भारत को पाकिस्तान बनने की राह पर धकेल रहे कट्टरपंथी

अठारह साल की एशम और उसकी बहन ईशा हर महीने दो बार मुल्तान जेल पहुंचती हैं, ताकि अपनी मां से मिल सकें। उनकी मां आसिया बीबी फिलवक्त पाकिस्तान के विवादास्पद ईशनिंदा कानून के तहत सजा-ए-मौत का इंतजार कर रही है। इस मामले में उसकी अंतिम अपील सुप्रीम कोर्ट के सामने है। ननकाना साहिब के लिए मशहूर पाकिस्तान के शेखपुरा जिले के इत्तनवाली गांव की रहने वाली आसिया बीबी (उम्र 50 वर्ष) पर ईशनिंदा के आरोप 2009 में लगे थे। एक खेत में काम करते हुए उसका झगड़ा साथ काम करने वाली मुस्लिम महिला से हो गया। झगड़ा इस बात पर हुआ कि आसिया को पानी लाने को कहा गया, तो मुस्लिम महिला ने आपत्ति जताई कि गैर मुस्लिम का छुआ पानी नहीं पिया जा सकता। झगड़े के बाद मुसलमान औरत स्थानीय मौलवी के पास पहुंची और बताया कि बीबी ने पैगंबर मोहम्मद को गाली दी। इसे ईशनिंदा का अपराध माना गया।

संवेदनशील मामला
पाकिस्तान में ईशनिंदा बहुत ही संवेदनशील मसला है, जिसके लिए मौत की सजा भी हो सकती है। आसिया बीबी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उस पर मुकदमा चला। आसिया ने अदालत में कहा कि आपसी झगड़ा था, ईशनिंदा जैसी कोई बात ही नहीं थी, फिर भी 2010 में उसे मौत की सजा सुना दी गई। उसके समर्थन में बोलने वाले पंजाब प्रांत के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर को उन्हीं के बॉडीगार्ड ने गोलियों से छलनी कर दिया। इस्लामाबाद में सरेआम गवर्नर की हत्या करने वाले मुमताज कादरी को मौत की सजा सुनाई गई और 2016 में उसकी सजा पर अमल भी हो चुका है।

पिछले कुछ समय से आसिया बीबी का मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। पाकिस्तान के ही कई लेखकों-संस्कृतिकर्मियों ने इसे बढ़-चढ़कर उठाया और इस कानून के नाम पर जेल में बंद या मारे गए तमाम निर्दोष लोगों की त्रासदी से दुनिया को परिचित कराया। आसिया की बेटी एशम पिछले साल अप्रैल में वैटिकन तक गई, जहां वह पोप से मिली और उनसे फरियाद की। पोप ने मां के लिए प्रार्थना करके उसे लौटा दिया। इन हलचलों के बाद पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने आसिया बीबी की मौत की सजा निलंबित कर दी और उसे अपील करने की छूट दी।

पाकिस्तान के चर्चित उपन्यासकार मोहम्मद हनीफ ने इस मसले पर ‘गार्डियन’ अखबार में लिखे अपने आलेख में उन प्रसंगों की चर्चा की थी कि कितनी मामूली वजहों से किसी को पाकिस्तान में ईशनिंदक करार दिया जा सकता है। किसी प्लास्टिक बैग में राख लेकर कूड़ेदान की तरफ जाना, जैसा कि रीमा मसीह नाम की एक छोटी बच्ची के मामले में हुआ था। पानी भरने की सार्वजनिक जगह पर वैवाहिक अधिकारों को लेकर समान धर्म के किसी पड़ोसी से बात करना, जैसा कि चकवल के एक स्कूल-शिक्षक के साथ हुआ। पड़ोसी से उनकी बातचीत बहस में बदल गई और शिक्षक अभी जेल में हैं। अपनी स्पेलिंग पर ध्यान न देना, इम्तिहान के पर्चे की जांच करते हुए अध्यापक ने उत्तर पुस्तिकाओं में ईशनिंदक सामग्री होने की बात कही और पुलिस बुला ली। बाद में पता चला कि स्पेलिंग की गड़बड़ी थी। विजटिंग कार्ड जमीन पर फेंक देना, एक डॉक्टर ने दवा कंपनी के सेल्समैन के प्रति गुस्से का इजहार करते हुए उसका कार्ड फेंक दिया था, जिस पर उसका नाम मोहम्मद लिखा था। सेल्समैन ने पुलिस में ईशनिंदा की शिकायत की।

किसी भी सभ्य व्यक्ति को हास्यास्पद लगने वाले ऐसे कई अन्य प्रसंगों की चर्चा भी मोहम्मद हनीफ ने की है। गौरतलब है कि ईशनिंदा कानून जिया उल हक की तानाशाही के दिनों में बनाया गया था, जब पाकिस्तान को ‘इस्लामीकरण’ की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिशें हुई थीं। तब धर्मसत्ता को राज्यसत्ता से ज्यादा प्रतिष्ठा दी गई। आज इस कानून के जरिए सरकार पाकिस्तान के कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने में लगी है। विडंबना यह है कि भारत में ईशनिंदा जैसा कोई कानून ना होने के बावजूद धर्म के नाम पर व्यक्तियों और समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है।

इस साल पंजाब में बलविंदर कौर नामक दो महिलाओं की हत्या इसी आड़ में हुई। वर्ष 2015 में पंजाब में धर्मग्रंथों को ‘अपवित्र’ करने की कई घटनाएं सामने आईं। इस मामले को लेकर उत्तेजना इस कदर बढ़ी कि दो प्रदर्शनकारी मारे गए। अपने आप को जनता की भावनाओं के साथ दिखाने के लिए पंजाब मंत्रिमंडल ने बीते 22 मार्च को एक बिल पारित किया, जिसके तहत ग्रंथों को ‘अपवित्र’ करने की सजा तीन साल से लेकर उम्रकैद कर दी गई है। पिछले दिनों हरियाणा की विधानसभा का उद्घाटन सत्र इस मामले में विवादों में रहा कि एक संप्रदाय विशेष के गुरु ने सभापति के उच्च स्थान पर विराजमान होकर प्रवचन दिया और धर्मसत्ता द्वारा राजसत्ता पर अंकुश रखने की बात कही। ज्यादा दिन नहीं हुए जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भी धर्मसत्ता को राज्यसत्ता के ऊपर रखने की बाकायदा हिमायत की।

संविधान की सीख
सच तो यह है कि आज केंद्र में सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगी संगठन सिद्धांत रूप में मानते हैं कि धर्मसत्ता राज्यसत्ता से ऊपर है। यही वजह है कि धर्म की आड़ में आज अराजक तत्व कभी किसी व्यक्ति को तो कभी किसी समुदाय को अपमानित करते हैं। पिछले दिनों वृंदावन में आयोजित एक नास्तिक सम्मेलन में जिस तरह हंगामा मचाया गया, वह इसकी एक बानगी है। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसे ही देश की कल्पना की थी? हमें सोचना चाहिए कि हम अपने संविधान के अनुरूप भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाएंगे, या पाकिस्तान के रास्ते पर चलते हुए धर्मसत्ता केंद्रित राष्ट्र की स्थापना करेंगे?

(http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/12912/)

2 thoughts on “भारत को पाकिस्तान बनने की राह पर धकेल रहे कट्टरपंथी

  1. Dinesh Shah

    Hitler, Al Qaida, ISIS and our communal groups like RSS, BJP, Shiv Sena are the two sides of same coin.It is people’s fault that they -though very much disappointed by Congress- brought this curse on themselves.
    As they were not alive to deterioration in Congress organisation, they are equally and totally apathetic to shenanigans of these obscurantist parties.
    GOD SAVE THE MOTHERLAND.

    1. shaturya

      I agree…! Tyranny tiptoes into the country in the garb of religion, race, class or nation. Iran,Libya, and Zimbabwe are some of the potent example. So called social organizations like Muslim Brotherhood has played exactly the same role as being played out in India.

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