आने पर आशंका, जाने पर उल्लास: भारतीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की खोज

देश के दो बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अपने नए कुलपतियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं .दिल्ली विश्वविद्यालय पिछले तीन महीने से कुलपतिविहीन है और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यकाल इस महीने खत्म हो जाएगा. दोनों ही जगहों के लिए इस काम के लिए बनाई गयी खोज और चयन समितियों ने अपना काम पूरा कर लिया है,ऐसी खबर है. उन्होंने अपनी ओर से इस पद के लिए ‘श्रेष्ठतम’ नामों की सूची इन विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष यानी राष्ट्रपति के पास भेज दी है. अब वे किस नाम पर सही करके भेजते हैं, इसका इन्तजार है. इस बीच अकादमिक जगत में और इसमें दिलचस्पी रखने वालों के बीच अफवाहों का बाज़ार गर्म है.

कुछ नामों के पक्ष-विपक्ष में बहस चल रही है. आशंका जताई जा रही है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तरह ही शासक दल की राजनीतिक विचार के अनुयायी चुने जाएँगे. एक मित्र ने कहा कि जब देश ने ही उस विचारधारा को चुन लिया तो अकादमिक परिसर क्योंकर उससे आज़ाद रहें! जो हो, चयन के पहले ही परिसर में संभावित नामों को लेकर पक्ष और विपक्ष तैयार हो जाता है. इस सबके बीच जिस नाम का भी चुनाव हो, वह परिसर में इस जानकारी के साथ प्रवेश करता है कि उसका पक्ष कौन-सा है और विपक्ष कौन-सा और वह अपनी सुरक्षा की तैयारी को अपनी स्थिरता के लिए प्राथमिकता देता है. पूरे कार्यकाल तक यह तनाव बना रहता है और कुलपति के फैसले इस चिंता से प्रभावित होते रहते हैं कि उसके विपक्षियों की तादाद और ताकत परिसर में न बढ़े. इसका असर सबसे अधिक नए अध्यापकों के चयन और पुराने अध्यापकों की प्रोन्नति पर पड़ता है. जाहिर है, जब अध्यापक के चुनाव का आधार ही गैर-अकादमिक है तो योग्य शिक्षक का चुन लिया जाना भी सिर्फ संयोग है. यह बहुत कम देखा गया है कि किसी कुलपति ने अपने विरोधियों की आशंकाओं को निर्मूल किया हो. अगर विरोध और समर्थन का आधार राजनीतिक विचार हैं तब तो तालमेल और मुश्किल हो जाता है.

आज तक यह पूछा नहीं गया कि आखिर ऐसा होता क्यों है? क्यों हर बार ऐसे मौके पर अफवाहें उड़ती हैं और नामों को लेकर कयासआराई होती है? क्यों चुने गए नामों की उपयुक्तता को लेकर इतना बड़ा मत-विभाजन बना रहता है? इसकी वजह है इस प्रक्रिया की रहस्यमयता और अपारदर्शिता और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति के चयन की प्रक्रिया प्रायः इस प्रकार है:कार्यपरिषद नए कुलपति की खोज और चयन के लिए गठित होनेवाली समिति के लिए दो सदस्यों का नाम राष्ट्रपति को भेजती है. फिर उनकी ओर से एक प्रतिनिधि नामित किया जाता है. इस काम में सरकार का विधानतः कोई दखल नहीं होता. लेकिन राष्ट्रपति का दफ्तर  मानव संसाधन मंत्रालय के जरिए काम करता है.इस तरह सरकारी हस्तक्षेप का एक रास्ता बन जाता है. पहले दो नाम प्रायः पदासीन कुलपति की पसंद के होते हैं और कहा जा सकता है कि उसे उनके माध्यम से चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने का मौक़ा रहता है.

दस साल पहले पंद्रह नए केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के लिए पहले कुलपतियों के चुनाव के समय से ही यह प्रथा शुरू हुई कि इस पद के लिए इच्छुक अभ्यर्थी आवेदन दें. आवेदनों के अलावा खोज-चयन समिति को और नामों पर विचार करने का भी अधिकार है. इसे लेकर खासी असुविधा महसूस की गई थी कि इस प्रतिष्ठित पद के लिए भी आवेदन माँगा जा रहा है. इसके खिलाफ तर्क था कि आवेदन करने में हिचकिचाहट में आभिजात्य के अहंकार की बू आती है.

कुछ वक्त पहले तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के चुनाव की गुणवत्ता पर शायद ही सवाल उठाए जाते थे. चयन समितियों में प्रायः अकादमिक जगत में प्रतिष्ठित नाम होते थे और उनके चिंता संस्थान को एक काबिल नेता देने की रहती थी. माना जाता था कि उनका दर्जा इतना ऊँचा है कि शायद ही कोई सरकार उन्हें प्रभावित कर पाए. अपनी अकादमिक प्रतिष्ठा के बल पर वे भी सरकार या राजनैतिक नेताओं को कह पाएँगे कि वे स्वायत्त हैं. लेकिन इससे यह बात कट नहीं जाती कि प्रक्रिया फिर भी रहस्यमय और अपारदर्शी ही थी. इस कारण यह चुनाव एक तरह का जुआ था और है: पाँसा उलटा भी पड़ सकता है और तब विश्वविद्यालय पांच साल तक एक अक्षम या बुरे प्रशासक के चंगुल में फँसा रहता है. परिसर में जो कड़वाहट पैदा होती है, वह अलग. दूसरे, चयन समितियों में भले ही बड़े नाम हों, देखा गया कि उन्हें प्रभावित करना उतना मुश्किल भी नहीं हैं.

चयन-प्रक्रिया पर अब बहस शुरू हुई है और यह अच्छा है. कम से कम दो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों ने इस पर अपनी राय जाहिर की है. ये वे लोग हैं जो पिछले वर्षों में अनेक संस्थानों के प्रमुखों की चयन समितियों में रहे हैं. प्रोफ़ेसर गोवर्धन मेहता ने माना है कि गड़बड़ी चयन प्रक्रिया में है. समिति के सदस्यों की कोई जवाबदेही नहीं होती. वे एक जगह घालमेल करके गायब हो जाते हैं और दूसरी समिति में जा बैठते हैं. प्रोफ़ेसर माधव मेनन भी इससे सहमत हैं. वे खोज और चयन समिति की जवाबदेही तय करने की बात से सहमत हैं. ये दोनों इतने समादृत हैं कि बेहतर होता कि वे कुछ आत्मालोचना भी करते, यह भी बताते कि उनकी श्रेष्ठता के बावजूद उनसे चूक भी हुई.

यह सवाल किया जाता रहा है कि कुछ मामलों में, जहां ये चयन-प्रक्रिया के हिस्सा थे, कैसे इनके पहले निर्णय को बदल कर नया निर्णय करने को इन्हें तैयार किया जा सका? क्यों इन जैसे सुरक्षित और आश्वस्त विद्वान भी इस दबाव को झेल न पाए?

सवाल वही है: चयन-प्रक्रिया कैसे पारदर्शी बने? चयन-समिति की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो? इसका एक तरीका है चयन समिति की पूरी कार्यवाही का सार्वजनिक होना. दूसरा, उसका संबंधित संस्थान के हर पक्ष से लगातार संपर्क और संवाद में रहना. हमारे विश्वविद्यालय जिन अमरीकी विश्वविद्यालयों की श्रेष्ठता का स्तर प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें उनकी प्रक्रियाओं में से कुछ को अपनाने में गुरेज न करना चाहिए.

अभी हम चयन समिति के गठन पर बहस नहीं कर रहे. क्या हम यह मान लें कि संस्थान का सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय, यानी कार्यपरिषद के दिमाग में उसकी भलाई नहीं है? लेकिन क्या यह संभव नहीं कि चयन समिति का हर कदम सार्वजनिक रहे? वह अपनी खोज-प्रक्रिया की घोषणा करे और हर किसी से नाम सुझाने की अपील करे? वह यह भी बताए कि कुलपति या संस्था-प्रमुख के लिए वह किन बातों को ज़रूरी मानती है. यह इसलिए कि हर संस्था दूसरे से अलग है और उसकी अपने नेता से अपेक्षा भी अलग-अलग हो सकती है. समय के अनुसार अपेक्षा भी बदल सकती है. संभव है, एक समय ऐसा नेता चाहिए हो जो परिसर में सौहार्द ला सके, कटुता और विभाजन कम कर सके; एक दूसरे समय संभव है, ऐसे नेता की आवश्यकता हो जो कुछ जड़ हो गए संस्थान को गति दे सके.

चयन प्रक्रिया में आने वाले हर नाम को भी सार्वजनिक होना आवश्यक है और उसके बारे में संस्थान से जुड़े प्रत्येक पक्ष, शिक्षक, छात्र, कर्मचारी, पूर्व-छात्र, समाज में उसके और हितैषियों की राय भी ली जानी चाहिए. प्रत्येक नाम को लिए जाने का कारण भी बताया जाना आवश्यक है. इस प्रक्रिया में समय लगता ही. इसलिए चुनाव और खोज का काम कार्यरत कुलपति के पद पर रहते हुए कम से कम साल भर तक चलना चाहिए. नए व्यक्ति को चयन के बाद कार्यभार लेने से पहले संस्था के प्रत्येक पक्ष से संपर्क और विचार-विमर्श का समय भी मिलना चाहिए. पिछले कुलपति के साथ उसे कम से कम तीन महीने काम करने का वक्त मिलना चाहिए जिससे उसे मालूम हो सके कि संस्था के सामने किस तरह की चुनौती है. इससे निरंतरता भी बनी रहेगी. इस पर किसी को हैरानी नहीं होती कि जो भी नया प्रमुख आता है, उसे बताने वाला कोई नहीं होता कि यहाँ क्या चल रहा है और क्या बदलना है.

राष्ट्रपति को भी तीन या चार नामों का विकल्प क्यों चाहिए? राष्ट्रपति की जगह संस्था की कार्यपरिषद को इस पर निर्णय करना चाहिए. लेकिन तब इस निकाय की संरचना पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता होगी क्योंकि आज तो वह भी पर्याप्त जवाबदेह नहीं है. क्यों राष्ट्रपति को इतने सारे संस्थानों का प्रमुख होना चाहिए? आखिर उनसे सवाल कौन करे और कैसे?

मेरे मित्र प्रोफ़ेसर पंकज चंद्र ने एक बार कहा कि प्रत्येक संस्था में तीन या पांच बुजुर्ग भी ऐसे होने चाहिए जो नए प्रमुख के साथ कुछ वक्त गुजारें और उसे उसकी संस्कृति से परिचित कराएँ. जाहिर है, ये बुजुर्ग सिर्फ उम्र के हिसाब से नहीं, अपनी विद्वत्ता और सांस्थानिक संलग्नता के आधार पर ही चुने जाने चाहिए. परिसर में इनका सर्वमान्य होना भी आवश्यक है. भारत के संस्थानों में यह कठिन है लेकिन अभी भी हम इतने गए-गुजरे नहीं हो गए कि अपने वरिष्ठ सहकर्मियों में कुछ का उनकी अकादमिक उपलब्धियों के आधार पर सम्मान न करें और उनकी चिंता को ध्यान देने लायक न मानें. साथ ही यह भी कहना पड़ेगा कि यह सम्मान और अधिकार अर्जित करना पड़ता है. दुर्भाग्य यह है कि प्रायः गैर अकादमिक कारणों से अलगाव इतना बढ़ जाता है कि किसी भी तरह की पेशेवराना पहचान ऊपर हो ही नहीं पाती.

एक गलत नेता के चुनाव का खामियाजा सिर्फ उसके रहने तक नहीं होता. उसके द्वारा हुई क्षति की भरपाई करने में नए नेता को काफी समय और श्रम देना होता है.

क्या यह करना कठिन है? उससे बड़ा सवाल है कि क्या यह ज़रूरी है? अगर हाँ, तो इसका प्रयोग कहीं से भी शुरू किया जा सकता है .आखिरकार अगर हमें अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा चाहिए तो उसी स्तर के मानक और प्रक्रिया भी चाहिए. आखिर यह कितना बुरा लगता है कि संस्था अपने प्रमुख को प्रसन्नता के साथ नए काम या नए दायित्व के लिए विदा भी नहीं कर सकते और उस बेचारे को खुद ही अपने विदाई के इंतजामात करने पड़ते हैं! जाते समय क्यों वह अपने संस्था के सदस्यों से सम्मान से मिल भी नहीं पाता? उसके जाने पर अफ़सोस से अधिक कटुता का अहसास ही क्यों बचा रहे? किसी प्रमुख के पांच साल बिताने पर उसके जाने की खबर पर अगर संस्था में लड्डू बाँटे जाएँ  या पटाखे छूटें तो यह सिर्फ उसी पर प्रतिकूल टिप्पणी नहीं.

(यह पहले सत्याग्रह वेबसाईट पर शुक्रवार 8 जनवरी को छप चुका है:http://www.satyagrah.com/india/jnu-du-vice-chancellors-faulty-selection-process/)

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