‘अरबन फासिज्म’ की शुरुआत : वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

रामचरित मानस में सुन्दर कांड में एक पंक्ति आती है, जो कही तो विभीषण के मुंह से गई है लेकिन वह आज के लोकतंत्र पर भी लागू होती है। चौपाई में विभीषण कहते हैं- ‘सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुं जीभ बिचारी।’ यानी विभीषण कहते हैं कि मैं ऐसे ही रहता हूं जैसे दांतों के बीच जीभ। प्रसंगांतर करके देखें तो भारतीय लोकतंत्र की हालत भी अब फासीवाद, सांप्रदायिकता व पूंजीवादी लोभ-लालच के जहरीले विषदंतों से घिरी जीभ जैसी नहीं हो गई है जिसे कोई भी काट लेना या आहत कर देना चाहता है?  गिरफ्तारियां, सर्चवारंट, नजरबंदी और मीडिया प्रोपगंडा हमारे देश की सर्वप्रमुख सचाई बन चुकी है और अब इस लोकतंत्र के भीतर सशक्त हो चुके अधिनायकवाद के लिए अब यही चीजें उसके शासन की वैधता का प्रमुख आधार बन गई हैं। जिस देश में हर वक्त मुठभेड़, गिरफ्तारी या देशद्रोहियों की खोज का सत्ता-प्रायोजित अभियान चल रहा हो, वहां लोकतंत्र के बारे में सोते-जागते चिंता न होना स्वाभाविक तौर पर संवेदनहीनता या फिर कमअक्ली का लक्षण माना जा सकता है। जैसे साइनबोर्ड पर किसी ने लिख कर टांग दिया है कि लोकतंत्र की अमुख तारीख को हत्या कर दी जाएगी, वह तारीख नजदीक आती जा रही है। ठीक रघुवीर सहाय की ‘रामदास’ कविता में रामदास की हत्या की तरह सभी को जैसे पता चल चुका है कि लोकतंत्र की हत्या हो जाएगी पर सब अपने-अपने काम में मसरूफ़ हैं। रघुवीर सहाय के शब्दों में-

निकल गली से तब हत्यारा/आया उसने नाम पुकारा/

हाथ तौलकर चाकू मारा/ छूटा लहू का फव्वारा/

कहा नहीं था उसने आखिर उसकी हत्या होगी।

जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकारवादियों, पत्रकारों व वकीलों की मंगलवार को गिरफ्तारी हुई है, उससे गंभीर चेतावनी और कोई हो ही नहीं सकती कि भारत के लोकतंत्र का गला घोंट देने की हर मोर्चे पर तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।लोकतंत्र इस धारणा पर टिका है कि लोगों के मन में सरकार का भय नहीं होना चाहिए। सरकार एक सुदूर बैठी संस्था हो सकती है जिसका काम लोगों के जीवन में भय, शंका या प्रोपगंडा पैदा करना नहीं है। पर लोकतंत्र का मौजूदा स्वरूप इसके ठीक विपरीत दिशा में आगे बढ़ रहा है। सुधा भारद्वाज (वकील, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता), वरवर राव (कवि), के. सत्यनारयाणा (दलित चिन्तक व प्रोफेसर), गौतम नवलखा (सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार), अरुण पेरियारा (वकील), वरनन गोंस्लावेज (वकील), आनंद तेलतुंबड़े (लेखक-विचारक), क्रांति (पत्रकार) की गिरफ्तारी कर सरकार ने सिविल सोसायटी के खिलाफ अपना पहला सबसे बर्बरतापूर्ण आक्रमण कर दिया है। इस धमकी के साथ कि और भी लोग पकड़े जाएंगे। ऐसी धमकियां भारत के लोकतंत्र की औपचारिक व्यवस्था के अंदर किसी सरकार ने कभी नहीं दी है। अभी तक माना जाता था कि सरकार किसी प्रकार से मीडिया, न्यायपालिका और प्रमुख विपक्ष दलों को काबू में करना चाहती है। इसके बाद वह चुनाव आदि में व्यस्त हो जाएगी, सामान्य जीवन पहले की तरह चलता रहेगा। लेकिन धीरे-धीरे पता चल रहा है कि वह संपूर्ण नागरिक जीवन को कंट्रोल करने की योजना बनाकर चल रही है।

‘अरबन नक्सल’ शब्द वास्तव में केवल कुछ एक्टिविस्टों को जेल भेजने के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र को निरर्थक बनाने की पूंजीवादी-फासिस्ट साजिश का हिस्सा है। विवेक अग्निहोत्री की निहायत बचकानी, मूर्खतापूर्ण और अफवाह फैलाने के लिए लिखी किताब ‘अरबन नक्सल्स’ को पढ़कर कोई जान सकता है कि कैसे ‘अरबन हिंदू फासिज्म’ को खड़ा करने के लिए हर किस्म के वैचारिक प्रतिरोध को निशाने पर लिए जाने की तैयारी लंबे समय से चल रही है। अधिकांश कट्टर हिंदू संगठन अब भारत के शहरी जीवन में तेजी से पैर पसार चुके हैं। इसलिए राहुल गांधी द्वारा संघ परिवार की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करना सचाई का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। सरकार की जांच एजेंसियां इस भयानक दबाव में हैं कि वे विपक्ष में खड़े लोगों के खिलाफ आंकड़ें जुटाने का काम तेजी से करें और बेहद शांतिप्रिय, अमन-चैन में भरोसा रखने वाले तथा लोकतांत्रिकता की सीमाओं में रहकर विरोध करने वालों की भी सूचियां तैयार की जा रही हैं।अपराध को रोकने के स्थान पर बुद्धिजीवियों-लेखकों को अपराधियों की श्रेणी में रखा जाने लगता है। तानाशाहों को जब खुद को अधिक स्वतंत्र करना होता है तब वह ऐसे ही लोगों को गुलाम बनाने के उपाय तलाशता है।

आरएसएस ने अब अपनी रणनीति बदल ली है। आरएसएस के दूसरे सरसंघसंचालक माधव सदाशिव गोलवरकर ने ‘मुस्लिम, क्रिश्चियन और कम्युनिस्ट’ को हिंदू राष्ट्र के लिए खतरा बताया था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में शायद संघ को भी अनुभव होने लगा कि भारत के उदारवादी लोकतंत्र में ऐसी कई शख्सियतें हैं जिन्हें सीधे इन्हीं खांचों में (मुस्लिम, क्रिश्चियन, कम्युनिस्ट) में रखकर उनके खिलाफ घृणा का प्रचार नहीं किया जा सकता है। अब उसका सामना अंबेडकरवादियों, नारीवादियों, उदारवादियों और वैचारिक ध्रुवीकरण से मुक्त प्रोफेशनल्स से भी है जो लोकतंत्र को सचमुच जीना चाहते हैं और वह उनकी बौद्धिक ट्रेनिंग व शिक्षादीक्षा के कारण जीवनशैली का हिस्सा बन जाता है। इस बड़ी आबादी को ब्राह्मणवादी-पूंजीवादी शक्तियों द्वारा नियंत्रित करना इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि आबादी के ये हिस्से सरकार की ताकत पर सवाल खड़े करते हैं, उसकी जवाबदेही के बारे में उसे याद दिलाते हैं। अक्सर राजनीति विज्ञान की इस मोटी सी बात को भी वे याद दिलाते हैं कि ‘राज्य’ नामक संस्था किसी भी नागरिक के पूरे सामाजिक जीवन में एक संस्था मात्र है, इकलौती निर्णायक संस्था नहीं है। एक मनुष्य का जीवन बहुत सारी अन्य संस्थाओं जैसे शिक्षा, धर्म-अध्यात्म, खेल, मनोरंजन, परिवार, पुस्तकालय आदि के चारों ओर घूमता है और राज्य की शक्ति को हर संस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं।

राज्य व सरकार की ताकत पर अंकुश लगाने वाली लोकतंत्र की यह क्लासिकल-लिबरल सोच ही जोर-जबर्दस्ती से हर नागरिक को राज्य-सरकार के अधीन लाने वाले तानाशाह को नागवार गुजरती है। तब वह अपनी शक्ति का ज्यादा से ज्यादा दिखावे, डराने वाले, आतंक पैदा करने वाले रूपों में इस्तेमाल करने लगता है।इसीलिए नए खतरे गढ़ना उसकी प्रमुख नीतियों में शुमार हो जाता है। भारत में ये खतरे ‘मोदी को खतरा’, ‘हिंदू को खतरा’, ‘मंदिर को खतरा’, ‘गाय को खतरा’ या फिर ‘पर्व-त्यौहार को खतरा’ आदि रूपों में हर निश्चित अंतराल पर सामने आते रहते हैं। वर्तमान में जिन लोगों की गिरफ्तारी हुई है, उनकी गिरफ्तारियों को भी खतरे के इन्हीं छद्म नैरेटिव में रखकर पेश किया गया है और इस बार पीएम की हत्या की साजिश से लेकर भीमा कोरेगांव में नक्सली हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया है। सुधा भारद्वाज हों या गौतम नवलखा ये लोग ‘उत्पीड़ितों की आवाज’ रहे हैं पर इन आवाजों को अब खामोश करने के लिए देशद्रोही होने या हत्या की साजिश में शामिल होने के वही पुराने घटिया, घिसेपिटे फार्मूले आजमाए जा रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन सारे फासीवादी, तानाशाही और एक विचारधारा थोपने वाले राजनीतिक अभियानों से लोकतंत्र सुरक्षित निकलकर बाहर आएगा। हजारों साल तक गुलामी में रहे इस देश के लोग अब किसी सनकी, आत्ममुग्ध शासक द्वारा आरोपित नए जमाने की, 21वीं सदी की गुलामी को स्वीकार करने से पूरी ताकत से मना कर देंगे।

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