उदारता की ईमानदारी:प्रसंग गुलाम अली का

कोलकाता में खचाखच भरे स्टेडियम ने गुलाम अली को गाते सुना. वे वहाँ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के न्योते पर गए थे.यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह कार्यक्रम पठानकोट काण्ड के फौरन बाद हुआ और राष्ट्रवादी क्षोभ के कारण रोका नहीं गया.गुलाम अली ने कहा कि कुछ वक्त पहले अपने समानधर्मा जगजीत सिंह की याद में मुंबई में उनके गायन के कार्यक्रम के न होने की तकलीफ इससे कुछ कम हो गई है.

केरल में भी गुलाम अली का सरकार ने स्वागत किया. उनका गायन भी हुआ. कार्यक्रम स्थल के बाहर गुलाम अली के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ लेकिन इस वजह से उसे स्थगित नहीं किया गया.

हम जानते हैं कि बिहार में भी गुलाम अली गा पाएँगे और शायद उत्तर प्रदेश में भी. इससे एक राहत यह मिलती है कि भारत में अभी भी इंसानियत के लिए गुंजाइश बची है जो उदारता के बिना संभव नहीं.

मुंबई में देवेन्द्र फड़नवीस की सरकार क्यों गुलाम अली के गायन का कार्यक्रम करवाने में असमर्थ रही और क्यों ममता बनर्जी की या ओमान चंडी की सरकारें इसे करवा सकीं?क्या इसका कारण महाराष्ट्र सरकार की विचारधारात्मक रूप से राष्ट्रवादी बाधा है जिसने उस राज्य के बल का प्रयोग करने की प्रेरणा भी न दी जिसके सहारे बहुत सारे अलोकप्रिय लेकिन आवश्यक काम सरकार करवा लेती है?वह क्यों लोकप्रिय राष्ट्रवादी मत की आशंका में पहले ही झुक गई?जिसे राज्येतर सत्ता कहते हैं, उसने कैसे महाराष्ट्र में राज्य को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया?और क्या यह राष्ट्रवाद, जिसका दबाव मुंबई में देखा गया, जो कि पाकिस्तान से द्वेष या घृणा से बनता है,बंगाल में नहीं के बराबर है?

क्या ममता बनर्जी को राष्ट्रवादी मत अगले चुनाव में नहीं चाहिए? या ओमान चंडी को? वह भी तब जब भारतीय जनता पार्टी केरल में एक आक्रामक प्रचार में जुट गई है? वे इतना निश्चिन्त कैसे हैं? क्या वहाँ राष्ट्रवादी मत कमजोर है?या क्या इन दो राज्यों की सरकारें अपना संवैधानिक दायित्व निभाने को लेकर सजग हैं और उसपर किसी राज्येतर दबाव को वे बर्दाश्त नहीं करेंगी, इसकी गारंटी है?

इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि राज्यों को इस उदारता के लिए आपस में प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्द्धा करनी चाहिए.उसने इसे आर्थिक उदारीकरण की एक शर्त या उसके एक परिणाम के तौर पर भी पेश किया है.आर्थिक उदारीकरण से वैचारिक उदारता का सीधा रिश्ता नहीं, बल्कि देखा गया है कि जो आर्थिक उदारीकरण को लेकर जितना ही दृढ़ संकल्प है,वह वैचारिक रूप से उतना ही अनुदार और राष्ट्रवादी है.यह तर्क किंचित उपयोगितावादी भी है. वैचारिक उदारता या खुलापन आर्थिक उदारीकरण के लिए या पूंजी के संचरण के लिए एक स्वस्तिकर वातावरण पैदा करेगा, इसलिए वांछित है,यह त्रुटिपूर्ण तर्क है.क्योंकि अक्सर देखा गया है कि कट्टरता पूँजी के लिए बाधा नहीं बनती.राष्ट्रवादी कट्टरता तो कतई नहीं.चीन का राष्ट्रवाद इसका उदाहरण है.

बंगाल की उदारता पर उत्साहित होने के पहले लेकिन हमें कुछ सावधानी बरतनी चाहिए.क्या यह बंगाल के स्वभाव का एक परिणाम है? क्या सरकार इस मूल्य की रक्षा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है? और क्या एक ऐसे राज्य में,जहाँ हिंसा सामाजिक और राजनीति स्वभाव का निर्माण करती है,यह उदारता असंगत और इसलिए मनमानी नहीं है?

क्या यह विडंबना नहीं कि जो कोलकाता अभी भी बांग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन को दिल्ली से वापस नहीं बुला सका,वह गुलाम अली के लिए बाँहें फैलाए खड़ा दीखा?यह सरकार कह सकती है कि उसके शासनकाल में तसलीमा को बंगाल से निकाला नहीं गया था.लेकिन यह भी उतना ही सच होगा कि सत्तारूढ़ होने और बंगाल के लगभग हर सामाजिक क्षेत्र पर पूरा दबदबा कायम कर लेने के बावजूद ममता बनर्जी की सरकार ने यह साहस नहीं दिखाया जो वाम मोर्चे की कायरता का जवाब हो.

तसलीमा नसरीन को कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के दबाव में कोलकाता छोड़ने को मजबूर कर दिया गया था,बल्कि वह एक शर्मनाक दृश्य था कि एक शरणार्थी लेखक को सरकार तकरीबन खदेड़कर राज्य से बाहर कर रही थी.इसे लेकर बंगाल के सभी दलों में मतैक्य नज़र आता है और ममता बनर्जी और हर मामले में वाम मोर्चे से भले ही अलग हों, इस प्रसंग में वे ठीक वैसी ही हैं.

भारतीय जनता पार्टी तसलीमा नसरीन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चिंतित जान पड़ती है लेकिन वह कोई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल्य को लेकर उसकी किसी प्रतिबद्धता के कारण नहीं, यह हम जानते हैं.उसके निकट मकबूल फ़िदा हुसेन या वेंडी डोनिगर या एक.के.रामानुजन की अभिव्यक्ति पाबंदी के योग्य ही है.गर इनमें से किसी की पिटाई हो रही हो तो उसके नेता उसे जनभावना की अभिव्यक्ति कहकर जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं. उनके निकट तो मोहम्मद इखलाक पर हमला भी जन भावना की एक अभिव्यक्ति थी,जैसे उन्होंने बाबरी मस्जिद के ध्वंस, गुजरात में मुसलमानों पर हमले और इन सबके पहले उनके प्रमुख नेता नानाजी देशमुख ने सिखों पर हमले को हिन्दुओं की भावना की किंचित उग्र,लेकिन समझ में आनेवाली अभिव्यक्ति बताया था.

यहाँ यह कहने की कोशिश नहीं की जा रही कि चूँकि बंगाल सरकार तसलीमा नसरीन के मामले में साहस नहीं दिखा सकी, गुलाम अली का उसका स्वागत नकली है और उसका कोई  मूल्य नहीं है. इतना ही समझना ज़रूरी है कि यह किसी सैद्धांतिक निर्णय के चलते हुआ हो,यह नहीं लगता. दूसरे यह कि बंगाल में आज जो आम तौर पर हिंसा का माहौल है जिसमें सत्ताधारी दल किसी भी विरोधी या प्रतिपक्षी विचार या दल को खड़ा रहने देने को भी तैयार नहीं, उसमें गुलाम अली को लेकर उसका उत्साह किसी जनतांत्रिक मूल्य की रक्षा या श्रेष्ठता की घोषणा से अधिक सिर्फ यह जतलाने का तरीका लगता है कि मैं चूँकि ताकतवर हूँ, कुछ भी कर सकती हूँ.

ममता बनर्जी ने ठीक ही साबित किया कि राज्य यदि ठान ले तो संवैधानिक प्रतिज्ञाओं को पूरा करना कठिन नहीं.यह और सरकारें क्यों नहीं कर सकतीं?

सरकार के साथ राजनीतिक दलों को इसपर विचार करना होगा कि यदि उन्होंने वैचारिक उदारता को न्यूनतम सहमति योग्य मूल्य के रूप में स्वीकार नहीं किया,तो उनमें से हर किसी पर खतरा मंडराता रहेगा.इस बात को वाम मोर्चे से अधिक अच्छी तरह और यंत्रणापूर्वक और कौन समझ सकता है?ताकत के बारे में यह समझना ज़रूरी है कि अलग-अलग समय यह अलग-अलग कारणों से हाथ बदल सकती है. उसे यह मनमाने ढंग से तय नहीं करना चाहिए कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं.

इन सबके साथ जो अनुदारता का सबसे बड़ा स्रोत और आधार है, उसकी गंभीरता से इनकार करना आत्मघाती होगा.वह है राष्ट्रवाद.वह अन्य से घृणा के बिना जब जीवित न रह सके तो उसकी दयनीयता में संदेह नहीं रह जाता.भारतीय राष्ट्रवाद को अभी कई अंदरूनी लड़ाइयाँ लडनी हैं और कई प्रश्नों के जवाब देने हैं.अगर खुद को साबित करने के लिए उसे नफरत को बुनियाद बनाना पड़ा, तो वह अपने निर्माण के संघर्ष से धोखा करेगा.बंगाल और केरल ने रास्ता दिखाया है कि घृणा के बिना भी राष्ट्रवाद की संभावना है.क्या इसे और कायदे से और ईमानदारी से समझा जाएगा?

( सत्याग्रह पर पहली बार 15 जनवरी को  प्रकाशित स्तंभ http://www.satyagrah.com/politics/west-bengal-mamta-banerjee-ghulam-ali-taslima-nasreen/ का परिवर्द्धित रूप )

One thought on “उदारता की ईमानदारी:प्रसंग गुलाम अली का

  1. K SHESHU BABU

    The other States are affected by the desease of ‘intolerance’. The cure in Gulam Ali’s words:
    ‘Dua tu kar aisi davaa
    Beemaar hoe achchaa teyraa
    Kuchney kahaa yeh chaand hai
    Kuchney kahaa chehraa teraa….’

We look forward to your comments. Comments are subject to moderation as per our comments policy. They may take some time to appear.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s