सम्मान वापसी पर कवि-चिन्तक मनमोहन का वक्तव्य

Guest Post by Manmohan

Displaying Manmohan- Hindi poet.jpg(

(हिंदी के वरिष्ठ कवि-चिंतक मनमोहन ने हरियाणा साहित्य अकादमी से 2007-08
में मिला `महाकवि सूर सम्मान` और उसके साथ मिली एक लाख रुपये की राशि
अकादमी को वापस भेज दी है। उन्होंने मौजूदा हालात और रचनाकारों के
प्रतिवाद को लेकर यह वक्तव्य भी जारी किया है।)

देश के हालात अच्छे नहीं हैं। जिन्हें अभी नहीं लगता, शायद कुछ दिन बाद
सोचें। जिन लोगों ने नागरिक समाज का ख़याल छोड़ा नहीं है और जिनके लिए
मानवीय गरिमा और न्याय के प्रश्न बिल्कुल व्यर्थ नहीं हो गए हैं, उन्हें
यह समझने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी कि परिस्थिति असामान्य रूप से
चिन्ताजनक है।

हममें से अनेक हैं जिन्होंने 1975-76 का आपातकाल देखा और झेला है।
साम्प्रदायिक हिंसा और दलित आबादियों पर जघन्य हमलों की कितनी ही
वारदातें पिछले 50 वर्षों में हुई हैं। 1984, 1989-1992 और 2002 के
हत्याकांड, फ़ासीवादी पूर्वाभ्यास और नृशंसताएं हमारे सामने से गुजरी
हैं। ये सरकार और वो सरकार, सब कुछ हमारे अनुभव में है। फिर भी लगता है
कुछ नई चीज़ है जो  घटित हो रही है। पहली बार शायद इस बात के संकेत मिल
रहे हैं कि जैसे राज्य, समाज और विचारधारा के समूचे तंत्र के फ़ासिस्ट
पुनर्गठन की किसी दूरगामी और विस्तृत परियोजना पर काम शुरू हुआ है। कोई
भोला-भाला नादान ही होगा जो आज के दिन इस बात पर यक़ीन कर लेगा कि
नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे, एम.एम. कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की
हत्याएं या रक्तपिपासु उन्मत्त भीड़ बनाकर की गई दादरी के अख़लाक़ की
हत्या में कोई अन्दरुनी रिश्ता नहीं है या ये कानून और
व्यवस्था की कोई स्थानीय या स्वतःस्फूर्त घटनाएं हैं। लगता है, ये सब
सिलसिला एक उदीयमान फ़ासिस्ट संरचना का अनिवार्य हिस्सा है। इसी के तहत
साहित्य, कला-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा और शोध की श्रेष्ठ
परंपराओं और तमाम छोटे-बड़े संस्थागत ढांचों को छिन्न-भिन्न और विकृत
किया जा रहा है और पेशेवराना साख और उत्कृष्टता के मानदंडों को हिक़ारत
से परे धकेलकर इन्हें ज़ाहिल और निरंकुश कूपमंडूकों के हवाले किया जा रहा
है। और इसी के तहत सार्वजनिक विमर्शों में और लोगों के
सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में साम्प्रदायिक नफ़रत और विद्वेष का जहर घोला
जा रहा है, स्त्रियों और दलितों को `सुधारने` के कार्यक्रम चल रहे हैं,
इसी के तहत देशभर में अपराधी फ़ासिस्ट गिरोह `धर्म`, `संस्कृति` और
`राष्ट्र` के `कस्टोडियन` बनकर घूम रहे हैं। गांवों और कस्बों में
अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, दलितों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं पर
संगठित हमले कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर उन्हें धमका रहे हैं और अपमानित
कर रहे हैं। लगता है, लोगों का खानपान, पहनावा, पढ़ना-लिखना, आना-जाना,
सोच-विचार, भाषा, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, यहां तक कि मानवीय
सम्बन्ध, जीवन व्यवहार और रचनात्मक अभिव्यक्ति- सब कुछ यही तय करेंगे। यह
बहुत साफ है कि ये लंपट तत्व सत्तातंत्र की गोद में खेल रहे हैं। उन्हें
नियंत्रित किया जाए, इसके बजाय लगातार संरक्षण मिल रहा है और उनकी हौसला
अफजाई की जा रही है।  फ़ासीवाद मानवद्रोह की मुक़म्मल विचारधारा है। हम
जानते हैं कि नवजागरणकालीन उदार, मानववादी, विवेकवादी, जनतांत्रिक और
आधुनिक मूल्य परम्पराओं के साथ उनकी बद्धमूल शत्रुता है और इन्हें वह
गहरी हिक़ारत और नफ़रत से देखती है। अग्रणी बुद्धिजीवियों, लेखकों,
फिल्मकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और समाजविज्ञानियों को निशाना
बनाए बिना उसका काम पूरा नहीं होता। अब यह स्पष्ट है कि बौद्धिक रचनात्मक
बिरादरी की नियति उत्पीड़ित आबादियों, स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों
इन सभी के साथ एक ही सूत्र में बंधी है। लड़ाई लंबी और कठिन है।
पुरुस्कार लौटाना प्रतीकात्मक कार्रवाई सही, पर इससे प्रतिरोध की ताकतों
का मनोबल बढ़ा है।

यह दुखद और शर्मनाक है कि जाने-माने रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के इस
देशव्यापी प्रतिवाद के गंभीर अर्थ को समझने के बजाय सत्ताधारी लोग इसका
मज़ाक उड़ाने की और इसे टुच्ची दलीय राजनीति में घसीट कर इसकी गरिमा को
कम करने की व्यर्थ कोशिशें कर रहे हैं।

अब जरूरत है कि हम और करीब आएं, मौजूदा चुनौतियों को मिलकर समझें और
ज्यादा सारभूत बड़े वैचारिक हस्तक्षेप की तैयारी करें। अगर हमने यह न
किया तो इसकी भारी क़ीमत इस मुल्क को अदा करनी होगी।

-मनमोहन

(Renowned Hindi poet scholar Manmohan, who had been honoured with the Mahakavi Surdas Samman by the Haryana Sahitya Akademi for the year 2007-08, has returned the award as well as the accompanying cash prize of Rs1 lakh to the akademi.He is the first writer from Haryana to return his award. Bharatbhooshan Tiwary has translated his statement – which he issued while returning the award – into English )

The country is in dire straits. Those who don’t feel the same way,
they may think about it in a few days. Those who have not given up on
Civil Society and the questions of human dignity and justice have not
lost their meanings for those; they would not find it very difficult
to understand that the situation is extraordinarily disturbing.

Many of us have seen the Emergency of 1975-76 and have suffered under
it. There have been numerous incidents of communal violence and
heinous attacks on Dalit populations in last fifty years. We have been
witness to carnages, fascist dress rehearsals, and atrocities of 1984,
1989-1992 and 2002. This government and that, we have experienced all.
Though, it feels like something new is taking place.  For the first
time ever, there are indications that the work has commenced on the
detailed scheme of fascist reorganization of the state, society and
the overall system. It would be naïve to believe today that there is
no internal connection among the murders of intellectuals like
Narendra Dabholkar, Govind Pansare and MM Kalburgi or the murder of
Akhlaq by a bloodthirsty frenzied mob in Dadri, and that these are
some local and spontaneous incidents of Law and Order.  This whole
series seems to be an integral part of a rising fascist structure.
Under the same structure, all major or minor institutional frameworks
and excellent traditions of literature, art & culture, learning &
science, education and research are being mutilated and disfigured,
the norms of professional reputation and excellence are being
sidelined with disdain and they are being handed over to tyrannical
bigots. Under the same structure, the public discourses and
socio-cultural lives of masses are being intoxicated by communal
hatred and hostility, programs are being undertaken to “reform” or
‘discipline’ women and Dalits, and under the same structure the
criminal fascist gangs are running amok all over the country as the
custodians of ‘religion’, ‘culture’ and ‘nation’. Villages and towns
are witnessing organized assaults against the minorities, women,
Dalits, journalists and social activists. They are being threatened
and insulted on the social media. It seems these elements would decide
everything- what should people eat, how should they dress, what should
they read or write, where should they come or go, what should they
think, what language should they speak, what should their religious
beliefs be, what should their festivities be; even the human
relationships, the conduct of life and creative expression. It is very
clear that these lumpen elements enjoy the patronage of the powers
that be. These elements are not being reined in, but protected and
promoted instead.

Fascism is an immaculately anti-human ideology. We know that it has
deep-rooted animosity against liberal, humanist, rationalist,
democratic and modern value traditions of renaissance and is full of
hatred and contempt against them. It cannot go on without targeting
leading intellectuals, writers, filmmakers, cultural activists,
journalists and social-scientists. It is now clear that the destiny of
the intellectual creative fraternity is tied with that of all
oppressed masses, women, Dalits and minorities. It is a long and
arduous struggle.  Returning awards is a symbolic act, it has
nonetheless turned out to be morale boosting for the forces of
resistance. It is grievous and shameful that instead of understanding
deeper meaning of the nationwide protest by well-known writers and
intellectuals, the powers that be are trying in vain to disgrace it by
making a mockery of it and by dragging it into petty party politics.

It is high time we came together, understood the present challenges
and prepared for more substantive and bigger ideological intervention.
The country would have to pay a heavy price lest we act.

2 thoughts on “सम्मान वापसी पर कवि-चिन्तक मनमोहन का वक्तव्य

  1. K SHESH ABU

    Every right-thinking writer is calling you to join the movement.
    ‘Aajs, mai toe michs hoon teeyri raah mein
    Tujh ko pukarey meeyraa pyaar’
    SAHIR

  2. Jasbir Chawla

    होना सुकरात से सुअर
    —————–
    सोमवार से वीरवार तक
    चेहरे पर मुक्का टंगा था
    शुक्रवार सत्ता से मिला
    छक कर अघा गया
    शनिवार आईना देखा
    बदलाव नजर आया
    रविवार पूर्ण रुपातंरण हो गया
    असंतुष्ट सुकरात से
    संतुष्ट सुअर हो गया
    अब कोंडबाड़े मे रहता है
    पार्टी का प्रवक्ता है

    // जसबीर चावला //

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