सात-वर्षीय विश्वविद्यालय का हाल-ए-दिल: युगांधर

GUEST POST by YUGANDHAR

2009 ई. में भारत सरकार ने देश के उन राज्यों में एक-एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जहाँ पहले से कोई केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं था | इसी प्रक्रिया में बिहार में भी एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई | तत्कालीन केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच प्रस्तावित विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर को लेकर खींचातानी शुरू हुई | लगभग तीन साल की कशमकश के बाद यह फैसला हुआ कि बिहार में दो विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएँगे | इसकी भी औपचारिकताएँ पूरी करते-करते सन् 2014 आ गया | कुल मिलाकर यह कि गंगा नदी के उस पार मोतिहारी में ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय’ और गंगा के इस पार गया जिला के पंचानपुर-दरियापुर में ‘दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय’  की स्थापना का निर्णय लिया गया |

चूँकि ‘दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय’ स्थायी परिसर गया में बनना था इसलिए तत्कालीन कुलपति ने 2013 ई. में कुछ विषयों की पढ़ाई गया में आरंभ की | जुलाई 2013 ई. से नए सत्र की शुरुआत हुई | मार्च 2014 ई. में संस्थापक कुलपति का कार्यकाल समाप्त हो गया | भारत सरकार की लेटलतीफी के कारण लगभग डेढ़ साल यह विश्वविद्यालय प्रभारी कुलपति के सहारे चलता रहा | अभी आलम यह है कि कुछ विषयों का पठन-पाठन  पटना में और कुछ विषयों का अध्ययन-अध्यापन  गया में किराए की जगह में चल रहा है | विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर के निर्माण का काम भी चल रहा है | 

जुलाई 2013 ई. में चार वर्षीय बी.ए. – बी. एड. और बी. एस.सी. – बी. एड. का एकीकृत पाठ्यक्रम भी शुरू किया गया | विश्वविद्यालय के अधिकारी यह बताते हैं कि यह मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली के दबाव के कारण करना पड़ा क्योंकि वहाँ से लगातार शिक्षा केंद्र स्थापित करने का निर्देश मिल रहा था | भारत की उच्च शिक्षा की विचित्रताओं में यह भी एक विचित्र बात है कि नए कोर्स खोलने का निर्देश जो संस्था देती है वह उसे मान्यता देने का अधिकार नहीं रखती | जैसे बी.ए. – बी. एड. और बी. एस.सी. – बी. एड. के उक्त कोर्स की मान्यता ‘राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्’ से प्राप्त होती है | न केवल जुलाई 2013 ई. से शुरू बल्कि 2014 ई. में भी जो सत्र जारी हुआ उसे भी ‘राष्ट्रीय अध्यापकशिक्षा परिषद्’ से मान्यता नहीं प्राप्त हुई है | फल यह है कि विद्यार्थी अपने-आप को ठगा महसूस कर रहे हैं | उन्हें अपने भविष्य की चिंता है | विश्वविद्यालय प्रशासन बार-बार पूछने पर यही बताता है कि ‘मान्यता प्राप्त करने की प्रक्रिया’ चल रही है | धीरज रखिए | परिणाम सुखद होंगे | यह आशावाद अंतहीन बनता जा रहा है और विद्यार्थियों ने अपना आंदोलन आरंभ कर दिया है |

अब एक दूसरे कोर्स का हाल सुनिए | 2015 ई. में बी. वॉक. (कला –शिल्प) का तीन वर्षीय कोर्स आरंभ किया गया | इस बार गरमी की छुट्टियों के बाद विश्वविद्यालय खुला और उन विद्यार्थियों को यह कहा गया कि आप के कोर्स में साल भर के बाद ‘डिप्लोमा’ ग्रहण कर कोर्स को छोड़ देने का भी प्रावधान है | विश्वविद्यालय इस कोर्स को तीन साल तक चलाने में असमर्थ है | आप चाहें तो विश्वविद्यालय के किसी दूसरे पाठ्यक्रम में भी आप दाखिला ले सकते हैं |

अब एक तीसरे कोर्स का बयान | इसी वर्ष(2016 ई.) विश्वविद्यालय ने एम.एड. का पाठ्यक्रम आरंभ किया | पचास विद्यार्थी इसमें नाम लिखा सकते हैं | लगभग 49 विद्यार्थियों ने नामांकन कराया | कल यानी 25 जुलाई 2016 ई. को उनका पहला ‘क्लास’ था | पहले ‘क्लास’ में ही उन्हें यह सूचना दी गई कि आप के कोर्स को स्थगित किया जा रहा है और जब कभी भी यह शुरू होगा आप को पहली प्राथमिकता के आधार पर मौक़ा दिया जाएगा |

ऊपर अत्यंत  संक्षेप में विश्वविद्यालय के अकादमिक जगत का हाल लिखा गया है | बाकी आधारभूत सुविधाओं का हाल और बुरा है | अभी विश्वविद्यालय में सुबह आठ बजे से शाम छ बजे तक कक्षाएँ संचालित हो रही हैं | ऐसा इसलिए कि किराए के मकान में कमरों की संख्या कम है और पाठ्यक्रमों की संख्या अधिक | ऊपर से तुर्रा यह कि ‘बायोमेट्रिक’ पद्धति से उपस्थिति दर्ज करने की बात चल रही है | एक-एक टेबुल-कुर्सी और एक कंप्यूटर या लैपटॉप लेकर एक साधारण लंबाई-चौड़ाईवाले कमरे में चौदह शिक्षकों के बैठने की व्यवस्था है | बार-बार शोध, प्रकाशन और ‘प्रोजेक्ट’ पर जोर दिया जाता है पर यह कभी समझा ही नहीं जाता कि इन कामों के लिए पर्याप्त समय, सुविधा और सहयोग की जरूरत होती है | किसी विषय में छात्र कम हैं तो शिक्षकों को कहा जाता है आप सोचिए कि विद्यार्थी क्यों कम हैं |जैसे विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना शिक्षकों का काम हो !  पाठ्यक्रम की गुणवत्ता का पैमाना यह है कि किस कोर्स में कितने अधिक नामांकन हुए ? शिक्षकों की बैठक में आला अधिकारी इस विश्वविद्यालय को विश्वस्तरीय बनाने का सपना दिखाते रहते हैं | आलम यह है कि पीने के पानी पर भी संकट आ जाता है | 2013-14 ई. में विश्वविद्यालय के  गया परिसर में नामांकित विद्यार्थियों के लिए जो छात्रावास(छात्र-छात्रा) किराए पर लिया गया था वही आज तक ज़ारी है | अभी विद्यार्थियों की कुल संख्या और छात्रावासों में उपलब्ध जगहों का अनुपात बहुत ही असामान्य है | वहाँ मेस की सुविधा भी नहीं है | गया परिसर में आज की तारीख में लगभग 700 विद्यार्थी  हैं |

मात्र सात साल पुराने विश्वविद्यालय की व्यवस्था का यह नमूना है | सभी समस्याओं को यह कह कर झेलने की सलाह दी जाती है कि ‘स्थायी परिसर’ में सब कुछ अच्छा होगा | ध्यान से देखा जाए तो दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय की वर्तमान स्थिति भारत की उच्च शिक्षा का हाल और विश्वविद्यालय प्रशासन के नजरिए को सामने लाती है | बी.ए.-बी.एड. और बी.एस.सी. – बी.एड. के जो विद्यार्थी आंदोलन कर रहे हैं  उन्होंने भरोसा कर लगभग तीन साल तक इंतज़ार किया | उनके सामने एक शिक्षक किस मुँह से जाए ? क्या एक शिक्षक की लाचारी इतनी बढ़ गई है कि वह विद्यार्थियों के तमाम हितों पर मौन साधे रहे ? क्या शिक्षक सिर्फ़ और सिर्फ़  और दूसरी नौकरियों की तरह एक नौकरी है ? ऊपर एम.एड. का जो वाकिया बताया गया है वह किसी भी शिक्षक की शांति भंग नहीं कर देगा ? बताइए ? पढ़ाई शुरू होने के पहले ही दिन कोर्स के स्थगन की सूचना ? क्या बीती होगी उन विद्यार्थियों पर ? उनके अभिभावकों पर ? गया जैसे कम सुविधाओंवाले शहर में दूर-दराज से आकर उन्होंने जो रहने की तैयारी की होगी उस प्रयास का क्या ? उन्हें सीधे कह दिया गया कि आप ने दाखिला के लिए जो पैसा दिया वह चाहे तो आप लौटा ले सकते हैं | जुलाई का महीना लगभग बीत चुका है | अब उन्हें नई संस्था में दाखिला मिलने की  संभावना न के बराबर है |

इस रिपोर्ट के छपते-छपते खबर यह है कि बी एड के आंदोलनकर्ता छात्रों को डरा-धमकाकर उनका आन्दोलन खत्म  कराया जा रहा है| गया और दिल्ली में दूरी बहुत है|यह जे एन यू भी नहीं कि मीडिया का ध्यान जाए |

 

 

 

4 thoughts on “सात-वर्षीय विश्वविद्यालय का हाल-ए-दिल: युगांधर

  1. sharma

    yahi haal central university jharkhand ke BA B Ed course ka bhi or central university haryana me hostel ke ek room 4 scholar/student ko rahne ka bhi nirdesh hua hai. fees bhi vayapak gati se bad rahi kuch central university me to ye pichle saat saalo me teen guna ho gayi hai.

  2. K SHESHU BABU

    Sarakar ko padhna aur padhaana achaa nahi lagta hai … jitna unpadh utna behtar …!
    Yeh ‘ make in india’ ki samskaran hai….

  3. राकेश रॉय

    इस लेख में व्याप्त जानकारी और स्व-अनुभाव के साथ मैं यह कह सकता हूँ, की स्थिति चिंता जनक जरूर है, परन्तु हमें निराश नही होना चाहिए अभी…

    थोड़ा सा समय सभी को मिलना चाहिए…
    और जिन विद्यार्थियो के साथ ऐसी घटनायें घटी, उसके लिए विश्वविद्यालय से ज्यादा जिम्मेवार वो सम्बधित विभाग है. जो। की।किसी भी।कोर्स को शुरू या बंद (मान्यता देने के सम्बन्ध में) करने का निर्देश बिना जाने और सोचे विश्वविद्यालयो को देता है।

  4. kumar Varun

    बहुत ही भयावह स्थिति से आपने साक्षात्कार कराई।सर्वप्रथम आप बधाई के पात्र है,क्योंकि आज शिक्षक अपनी समस्या को लेकर चिंतित परंतु छात्रों के लिए नहीं।आप की तरह संवेदनशील शिक्षक की हमें जरूरत है ,जो छात्र-हित के बारे में सोचते हैं

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