है जहां बौद्ध समुदाय के अतिवादी उग्रवादी/आतंकी अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं।

पड़ोसी मुल्क श्रीलंका को देखें जहां बौद्ध भिक्खुओं का एक हिस्सा विराथू से टक्कर ले सकता है। इन्हीं के एक समूह द्वारा बनाए ‘बोडु बाला सेना’ का नाम पिछले कुछ समय से सूर्खियों में है, जो एक अतिवादी सिंहला-बौद्ध संगठन है – जिसकी अगुआई विराथू की ही तरह बौद्ध भिक्खु कर रहे हैं। इसकी स्थापना भिक्खु वेन किरामा विमलाजोति और वेन गालागोडा अथथे ज्ञानसारा ने की है, जब वह एक अन्य बौद्ध अतिवादी संगठन जाथिका हेला उरूमाया से इस आधार पर अलग हुए कि वह संगठन बौद्धों के हितों की रक्षा करने में विफल रहा है। इस संगठन का मुख्यालय कोलम्बो में बुद्धिस्ट कल्चरल सेन्टर में है, जिसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति महिन्दा राजपक्षे ने किया था। इस नवफासीवादी संगठन के हजारों समर्थक हैं जो यह मानते हैं कि श्रीलंका को अल्पसंख्यकों से खतरा है। हजारों लोग उनकी रैलियों में शामिल होते हैं तो सोशल मीडिया पर भी उनकी अच्छी खासी पकड़ बनी है। बोडु बाला सेना का दावा है कि ‘‘सिंहल बौद्ध राष्ट्र’’ श्रीलंका ेमें ‘मुसलमानों, ईसाइयों और तमिलों के लिए कोई जगह नहीं है।’ बोडु बाला सेना के मुताबिक अगर वह चाहें तो वहीं रह सकते हैं, मगर उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनना होगा। वे अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक विश्वासों, पूजा पाठ के तरीकों और प्रार्थनास्थलों को निशाना बनाते हैं। अभी पिछले साल ही बोण्डु बाला सेना के सम्मेलन में विराथू को विशेष अतिथि के तौर पर बुलाया गया था, जहां इन दोनों संगठनों ने मिल कर दक्षिण एशिया के इस हिस्से को ‘पीस जोन’ अर्थात ‘शान्ति का क्षेत्रा’ बनाने को लेकर अपने संकल्प का इजहार किया – जिसमें उनके निशाने पर मुसलमान थे – और राष्टीय स्वयंसेवक संघ को इस अलग किस्म के समन्वय में शामिल होने का आवाहन किया। रेखांकित करनेवाली बात है कि इन दिनों भाजपा में भेजे गए संघ के वरिष्ठ नेता राम माधव ने अपने फेसबुक पेज पर बोण्डु बाला सेना ही नहीं बल्कि विराथू के संगठन की हिमायत की थी। उदाहरणार्थ,

BODU BALA SENA – A NEW BUDDHIST MOVEMENT IN SRI LANKA

Bodu Bala Sena (BBS) – a Buddhist organisation many wish to call as Right or Ultra Right – is a new phenomenon in Sri Lanka. One may prefer to brand them in any manner one would like to. But the fact remains that this new outfit is slowly growing in stature and popular support in the country’s Buddhist-dominated areas…

So far, the issues raked up by the BBS are worthy of active and sympathetic consideration. BBS is able to capture the attention of the Buddhist population of Sri Lanka.

(facebook, 28 March 2013)

गौरतलब है कि बर्मा एवं श्रीलंका में जहां बौद्धों का एक हिस्सा अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ अतिवादी/आतंकी कार्रवाइयों में मुब्तिला हैं और जिसके निशाने पर मुस्लिम हैं, तथा हिन्दु एवं ईसाई भी है, वहीं हम देखते हैं कि दक्षिण एशिया के अन्य बडे़ नाभिकीय हथियार से सम्पन्न मुल्क – पाकिस्तान में – उत्पीडक, आततायी के तौर पर मुस्लिम नज़र आते हैं, जबकि हिन्दु, ईसाई तथा अहमदिया जैसे अन्य अल्पसंख्यक बचावात्मक पैंतरा रख कर चलने के लिए अभिशप्त हैं। ईशनिन्दा का आरोप लगा कर उनकी बस्तियां हमले का शिकार होती हैं, उन्हें जेल में ठूंसा जाता है। मगर पाकिस्तान के इस्लामिक अतिवादी सिर्फ इन गैरमुस्लिमों के खिलाफ ही खड़े नहीं है।ं वे सूफी मजारों के सामने मानवीय बम बन कर अपने ही धर्म के अनुयायियों को उड़ा दे रहे हैं या शियाओं के नस्लीय शुद्धिकरण में मुब्तिला हैं। क्योकि उनका मानना है कि मजार पर जाना इस्लाम की तौहिनी करना है।

यूं तो बांगलादेश इस समूची आपाधापी में थोड़ा अलग जान पड़ता है, जहां औपचारिक तौर पर हुकूमत में सेक्युलर ताकतें हैं, मगर धर्म की सियासत करनेवाली तंजीमें, संगठन किसी भी मामले में कमजोर नहीं हैं, जो उनके खिलाफ आवाज़ उठानेवालों को निशाना बनाने में सक्षम हैं। निश्चित तौर पर बांगलादेश उस स्याह दौर से बाहर निकल आया है जब जब इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में वहां कट्टरपंथी संगठनों का इस कदर बोलबाला था कि ‘जागृत मुस्लिम बांगला’ जैसे बांगलाभाई जैसे लीडरों की अगुआई में चल रहे संगठनों ने एक साथ बांगलादेश के 64 जिलों में लगभग 350 स्थानों पर बम विस्फोट करके अपनी ताकत का इजहार किया था।

अगर हम दक्षिण एशिया की इस संक्षिप्त यात्रा से वापस लौटें तो यह प्रश्न पहले से नमूदार दिखता है कि इस समूचे संकट की जड़ें कहां पर हैं, जिनसे हमारे पड़ोसी मुल्क भी जूझ रहे हैं।
मुझे लगता है कि हमें पड़ताल करनी चाहिए कि आज के वक्त़ में अचानक जो विचारों से खौफ का आलम दिख रहा है कि उसके लिए कौन कौन जिम्मेदार हैं ? वे कौनसी बाहरी ताकतें/संगठन/प्रक्रियाएं हैं जो आप को महज भावनाओं तक, जजबातों तक सीमित रखना चाहती हैं।

निश्चित तौर पर हमें ऐसी तंजीमों के बारे मंे, संगठनों के बारे में बात करनी होगी जिनकेें बारे में प्रख्यात लेखक हरिशंकर परसाई कहा करते थे कि उनके दिमाग के ताले बन्द कर दिए जाते हैं और चाभी नागपुर के गुरूजी के पास भेजी जाती है। आज परसाई जिन्दा होते तो देखते कि चाभियां उतनी दूर भेजने की जरूरत नहीं पड़ती, अब राजधानी में झंडेवालान में कैम्प आफिस बना है और गुरूजी की गददी पर विराजमान लोग अक्सर वहीं पाए जाते हैं।

निश्चित ही ऐसी तमाम तंजीमें है, जो धर्म और सियासत का खतरनाक कॉकटेल बना रही हैं, जो हर धर्म के नाम पर अपनी दुकान जमायें बैठी हैं, उन्हें मनुष्य का स्वतंत्रा विचार, आज़ादखयाल होना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है। उनके बारे में हमें विस्तार से बात करनी होगी, मगर सबसे पहले हमें अपनी आत्ममुग्धता पर बात करनी होगी।

8

अगर हम अपने में ही खुश हैं तो दूसरे के विचारों पर गौर करने की जरूरत ही कहां है ? भारत में एक प्रबल धारा है जो अपने आप को सर्वबुद्धिमान समझती है – इसी का नतीजा है कि कई लोग अपने आप को विश्वगुरू समझते हैं। उपनिवेशवाद के दिनों में उठी पुनरूत्थानवादी धारा ने इसे मजबूती दी है, जिसने अपनी हार के कारणों का विश्लेषण करने के बजाय अपना अतीतगान शुरू किया। गौर करेंगे कि हर हारा हुआ व्यक्ति अतीत का महिमामंडन करने लगता है। मैक्समुलर जैसे विद्वानों ने उस हारे हुए भारतीय मानस को यह भी समझा दिया कि तुम ‘आध्यात्मिक देश’ रहे हो, इन लौकिक गुलामी पर क्यों परेशान होना ?

मैं इस सम्बन्ध में एक किस्सा सुनाना चाहूंगा, चीनी यात्राी हयूएन त्सांग के यात्रा के विवरण पर आधारित, जिसका जिक्र पंडित नेहरू ने ‘भारत एक खोज’ में किया है। किस्सा यह है कि हयूएन त्सांग को किसी नगरी में कर्णसुकर्ण नामक विद्वान मिला, जिसने विचित्रा किस्म की पोशाक पहनी थी। अपने पेट पर मजबूत पटटा बांधा था और सर पर मशालनुमा कोई चीज रखी थी। उससे वार्तालाप करने के पश्चात जब हयूएन त्सांग ने उससे इस विचित्रा पहनावे के बारे में पूछा तो उसका जवाब था कि उसके पास इतना ज्ञान है कि उसका पेट फटा जा रहा है और वह मशाल सर पर लिए इसलिए घुमता है कि अंधेरे में पड़े लोगों को रौशनी दिखा सके।

कर्णसुकर्ण की कहानी सुन कर हम सभी हंस सकते हैं, कोई कहेगा कि पागल होगा। मैं निश्चित ही यह नहीं समझता हूं। अगर हयूएन त्सांग ने जिक्र करना चाहा तो निश्चित ही किसी आधार पर उसका उल्लेख किया होगा। निश्चित ही उच्च कोटी का विद्वान रहा होगा, मगर वही अपने में ही मगन। आत्ममुग्ध।

बुरा न मानें – यह आत्ममुग्धता हमारा राष्टीय गुण है। एक उदाहरण देना चाहूंगा, जिसका जिक्र सुश्री मीरा नंदा ने अपनी किताब ‘द गॉड मार्केट: हाउ ग्लोबलायजेशन इज मेकिंग इंडिया मोअर हिन्दू’ /रेण्डम हाउस,2009/ में किया है। /पेज 145-146/उनके मुताबिक जानेमाने अमेरिकी थिंक टैंक ‘प्यू रिसर्च सेन्टर’ ने वर्ष 2007 में ग्लोबल एटिटयूडस अर्थात वैश्विक प्रव्रत्तियों को जानने के लिए सर्वेक्षण किया जिसमें सैंतालीस मुल्कों के प्रतिभागियों से पूछा गया कि क्या वह इस प्रश्न से सहमत या असहमत हैं: ‘ हमारे लोगों में कमी हो सकती है, मगर हमारी संस्क्रति बाकियों से श्रेष्ठ है।’

इसमें भारतीय अव्वल थे, सर्वेक्षण में शामिल 93 फीसदी ने कहा कि हमारी संस्क्रति महान है,उन्हें अपनी संस्क्रति में कुछ ऐब नज़र नहीं आता, जबकि अध्ययन में शामिल बाकी देशों के लोग उतना आत्मसंतुष्ट नहीं दिखे, वह अपनी कमियां गिना रहे थे। भारत मंे उन्होंने 2043 लोगों से बात की जो सभी शहरी थे, जिसका अर्थ अधिक शिक्षित थे, अंग्रेजी के जानकार थे और सम्पन्न भी थे।

वह आगे लिखती हैं कि भले ही सभी लोगों को अपनी संस्क्रति के बारे में अधिक प्यार हो, आदर हो, मगर भारत की तुलना अन्य ‘प्राचीन सभ्यताओं ’ से करें तो दिखता है कि ‘भारत के 93 फीसदी लोगों के बरअक्स जापान के महज 69 फीसदी और चीन के महज 71 फीसदी अपनी संस्क्रति को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बता रहे थे।’

‘अमेरिका जो अपने सांस्क्रतिक साम्राज्यवाद के लिए दुनिया भर में भर्त्सना का शिकार होता है, वह एक तरह से ऐसे मुल्क की तस्वीर पेश करता है जो गोया हीन भावना से ग्रस्त हो: महज 55 फीसदी अमेरिकी अपनी संस्क्रति की श्रेष्ठता पर यकीन करते हैं, 24 फीसदी ने इस पर अपना सन्देह प्रगट किया और 16 फीसदी ने इस बात से पूरी तरह इन्कार किया कि उनकी संस्क्रति महान है/ भारत के लिए इससे सम्बधित आंकड़े थे, 93, 5 और 1 फीसदी/’

अब जैसा राजनीतिक माहौल बन रहा है उसमें इसी समझदारी को जुबां देने वाले शीर्ष पर पहुंचे दिखते हैं। फिर आप चाहे इस साल विज्ञान कांग्रेस में ऐसे तत्वों द्वारा की गयी प्रस्तुतियों पर गौर करें / जिनमें से एक ‘विद्वानद्वय’ ने प्राचीन भारत में किस तरह विमान उड़ाने की क्षमता थी, इसे लेकर आमंत्रित व्याख्यान पेश किया था/ या इतिहासअध्ययन में संघ के स्वयंसेवक दीनानाथ बात्रा की बढ़ते दखल को देखें, जो इन दिनों भाजपाशासित राज्यों में शिक्षा के सलाहकार के तौर पर सक्रिय कर दिए गए हैं।

मिसाल के तौर पर, गुजरात सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए अनिवार्य बना दी गयी दीनानाथ बात्रा की किताबों को पलटें, तो इसका अन्दाज़ा लगता है। पिछले साल गुजरात सरकार ने एक परिपत्रा के जरिए राज्य के 42,000 सरकारी स्कूलों को यह निर्देश दिया है कि वह पूरक साहित्य के तौर पर दीनानाथ बात्रा की नौ किताबों के सेट को शामिल करे। इन किताबों को लेकर ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ ने दो तीन भागों में स्टोरी की। दिलचस्प बात यह है कि गुजरात के सरकारी स्कूलों में पूरक पाठयक्रम में शामिल इन किताबों में प्रधानमंत्राी जनाब नरेन्द्र मोदी एवं गुजरात के शिक्षामंत्रियों भूपेन्द्र सिंह आदि के सन्देश भी शामिल किए गए हैं। ‘तेजोमय भारत’ किताब में भारत की ‘महानता’ के किस्से बयान किए गए है:

अमेरिका स्टेम सेल रिसर्च का श्रेय लेना चाहता है, मगर सच्चाई यही है कि भारत के बालकृष्ण गणपत मातापुरकर ने शरीर के हिस्सों को पुनर्जीवित करने के लिए पेटेण्ट पहले ही हासिल किया है .. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि इस रिसर्च में नया कुछ नहीं है और डा मातापुरकर महाभारत से प्रेरित हुए थे। कंुती के एक बच्चा था जो सूर्य से भी तेज था। जब गांधारी को यह पता चला तो उसका गर्भपात हुआ और उसकी कोख से मांस का लम्बा टुकड़ा बाहर निकला। द्वैपायन व्यास को बुलाया गया जिन्होंने उसे कुछ दवाइयों के साथ पानी की टंकी में रखा। बाद में उन्होंने मांस के उस टुकड़े को 100 भागों में बांट दिया और उन्हें घी से भरपूर टैंकों में दो साल के लिए रख दिया।दो साल बाद उसमें से 100 कौरव निकले। उसे पढ़ने के बाद मातापुरकर ने एहसास किया कि स्टेम सेल की खोज उनकी अपनी नहीं है बल्कि वह महाभारत में भी दिखती है। (पेज 92-93)

हम जानते हैं कि टेलीविजन का आविष्कार स्काटलेण्ड के एक पादरी ने जान लोगी बाइर्ड ने 1926 में किया। मगर हम आप को उसके पहले दूरदर्शन में ले जाना चाहते हैं ..भारत के मनीषी योगविद्या के जरिए दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेते थे। इसमें केाई सन्देह नहीं कि टेलीविजन का आविष्कार यहीं से दिखता है .. महाभारत में, संजय हस्तिनापुर के राजमहल में बैठा अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग कर महाभारत के युद्ध का सजीव हाल दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को दे रहा था। (पेज 64)

हम जिसे मोटरकार के नाम से जानते हैं उसका अस्तित्व वैदिक काल में बना हुआ था। उसे अनाश्व रथ कहा जाता था। आम तौर पर एक रथ को घोड़ों से खींचा जाता है मगर अनाश्व रथ एक ऐसा रथ होता है जो घोड़ों के बिना – यंत्रा रथ के तौर पर चलता है, जो आज की मोटरकार है, ऋग्वेद में इसका उल्लेख है। (पेज 60)

हम आसानी से देख सकते हैं कि दीनानाथ बात्रा विज्ञान की खोजों की जड़ें भी हिन्दू धर्म में ढंूढ लेते हैं और वैदिक काल को सर्वश्रेष्ठ काल बताते हैं। यह तो कोई सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी बता सकता है कि ऐसी मनगढंत बातें पढ़ना अनिवार्य बना कर बाल मन को किस कदर अवरूद्ध किया जा रहा है।

और इनमें सबसे शीर्ष पर विराजमान वजीरे आज़म मोदी को देखें, जिन्होंने अम्बानाी सेठ के अस्पताल के उदघाटन के अवसर पर इसी किस्म की बातें कही थी कि दुनिया में उसका मज़ाक उड़ा था। उन्होंने गणेश के होने को प्राचीन काल में भारत में जेनेटिक इंजिनीयरिंग की उपस्थिति के सबूत के तौर पर देखा था, वगैरा। प्रधानमंत्राी से मेरी तमाम असहमतियां हैं, देश और समाज को जिस दिशा में वह ले जाने का इरादा रखते हैं – भले ही वह आए दिन संविधान की कसमें खाते हों – इस पर मेरे अलग विचार हैं, गुजरात मॉडल को देश का भविष्य बनाने की उनकी बातें मुझ में हमेशा सिहरन पैदा करती रही हैं, लेकिन आत्ममुग्धता के जिस प्रसंग में हम बात कर रहे हैं, फिलवक्त उसी पर केन्द्रित करें तो यह अवश्य कहना चाहूंगा, मैं जिस मुल्क में पैदा हुआ और जिसका बाशिन्दा हूं उसका मुखिया दुनिया में हंसी का सबब बने यह मुझे निश्चित ही उचित नहीं लगता।

भारत के यह नए भाग्यविधाता किस तरह कुन्दजेहनी, बन्ददिमागी के दौर में यहां की जनता को ले जाना चाहते हैं, उसके बारे में कई बातें की जा सकती हैं, जहां ऐसे मौके अब अधिक सामने आते दिखते हैं जब संसद के पटल पर अनर्गल, अवैज्ञानिक, अतार्किक बातों को परोसा जाता है। अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि उसी संसद की पटल पर वर्ष 1958 में विज्ञान नीति का प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्राी ने पूरा पढ़ा था /13 मार्च 1958/ और एक मई 1958 को उस पर हुई बहस में किसी सांसद ने यह नहीं कहा कि भारत धर्म और आस्था का देश है। सांसदों ने कुंभ मेले, धार्मिक यात्राओं पर कटाक्ष किए थे, जिनका इस्तेमाल उनके मुताबिक ‘अंधविश्वास फैलाने के लिए किया जाता है।’ नवस्वाधीन भारत को विज्ञान एवं तर्कशीलता के रास्ते पर आगे ले जाने के प्रति बहुमत की पूरी सहमति थी।

नवस्वाधीन भारत के वे कर्णधार किस तरह मुल्क को धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र के तौर पर विकसित करना चाह रहे थे, धर्म एवं राजनीति के विभाजन को मजबूती दिलाना चाह रहे थे, इसके बारे में कई प्रसंग चर्चित हैं।

उदाहरण के तौर पर यह किस्सा मशहूर है कि टर्की की यात्रा पर निकले मौलाना आज़ाद ने जवाहरलाल नेहरू को यह सूचना दी कि वह टर्की के शासकों को कुराण की प्रति भेंट करना चाह रहे हैं, तब नेहरू ने उन्हें सलाह दी कि एक बहुधर्मीय मुल्क में जहां धर्मनिरपेक्षता का संघर्ष नाजुक मुकाम पर है, आप का किसी खास मजहब के नुमाइन्दे के तौर पर वहां जाना उचित नहीं होगा।
इतनाही नहीं सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए जब स्वाधीन भारत में कन्हैयालाल मुंशी ने धनसंग्रह की मुहिम छेड़ी और सरकार से सहायता प्राप्त करने की कोशिश की तब न केवल गांधी बल्कि नेहरू ने भी साफ मना किया था। उनका यह कहना था कि यह सरकार का काम नहीं है। जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद उदघाटन समारोह के लिए तत्कालीन राष्टपति राजेन्द्र प्रसाद को बुलावा आया, तब नेहरू ने यही कहा कि आप व्यक्तिगत तौर पर उसमें शामिल हो सकते हैं, मगर एक सेक्युलर मुल्क के राष्टपति के तौर पर नहीं। अन्ततः राजेन्द्र प्रसाद उसमें शामिल हुए, राष्टपति के तौर पर नहीं बल्कि आम नागरिक के तौर पर।

और अब यह आलम है कि भगवदगीता को अलग अलग देशों के कर्णधारों को भेंट देना एक रवायत बन रही है, गोया वह भारत का राष्टीय ग्रंथ हो और काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर की यात्रा पर गए प्रधानमंत्राी उसे भारत के खजाने से चार करोड़ से अधिक की सामग्री भेंजने का वायदा करते हैं।

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विचार का विरोध हमारी संस्क्रति, हमारी सामाजिक संरचना में रचा बसा है।

छोटे बच्चे का स्वतंत्रा दिमाग विकसित हो, वह विभिन्न वर्जनाओं से मुक्त होकर उन्मुक्त होकर सोचना शुरू करे इसके पहले हम उसे झुकने का, बड़ों की बात मान लेने का प्रशिक्षण देने लगते हैं, फलां मूर्ति के सामने झुक, खुदा के सामने झुक, बड़ांे के सामने झुक। कुछ समय बाद आलम यह बन जाता है कि बच्चा झुकने पहले लगता है, किसके सामने झुका है यह बाद में देखता है।
बचपन की किताब में पहला पाठ होता था।

‘गगन उठ। बड़ों को प्रणाम कर। हाथ-मुंह धो। नाश्ता कर। स्कूल जा।’

आज निश्चित ही किताबें बदली होंगी, अधिक आकर्षक हुई होंगी, मगर उनका स्वर वही रहता है

‘सोचो मत, सिर्फ करो।’ ‘पूछो मत, मान जाओ।’

बाल मन के साथ यह जो जबरदस्त हिंसा की जाती है उसके बारे में सोचते हुए मुझे बरबस रिचर्ड डॉकिन्स नामक विद्वान याद आते हैं जिन्होंने अथेइजम पर अर्थात नास्तिकता पर कई किताबें लिखी हैं। एक किताब में वह पूछते हैं कि आखिर बच्चे को क्या हम इतनी भी आज़ादी नहीं देना चाहते कि वह ईश्वर को पूजना चाहता है या नहीं यह भी न सोचे। वह पूछते हैं कि क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि हम ईसाई बच्चा कहने के बजाय कहें ईसाई मां बाप की सन्तान।

समाज की बात करता हूं तो मेरे लिए कभी कभी यह समझना मुश्किल होता है कि बच्चा तो छोड़ दीजिए यहां वयस्क व्यक्ति पर भी कितने बंधन हैं, कितनी वर्जनाओं से उसे घिरे रहना पड़ता है।
कहां व्यक्ति की आज़ादी की बात करें यहां समुदाय व्यक्ति के सीने पर बैठा है।

वह क्या खाये, क्या पीये, क्या पहने, क्या ओढ़े, किसके साथ शादी रचाए, किसे घर में पानी पिलाए सब वही समुदाय तय कर रहा है। आखिर संविधान 18 साल का होने पर व्यक्ति के लिए शासक चुनने की आज़ादी दे देता है, मगर व्यक्तिगत जीवन के बेहद अंतरंग सवालों, मसलों के बारे में – अधिकतर लोग स्वतंत्रा नहीं हैं – अगर आप ने अपने मन से शादी की तो हो सकता है कि आप के अपने ही माता पिता, समुदायजन, मोहल्लेवाले आप का तथा आप के जीवनसाथी का गला घोंटने के लिए आमादा दिखें; हर साल हजारों युवा आनर किलिंग के नाम पर अपने ही ‘आत्मीयों’ द्वारा मार दिए जाते हैं।

ऐसा समाज जहां जाति, पित्रसत्ता जैसी सामाजिक संरचनाएं लोगों के दिलो दिमाग पर आज भी हावी हों, मनुमहाराज से अलविदा किए सत्तर साल होने को हैं, मगर वह अभी भी लोगों के जेहन पर राज करते हों, वहां कहां से स्वतंत्रा विचारों के फलने फूलने को जगह मिलेगी और जहां लोग उन्मुक्त ढंग से तर्कशीलता के साथ विचार न कर सकें वहां तो उन्हें जजबातों के आधार, भावनाओं के सहारे आसानी से भड़काया जा सकता है।

ऐसी ही परिस्थितियों में ऐसे मानस का निर्माण होता है जोे किसी चतुष्पाद या द्विपाद जानवर की स्वाभाविक मौत से इस कदर उद्वेलित हो जाता है कि कहीं ‘गैर’ की बस्ती पर आक्रमण कर देता है और वहां तबाही रचता है।

ऐसी ही परिस्थितियों में उस मानस का निर्माण होता है जो किसी पवित्र किताब की दुहाई देते हुए ऐसा बर्बर हिंस्त्रा प्रदर्शन करता है कि चंगेजों एवं हलाकूओं की भी जान सूख जाती है।
आज वक्त़ की मांग है कि दिमाग पर पड़ी इन तमाम जंजीरों को, मनमस्तिष्क पर पड़ी इन तमाम बेड़ियों को एक झटके से तोड़ दें और आगे आएं।

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कहां व्यक्ति की आज़ादी की बात चल रही थी, उसका तसव्वुर किया जा रहा था और अब झंुडवाद की बल्ले बल्ले है।

बोलो तो हमारे जैसा बोलो भक्तों की तरह बोलो वरना खामोश रहो।

खाओं तो हम जो कहते हैं, वह खाओ या मार खाओ।

गौरतलब है कि पहले जब भक्त कहा जाता था तो ईश्वर की प्रार्थना में लीन व्यक्ति की तस्वीर आंखों के सामने नमूदार हो जाती है और आज भक्त कहने पर उस हिंस्त्रा व्यक्ति की छवि मन की आंखों के सामने हाजिर हो जाती है, जो टिवट के जरिए या फेसबुक के जरिए या अन्य साधनों के जरिए ऐसा जहर उगलता मिलेगा कि कहीं आप उसके सामने पड़े तो जला कर राख न कर दे।
सीधी सीधी इन्सानी बातें इन कठमुल्लों को, अतिवादियों को गंवारा नही।

भक्तगण तो इसमें पूरी तरह माहिर हैं, वह किसी के पीछे पड़ते हैं तो उससे इस कदर पेश आते है कि अगर मजबूत कलेजे वाला शख्स न हो तो उसे दिल का दौरा पड़ जाए।ं
दरअसल मौजूदा सरकार के आगमन के बाद जिस तरह का माहौल बना है, जिसने न केवल राज्य कारकों/स्टेट एक्टर्स बल्कि गैरराज्य कारकों/नान स्टेट एक्टर्स को गोया खुली छूट मिली दिखती है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की नहीं बल्कि अब विशिष्ट समुदायों की भावनाओं, आस्थाओं को मददेनज़र रखते हुए हल्ला हंगामा करते रहे, किसी को गाली दे, किसी को अपमानित करे और उसी का अगला कदम है जब इन दिनों बैन बरस रहा है।

मीट बन्द, सिनेमा बैन, किताब बैन, यह बैन वो बैन

अब मीट बैन को ही ले, मुख्यतः भाजपाशासित राज्यों द्वारा जैन समुदाय के पर्युषण पर्व का हवाला देकर और उनकी भावनाओं का खयाल करने की बात करते हुए, पिछले दिनों जिस तरह एक के बाद एक बैन सामने आए, उससे इस व्यवसाय में मुब्तिला लाखों लोगों को – श्रमिकों से लेकर बड़े व्यापारियों तक को – जिस कदर मजदूरी के घाटे और नुकसान उठाना पड़ा हो, उसका अन्दाज़ लगाना मुश्किल है।

मीट बैन को लेकर कमसे कम महाराष्ट सरकार ने अपने आप को बेहद हास्यास्पद स्थिति में भी ला खड़ा किया। दरअसल उसने सिर्फ मीट पर पाबन्दी लगायी थी, मछलियों पर नहीं। अदालत ने पूछा कि आखिर मछली को क्यों दूर रखा गया ? सरकार का मूर्खतापूर्ण जवाब था कि मछलियों को काटना नहीं पड़ता, गोया मछलियां आत्महत्या करने के इरादे से पानी से कूद कूद कर बाहर आती हों, जिन्हें मछुआरे बाज़ार में जाकर बेचते हों। दरअसल मछलियों को उसने इस पाबन्दी से दूर रखा क्योंकि वह जानती थी कोली समुदाय, जो मछलियों के व्यापार में मुब्तिला है, जिसकी मुंबई में ही नहीं बाकी भागों में अच्छी तादाद है, ऐसे लड़ाकू समुदाय की पेट पर लात मारनेवाले कदम से उसके लिए मुश्किलें सामने आएंगी।

सभी जानते हैं कि मीट बैन को लेकर महाराष्ट सरकार एक ही तीर से दो निशाने साध रही थी, अल्पसंख्यक जैनियों की भावनाओं की बात करते हुए उन्हें खुश कर रही थी और दूसरी तरफ, इस हकीकत को देखते हुए कि मीट के पेशे में अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की बहुतायत है, उनकी रोजी रोटी पर कुल्हाडी मार रही थी। अभी कुछ माह पहले बीफ बैन पर अपने आदेश के जरिए इसी समुदाय की आर्थिक कमर तोड़ने और उसका अपराधीकरण करने का काम किया था।

बैन की इस सियासत को लेकर लिखे अपने आलेख में शिव विश्वनाथन /द स्युडोरिलिजोसिटी आफ बीजेपी, द हिन्दू 16 सितम्बर 2015/ ने एक दिलचस्प बात लिखी थी कि ऐसे बैन लगाते वक्त भाजपा या अदालतें अचानक समय के विभिन्न दौरों को आपस में गुत्थमगुत्था कर देती है। अपनी सुविधा के हिसाब से कभी औरंगजेब या कभी अकबर की बात करते हुए उसे उचित ठहराती है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्वन्यायाधीश मार्कंण्डेय काटजू का किस्सा इस मामले में गौरतलब है। गुजरात के मीट के व्यापारियों द्वारा सूबाई हुकूमत द्वारा किसी खास पर्व पर मीट की बिक्री पर लगायी गयी पाबन्दी को लेकर सर्वोच्च न्याायालय का दरवाजा खटखटाया था। काटजू ने इस बैन को इस आधार पर सही ठहराया क्योंकि ‘अकबर के जमाने में भी ऐसे होता था’। उन्होंने एक विवादास्पद वक्तव्य भी दिया था कि ‘कुछ दिन तक अगर मांसाहारी लोगों को मांस नहीं मिलेगा तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए , और क्या वह आपसी सदभाव के लिए जैनियों की भावनाओं का खयाल नहीं कर सकते हैं।’

भारत की बहुलतावादी छवि को तार तार करते ऐसे कदम शेष दुनिया में उसकी कैसी छवि बनाते होंगे, इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। जहां दुनिया के प्रबुद्ध समुदाय में इस बात को लेकर पहले से ही चर्चा चल पड़ी है कि इस सरकार के आगमन के बाद अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं, /जो सरकार के अपने ही आंकड़ों में प्रतिबिम्बित होते हैं, कि साम्प्रदायिक घटनाओं में 25 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है/ वहीं अब बैन के बाद बैन से इसकी कटटरपंथी, असहिष्णु छवि में इजाफा हो रहा होगा इसमें कोई दोराय नहीं।

कोई पूछ सकता है कि सबका साथ सबका विकास की बातों के साथ ऐसे कदमों का सामंजस्य कैसे बिठाया जा सकता है ? ऐसे कदम तो जनतांत्रिक एजेण्डे को नहीं बल्कि बहुसंख्यकवादी एजेण्डे को आगे बढ़ाते दिखते हैं ?

दरअसल देश के कर्णधारों को यह बात समझ में आयी है कि 2014 का चुनाव वह भले ही विकास के नारे के तहत जीत गए हों, उनके लिए आर्थिक विकास की दिशा में मुल्क को ले जाना कत्तई मुमकिन नहीं है, विगत डेढ साल का उसका अनुभव यही बताता है। एक आम राय यही बन रही है कि यह आम आदमी की नहीं बल्कि कार्पोरेट हितों की रखवाली सरकार है। यह सरकार आम लोगों के लिए जहां जबरदस्त महंगाई ले आयी है, मगर कार्पोरेट जगत के लिए तरह तरह की छूटों के अंबार के साथ उपस्थित है। और चूंकि जनता की आकांक्षाएं भी हुकूमत को लेकर पहले से बढ़ी है, जो अब उनसे ‘अच्छे दिनों’ के आगमन का वायदा याद दिला रही है, तो इस दिशा में नाकारा साबित हो रही हुकूमत ने यही तय किया है कि वह अपना पुराना आजमाया बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का कार्ड खेलेगी, आस्था की दुहाई देकर विकास की बहस को ही एजेण्डा से विलुप्त कर देगी। और बैन के बाद बैन बरसा कर उन्हें निरन्तर तनाव में रखेगी ताकि वह उनसे कोई हिसाब न मांगें।

ऐसे माहौल में कहां कोई सुकून से बैठ सकेगा और सोच सकेगा।

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यह भी सोचने का सवाल है कि कौनसी राजनीतिक सामाजिक प्रक्रियाओं को चिन्हित किया जा सकता है कि विचारों को दुबक कर बैठना पड़ रहा है। हम लोग समुदाय की राजनीति की चर्चा थोड़ा कर चुके हैं, जो व्यक्तिगत से लेकर सामाजिक मामलों में बहस मुबाहिसा, आपसी बातचीत एवं सम्वाद की गुंजाइश कम कर देती है। और भी कई सारे पहलू हैं, मिसाल के तौर पर धर्म और सियासत के संमिश्रण की जो राजनीति हावी हो चली है, जिसने ‘हम’ और ‘वे’ की बहस को इस कदर आगे बढ़ाया है कि गणतंत्रा हिन्दोस्तां में उभरी ‘सरहदों’ का सवाल हमारे सामने नमूदार हुआ है। और सिर्फ हिंसा के उस प्रगट दौर में ही नहीं बल्कि स्थगित हिंसा के लम्बे दौर में, जब लोग जीवन की सुरक्षा का हवाला देते हुए अपने-अपने ‘घेट्टो’ में पहुंच रहे हैं।

यहां की सरहदें तो महज भौतिक नहीं हैं, वे तो मानसिक भी हैं, समाजी-सियासी -सांस्कृतिक इतिहास द्वारा गढ़ी भी गयी हैं, जहां हम पा रहे हैं कि मुल्क के अन्दर नयी ‘सरहदों’ का, नए ‘बॉर्डरों’ का निर्माण होता दिख रहा है। धार्मिक पहचानों के इर्दगिर्द निर्मित इन सरहदों से हम अधिक बावस्ता होते हैं, अलबत्ता इसका स्वरूप बहुआयामी है। अंग्रेजों के जमाने में जिस तरह कुछ विद्रोही/बग़ावती समुदायों को ‘क्रिमिनल ट्राइब्स/आपराधिक समुदाय’ का दर्जा देकर तमाम मानवी अधिकारों से वंचित किया गया था, आज उसी का एक सुधरा संस्करण हम देख रहे हैं ; जहां गरीब होना, साधनविहीन होना, अवर्ण कहे जानेवाले समुदायों में पैदा होना, यवन-म्लैंच्छ कहे गये धर्मों से ताल्लुक रखना, अपने आप में एक ‘अपराध’ घोषित किया जा रहा है, जिसके लिए जेल की सलाखों से लेकर आक्रान्ता समूहों के हाथों जिन्दा आग के हवाले हो जाने जैसे तमाम ‘विकल्प’ खुले हैं।

गौरतलब है कि वे घटनायें – जब इलाके या सूबे के पैमाने पर या कहीं और व्यापक घेरे में – जो अपनी रक्तरंजित निशानियां आनेवाले पीढ़ियों के लिए छोड़ देती हैं, जब अन्तरसाम्प्रदायिक विवाद कहीं कहीं खतरे के निशान पार करते आगे जाते दिखते हैं, उनका एक पैटर्नसा बन गया है। कहीं एक झगड़ा या झगड़े की अफवाह, जिसमें दोनों पक्ष अलग-अलग समुदायों के हों, और फिर इस असली या नकली झगड़े की प्रतिक्रिया में ‘स्वतःस्फूर्तता’ के आवरण में संगठित हिंसा के सिलसिले का आयोजन, पुलिस प्रशासन का ढुलमूल रवैया, मीडिया के बड़े हिस्से का ‘बहुसंख्यककरण’। और फिर इन्साफ के मसले को ठण्डे बस्ते में डालते हुए शान्ति की स्थापना। कह सकते हैं मरघट की शान्ति का कायम होना।

किसी भी सभ्य समाज के लिए यह कितनी विचलित करनेवाली बात हो सकती है कि चीजें उसी अन्दाज़ में चल रही हैं, जब मासूमों के कतलेआम को अंजाम देनेवाले जनद्रोही सियासतदां या उनकी मनुष्यद्रोही सियासत से समाज के व्यापक हिस्से को कोई गुरेज नहीं है ; उल्टे वे हृदयसम्राटों के रूप में महिमामण्डित हो रहे हैं। 1984 के सिखविरोधी दंगे में अकेले दिल्ली में ढाई हजार से अधिक सिख मारे गए थे, कितने लोग अपने किए की सज़ा पा सके। 1992-93 में बम्बई के दंगों ने इसी तरह हजार से अधिक लोगों की जानें गयीं। क्या श्रीकृष्ण आयोग ने हिन्दुत्व के जिन सिपहसालारों को जिम्मेदार ठहराया, जिन पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया, क्या किसी को जेल हो सकी। इसवी 2002 का गुजरात इसकी ही निशानी है। राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, इस मुल्क की आला अदालत ने जिस शख्स को ‘नीरो’ का दर्जा दिया, उसकी चुनावी जीत के बाद तो उसके शह पर हुई संगठित हिंसा गोया गल्पकथाओं में शुमार हो गयी है।
प्रश्न है कि इक्कीसवीं सदी की अगली दहाइयों में क्या यह मुल्क अफ्रीका के रवाण्डा का व्यापक एवम विस्तारित संस्करण बनेगा – वहीं रवाण्डा जहां 90 के दशक में हुतू समुदाय के हथियारबन्द लोगों ने अपने ही मुल्क के नागरिक तुत्सी समुदाय के लाखों लोगों का जनसंहार किया था ? या ‘नियति के साथ संकेत’ के जरिये सभी धर्मों, सम्प्रदायों को साझेपन की भावना के साथ आगे जाने का जो संकल्प 14 अगस्त 1947 की रात में लिया गया था, उसी रास्ते पर आगे जाएगा।

फिलवक्त हम इस सवाल से बच नहीं सकते कि अगर हिंसा को संगठित करनेवाली ताकतें समाज में मौजूद हों, फिर भी लोग खुद क्यों उनके प्यादे बनते हैं। इन हिंसाचारी जमातों को वे कंधे कहां से मिल जाते हैं जिन पर बन्दूकें रख कर वे ‘सदियों के अपमान का बदला’ चुकाते हैं। वह मानस कैसे निर्माण होता है, जिसे लोगों की जिन्दगी भर की गाढ़ी कमाई को आग के हवाले करने में एक विचित्रासी खुशी होती है, या किन्हीं नरोदा पाटिया में गड्ढे में छिपे अल्पसंख्यकों पर तेल छिड़क कर उन्हें आग के हवाले करने में वह फक्र महसूस करता है।

क्या हमारी सामाजिक संरचना में, हमारी सभ्यता-संस्कृति में विशेषीकृत लोगों को इस कदर अलग करने की, उनके खिलाफ हिंसा को महिमामण्डित करने की कुछ निशानियां मिल सकती हैं, जिनको यह समाज चुपचाप ढोये जा रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे प्रोफेसर तुलसी राम दलित विरोधी हिंसा के सन्दर्भ में इस बात को अक्सर चर्चा में लाया करते थे कि हिन्दुओं के आदिग्रंथ कहे गये मनुस्मृति में जिस तरह शूद्रों-अतिशूद्रों-स्त्रिायों के खिलाफ हिंसा को एक ‘पवित्राता’ प्रदान की गयी है, उसी का प्रतिबिम्बन आज भी दिखता है।
मिल्टन मेयर, जिसने आम नागरिक के नज़रिए से जर्मनी में हिटलर की अगुआई में नात्सी ताकतों के हावी होने का चित्राण किया है ( दे थॉट दे वेअर फ्री: द जर्मन्स, 1955, शिकागो प्रेस) वह लिखते हैं

‘शायद एक बात पर किसी ने गौर नहीं किया था और वह था सरकार और जनता के बीच की बढ़ती दूरी का मसला।… तानाशाही और उसका अस्तित्व में आना, सबकुछ भटका देनेवाला था …. वह उन लोगों के लिए न सोचने का एक बहाना प्रदान कर रही थी जो वैसेभी सोचना नहीं चाहते थे.. और हमें लगातार बदलावों और ‘‘संकटों’’ से रूबरू करा रहे थे और हम सब इस तरह ‘‘राष्ट्रीय दुश्मनों’’ के बारे में चिन्तित थे, और हमारे इर्दगिर्द फैलती जा रही तमाम खतरनाक चीजों के बारे में हम बिल्कुल अनभिज्ञ थे …हर कदम इतना छोटा था, इतना अप्रभावी था कि यह पता नहीं चल पाता था कि अचानक आप के सर के ऊपर से पानी गुजरने लगेगा …हर कार्रवाई, हर अवसर , पहले से ख़राब था लेकिन थोड़ा ही ख़राब था … आप इन्तज़ार करते रह जाते हैं कि अन्दर से हिला देनेवाला मौका आएगा, यह सोचते हुए कि जब ऐसा झटका लगेगा कि बाकी लोग भी आप के साथ प्रतिरोध मंे जुड़ जाएंगे … लेकिन ऐसा अवसर कभी आता ही नहीं .. और यही सबसे बड़ी कठिनाई थी।’

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पूंजीवाद के मौजूदा नवउदारवादी मुक़ाम ने – जबकि ‘कोई विकल्प नहीं’ की अवधारणा को सहजबोध में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है – इस विचारहीनता को नयी वैधता प्रदान की है। इसी के परिणामस्वरूप प्रचार, पब्लिक रिलेशन्स और उपभोक्तावादी विचारधारा के विकासक्रम के गहरे राजनीतिक परिणाम दिखते हैं, जो इस धारणा को प्रचारित करते हैं कि आज़ादी का रास्ता राजनीतिक स्वतंत्राता हासिल करने में नहीं बल्कि भौतिक संसाधन जुटाने में है, जिन्हें सामाजिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं के तत्काल समाधान के तौर पर प्रस्तुत/प्रचारित किया जाता है, जो एक ‘मुक्त, सार्थक और आपस में जुड़े हुए जीवन का रास्ता सुगम करता है।’ इसका नतीजा यह हुआ कि अतिउत्पादन से पैदा उत्पादों को लोगों को खरीदने के लिए प्रेरित किया जा सका जिसकी उन्हें जरूरत नहीं थी और पूंजीवादी व्यवस्था को लेकर सामाजिक असन्तोष भी मद्धिम किया जा सका।

उपभोक्तावाद की इस विचारधारा को लेकर एक विद्वान लिखते हैं कि ‘‘उपभोक्तावाद की यह विचारधारा उपभोग एवं नागरिकता की अवधारणा को आपस में सम्मिलित करने या पूंजीवाद एवं जनतंत्रा को सम्मिलित करने का काम करती है, गोया सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों का समाधान उपभोग में निहित है।

भारत में मध्यमवर्ग की मौजूदा स्थिति से उपभोक्तावाद की इस विचारधारा को ताकत मिलती है।

किसी देश/समाज के मध्यवर्ग को देख कर हम बहुत कुछ अन्दाज़ा लगा सकते हैं। भारत का मध्यवर्ग केवल आय, उपभोग, जीवन स्तर के मामले में मध्यवर्ग दिखता है। अगर हम यूरोप के शुरूआती मध्यवर्ग को देखें तो फरक स्पष्ट हो जाएगा। हम जानते हैं कि वह वैचारिक क्रांति का प्रणेता था – इसी वैचारिक क्रांति द्वारा आधुनिकता का सूत्रापात हुआ। ईशकेन्द्रित के बजाय मानवकेन्द्रित समाज की स्थापना का ऐलान हुआ। दूसरे यह वर्ग आर्थिक क्रांति का जनक था – जिसने एक नई उत्पादन प्रणाली का आगाज़ किया। तीसरे यह राजनीतिक क्रांति का प्रणेता था, सामन्ती यूरोप के राजतंत्रा की जगह उसने लोकतंत्रा स्थापित करने का नारा बुलंद किया। हम आसानी से देख सकते हैं कि इस मध्यम वर्ग की भूमिका युगांतरकारी थी।

अगर हम इसके साथ भारत के मौजूदा मध्यवर्ग की तुलना करें तो भारत का मध्यवर्ग बौना दिखता है। वह राजनीतिक तौर पर प्रतिक्रियावादी, सामाजिक तौर पर प्रतिगामी मूल्यों का वाहक एवं सांस्क्रतिक तौर पर रूढिवादी दिखता है। उसका व्यक्तित्व क्षुद्र, कंुठित, स्वार्थी, छोटी छोटी चालबाजियों में मशगुल, विचार, विज्ञान, उत्पादन, राजनीति और संस्क्रति के क्षेत्रा में शून्य उपलब्धियों वाला, अपनी मीडियाक्रिटी को राष्टवादी अहंमन्यता/उन्माद से जोड़नेवाला दिखता है। यह अकारण नहीं कि ज्ञान विज्ञान, जनवाद, प्रगतिशील सामाजिक नज़रिया और स्रजनशीलता के बजाय वह संघ परिवार की बर्बरता और फासिस्ट आचार विचार का समर्थक दिखता है।

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सोचने की जरूरत है कि क्या यह सब ऐसे ही चलेगा ?

क्या यही मान लिया जाए कि लोकतंत्रा का जितना स्वाद हमने लिया अब आगे ठोकतंत्रा ही मयस्सर होगा, बहुसंख्यकवाद में जीना पड़ेगा ? और आनेेवाली पीढ़ियों के लिए यही बताना है कि उन्हें इसी हिन्दु राष्ट में, निजामे मुस्तफा में, खालिस्तान मे या जियनवाद के गढ़ में अपना मुस्तकबिल ढूंढना पड़ेगा, अपने भविष्य की तलाश करनी होगी ? क्या यही कहा जाए कि पूंजीवाद को अंतिम सत्य मान लेना पड़ेगा !

हमारा यहां एकत्रित होना या कल तक हमारे लिए नामालूम रहे प्रोफेसर कलबुर्गी के लिए सड़कों पर उतरना इस बात का प्रमाण है कि हम जो हो रहा है उसे कबूल करने के लिए नहीं बल्कि प्रतिवाद एवं प्रतिरोध की आवाज़ बुलन्द करने के लिए जुटे हैं।

यह एहसास हमें हैं या होना चाहिए कि एक लड़ाई हम हारे हैं और मुमकिन है कि चन्द अन्य हारें हमें झेलनी पड़े। मगर विचारों की दुश्मन ताकतों के लिए, तर्क के विरोध में खड़ी ताकतों के लिए नैतिक पराजय दिलाने में हम कामयाब हुए हैं। ऐसे लोग भी जो उनके समर्थक थे, वह भी इस एकांगी माहौल से तंग आते दिख रहे हैं।

फिर सवाल उठता है कि करना क्या है ?

– पहली बात यह समझना, मन में गांठ बांध लेना आवश्यक है कि विचारों की हिमायत की जिस लड़ाई को हम आगे ले जाना चाह रहे हैं, वह आदिम काल से चले आ रहे संघर्ष की ही अगली कड़ी है।
– दूसरी बात अपने गिरेबां में झांकने की है। यह सोचने की है कि आखिर क्या हमारी भी कुछ कमजोरियां हैं जिनकी वजह से विचारों की लड़ाई कहीं मद्धिम पड़ती है।
– तीसरा बात है कि ऐसे तमाम सुझावों, सलाहों पर ब्रेनस्टार्मिंग करना अर्थात आपस में वैचारिक गुत्थमगुत्था होना कि शायर की जुबां में कहें तो कि ‘यह मुददआ तो बदले’।

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यह देख कर मैं अक्सर दंग रहता हूं कि इस उपमहाद्वीप में बहस मुबाहिसे, धारा के प्रतिकूल चिन्तन की कितनी लम्बी परम्परा है।

आज से ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने कहा था

किसी भी चीज़ पर विश्वास मत करो/सिर्फ इसलिए कि वह तुम्हें बतायी गयी है..
अपने अध्यापक की बात पर विश्वास मत करो/सिर्फ उसका सम्मान करने के लिए..
परंतु सम्यक निरीक्षण और विश्लेषण के पश्चात
तुम्हें जो अच्छा लगे ..
उसी पर विश्वास करेा, उस पर बने रहो
और उसे ही अपना मार्गदर्शक मानो’

यह वही महात्मा बुद्ध ने जिन्होंने म्रत्यु शैयया पर रहते हुए, अपने परमसाथी एवं शिष्य आनंद के इस प्रश्न पर कि आप अपना अन्तिम संदेश अपने अनुयायियों के लिए दे दें तो यही कहा था ‘अप्पो दीपो भव’ अर्थात ‘अपने दीपक आप बनो’।

वाल्मीकि रामायण में जाबालि का जिक्र आता है जो हर चीज पर सन्देह की बात करता है।

यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है कि भारतीय दर्शन में नास्तिकता की/निरीश्वरवाद की भी लम्बी परम्परा है। अपनी चर्चित किताब ‘इंडियन एथेइजम’ में प्रो डी पी चटोपाध्याय विभिन्न दार्शनिक प्रणालियों की चर्चा करते हुए बताते हैं कि दूसरे शब्दों में कहें कि किस तरह

Indian Philosophers did their best to prove that logically speaking God was only an illusion. And there is no doubt that in this they were successful. As a matter of fact, a survey of the Indian phiosophical literature gives us the impression of how amazingly varied the logical arguments against the theistic assertion could be

वह इन विभिन्न धाराओं की सीमा की भी बात करते हैं कि

..our philospheres did not raise an extremely relevant question : Why, in spite of being illusory, God could have such a real grip on the human mind ?

चार्वाक जो भौतिकवाद के दार्शनिक समझे जाते हैं लिखते हैं

‘सभी मनुष्य मात्रा के विभिन्न शारीरिक अवयवों में स्पष्ट समानता होते हुए भी मानव-मानव के बीच वर्ण के रूप में अप्राक्रतिक उंचनीचता का भाव कैसे हो सकता है ? ..‘यह कदापि सहजमान्य होने वाली बात नहीं है कि लोगों ने अपने अपने जन्मजात वर्ण के अनुसार ही क्रियाकलाप करना उनके लिए फलदायी होता है।’

एक दूसरे स्थान पर वह लिखते हैं

‘ हे पुरूष, तू स्त्रिायों को संबोधित कर कहे जानेवाले घ्रणास्पद व लज्जाजनक निंदनीय वाक्य का प्रयोग छोड़ दे। क्योंकि ऐसी अभिव्यक्तियां किसी ईर्ष्यालु की तरह ही निरर्थक व बेतुकी होती हैं। और फिर तेरी स्वयं की स्थिति भी उससे कोई अलग नहीं बल्कि वैसी ही होने के बावजूद तू कब तक इस प्रकार से लोगो को गुमराह करता रहेगा। / दोनों संदर्भ, ‘चार्वाक दर्शन’ रविन्द्र देवघरे शलभ, सुधारक, अगस्त 2002, नागपुर/

अपनी चर्चित किताब ‘आगुमेंटेटिव इंडियन’ में प्रोफेसर अमर्त्य सेन ऐसे तमाम उदाहरणों का जिक्र करते हैं, जो बहस मुबाहिसे की परम्परा पर रौशनी डालते हैं; जिसमें दो ऐसे उदाहरण हैं जिनका उल्लेख जरूरी है सम्राट अशोक द्वारा आयोजित चर्चासत्रा और अकबर द्वारा समय समय पर आयोजित शास्त्रार्थ। उनके मुताबिक भारत में सार्वजनिक चर्चा के इतिहास में बौद्धों का असीम योगदान रहा है। दुनिया की सबसे खुली आमसभा का आयोजन ‘बुद्ध की मौत के बाद राजग्रह’ में पहली बार हुआ। दूसरा अधिवेशन बुद्ध की मौत की एक शताब्दी के बाद वैशाली में हुआ था और तीसरा सबसे बड़ा आयोजन पाटलिपुत्रा में अशोक के संरक्षण में हुआ था। इन आम चर्चाओं के लिए कुछ मूलभूत नियमों का प्रतिपादन किया गया था:

‘भाषा में संयम बरता जाए जिससे कि किन्हीं अनुपयुक्त अवसरों पर /कुतर्कों द्वारा/ किसी एक मत द्वारा अपना महिमामंडन एवं दूसरे मतों का अनादन न हो। उपयुक्त अवसरों पर भी अपने विचार संयम के साथ प्रस्तुत किए जाएं।

प्रजा को सम्बोधित करते हुए अशोक ने लिखा था:

‘ यदि आप अपने विश्वास का आदर का आदर करते हैं तो अपने विश्वास का आदर करने के साथ साथ आप को दूसरों के विश्वास का भी सम्मान करना चाहिए। दूसरों के विश्वास का सम्मान करते हुए आप अपने विश्वास को उंचा उठाएंगे और अपने विश्वास के प्रति दूसरों का आदर प्राप्त करेंगे।

वह यह भी बताते हैं कि सम्राट अकबर द्वारा फतेहपुर सिक्री में आयोजित एक कार्यक्रम में नास्तिकों के समूह भी शामिल हुए थे।

इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि सकारात्मक तथा नकारात्मक धाराओं के बीच संघर्ष चलता रहा है। एक वक्त़ में जिस मुल्क में बौद्धों का दबदबा रहा, वहां से उसे नामशेष भी किया गया ; नालंदा विश्वविद्यालय जहां पढ़ने के लिए सुदूर क्षेत्रों से लोग आते हैं, उसे भी इसी किस्म के आततायी तत्वों के हमले का शिकार होना पड़ा था।

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एक ऐसा सवाल है जो हमारी अपनी बातचीत में बहुत कम उठता है, वह है अपनी कमजोरियांे का !

क्या हमारी अपनी कमजोरियां भी हैं जिसकी वजह से विचारों के संघर्ष की धार मद्धिम पड़ती हो ?

सबसे बड़ी समस्या जो सच बोलने में हमारी जुबां रूकती है, जिसमें किसी वरिष्ठ का कोपभाजन होने का डर रहता है।

जुबा रूकने में लोकरंजकता को भी चिन्हित किया जा सकता है। खरी बात कहने से जनता के नाराज हो जाने का डर अक्सर हमें सताता है। कई बार मैं देखता हूं कि इस मामले में मध्युग के कई समाजसुधारक सन्तों से भी हम कभी कभी पीछे खड़े दिखते हैं जो जनता के पाखंड को लेकर सीधे ललकारते थे।

अगर लोग अतीत की सामाजिक संरचनाओं में उलझे हैं, तरह तरह की बन्ददिमागी के शिकार हैं तो उन्हें पुचकारने से काम नहीं चलेगा, उन्हें वास्तविक तौर पर आधुनिक बनने के लिए, आधुनिक मूल्यों का स्वीकार करने के लिए तैयार करना होगा।

एक दूसरा मसला, हमारी सिलेक्टिव खामोशियों का भी है। उदाहरण के तौर पर हिन्दुत्व की साम्प्रदायिकता की हम मुखालिफत करेंगे, मगर अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकताओं को लेकर आंखों पर पटटी बांधे रहेंगे या होठ सिले रहेंगे।

दो साल पहले इन चुनिन्दा खामोशियों की एक मिसाल सामने आयी थी। दक्षिण एशिया के इस हिस्से में बांगलादेश की सरजमीं पर खडे़ शाहबाग आन्दोलन के बहाने, जो वहां के युद्ध अपराधियों के खिलाफ खड़ा हुआ था। यह वे युद्ध अपराधी थे जिन्होंने बांगलादेश की मुक्ति का विरोध करते हुए पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था। मेरी जानकारी में तीसरी दुनिया के किसी मुल्क में सेक्युलेरिजम की हिफाजत के लिए चला वह पहला जनान्दोलन था, जिसको समर्थन देना जरूरी था। हमारे जैसे लोगों ने तमाम कोशिश की, लेकिन सेक्युलर कहलानेवाले समूह भी मौन ही रहे। वजह थी कटघरे में था बांगलादेश का जमाते इस्लामी संगठन और महज इसी बात पर तमाम कोशिशें आकार नहीं ग्रहण कर सकीं।

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तय बात है कि सुकरात की सन्तानों या ब्रूनों वारिस इस त्रिमूर्ति की शहादत के बाद हम जो आज यहां इकटठा हुए हैं, उनकी जिम्मेदारी बढ़ गयी है। मगर यह कहना घिसीपीटी बात हो जाएगी कि उनके बचे खुचे कामों को हमें आगे ले जाना होगा। अभी हमें मिल कर या अलग अलग यह तय करना है कि हम नया क्या करने जा रहे हैं कलसे । क्या हम अपने कामों में कुछ नया रचने की, नयी जमीन तोड़ने की सोचते हैं क्योंकि अब तक जितना चल रहा है, जिस तरह चल रहा है, वह नाकाफी है।

इस सिलसिले में मैं बताना चाहूंगा कि जिस मुहिम में यह तीनों मुब्तिला थे, वह काम उनके साथी/सहयोगी मजबूती से आगे बढ़ा रहे हैं।

जिन लोगों को लगता था कि अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्ष की अगुआई कर रहे इस अलग किस्म के ‘कमांडर’ के न रहने से मुहिम धीमी हो जाएगी, वह गलत साबित हुए हैं। दाभोलकर ने जिस मिशन के प्रति अपने आप को न्यौछावर किया था, वह उतने ही उत्साह से आगे बढ़ रहा है। कहीं कहीं तो ऐसा भी लगता है कि अपने इस अगुआ साथी की इस असामयिक मौत से उद्धिग्न उनके दोस्तों-सहकर्मियों ने नयी संकल्प शक्ति के साथ काम शुरू किया है। catchnews.com पर दाभोलकर के बेटे हमीद का छपा साक्षात्कार उन तमाम शख्सियतों से रूबरू कराता है, जो गुमनामी में रहते हुए उसी मिशन में मुब्तिला हैं।/http://www.catchnews.com/india-news/every-radhe-maa-kills-my-father-again-1440106007.html /

हमीद बताते हैं कि

नासिक के क्रष्णा चांदगुडे हैं – जिनका पारिवारिक बिजनेस है – विगत दो साल से अंधश्रद्धा निर्मूलन के काम में पूरा वक्ती कार्यकर्ता बन कर सक्रिय हैं या इस्लामपूर के संजय बनसोडे हैं, जिनके पिता की मौत दाभोलकर की हत्या के महज पन्दरह दिन पहले हुई थी, मगर अपना ग़म भुल कर अंधश्रद्धा निर्मूलन के काम में जुटे हैं। ..आप माधव बागवे से मिलें, जो खुद कभी ढांेगी बाबाओं के चक्कर में पड़े थे और आज अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के मुख्य सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय हैं। मान तहसील के जग्गूबाबा गोराड हैं जो कभी खुद ढोंगी बाबा थे, मगर आज एक साधारण कार्यकर्ता के तौर पर इस मुहिम में जुटे हैं।

मगर अंधश्रद्धा निर्मूलन की यह मुहिम महज दाभोलकर के चन्द मुरीदों से परिभाषित नहीं होती। जमीनी स्तर पर भी बहुत कुछ हुआ है। डा दाभोलकर ने जिस कानून के निर्माण के लिए लगभग डेढ दशक लगाया था, उसे उनके जाने के बाद ही सरकार ने स्वीकारा है और ‘काला जादू कानून’ नामसे अधिक चर्चित इसी कानून के निर्देशों के मददेनज़र ऐसे बाबाओं को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है, जो चमत्कार दिखा कर लोगों को गुमराह करा रहे थे। स्वयं समिति के पास रेकार्ड मौजूद हैं, जो बताते हैं कि उनकी संख्या डेढ सौ से अधिक हैं। और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति उन तीन सौ इकाइयों के जरिए सक्रिय हैं जो महाराष्ट के सभी जिलों में ीही नहीं बल्कि बगल के कर्नाटक एवं गोवा के कुछ हिस्से में भी कायम की गयी हैं और जिनके पास तीन हजार से अधिक समर्पित कार्यकर्ता हैं।

अगर आप कामरेड पानसरे के साथियों से मिलेंगे या कलबुर्गीजी के विद्यार्थियों, सहयोगी अध्यापकों, विद्धानों/विदुषियों से मिलेंगे तो आप को यही बात सुनाई देगी। पिछले दिनों कलबुर्गीजी के शहर धारवाड में उनकी याद में जिस विशाल जनसभा का आयोजन हुआ था, उसमें यह बात जोर से रखी गयी कि कर्नाटक सरकार – जो जादूटोना विरोधी विधेयक के मसविदे पर बात कर रही है, वह इस मामले में अध्यादेश लेकर आए।

मैं इस बात को इस बैठक में इसलिए रख रहा हूं ताकि हम अपने अपने स्तर पर तय करें कि समाज में वैज्ञानिक चिन्तन का प्रचार प्रसार करने, समाज को वास्तविक तौर पर आधुनिक बनाने और उसे अधिक समतामूलक, अधिक समावेशी, अधिक न्यायपूर्ण बनाने के इस काम को हम इन साथियों की शहादत के बाद किस तरह आगे बढ़ानेवाले हैं। किस किस्म का एक सकारात्मक एजेण्डा लोगों के बीच ले जाने वाले हैं।

उदाहरणार्थ, क्या आप को नहीं लगता कि ‘जादू टोना विरोधी कानून’ जैसा कोई कानून उत्तर भारत में भी बने या देश के स्तर पर बने ताकि जनता को गुमराह करने में लगे तमाम बाबाओं, बापूओं का पर्दाफाश ठीक से किया जा सके। मैं जानता हूं कि वह एक छोटा कदम है। उससे निश्चित ही इन्कलाब नहीं होगा। यह महज प्रस्ताव है।

क्या आप को नहीं लगता कि कामरेड पानसरे ने जिस तरह अपने संघर्ष में तर्कशीलता का सवाल, साम्प्रदायिकता विरोधी संघर्ष या मेहनतकशों के सवाल को एकीक्रत किया था, ऐसे एकीक्रत ढंग से भी सोचने की जरूरत है। साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष का सवाल उनके लिए महज बचावात्मक लड़ाई का तरीका नहीं था, वह आक्रामक ढंग से उसकी मुखालिफत करने में यकीन करते थे, फुटबॉल की जुबां में कहूं तो फॉरवर्ड खेलने में यकीन रखते थे। अपनी असामयिक मौत के महज एक माह पहले उन्होंने अपने शहर कोल्हापुर में ‘हू किल्ड करकरे’ के लेखक, महाराष्ट के रिटायर्ड डीआईजी जनाब एस एम मुशरिफ की विशाल सभा का आयोजन किया था, जिसमें मुशरिफसाब ने हिन्दुत्व आतंक एवं ऐसे तत्वों की घुसपैठ पर रौशनी डाली थी और संघ परिवारी संगठनांे के साथ उनके करीबी रिश्तों को उजागर किया था। और कामरेड पानसरे ने ऐलान किया था कि वह मुशरिफसाब को लेकर महाराष्ट के तमाम जगह जनसभाओं के आयोजन का ऐलान किया था। मुशरिफसाब बता रहे थे कि शायद इसी डर से उनकी हत्या कर दी गयी थी।

छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे सर्वधर्मसमभाव में यकीन रखनेवाले राजा के साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा एप्रोप्रिएशन को, उन्हें अपने में समाहित किए जाने को उन्होंने चुनौती दी थी और उनके वास्तविक चरित्रा को एक किताब के जरिए उजागर किया था जिसका शीर्षक था ‘शिवाजी कौन था’। भारत के तमाम भाषाओं में अनूदित इस किताब की लाखों प्रतियां अभी तक वितरित हुई हैं।
बहुत कुछ करने की, नया रचने की, अस्तित्वमान की आलोचना करने की जरूरत है, विचारों की हिमायत के लिए विचारद्रोही ताकतों को बेपर्द करने की जरूरत है। ऐसे तमाम संघर्ष आज की तारीख में मुल्क में चल रहे हैं जिनके आगे बढ़ने से हमारी लड़ाई मजबूत हो सकती है, ऐसे सभी संघर्षों को मजबूती दिलाने की जरूरत है। फिर चाहे जातिप्रथा, पित्रसत्ता के खिलाफ संघर्ष हो या पूंजी की गुलामी के खिलाफ उठती आवाज़ें हों। पूंजी की गुलामी से लेकर मानवद्रोही परम्पराओं से बग़ावत करने की जरूरत है।

और इस सन्दर्भ में यह निहायत जरूरी है कि हम अपने विरोधियों से भी सीखने में संकोच न करें, उन ताकतों की यात्रा का भी बारीकी से अध्ययन करें जो राजनीति एवं समाज पर हावी होती दिख रही है ताकि यह जाना जाए कि समाज मन पर हावी होने के लिए सामाजिक-सांस्क्रतिक दायरों में उन्होंने किस तरह का हस्तक्षेप किया। उदाहरण के तौर पर अपने जनम के 90 साल पूरे कर रहे राष्टीय स्वयंसेवक संघ को देखें, जिसका दावा रहता है कि वह सांस्क्रतिक हस्तक्षेप /बनसजनतंस पदजमतअमदजपवद/नहीं बल्कि संस्क्रति में हस्तक्षेप /पदजमतअमदजपवद पद बनसजनतमध्करता है। किसी को यह शब्दों का फेर लग सकता है, मगर बारीकी से देखें तो अपनी इसी समझदारी के तहत उसने स्कूलों, कालेजों, अस्पतालों, सेवा प्रकल्पांे, एकल विद्यालयों जैसे तमाम कामों की शुरूआत की है, जिनके माध्यम से वह अपने विचारों की रौशनी फैला रहा है। आप गौर करेंगे कि चाहे जमाते इस्लामी हो, संघ हो या धर्म को सियासत में घुला देने में यकीन रखनेवाले अन्य संगठन हों, वह इसी समझदारी को आगे बढ़ा रहे हैं।

क्या आप को नहीं लगता कि न्याय, समता, प्रगति की जुस्तजू रखनेवाली ताकतों को चाहिए कि वह अपने बीते काम की समीक्षा करे, अगर वे सही मायने में समाज प्रबोधन करना चाह रही हैं तो उन्हें चाहिए कि महज अपने संघर्ष को महज राजनीतिक-आर्थिक दायरों तक सीमित न रखें बल्कि सामाजिक सांस्क्रतिक दायरों तक ले जाएं।

उन्नीसवीं सदी के महान दार्शनिक क्रांतिकारी मार्क्स ने एक जगह लिखा है विचार तब भौतिक शक्ति बनते हैं, जब जनसमुदाय द्वारा ग्रहण किए जाते हैं। आज के वक्त में आमूलचूल बदलाव का विचार, तर्कशीलता का चिन्तन ंआदि के हक में अधिकाधिक ताकतों को जोड़ने की जरूरत है, तभी वह सही मायने में भौतिक शक्ति बन सकते है।

/कलम विचार मंच, लखनउ द्वारा आयोजित सेमिनार में 18 सितम्बर 2015 को दिए गए भाषण का विस्तारित रूप/

4 thoughts on “तर्क और विचारों से कौन डरता है ? – दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की शहादत के बहाने चन्द बातें

  1. K SHESHU BABU

    Wow!! Sensibility is still alive….
    ‘Jab amber jhoom ke nachegi
    Jab dharti nagme gayegi
    Woh subah kabhi to ayegi”
    SAHIR

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