माँ, तुझे सलाम! कविता कृष्णन

अतिथि पोस्ट : कविता कृष्णन

“Scout,” said Atticus, “nigger-lover is just one of those terms that don’t mean anything—like snot-nose. It’s hard to explain—ignorant, trashy people use it when they think somebody’s favoring Negroes over and above themselves. It’s slipped into usage with some people like ourselves, when they want a common, ugly term to label somebody.”

“You aren’t really a nigger-lover, then, are you?”

“I certainly am. I do my best to love everybody… I’m hard put, sometimes—baby, it’s never an insult to be called what somebody thinks is a bad name. It just shows you how poor that person is, it doesn’t hurt you.” (To Kill A Mockingbird, Chapter 11)

‘Now, there is a long and honourable tradition in the gay community and it has stood us in good stead for a very long time. When somebody calls you a name – you take it. And you own it.’ (Pride, 2014)

‘टू किल अ मॉकिंगबर्ड’ उपन्यास 1950 के दशक के अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में नस्लवाद की कहानी है. उसमें एक वकील जिनका नाम एटिकस है, एक काले नस्ल के आदमी की पैरवी करते हैं जिस पर बलात्कार का गलत आरोप लगाया गया है. एटिकस की 8 साल की बेटी स्कौट कहती है की गाँव के लोग कह रहे हैं कि मेरे पिताजी ‘हब्शी-प्रेमी’ है. वह पूछती है कि इसका क्या अर्थ है, सुनकर लगता है कोई गाली है, जैसे किसी ने मुझे ‘बन्दर’ कहा हो, पर इसका क्या मतलब है?

‘टू किल अ मॉकिंगबर्ड’ में जब एटिकस को ‘nigger-lover’ (‘हब्शी-प्रेमी’) कहा जाता है 

एटिकस कहता है, ‘स्कौट, ‘हब्शी-प्रेमी’ ऐसा एक लफ्ज़ है जो अर्थहीन है, जैसे ‘बन्दर’ – जाहिल, बेकार लोग ऐसा कहते हैं जब उन्हें लगता है की कोई काले लोगों को सर पर चढ़ा रहा है. लोग उसका इस्तेमाल करने लगे हैं, जब वे किसी को गाली देकर तुच्छ दिखाना चाहते हैं.’

स्कौट पूछती है, ‘तो तुम सचमुच हब्शी-प्रेमी तो नहीं हो न?’

एटिकस जवाब देते हैं, ‘क्यूँ नहीं? मैं तो कोशिश करता हूँ सबसे प्यार करूँ. … कैसे समझाऊँ? बच्ची, जब हमें कोई गाली देता हो तो इसमें हमें कभी अपमानित नहीं महसूस होना चाहिए. ये तो हमें दिखता है की गाली देने वाला कितना कमज़ोर है, इससे हमें कोई चोट नहीं पहुँचती.’

2014 में बनी फिल्म ‘प्राइड’ में लन्दन में समलैंगिक लोगों का संगठन 1984 के ब्रिटेन के गांवों के हड़ताली कोयला मजदूरों का साथ देते हैं. अखबार में उन्हें विकृत (pervert) कहते हुए लेख छपता है. तब समलैंगिक कार्यकर्ता मार्क ने कहा, ‘अच्छा, समलैंगिक समुदाय में एक लम्बी और सम्मानजनक परंपरा है जिसने हमारा खूब साथ दिया है – जब कोई तुम्हें गाली देता हो, तुम पर ठप्पा लगता हो – तो उस गाली को गर्व से अपना लो, अपनी ताकत बना लो!’ मार्क कहता है की अखबार में ऐसा लेख तो हमारे लिए विज्ञापन का काम करेगा. इससे पहले समलैंगिक लोग हड़ताली खदान मजदूरों के समर्थन में ‘Perverts Support The Pits’ नाम से बेहद सफल संगीत का कार्यक्रम करके खूब चंदा जुटा चुके हैं.

‘प्राइड’ फिल्म से एक दृश्य

भारत में दलित आन्दोलन में भी कुछ ऐसी ही परंपरा रही है – जहाँ दलितों ने कहा, ‘तुम हमें पद-दलित करके नीचा बताते हो, हम गर्व से खुद को दलित कहेंगे.’

महिला मुक्ति के आन्दोलन में भी ऐसा हुआ है. कनाडा के एक पुलिस अफसर ने जब एक बलात्कार पीडि़ता को ‘रंडी’ (slut) कहा तो उस पुलिस वाले की कोशिश थी हमें बताने की, कि ‘बलात्कार का आरोपी निर्दोष है, एक बेशर्म, बेहया रंडी का आखिर बलात्कार कैसे संभव है’. पर इसके जवाब में पहले कनाडा और फिर पूरी दुनिया में महिलाएं सड़क पर ‘slut-walk’ (‘रंडी-रैली’ या ‘बेशर्मी मोर्चा’) में उतर गयीं.

टोरंटो में ‘slut-walk’ (‘रंडी-रैली’ या ‘बेशर्मी मोर्चा’) 

मोर्चे पर महिलाओं ने कहा कि हम सब इस ‘गाली’ को गर्व से अपनाती हैं, ताकि पितृसत्ता के रखवाले हम महिलाओं को ‘रंडी’ और ‘सती-सावित्री’ में बाँट न पाए, बलात्कार पीड़ितों को इस तरह शर्मिंदा कर ही न पाए. अगर एक महिला को बेहया कहते हो, तो हर महिला उस का साथ देते हुए कहेगी की ‘हम सब बेहया हैं’.

हाल में हमारे देश में जो कुछ हो रहा है, वहां इन उदाहरणों को याद रखना ज़रूरी हो गया है.

JNU और जादवपुर यूनिवर्सिटी की लड़कियों पर ‘फ्री सेक्स’ का ‘आरोप’ लगाया जा रहा है. भाजपा नेता दिलीप घोष कहते हैं कि जादवपुर की छात्राएं ABVP के लोगों पर यौन उत्पीड़न का आरोप कैसे लगा सकती हैं – ‘ऐसी बेहया लड़कियों का भला यौन उत्पीड़न कैसे संभव है? अगर वे उत्पीडि़त नहीं होना चाहती, तो यूनिवर्सिटी में पढ़ने क्यूँ गयीं, आन्दोलन करने क्यूँ गयीं? चुप चाप घर क्यूँ नहीं बैठीं?’

बलात्कार कानून या जुवेनाइल जस्टिस कानून पर TV चैनल पर बहस में, जब भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी के पास मेरे तर्कों का जवाब नहीं बचता है, तो वे गाली पर उतर आते हैं और मुझे अकसर ‘नक्सल जो फ्री सेक्स करती है’ कह चुके हैं.

अब सवाल यह है कि इस गाली का क्या जवाब हो? मुझसे किसी ने पूछा, ‘आप कह क्यूँ नहीं देती, की मैं नक्सली नहीं हूँ?’ कई लोग मुझसे कहते हैं, ‘JNU की महिलाएं, नारीवादी या वामपंथी महिलाएं, फ्री सेक्स नहीं करती हैं, ये बताना ज़रूरी है.’ ऐसे सलाह सुनकर मुझे कुछ ऐसा लगता है, जैसे एटिकस को लगा जब बेटी स्कौट ने पुछा, ‘पापा पर तुम सचमुच ‘हब्शी-प्रेमी’ तो नहीं हो न?’ ऐसी गलियों में जो विष है, उसे सहर्ष, गर्व से स्वीकार लेने और पी लेने से ही इन्हें पराजित किया जा सकता है.

‘नक्सली’ शब्द का आखिर अर्थ क्या है? जब सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग उसे गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं तो वह ‘बन्दर’ की तरह ही बचकाना और अर्थहीन गाली है. वे कहना चाहते हैं कि मेरे जैसे लोगों के तर्क को मत सुनो क्यूँ कि ये ‘नक्सली’ हैं, आतंकवादी हैं. पर ‘नक्सली’ शब्द ‘नक्सलबाड़ी आन्दोलन’ से उपजा है, जो स्वतंत्रता संग्राम के समय के पुन्नाप्रा वायलार, हूल, और तेलंगाना के महान किसान-आदिवासी विद्रोहों की परंपरा में ही एक क्रांतिकारी विद्रोह था. नक्सलबाड़ी गाँव के गरीब आदिवासी; कोलकाता शहर के युवक-युवतियां जिन्होंने शहादत दी, पुलिस की गोलियों से या जेलों में प्रताड़ना से मारे गए, ‘आतंकवादी’ नहीं थे.

‘मुक्त होगी प्रिय मातृभूमि, वो दिन दूर नहीं आज’ – नक्सलबाड़ी आन्दोलन से संबंधित एक गीत

उनके होंठों पर मुक्ति गीत था  – ‘मुक्त होगी प्रिय मातृभूमि, वो दिन दूर नहीं आज … महान भारत की जनता महान, भारत होगा जनता का’. कम्युनिस्ट विचारधारा से, भाकपा माले की विचारधारा से इत्तेफाक रखें चाहे न रखें, क्रान्ति और मुक्ति के इस सपने का सम्मान करने वाले इस देश में हमेशा पाए जायेंगे. और इसलिए ‘नक्सली’ कहलाने में मुझे कोई शर्म नहीं; मेरा सवाल सिर्फ यह है कि मौजूदा बहस से भागने के लिए अगर आप ‘नक्सली’ या ‘फ्री सेक्स’ को गाली की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, तो इसमें आपकी पराजय, आपकी हताशा ही झलकती है.

याज्ञवल्क्य जब गार्गी से बहस में पराजित हो गये तो उन्‍होंने कहा ‘गार्गी चुप हो जाओ वर्ना तुम्हारा सर गर्दन से अलग होकर गिर पड़ेगा. ज्यादा सवाल मत करो, गार्गी!’ आजकल की राजनैतिक बहसों में महिलाओं के तर्कों और सवालों को चुप कराने के लिए ‘फ्री सेक्स’, ‘रंडी’ आदि गालियों का कुछ ऐसा ही इस्तेमाल होता है. किसी महिला के तर्कों का अगर कोई तर्कपूर्ण जवाब न हो, तो विषय बदलकर उसके चाल-चलन-चरित्र, उसके रंग-ढंग, उसके निजी जीवन/सेक्स-लाइफ, उसके चेहरे या शरीर आदि पर टिप्‍पणी और गाली-गलौज शुरू हो जाती है. लेकिन गार्गी की बेटियों ने – आज की भारतीय महिलाओं ने – सर के गिर जाने का, शर्म-हया पर धब्बा लगने का, ‘फ्री-सेक्स-करने-वाली’ कहलाने का डर छोड़ दिया है. मेरे निजी जीवन में तुम्हारा क्या काम है? मेरे राजनीतिक विचारों से बहस करना हो तो करो – पर मेरे चरित्र, मेरे शरीर, मैं बदसूरत हूँ या नहीं, इन सब पर चर्चा को मोड़ोगे, तो मैं तो चुप नहीं हो जाऊंगी, पर सब समझ जायेंगे की तुम बहस में हार गए हो.

‘फ्री सेक्स’ लफ्ज़ भी एक बिलकुल अर्थहीन गाली है, जो पुरुषों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होती, महिलाओं को शर्मिंदा करने के लिए ही इस्तेमाल होती है. हर किस्म का सेक्स, ‘फ्री सेक्स’ ही होता है. अगर सेक्स करने वाले लोग ‘फ्री’ होकर, अपनी सहमति से सेक्स नहीं कर रहे हैं, अगर उनपर किसी भी किस्म का दबाव हो, उन पर किसी किस्म का बंधन हो, तो वह सेक्स ‘सेक्स’ नहीं, ‘रेप’ – बलात्कार – कहलाता है. शादी के भीतर पति पत्नी के बीच हो, चाहे किन्ही भी दो लोगों के बीच हो, सेक्स के लिए ‘फ्री’ होना, मुक्त और सहमत होना एक अनिवार्य शर्त है. इसलिए ‘फ्री सेक्स’ जैसी गाली से हम भला क्यूँ घबराएँ?

‘फ्री सेक्स’ का आरोप राजनीतिक बहस में किसी मर्द के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल क्यूँ नहीं होता है? क्यूंकि यह माना जाता है कि मर्द को फ्री होने का अधिकार हैं. महिलाओं को बंधन में रखने वाले लोग ही तो ‘फ्री’ महिलाओं से घबराते हैं.

दरअसल संघी विचारधारा के लोग – और हर विचारधारा के पितृसत्तात्मक लोग – मुक्त यानि ‘फ्री’ महिलाओं से, लोगों से डरते हैं. वे डरते हैं कि जाति-धर्म के, लिंगभेद के, नस्लवाद के, नफरत के बंधनों को तोड़, लोग प्यार करने लगेंगे तो हमारी सत्ता का क्या होगा? गोरख की कविता से उधर लें तो ‘वे डरते हैं/ कि एक दिन/’ महिलाएं उनसे, उनकी गालियों से ‘डरना बंद कर’ देंगी … रंडी, बेशर्म, बेहया, फ्री सेक्स करने वाली कहलाने से डरना बंद कर देंगी…

मैं अपनी माँ और अपने पिता को तहे दिल से शुक्रिया करना चाहती हूँ कि उन्होंने बचपन से ही मेरे भीतर इस डर को पैदा होने ही नहीं दिया, ‘नारी-सुलभ-शर्म’ या ‘शुचिता’ के कांसेप्ट का मज़ाक उड़ाकर अपनी बेटियों से मुक्त गगन में उड़ान भरने को कहा, सर उठाकर जीने को कहा.

 हिंदुत्व कट्टरपंथियों द्वारा संपादित कविता कृष्णन के विकिपीडिया पेज का एक अंश
हिंदुत्व कट्टरपंथियों द्वारा संपादित कविता कृष्णन के विकिपीडिया पेज का एक अंश

और इसलिए, जब सोशल मीडिया पर लोग मेरी माँ या मेरे पिता के ज़रिये मुझे शर्मिंदा करना चाहते हैं, जब वे पूछते हैं की ‘तेरी माँ जानती भी है की तेरे पिता कौन हैं’; ‘तेरी माँ फ्री सेक्स करती होगी’, आदि तो मेरी माँ, मेरी बहन और मैं सब खूब हँसते हैं. क्यूंकि ऐसे सवाल करने वाले जानते ही नहीं कि मेरी माँ से पंगा लेकर वे किस मुसीबत को मोल रहे हैं!

हाल में ज्ञानदेव आहूजा और JNU के कुछ अध्यापकों द्वारा तैयार किये गये ‘दस्तावेज़’ में JNU में ‘सेक्स रैकेट’, ‘फ्री सेक्स’ आदि की बेहूदा टिप्पणियों के बारे में मैंने लिखा कि इन्हें सुनकर हमें सोचना चाहिए कि आखिर छात्र-छात्रों के सेक्स-लाइफ के बारे में ये लोग इतनी कल्पना क्यूँ करते हैं? किसी और के सेक्स-लाइफ के बारे में जो इतना सोचते हों, अपने दिमाग में रंगीन और बेहूदा चित्र बनाते हों, उनकी मनस्थिति के बारे में चिंता करना ज़रुरी है. जब दिलीप घोष कहते हैं कि बेहया लड़कियों का यौन उत्पीड़न होना जायज़ है, तो वे बलात्कारी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं.

मैंने कहा कि जो ‘फ्री सेक्स’ से डरते हैं उनपर हमें तरस खाना चाहिए, क्यूंकि आखिर जो सेक्स ‘फ्री’ नहीं, वह बलात्कार ही है, और कुछ नहीं है. मेरे इस बात पर मुझसे फेसबुक पर जब किसी ने पूछा कि ‘तेरी माँ या बेटी ने फ्री सेक्स किया?, तो मैंने जवाब दिया कि ‘हाँ मेरी माँ ने किया, और उम्मीद है कि आपकी माँ ने भी किया होगा, क्यूंकि जो सेक्स फ्री नहीं, वह सेक्स नहीं बलात्कार है.’

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और मेरी माँ ने उनसे कहा ‘मैं कविता की माँ हूँ, मैंने फ्री सेक्स किया, मेरे पसंद के इन्सान के साथ, जब मेरी मर्ज़ी थी – और क्यूँ नहीं?! मैंने हमेशा हर पुरुष और महिला के पूरी स्वायत्तता से सेक्स करने के अधिकार के लिए संघर्ष किया – कभी ‘अन-फ्री’ नहीं, कभी जोर-ज़बरदस्ती में नहीं. हमेशा मुक्त, हमेशा सहमति से.’

ऐसा कहकर मेरी माँ ने मेरा साथ दिया – और हर ऐसी महिला का, लड़की का साथ दिया जिसे कभी ‘सेक्स’ के नाम पर शर्मिंदा करने की कोशिश हुई हो. ऐसा कहकर मेरी माँ ने हर लड़की, हर महिला से कहा कि ‘बिंदास’, ‘फ्री’, ‘बेहया’ कहलाने में शमिन्दा होने की कोई ज़रूरत नहीं है. उल्टा उस ‘गाली’ को सहर्ष स्वीकार कर, गाली देने वाले को शर्मिंदा करना चाहिए. शर्म तो वैसे लोग करें जिन्हें लगता है कि आज़ादी मांग रही महिलाओं के साथ बलात्कार जायज़ है; कि महिलाओं को किसी बहस में चुप करने के लिए उनके सेक्स-लाइफ और निजी जीवन के बारे में कल्पनाएँ गढ़ना जायज़ है.

कविता कृष्णन की मां लक्ष्मी कृष्णन
कविता कृष्णन की मां लक्ष्मी कृष्णन

माँ की टिप्पणी का हज़ारों लोगों ने स्वागत किया. पर अब भी कुछ ऐसे लोग हैं जो मेरे फेसबुक वाल पर लिख रहे हैं की ‘ऐसी माँ-बेटी से फ्री सेक्स कौन करेगा, ये तो बलात्कार करने लायक भी नहीं हैं, इतने बदसूरत हैं’! जो लोग ऐसी टिप्पणियां लिख रहे हैं, उनसे मैं कहना चाहती हूँ: “भारत माता की जय की बात करते हो, कुछ मेरी माता से सीख लेते तो आपका ही भला होता. आप तो अपने ही बलात्कारी और बेहूदा मानसिकता का परिचय दे रहे हैं.“ इन टिप्पणियों की चर्चा करते हुए मेरी माँ ने जो sms मुझे भेजा, उसे उनकी इजाज़त के साथ यहाँ लिख रही हूँ: “इस पूरे प्रकरण में मुझे तुम्हारे पिताजी की खूब याद आ रही है (मेरे पिताजी 2010 में गुज़र गए). वे होते तो इन Lotus Louts (कमल धारी लम्पटों) को प्यार और सम्मान के बारे में कुछ सिखा देते – सिखाते कि ‘फ्री सेक्स’ गन्दा लफ्ज़ नहीं हैं अगर आपकी कल्पना गन्दी न हो.” (I really miss your father in this whole episode – he would have shown these Lotus Louts a thing or two about love and respect, and taught them that ‘free sex’ is not a dirty word unless your imagination makes it so.)

ऐसी बलात्कारी मानसिकता के लोगों से हम ‘भारत माता की जय’ कहना तो नहीं सीख सकते. पर अपनी बेबाक माँ को, जिसने हजारों बच्चों को और युवक-युवतियों को जीवन भर पढ़ाया; दो बेटियों को बेबाक, बेखौफ जीना सिखाया; जातिवाद, साम्प्रदायिकता और नस्लवाद से संघर्ष करना सिखाया; उम्र के बंधनों को तोड़ कर अपने से आधी उम्र के लोगों से दोस्ती निभायी, सलाम करती हूँ.

माँ, तुझे सलाम! लक्ष्मी कृष्णन तुझे सलाम!

कविता कृष्णन भाकपा (माले) लिबरेशन की पोलितब्यूरो की सदस्य और अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (AIPWA) की सचिव है

18 thoughts on “माँ, तुझे सलाम! कविता कृष्णन

  1. Utkarsh

    Hmmm, Let me start with few question . Please let us know your views on Prostitution do you think it should come under Free sex or its different? We all know that Free sex is important between two individual otherwise its call rape, We know this . My question is Do you support sex without marriage or before marriage , Do you also support Freesex after marriage with others whom you like.

    1. As long as two consenting adults, before, after, inside or outside of marriage freely choose to have sexual relations with each other – it is their private affair and no one should have the right to interfere.

      1. True, Shuddha, but then even our laws interfere… Sec.497/IPC
        Maybe Utkarsh will now pounce on this with an aha!! and see his way out…
        By the way, Utkarsh, Prostitution is neither free sex nor “free” sex… get it?

      2. Ram Sharma

        An interesting response. It would work extremely well in the favor of single men who have sexual relations with others’ wives. The sexually deprived husband would have the burden of supporting his wife, including the child born due to her sexual union, but the lover has none. If the wife has no income of her own, and divorce happens, she will be on street. Unfortunately, that scenario describes a major section of the Indian society. In the upper echelon of a capitalistic society, it would not matter if the lover is also married, or divorce takes place, but Communists in Russia and China have labeled it as a decadent practice. In poor labor class, there is an economic independence similar to that of the rich class. In both, free sex would create less social turmoil that in middle classes where women are not on par with the men in earnings. I should point out that the Soviet Union, in spite of decades of Communism, did not sanction free sex. And it is unacceptable in the Communist China. Now in the family in discussion here, if Kavita’s mother Lakshmi was unable to earn a living, and send Kavita to JNU, she would be forced into prostitution. That, in my opinion, would be highly degrading for a woman. Therefore, women with reasonable economic resources should not prescribe a sexual conduct which would be ruinous to less resourceful women. Most men advocate free sex for women who are not their mother, sister or daughter. And only women, and not men, bear children. Therefore, the doctrine of free sex must not be advocated without taking into consideration the welfare of less fortunate women. Kavita or Lakshmi are not one of them.

        1. Well, you are absolutely right, Mr Sharma, in pointing out the middle-class morality there and the point about economic consideration is spot on. However, there is another aspect to it with regard to tribal and downtrodden societies. In my father’s community for example, there was no real formal marriage just a few decades ago. A man and wife could settle down as per their convenience. Of course, there were rituals which were primitive and maybe formalized later on, but they were free to walk away from one another at any time. The surprising observation is that women were just as empowered as men in those times and in this particular matriarchal society it was not considered taboo, odd or shameful for women to marry several husbands. I am not saying that it is either progressive or inferior , but you can see these characteristics in a lot of tribal societies and there is very little angst or jealousy between the men and women surprisingly. But you are right, it could again be the economic condition that makes it so.
          I would not possibly say that less resourceful women have no right to make a choice, however. And I do not get that point about “women with resources …ruinous to less resourceful women”, when you have already pointed out that the middle class women are the ones more likely to be badly affected by the concept of free sex. I am afraid you might be looking at it merely from the male perspective without considering the idea that these “less fortunate women” might wish to make a choice of their own and consider their welfare in a reasonable manner?

  2. shaturya

    My respect and admiration for Kavita and her mother for their free thoughts unencumbered by patriarchal and orthodox social traditions..!!

  3. Ramesh Kumar Choubey

    हम कविता कृष्णन के उद्गार का समर्थन करते हैं ! बेवाकी से इन्होने अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है ! संघ के लोग जो दिन में भैया रात में सैंया दिन में दीदी रात में बीबी की मानसिकता वाले लोग हैं ये चरित्रहीन लोग दोहरे चरित्र को आत्मसात किये हैं !

  4. Every man related to main stream media/politics/religion/ has double standards_one set for his own personal life and another for public life.If one does not react over double entendre s _then in the way of Buddha all bad mind force goes to those who engineered those abused words and their dirty emotive vibes.

  5. kiranrao

    I cant understand what kavita maa’m want to say..is sex to be allowed in public place, is govt she want to tell don’t torcher lovers in park, moral policing is tob eavoided then already laws exists for freedom of speech and others

  6. Pingback: बलात्कारी मानसिकता के लोगों से #भारतमाताकीजय कहना नहीं सीख सकते

  7. Rajesh Upadhyay

    Kavita aur Laxmi Ji ko salaam. We really need this kind of a confident and hard hitting expression to defend the rights of women and all others. Only then the people with blind patriarchal faith will be forced to dialogue and think.

  8. Pingback: कविता और फ्री सेक्स – capankajblog

  9. बहुत बढ़िया, सच में जो डर जाता है या सच्चाई से भागता है तो वह ऐसे ही गाली देकर चुप कराने का प्रयास करता है-

  10. वो तुम्हे एन्टी हिन्दू या एन्टी नेशनल जो भी कहे ।सच क्या है मैं जानना नही चाहता।क्योंकि मैं जानता हूँ तुम वो स्त्री हो जिसकी समाज को जरूरत है खासतौर से भारतीय स्त्रियों को।तुम्हे गालियां देने वाले ये अच्छे से जाहिर कर चुके हैं कि वो एक स्त्री को कितना सम्मान देतें है।

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