बढ़ती असहिष्णुता और फासीवादी प्रवृतियां : किशोर

Guest Post by KISHORE

(Image : Courtesy – http://www.huffingtonpost.in)

अख़बारों में आई खबर के अनुसार ग्रेटर नॉएडा में भीड़ ने एक व्यक्ति को इस अफवाह के आधार पर मार दिया कि वह गौमांस के व्यापार में लगा था. यह बताने की जरूरत नहीं कि मरने वाला किस धर्म को मानने वाला था और मारने वाले किस धर्म के अनुयायी थे. अब आ रही खबरों के अनुसार यह अफवाह झूठी थी और जिस पुजारी ने इस अफवाह की शुरूआत करी. उस पुजारी को यह अफवाह उड़ाने के लिए मजबूर किया गया था. कुछ लोग यहाँ तक कह रहें हैं कि यह बर्बर हत्या किसी ग़लतफ़हमी के कारण हुई है, पर मेरे एक मित्र ने बड़ा ही प्रासंगिक प्रश्न उठाया कि हम अगर यह मान भी ले की वह व्यक्ति गौ मांस के व्यापार से जुड़ा हुआ था तो क्या उसकी हत्या को उचित ठहराया जा सकता है.

इस बात में कोई दो राय नहीं कि अगर मेरा धर्म मुझसे अपेक्षा रखता है कि मैं ये खाऊँ और ये ना खाऊँ और मैं उसमे विश्वास रखता हूँ, तो यह मेरा चयन हो सकता है कि मैं कुछ ना खाऊँ. कोई मुझे वह चीज़ खाने के लिए मजबूर नहीं कर सकताण. पर क्या यह जरूरी है कि मेरे खाने या ना खाने के चयन का पालन बाकि लोग भी करें. खाना.पीना, पहनना-ओढना और कुछ अच्छा लगना या न लगना हर किसी का निजी मामला है. क्या समाज यह तय कर सकता है कि मैं क्या खाऊँ और क्या ना खाऊँ ? और एक वर्ग की प्राथमिकताओं के हिसाब से न चलने पर उसको मौत के घाट उतारना किसी न्यायोचित समाज की निशानी है या बर्बर समाज की ?

एक नज़र समाज के उस सभ्य वर्ग के उसकी पूजनीय गौ माता के प्रति व्यवहार पर डालते हैं. गौमांस को बेचने के लिए ये गायें आती कहाँ से है ? क्या अपनी गौ माता को केवल उस वर्ग के लोग ही बेचते हैं जो इस खाते हैं ? उस समाज के लोगों से पुछा जाये जो इस हत्या में शामिल थे या जो लम्बे समय से इस मुहीम का हिस्सा है कि जब गाय दूध देने लायक नहीं रहती तो वह उसका क्या करते हैं ? क्या वह दूध का उत्पादन बढाने के लिए गायों को इंजेक्शन नहीं देते जो गायों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ? क्यों यह वर्ग दूध निकालने के बाद उसी गाय को खाने के लिए सडको पर प्लास्टिक की थैलियाँ खाने के लिए खुला नहीं छोड़ देता है ? यह व्यवहार किसी और के साथ नहीं अपनी माँ जैसी गाय के साथ किया जाता है. समाज का वो हिस्सा जो गाय को मां मानने का दावा करता है क्या इस बदसलूकी में शामिल नहीं ?

पहले इस आधार पर लोगों को मारा गया कि उन्होंने अपनी पसंद से जीवनसाथी चुना था, फिर उन लोगों को काफ़िर करार दिया गया जो अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ प्यार करते हैं, फिर उन लड़कियों का बलात्कार किया गया जिन्होंने उनके मन मुताबिक कपडे नहीं पहने थे, फिर उन लोगों की हत्या की गयी जिनके नैन नक्श उस वर्ग विशेष जैसे नहीं थे और अब उन लोगों को मारा जा रहा है या उनके ख़िलाफ़ मुहीम चलाई जा रही है जिनकी खाने पीने की आदतें समाज विशेष के एक हिस्से जैसी नहीं है. अब कानून व्यवस्था और न्यायप्रणाली तार्किकता के आधार पर नहीं चलेगी बल्कि एक वर्ग विशेष की पसंद या नापसंद के आधार होंगे.

मैं क्या खाऊँ, क्या पहनू, किससे प्यार करूं और किससे शादी करूं यह तय करने की आजादी मुझे नहीं पर यह निर्णय हिंसा में यकीन रखने वाला यह बर्बर समाज करेगा. निजी स्वतंत्रता समाज के नैतिक पतन की निशानी है और सबके हित में यह निर्णय समाज के कुछ ठेकेदार करेंगे. बढ़ती हुई असहिष्णुता और फासीवादी प्रवृति इस समाज को किस ओर ले जा रही है ये उसका एक लक्षण मात्र है. आगे क्या होगा यह तो समाजशास्त्री ही बता सकते हैं. अभी तो मुझे पास्टर निमोलर* की यह पंक्तियाँ याद आ रही है

” पहले वे यहूदियों के लिए आये
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वे कम्युनिस्टों के लिए आये
मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था

फिर वे ट्रेडयूनियन वालों के लिए आये
मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनवाला नहीं था

फिर वे मेरे लिए आये
और मेरे लिए बोलनेवाला कोई नहीं था …”
( *हिटलर के शासनकाल के एक कवि और फासीवाद विरोधी कार्यकर्ता)

(लेखक डेवलेपमेंट प्रोफेश्नल के रूप में टेरे डेस होम्सए जर्मनी में कार्यरत हैं और पिछले कई सालों से बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं )

2 thoughts on “बढ़ती असहिष्णुता और फासीवादी प्रवृतियां : किशोर

  1. K SHESHU BABU

    ‘Aaj agar hai toe gunaahoon ka asar dekhinge
    Teer-e-nazar phekhengee : zakhm-e-jigar dekhingee
    Aaj ki raat agar hai toe zahar dekhingee
    Teer-e-nazar dekhingee zakhm-e-jigar dekhingee….
    (KAIFI AZMI – with a request to excuse me if some words are missing or omitted inadvertently.but my idea is the same as that of Marhoom Kaifi).
    ‘Voh din ko jis ka aaza hai… hum dekhingee
    Hum dekhingee!…Lazim hai ke hum bhi dekhingee..
    Hum dekhingee’
    FAIZ AHMED FAIZ

  2. Ashutosh Mishra

    If what the press reports are saying is true regarding this episode, I unequivocally condemn and condole and pray for the peace of the victim and strength to the bereaved. I demand strongly that not one culprit should get away due to witnesses turning hostile due to threat, or due to shoddy investigation so that our nation remains a civilized state and not turn into a Hindu version of our benighted neighbor Pakistan.

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