परवेज हुदभॉय क्यों चिन्तित हैं ?

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परवेज हुदभॉय (Pervez Hoodbhoy) भारतवासियों के लिए अपरिचित नाम नहीं है!

जानेमाने भौतिकीविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता के अलावा उनकी पहचान एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी के तौर पर है जिनके अन्दर बुनियादपरस्त ताकतों से लोहा लेने का माददा है। पाकिस्तान में इस्लामीकरण की बढ़ती आंधी में वह ऐसे शख्स के तौर पर नमूदार होते हैं, जो सहिष्णुता, तर्कशीलता, की बात पर जोर देते रहते हैं। नाभिकीय हथियारों से लैस दोनों पड़ोसी मुल्कों में आपस में अमन चैन कायम हो इसके लिए आवाज़ बुलंद करते रहते हैं।

पिछले दिनों ‘डॉन’ अख़बार में लिखे अपने नियमित स्तंभ में उन्होंने पाठयपुस्तकों के माध्यम से प्रचारित किए जा रहे विज्ञान विरोध पर लिखा।( http://www.dawn.com/news/1300118/promoting-anti-science-via-textbooks  ) खैबर पख्तुनख्वा में प्रकाशित जीवविज्ञान की पाठयपुस्तक का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह उसमें चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत को सिरेसे खारिज किया गया है। किताब में लिखा गया है कि चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रस्तावित इवोल्यूशन अर्थात विकासवाद का सिद्धांत ‘अब तक का सबसे अविश्वसनीय और अतार्किक दावा है।’ किताब इस धारणा को ही खारिज करती है कि संश्लिष्ट जीवन सरल रूपों से निर्मित हुआ। किताब के मुताबिक यह विचार कामनसेन्स/सहजबोध का उल्लंघन करता है और यह उतनाही ‘बकवास’ है जब यह कहा जाता हो कि दो रिक्शा के टकराने से कार विकसित होती है। हुदभॉय के मुताबिक प्रस्तुत किताब अपवाद नहीं है। खैबर पख्तुनवा की एक अन्य किताब बताती है कि ‘‘एक सन्तुलित दिमाग का व्यक्ति पश्चिमी विज्ञान के सिद्धांतों को स्वीकार नहीं कर सकता। /कहने का तात्पर्य सिर्फ पागल लोग स्वीकार सकते हैं ?/ सिंध की भौतिकी की पाठयपुस्तक स्पष्ट लिखती है कि ‘ब्रहमाण्ड तब अचानक अस्तित्व में आया जब एक दैवी आयत/श्लोक का उच्चारण किया गया।’ विज्ञान का यह विरोध निश्चित ही पाठयपुस्तकों तक सीमित नहीं है। वहां विज्ञान और गणित के तमाम अध्यापक अपने पेशे से असहज महसूस करते हैं।

अपने एक अन्य आलेख में वह भूतों प्रेतों की ‘मौजूदगी’ को लेकर या पैरानार्मल परिघटनाओं का ‘तार्किक जामा’ पहनाने को लेकर वहां के शिक्षासंस्थानों में – जिनमें तमाम अग्रणी शिक्षा संस्थान भी शामिल हैं – आयोजित होने वाले ‘विशेषज्ञों’ के व्याख्यानो ंकी चर्चा करते हैं, जिनमें भारी भीड उमड पड़ती है। मुल्क के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के एक ऐसे ही व्याख्यान के अंत में जिन्नों की मौजूदगी को लेकर ‘अंतिम प्रमाण’ के तौर पर वक्ता ने पूछा कि ‘आखिर हॉलिवुड का खरबों डॉलरों का व्यापार करनेवाला फिल्मजगत हॉरर मूवीज या पैरानार्मल परिघटनाओं पर इतनी रकम बरबाद क्यों करता अगर उनका अस्तित्व न होता।’ (http://www.dawn.com/news/1212051/jinns-invade-campuses/ी)

पूरे मुल्क में बढ़ती इस बन्ददिमागी एवं अतार्किकता का जो परिणाम दिखाई दे रहा है, उसका निष्कर्ष निकालते हुए वह आगे बताते हैं:

.. दुनिया में किसी भी अन्य इलाके की तुलना में पाकिस्तान एवं अफगाणिस्तान में अतार्किकता तेजी से बढ़ी है और ख़तरनाक हो चली है। लड़ाइयों में मारे जानेवाले सिपाहियों की तुलना में यहां पोलियो कर्मचारियों की उम्र कम होती है। और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, इस हक़ीकत को देखते हुए स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय युवा मनों का प्रबोधन करने के बजाय उन्हें कुचलने में लगे हैं, अतार्किकता के खिलाफ संघर्ष निश्चित ही यहां अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है।

(http://hoodbhoy.blogspot.in/p/dr-pervez-hoodbhoy-complete-repository.html)

पड़ोसी मुल्क में बढ़ती बन्ददिमागी को लेकर हर वह शख्स चिंतित हो सकता है जो वैज्ञानिक चिन्तन, तर्कशीलता में ही नहीं समूची मानवता की बेहतरी में यकीन रखता हो। कोईभी बता सकता है कि वहां ऐसी स्थितियां रातों रात निर्मित नहीं हुई हैं, उसके बीज बहुत पहले पड़े हैं।

2.
वैसे अगर हम अपने गिरेबां में झांकने की कोशिश करें तो लग सकता है कि यहां भी ऐसी कोशिशें जोर पकड़ती दिख रही है, अलबत्ता उस पर अधिक ध्यान नहीं गया हो। अगर वहां जिन्नों की मौजूदगी को लेकर शिक्षा संस्थान ‘विद्धतजनों’ की तकरीरों को सुनते हैं तो यहां सबकुछ ‘प्राचीन भारत’ में किस तरह आविष्कृत  किया गया था, इसे बताने के लिए ‘विद्वानद्वय’ बुलाए जाते है। याद करें 2015 की भारतीय विज्ञान कांग्रेस का मुंबई अधिवेशन – जिसमें सबसे चर्चित रहा था वह आमंत्रित व्याख्यान जिसमें यह दावा किया गया था कि प्राचीन भारत में किस तरह विमान उड़ाने की क्षमता थी। राष्ट्रीय  नहीं अंतरराष्ट्रीय  मीडिया में भी इस कवायद का भरपूर मज़ाक उड़ा था।

इतिहासअध्ययन में जनाब दीनानाथ बात्रा जैसे व्यक्ति का बढ़ता हस्तक्षेप इसी बात का संकेत देता है। याद रहे जनाब बात्रा न केवल कई भाजपाशासित कई राज्यों में शिक्षा के सलाहकार के तौर पर सक्रिय कर दिए गए है, बल्कि केन्द्रीय स्तर पर शिक्षा के भारतीयकरण को लेकर जो जानकारों की कमेटी बनी है, उसके भी वह अहम सदस्य बताए जाते हैं। गुजरात सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए अनिवार्य बना दी गयी उनकी किताबों को पलटें, तो उनके चिन्तन का अन्दाज़ा लगता है। दो साल पहले गुजरात सरकार ने एक परिपत्र के जरिए राज्य के 42,000 सरकारी स्कूलों को यह निर्देश दिया कि वह पूरक साहित्य के तौर पर दीनानाथ बात्रा की नौ किताबों के सेट को शामिल करे। इन किताबों को लेकर ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ ने दो तीन भागों में स्टोरी की। ‘तेजोमय भारत’ किताब में भारत की ‘महानता’ के किस्से बयान किए गए है:

अमेरिका स्टेम सेल रिसर्च का श्रेय लेना चाहता है, मगर सच्चाई यही है कि भारत के बालकृष्ण गणपत मातापुरकर ने शरीर के हिस्सों को पुनर्जीवित करने के लिए पेटेण्ट पहले ही हासिल किया है .. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि इस रिसर्च में नया कुछ नहीं है और डा मातापुरकर महाभारत से प्रेरित हुए थे। कंुती के एक बच्चा था जो सूर्य से भी तेज था। जब गांधारी को यह पता चला तो उसका गर्भपात हुआ और उसकी कोख से मांस का लम्बा टुकड़ा बाहर निकला। द्वैपायन व्यास को बुलाया गया जिन्होंने उसे कुछ दवाइयों के साथ पानी की टंकी में रखा। बाद में उन्होंने मांस के उस टुकड़े को 100 भागों में बांट दिया और उन्हें घी से भरपूर टैंकों में दो साल के लिए रख दिया।दो साल बाद उसमें से 100 कौरव निकले। उसे पढ़ने के बाद मातापुरकर ने एहसास किया कि स्टेम सेल की खोज उनकी अपनी नहीं है बल्कि वह महाभारत में भी दिखती है। (पेज 92-93)

हम जानते हैं कि टेलीविजन का आविष्कार स्काटलेण्ड के एक पादरी ने जान लोगी बाइर्ड ने 1926 में किया। मगर हम आप को उसके पहले दूरदर्शन में ले जाना चाहते हैं ..भारत के मनीषी योगविद्या के जरिए दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेते थे। इसमें केाई सन्देह नहीं कि टेलीविजन का आविष्कार यहीं से दिखता है .. महाभारत में, संजय हस्तिनापुर के राजमहल में बैठा अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग कर महाभारत के युद्ध का सजीव हाल दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को दे रहा था। (पेज 64)

हम जिसे मोटरकार के नाम से जानते हैं उसका अस्तित्व वैदिक काल में बना हुआ था। उसे अनाश्व रथ कहा जाता था। आम तौर पर एक रथ को घोड़ों से खींचा जाता है मगर अनाश्व रथ एक ऐसा रथ होता है जो घोड़ों के बिना – यंत्रा रथ के तौर पर चलता है, जो आज की मोटरकार है, ऋग्वेद में इसका उल्लेख है। (पेज 60)

हम आसानी से देख सकते हैं कि दीनानाथ बात्रा विज्ञान की खोजों की जड़ें भी हिन्दू धर्म में ढंूढ लेते हैं और वैदिक काल को सर्वश्रेष्ठ काल बताते हैं। यह तो कोई सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी बता सकता है कि तथ्यों एवं मिथकों के घालमेल से बनी ऐसी मनगढंत बातें न केवल हमें अपनी वास्तविक उपलब्धियों को समझने का मौका प्रदान करती है बल्कि ऐसी बातों को पढ़ना अनिवार्य बना कर बाल मन के अवरूद्ध होने का खतरा अवश्य दिखता है।

निश्चित ही जनाब बात्रा अपवाद नहीं है।

प्रचारक से प्रधानमंत्राी बने वजीरे आज़म मोदी अम्बानाी सेठ के अस्पताल के उदघाटन के अवसर पर गोया बात्राजी की बातों को दोहराते दिखे थे जिसमें उन्होंने चिकित्सकीय विज्ञान को मिथकशास्त्रा से जोड़ा था तथा गणेश और कर्ण की प्रचलित कहानियों के बहाने प्राचीन भारत में ‘‘प्लास्टिक सर्जरी’’ और ‘‘जेनेटिक साइंस’’ की मौजूदगी को रेखांकित किया था। (http://indianexpress.com/article/india/india-others/pm-takes-leaf-from-batra-book-mahabharat-genetics-lord-ganesha-surgery/) प्रधानमंत्राी कार्यालय द्वारा वेबसाइट पर डाले गए उनके व्याख्यान के मुताबिक उन्होने कहा था

‘‘हम गणेशजी की पूजा करते हैं। कोई प्लास्टिक सर्जन होगा उस जमाने में जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सर रख कर के प्लास्टिक सर्जरी का प्रारंभ किया होगा।’

3.
भारत के यह नए भाग्यविधाता किस तरह कुन्दजेहनी, बन्ददिमागी के दौर में यहां की जनता को ले जाना चाहते हैं, उसके बारे में कई बातें की जा सकती हैं, जहां ऐसे मौके अब अधिक सामने आते दिखते हैं जब संसद के पटल पर अनर्गल, अवैज्ञानिक, अतार्किक बातों को परोसा जाता है। अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि उसी संसद की पटल पर वर्ष 1958 में विज्ञान नीति का प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्राी ने पूरा पढ़ा था /13 मार्च 1958/ और एक मई 1958 को उस पर हुई बहस में किसी सांसद ने यह नहीं कहा कि भारत धर्म और आस्था का देश है। सांसदों ने कुंभ मेले, धार्मिक यात्राओं पर कटाक्ष किए थे, जिनका इस्तेमाल उनके मुताबिक ‘अंधविश्वास फैलाने के लिए किया जाता है।’ भारत को विज्ञान एवं तर्कशीलता के रास्ते पर आगे ले जाने के प्रति बहुमत की पूरी सहमति थी।

नवस्वाधीन भारत के वे कर्णधार किस तरह मुल्क को धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र के तौर पर विकसित करना चाह रहे थे, धर्म एवं राजनीति के विभाजन को मजबूती दिलाना चाह रहे थे, इसके बारे में कई प्रसंग चर्चित हैं।

उदाहरण के तौर पर यह किस्सा मशहूर है कि टर्की की यात्रा पर निकले मौलाना आज़ाद ने जवाहरलाल नेहरू को यह सूचना दी कि वह टर्की के शासकों को कुराण की प्रति भेंट करना चाह रहे हैं, तब नेहरू ने उन्हें सलाह दी कि एक बहुधर्मीय मुल्क में जहां धर्मनिरपेक्षता का संघर्ष नाजुक मुकाम पर है, आप का किसी खास मजहब के नुमाइन्दे के तौर पर वहां जाना उचित नहीं होगा। इतनाही नहीं सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए जब स्वाधीन भारत में कन्हैयालाल मुंशी ने वल्लभभाई पटेल के साथ मिल कर गांधी से मुलाकात कर सरकार से सहायता प्राप्त करने की बात कही तब उन्होंने साफ मना किया। उनका यह कहना था कि यह सरकार का काम नहीं है। साफ है नेहरू ने भी सेक्युलर मुल्क में मंदिर निर्माण के लिए सरकारी सहायता से साफ इन्कार किया।

गौरतलब है कि बाद में उनके अपने मंत्रिमंडल के सदस्य कन्हैयालाल मंुशी को उन्होंने इस वजह से भी डांटा क्योंकि जनाब मुंशी ने बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास को लिखा था कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए ‘‘होआंग हो, यांगत्से और पर्ल नदियों के जल भेजने तथा टिन शान पहाड़ों की कुछ टहनियां भेजने के लिए’’ पत्रा लिखा था।
नेहरू ने अपने काबिना मंत्राी मंुशी को कहा

‘‘इस पत्र ने हमारे दूतावास को विचलित कर दिया है और मैं खुद भी इस विचार से परेशान हूं कि विदेशों के दूतावासों को ऐसे पत्रा भेजे जा रहे हैं। अगर मामला निजी किस्म का होता / हालांकि उस वक्त भी वह अवांछनीय होता/ तब भी एक हद तक ऐसी गुजारिश को बर्दाश्त किया जाता। लेकिन सरकार से सम्बद्ध व्यक्ति द्वारा की गयी यह गुजारिश जिसके साथ राष्टपति का नाम भी जोड़ दिया गया हो, हमारे लिए काफी असहज करनेवाली स्थिति है। मुझे डर है कि इस बात का एहसास हमारे लोगों में ही बना नहीं है कि हमारे चिन्तन और कार्य के प्रति बाकी लोग किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं।

(http://www.business-standard.com/article/opinion/bharat-bhushan-pm-as-pilgrim-or-indianness-redefined-114081401189_1.html)

जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद उदघाटन समारोह के लिए तत्कालीन राष्टपति राजेन्द्र प्रसाद को बुलावा आया, तब नेहरू ने यही कहा कि आप व्यक्तिगत तौर पर उसमें शामिल हो सकते हैं, मगर एक सेक्युलर मुल्क के राष्टपति के तौर पर नहीं। अन्ततः राजेन्द्र प्रसाद उसमें शामिल हुए, राष्टपति के तौर पर नहीं बल्कि आम नागरिक के तौर पर।

4.
बहरहाल, यह विचार महज किताबों या बहस मुबाहिसों तक सीमित नहीं है। यह फौरी तौर पर न केवल भारत में चल रहे ताज़ा अनुसंधानों की दिशा को भी प्रभावित कर रहा है, वहां फंड कटौती धडल्ले से हो रही है, और ऐसे अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो खास विचारधारा से प्रेरित है, जिसके लिए रिसर्च के पैमानों का उल्लंघन किया जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि जिसकी उपलब्धियां संदिग्ध हैं। चिकित्सा के रूप में गोमूत्रा को बढ़ावा देने का विचार इसमें अहम है। ‘कौन्सिल आफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्टियल रिसर्च’ द्वारा अपनी घटक प्रयोगशालाओं के जरिए गोमूत्र के ‘चिकित्सकीय गुणों’ की खोज को लेकर अध्ययन किया जा रहा है।/http://www.business-standard.com/article/pti-stories/govt-undertaking-research-to-promote-use-of-cow-urine-ls-told-116112500876_1.html /

प्रतिष्ठित वेबपत्रिका ‘द वायर’ ने अपने हालिया आलेख में इस मुददे पर रौशनी डाली थी।(http://thewire.in/82813/cow-urine-distillate-cancer)  वेबपत्रिका के विज्ञान सम्पादक वासुदेवन मुकुन्थ, ने लिखा था कि इस अनुसंधान में पारदर्शिता की भारी कमी है। विज्ञान जगत में यह स्थापित परंपरा है कि वैज्ञानिक अध्ययन में मुब्तिला लोग अपने अध्ययन को पहले ऐसे प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित करते हैं – जहां क्षेत्रा के अन्य विद्वान पहले उसके दावों को परखते हैं, उनके पास भेजे मसविदे पर अपनी आशंकाओं को भी अध्येता के साथ साझा करते हैं और बाद में ही ऐसे पर्चे प्रकाशित होते हैं। अपने अनुसंधानों को पहले सेमिनारों, कान्फेरेन्स में प्रस्तुत करने की भी परंपरा है, जहां आप क्षेत्रा के सहअध्येताओं के साथ विचार विमर्श को आगे बढ़ाते हैं। विडम्बना ही गोमूत्र के कथित गुणों को प्रचारित करने की हडबडाहट में ऐसे सभी पैमानों का उल्लंघन किया जा रहा है। लाजिम है जो अध्ययन सामने आ रहे हैं उनकी गुणवत्ता ही सन्देह के घेरे में है।

अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए आयुष मंत्रालय की तरफ से उसने हासिल किए पेटेण्ट की भी चर्चा होती है। अब पेटेण्ट मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण बात हो सकती है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि जो पेटेण्ट हासिल किया गया है वह मानवीय शरीर के लिए उपयोगी ही है।

तीसरी महत्वपूर्ण बात संसाधनों की कमी की आती है। एक पहलू पर अत्यधिक जोर ने विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान को मिल रहे पहले से सीमित फंड में भी कैची लग रही है। उदाहरण के तौर पर अक्तूबर 2016 में सरकार ने विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान रिसर्च /सीएसआईआर/का बजट आधा कम किया और उसे कहा कि वह उत्पादों को तैयार करके बाकी खर्चे जुटा लें, इतनाही नहीं उसे यह भी कहा गया कि वह सोशल सेक्टर टेक्नोलोजी की तरफ अपना फोकस बनाए /जिसमें गोमूत्र पर अनुसंधान भी शामिल हो/ और उसकी मासिक प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करे। विडम्बना ही है कि अलसुबह हुई 2000 करोड़ रूपए की इस कटौती ने देश में अन्य स्थानों पर चल रहे रिसर्च के लिए सीएसआईआर के 38 सेन्टरों की मदद लेना नामुमकिन हुआ है।

विडम्बना ही है कि एक तरफ सीएसआईआर जैसी स्थापित संस्था के फंड में कटौती करके देश भर में पहले से चल रहे अनुसंधान को प्रभावित किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे आयोजनों को विभिन्न सरकारी महकमों की तरफ से 12 करोड़ रूपए का अनुदान दिया गया है – जिसका आयोजन राष्टीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक संस्था कर रही है। http://www.telegraphindia.com/1161207/jsp/frontpage/story_123394.jsp#.WEfLhbJ97IU/समाचार के मुताबिक चार सरकारी विज्ञान विभागों को दिसम्बर में माह में आयोजित इंडिया इण्टरनेशन साइन्स फेस्टिवल के लिए यह पैसे देने का निर्देश मिला जिसका आयोजन विज्ञान भारती कर रही है जिसका लक्ष्य ‘स्वदेशी विज्ञान’ को बढ़ावा देना है और ‘‘भारतीय’’ विरासत को प्रमोट करना है। अब इस आयोजन की खासियत होगी वहां देश भर से आए छात्रों मे से लगभग 550 छात्रों को अल्बर्ट आइनस्टाइन की वेशभूषा मे खड़ा करके गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज करना। आयोजकों का दावा है कि पिछले साल अमेरिका में लगभग 350 छात्रों ने यह ‘रेकार्ड’ बनाया था और हम इसका अगला रेकार्ड कायम करेंगे।

एक अग्रणी वैज्ञानिक की इस पर टिप्पणी गौरतलब है कि ‘फैन्सी डेस’’ प्रतियोगिता मार्का आयोजनों से जो लोग वैज्ञानिक चिन्तन को बढ़ावा देने का भ्रम पाले हैं, वह किन ख्वाबों में जीते हैं, इसकी पड़ताल आवश्यक है।

2 thoughts on “परवेज हुदभॉय क्यों चिन्तित हैं ?

  1. Thanks to Subhash Gatade for penning an amazing eye-opening review of the activities of the obscurantists which with the patronage of ruling classes in the Subcontinent are working overtime to drag the human civilization back to the period when killing/burning of CHARVAAKS and Copernicus’ was common.

  2. shaturya

    It is a commonplace to notice that big leaders love to fight elections from backward areas so that all other tactics except informed opinions could be effective. Now the same is being attempted for the entire country.

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