जो पहले नहीं हुआ: किशोर कुमार

Guest Post by KISHORE KUMAR

लगभग चालीस लेखकों के पुरुस्कार लौटाने के बाद अब फिल्म निर्देशकों ने भी पुरुस्कार लौटने शुरू कर दिए. यह पुरुस्कार बढती असहनशीलता और अभिव्यक्ति की स्वंत्रता के दमन के विरोध में लौटाए जा रहे हैं.

बी.जे.पी की राय में यह राजनीति से प्रेरित कदम है और यह सब बी.जे.पी के खिलाफ हो रही साजिश का हिस्सा है. बी.जे.पी के अनुसार आज कुछ ऐसा नया नहीं हुआ जो पहले ना हुआ हो और इन लोगों ने उस समय यह पुरूस्कार वापस क्यों नहीं लौटाए? बी.जे.पी. के अनुसार पुरुस्कार लौटना छदम धर्मनिरपेक्ष लोगों का नाटक है और  असहनशीलता इतनी नहीं बढ़ी और माहौल इतना ख़राब नहीं हुआ कि इतना शोर मचाया जाए.

इसमें कोई संदेह नहीं कि पहले भी असहिंष्णुता, सांप्रदायिक दंगो और आज़ादी पर हमले के कई वाकये हैं. उदहारण के लिए भागलपुर, राम मंदिर आन्दोलन और बाबरी मस्जिद ढहने के बाद हुए दंगे, 1984 में सिखो का कत्ले आम, मेरठ दंगे, मुज्जफर नगर दंगे और इमरजेंसी के समय सरकार की ज्यादतियां आदि. इनमे से कई दंगो में राज्य ने भूमिका भी निभाई थी लकिन इनमे से अधिकतर दंगो में कट्टर हिंदूवादी दलों की भूमिका भी थी. 1984 के सिख जनसंहार और 1975 में इमरजेंसी को छोड़ कर शासित पार्टी की सीधी भूमिका को साबित नहीं किया जा सकता. कांग्रेस लगातार सांप्रदायिक ताकतों (हिन्दू और मुस्लिम दोनों) का प्रयोग अपने चुनावी लाभ के लिए करती रही है.

अंतर यह है कि आज से पहले सत्ता में काबिज लोगों ने दंगो को जनता की भावनाओं का परिणाम बताकर उनका समर्थन नहीं किया और ना ही दंगाईयों के समर्थन में सीधे सीधे सामने आये. यह बात अलग है कि पहले भी शासन ने इन दंगाइयों के खिलफ कुछ खास कदम नहीं उठाये और इन दंगो का उपयोग अपने राजनैतिक फायदे के लिए किया.

लोगों की भावनाओं को भड़का और दंगे करवा कर चुनावी राजनीति करना भी कोई नई बात नहीं है. अपने चुनावी गणित के कारण फतवों के विरोध में ना बोलना एक बात है और उन फतवों का समर्थन करना दूसरी बात. शासन का अपने राजनैतिक फायदे के लिए कठमुल्लावादी  और फासीवादी ताकतों  का उपयोग एक बात है और शासन का खुद फासीवादी होना दूसरी बात.

यही अंतर है वर्तमान और बीते हुए कल के माहौल में. कांग्रेस फासीवादी ताकतों की गुंडागर्दी के खिलाफ कोई ठोस कदम ना उठा कर अपनी राजनैतिक रोटियां जरूर सेकती थी पर इन फासीवादी हरकतों को जनता की भावना बताकर उसका औचित्य सिद्ध करने की कोशिश नहीं करती थी.

शहीद पनेसर और कुलबर्गी की तरह दिवंगत दाभोलकर की हत्या बी.जे.पी. शासन में नहीं हुई और यह भी सही हो सकता है कि उनके हत्यारों को पकड़ने में कांग्रेस शासन ने कुछ खास तत्परता नहीं दिखाई. लेकिन फिर भी यह सच्चाई है कि उनकी हत्या के शक की सुई कांग्रेस पर न होकर कट्टरवादी हिन्दू वादी संगठनो पर है. बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए तो खुद बी.जे.पी. के नेता जिम्मेदार थे.

हो सकता है कि पहले शायद लेखको ने अपने पुरुस्कार ना लौटाएं हों पर यह कहना कि तब तथाकथित छदम धर्मनिरपेक्ष लोगों ने उनका विरोध नहीं किया था, गलत होगा. भागलपुर से लेकर हाल ही में हुए मुज्जफर दंगो में इन “छदम” धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने जो भूमिका निभाई है वो सबके सामने है. मलियाना-हाशिमपुर के सच को सामने लाने में इन “छदम” धर्मनिरपेक्ष मानवाधिकारो संगठनो की भूमिका काबिले तारीफ रही. हो सकता है विरोध के तरीके अलग रहे हों लेकिन यह कहना कि विरोध नहीं हुए, गलत होगा.

अब बी.जे.पी. के नेता असहनशीलता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हो रहे हमलो का विरोध करने की जगह इनका विरोध करने वालो पर साजिश का आरोप लगा रहे हैं और दावा कर रहें है कि महौल इतना ख़राब नहीं हुआ. किसी आदमी को इसलिए पीट पीट कर मार दिया जाता है क्योंकि उसके खिलाफ गौ मांस खाने की अफवाह है और बी,जे पी. कहती है ऐसा कुछ खास नहीं हुआ. किसी खास दिन बाल काटने के विरोध में दंगे हो जाते हैं पर ऐसा ज्यादा कुछ नहीं हुआ कि इतना विरोध हो. घर वापसी के नाम पर ईसाईयों और मुसलमानो के धर्म परिवर्तन को संघ परिवार जायज ठहरा रहा है पर कुछ नहीं हुआ. कई अन्तराष्ट्रीय संगठन मोदी के सत्ता में आने के बाद दंगो में वृद्धि की बात कह रहे हैं पर वह सब बी.जे.पी. सत्ता के खिलाफ साजिश है और भारत को बदनाम करने की कोशिश है.

भाजपा नेता यह जानने में बहुत उत्सुक हैं कि आज क्या हो गया जो पहले नहीं हुआ तो उनको बताया जाए कि आज से पहले सत्ता के प्रतिनिधि इसं तरह से सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वालों का समर्थन नहीं करते थे. आज से पहले अल्पसंख्यक अपने को इतना असुरक्षित नहीं महसूस करते थे जितना आज करते है. निश्चित रूप से आज का माहौल आज से दो साल पहले के माहौल से ज्यादा ख़राब है. अगर ऐसे में कोई  विरोध में पुरुस्कार वापस कर रहा है, जो पहले नहीं हुआ, तो भाजपा को आत्मचिंतन करना चाहिए ना कि साजिश के आरोप लगाने चाहिए.

The author is a social activist and works with terre des hommes, an organization working on child rights in Delhi

2 thoughts on “जो पहले नहीं हुआ: किशोर कुमार

  1. K SHESHU BABU

    “Dil jo na kahsaka…vohi raaze dil kahneki raat aayeee…”
    SHEVAN RIZVI
    So far, the mind could not express…and now the night has finally arrived
    Let bygones be bygones! Past be past! Now times have changed and dissent is erupting like a volcano. How can it be put off! The burning memories of the myrtyrs who died for the sake of upholding truth!
    “Dil me kiseeyki yaad ka jalta hua chiraag duniyaan ki aandhiyoon se bhalaa yeh bhujee ga kya?..” (SAHIR)
    (Free translation: The fire burning in the mind of the memory of someone …can it be put off by the storm of the world?…)

  2. Dashanan

    Hamko unse hai wafa ki ummeed, jo nahin jantey wafa kya hai (Mirza Ghalib). Those who do not believe in allowing the freedom of speech and loudly shouting that their freedom is curtailed. What a paradox!

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