‘आधार’ न बचा, न मरा, बचा केवल मदमस्त सफ़ेद हाथी : राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

Aadhar for Hanumanji
Aadhar for Hanumanji, image courtesy Aaaj Tak

उच्चतम न्यायालय के बहुमत ने ‘आधार’ पर दिये गए हालिया फैसले में सरकारी योजनाओं, सब्सिडी इत्यादि का लाभ लेने के लिए आधार अनिवार्य करने के सरकारी फैसले को सही ठहराया है। इस के साथ ही आयकर दाता के लिए भी आधार अनिवार्य कर दिया है। इस के अलावा बाकी जगह इस के प्रयोग को अवैध ठहरा दिया है; अब न मोबाइल फोन और न बैंक खातों के लिए यह ज़रूरी रहेगा। न निजी कंपनियाँ इसे मांग या प्रयोग कर पाएँगी। यह सब अब बच्चा बच्चा जानता है। सवाल यह है कि इस परिस्थिति में अब आधार का क्या प्रयोजन बचा है?
सरकार ने अदालत में आधार को कर-चोरी, काले-धन और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सशक्त हथियार के तौर पर प्रस्तुत किया है (बहुमत समेत तीनों फैसलों की एक संयुक्त फाइल का पृष्ठ 1095-6)। काले-धन के खिलाफ लड़ाई के लिए बैंक खातों और पैन को आधार से जोड़ना अनिवार्य किया गया था। आतंकवाद से लड़ने एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मोबाइल फोन के लिए आधार अनिवार्य किया गया था। अब जब बैंक खातों और मोबाइल फोन के लिए आधार अनिवार्य नहीं रहा, तो अब आधार इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किसी काम का नहीं रहा। लोगों के छद्म नाम से कई-कई खाते चलते रहेंगे और काले धंधे का कारोबार जैसे अब तक चलता रहा है, वैसे ही चलता रहेगा। आयकर दाता के लिए आधार अनिवार्य करने से काले धंधे और काली कमाई पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। अदालत के आधार को वैध ठहराने वाले एक जज ने भी अपने फैसले में कहा है कि बैंक खाता और पैन कार्ड दोनों का लिंक होना ही प्रभावी होगा (अकेला पैन कार्ड नहीं; इस लिए उन्होने बैंक खातों के लिए भी आधार को वैध ठहराया है हालांकि अल्पमत होने के चलते उन के फैसले का यह अंश प्रभावी नहीं होगा (पृष्ठ 55 माननीय जज अशोक भूषण के फैसले का/पृष्ठ 1103 तीनों फैसलों की संयुक्त फाइल का)।
आयकर डाटा के लिए आधार अनिवार्य करने से केवल इतना ज़रूर होगा कि एक व्यक्ति एक से ज़्यादा पैन कार्ड नहीं बनवा पाएगा। ज़रूर कुछ लोग एक से ज़्यादा पैन कार्ड बनवा लेते होंगे पर इन की संख्या ज़्यादा होने की संभावना नहीं है। कारण? केवल एक नंबर में और औपचारिक क्षेत्र में कामधंधा करने वाले को पैन की ज़रूरत होगी और वो टैक्स बचाने के लिए एक से ज़्यादा पैन कार्ड बनवाता होगा। अनौपचारिक क्षेत्र में या बिल्कुल अवैध धंधा करने वाले को किसी पैन की ज़रूरत नहीं होती। खैर, वैसे भी बिना आधार के भी दोहराव (डुप्लिकेशन यानी एक ही व्यक्ति कई बार किसी सुविधा लाभ ले)/दोहरे लाभ लेने की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है। मेरी माँ के पास आधार नहीं है फिर भी, शहर बदलने के कारण, अलग अलग शहरों और ब्रांचों में खुले उन के सब बैंक खाते लिंक हो गए हैं। हमें इस का एहसास तब हुआ जब एक खाते में फोन का नंबर बदला, तो सब खातों का फोन नंबर बदल गया। इस पर कोई विवाद नहीं है कि कंप्यूटरीकरण होने से ही दोहरे खातों पर, चाहे वो गैस के हों चाहे बैंक के, काफी हद तक रोक लग सकती है। इस के लिए आधार की ज़रूरत नहीं है। सरकारी दस्तावेज़ ही दिखाते हैं कि बिना आधार के भी दोहरे लाभ लेने को काफी हद तक रोका जा सकता है। अदालत के इस फैसले में ही यह दर्ज़ है कि 2012 के शुरू में आए उच्चतम न्यायालय के फैसले में यह रेखांकित किया गया था कि 2006 के बाद 2.1 करोड़ दोहरे राशन कार्ड रद्द कर दिये गए थे (पृष्ठ 187/1235)। हाँ यह ज़रूर है आधार से इस दोहराव को और भी कड़ाई से रोका जा सकता है।
वापिस मूल बात पर आते हैं, क्योंकि बैंक खाता खोलने के लिए पैन कार्ड अनिवार्य नहीं है इस लिए कई कई खाते तो अब भी खुलते रहेंगे। इस लिए जैसा की दावा था, उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद आधार के माध्यम से काले धन और काले धंधे पर रोक नहीं लग पाएगी। इसी तरह मोबाइल फोन के लिए आधार अनिवार्य न होने के कारण आधार का ‘आतंकवाद से लड़ने और राष्ट्रीय सुरक्षा’के लिए भी प्रयोग नहीं हो पाएगा। अदालत में आधार समर्थक एक वकील ने भी यह रेखांकित किया है (पृष्ठ 637)।
फिर आधार का फायदा क्या होगा? आधार हर किस्म की सरकारी सब्सिडी/सहायता/खर्च पर भी लागू नहीं होगा। आधार कानून की धारा 7 के शीर्षक में ही यह स्पष्ट किया गया है कि यह सब्सिडी इत्यादि के कुछ मामलों में लागू होगा यानी सब में नहीं। संभावना यह है कि यह केवल गरीब और वंचित तबकों को मिलने वाली सरकारी सब्सिडी/आर्थिक सहायता पर ही लागू होगा। उदाहरण के लिए अभी सब कर्मचारियों पर आधार अनिवार्य नहीं हुआ पर स्कूलों में मध्याह्न भोजन बनाने में लगी महिला कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्य हो गया है (हालांकि 3-3 महीने की मोहलत के चलते अभी यह धरातल पर लागू नहीं हुआ है पर इस बारे में निर्देश 28 फरवरी 2017 को जारी हो चुके हैं)। बहुमत के फैसले में स्पष्ट तौर पर यह रेखांकित किया गया है कि आधार की अनिवार्यता केवल गरीब और वंचित तबकों को मिलने वाली सब्सिडी पर लागू होगी और बैंकों और निगमों को दी जाने वाली सब्सिडी इत्यादि पर लागू नहीं होगी (पैरा 447 (6) (डी) पृष्ठ 563-564)। बहुमत के फैसले में इसे वंचित तबको को दी जाने वाली सेवाओं तक सीमित रखने का आदेश भी दिया है (555)।
यानी जिस किसी गरीब को सरकार से सब्सिडी, बुढ़ापा पेंशन या विधवा पेंशन लेनी है उस के लिए अब आधार कानूनी तौर पर अनिवार्य हो गया है। यह सही है कि आधार की अनिवार्यता के चलते इन योजनाओं में लाभार्थी के दोहराव की समस्या पर काफी हद तक रोक लग पाएगी। परन्तु ध्यान रहे आधार इन सारी योजनाओं में केवल लाभार्थी-दोहराव के माध्यम से होने वाले भ्रष्टाचार पर रोक लगा पाएगा। यह न सम्पन्न व्यक्ति को नकली गरीब बन कर गरीब के तौर पर सुविधा लेने से रोक पाएगा और न असली गरीब को इस का लाभ दिला पाएगा; न पूरा राशन दिला पाएगा, न समय पर दिला पाएगा और न सही (खाने लायक) दिला पाएगा। आधार बस एक नकली गरीब को एक बार से ज़्यादा फायदा उठाने से रोक पाएगा। इतना भर भ्रष्टाचार और काले धन पर रोक के नाम पर आधार से होगा।
चलो इतना ही सही। कुछ तो भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, कुछ तो सरकारी खर्च बचेगा। अदालत ने भी यही कहा है। भागते चोर की लंगोटी ही सही। हम भी ऐसा मान कर आधार को स्वीकार कर लेते बशर्ते यह बिना विशेष लागत के लगभग मुफ्त में मिल जाता; न सरकार को इस की कोई विशेष कीमत चुकानी पड़ती और न गरीब और वंचित को। परन्तु ऐसा है नहीं। सरकार (यानी समाज) को चोर की लंगोटी पकड़ने पर पैसा खर्च करना होगा और गरीब और वंचित को तकलीफ भी होगी। इस लिए भागते चोर की लंगोटी पकड़ने से मिलने वाले लाभ की तुलना उस की लागत से ज़रूर की जानी चाहिए।
पहले इस पर होने वाले सरकारी खर्च की बात कर लें। हैरानी की बात है कि 1448 पृष्ठ के फैसले में कहीं पर भी आधार परियोजना पर होने वाले खर्च का ज़िक्र ही नहीं आया। इस पूरी प्रक्रिया पर कितना खर्च होगा इस का कोई आंकड़ा इस फैसले में नहीं है। आधार योजना को लागू करने से पहले भी इस का कोई आकलन नहीं किया गया। यूआईडीएआई प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष के एक वक्तव्य में यह कहा गया था कि लागत के आँकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं परन्तु ‘विश्वास’ है कि यह फ़ायदे का सौदा रहेगा। हाँ, आधार की परिकल्पना में इतना ज़रूर कहा गया था कि इस पर आने वाले खर्चे की कुछ भरपाई तो पुष्टीकरण शुल्क से हो जाएगी (यानी जब-जब आधार का प्रयोग होगा, प्राधिकरण को इस के लिए भुगतान मिलेगा; अब धारा 8 में इस का प्रावधान कर दिया है। अभी यह नहीं लिया जा रहा, यह एक छलावा है। जब यह आधार पूरी तरह लागू होगा तो पुष्टीकरण सेवा मुफ्त नहीं रहेगी; अब भी हर बार जानकारी में बदलाव के लिए जैसे पता या फोन नंबर में बदलाव के लिए फीस ली जा रही है) और खर्च की बाकी भरपाई कंपनियों को एकत्रित डाटा की बिक्री से होनी थी। अब जब आधार सब के लिए अनिवार्य नहीं रहा, इस का दायरा काफी सीमित हो गया है, गरीब और वंचित तक और कुछ मामलों तक सीमित रह गया है, तो पुष्टीकरण से होने वाली आमदनी कम होने के साथ साथ आधार डाटा की बिक्री से भी आमदनी नहीं हो पाएगी। इस लिए आधार व्यवस्था पर होने वाला खर्च अंतत करदाता पर ही पड़ना है। खेद की बात है यह है कि यह खर्च कितना होगा, इस का उच्चतम न्यायालय के निर्णय में ज़िक्र तक नहीं है। निर्णय में लाभ-लागत की तुलना ही नहीं है। यहाँ तक कि इस से होने वाली सरकारी बचत के बारे में भी अदालत ने कोई निश्चित आंकड़ा नहीं दिया बल्कि एक जज ने तो यहाँ तक कहा है कि हम आधार लागू होने से होने वाली बचत पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे (पृष्ठ187/1235)
अब आ जाएँ, आधार की गरीब और वंचित तबके पर पड़ने वाली लागत पर। पहले तो उसे पंजीकरण करवाने में ही दिक्कत होती है क्योंकि मशीन में उम्रदराज/मेहनतकश जनता की उँगलियों की छाप लेने में ही दिक्कत आती है। बार बार, कई बार हाथ धो-धो कर अगर उस की उँगलियों की छाप एक बार को आ भी जाती है और उस का आधार पंजीकरण हो भी जाता है, तो भी उँगलियों की छाप लेने की समस्या हर बार सत्यापन/पुष्टीकरण के समय, जब-जब उसे बुढ़ापा या विधवा पेंशन लेनी होती है, आन खड़ी होती है। हालांकि उंगली/पुतली की छाप लेने में आने वाली दिक्कत ही कोई छोटी परेशानी नहीं है, पर अगर यह दिक्कत न भी हो, तो भी छाप आने के बावजूद पुष्टीकरण में गलतियाँ होनी अवश्यंभावी हैं।
छाप लेने के बावजूद, पुष्टीकरण में होने वाली इन गलतियों को खत्म करना संभव नहीं है। कोई भी स्नातक स्तर तक का गणित/सांख्यिकी का विद्यार्थी जानता है कि उँगलियों की छाप के मिलान में दो तरह की गलतियाँ अनिवार्य तौर पर होती हैं, होंगी, चाहे कितनी भी आधुनिक मशीन हो और चाहे कितनी भी सावधानी बरती जाये। विशेषज्ञ इन्हें टाइप 1 गलती (जब सच्चे को झूठा मान लिया जाता है) और टाइप 2 गलती (जब झूठे को सच्चा मान लिया जाता है) कहते हैं। अगर एक तरह की गलती की संभावना को कम करने के प्रयास किए जाते हैं तो दूसरी तरह की गलती की संभावना बढ़ जाती है। दोनों तरह की गल्तियों को कम करना सैद्धांतिक रूप से संभव ही नहीं है। यानी यह संभावना इस तकनीक में (असल में किसी भी सांख्यिकी आधारित निर्णय में) अंतर्निहित है कि ‘आप’ अपने आप को ‘आप’ साबित न कर पाएँ और कोई और अपने आप को ‘आप’ साबित कर ले जाए। दोनों में से एक त्रुटि की संभावना को कम किया जा सकता है पर ऐसा करने के साथ दूसरी त्रुटि की संभावना बढ़ जाएगी।
पुष्टीकरण में दिक्कत आने की समस्या है कितनी विकराल? उच्चतम न्यायालय के बहुमत के निर्णय में आधार की सत्यता 99.86% (कहीं कहीं यह 99.76% दी गई है; इस अंतर को मुद्रण त्रुटि मान सकते हैं) बताई गई है। समाचार पत्रों में भी यही आंकड़े दोहराये गए हैं। परन्तु बहुमत के ही निर्णय में ही दिये गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार वास्तव में पुष्टीकरण में उँगलियों की छाप के मिलान में 6% लोगों की पुष्टि नहीं हुई और आँखों की पुतली के मिलान में 8.54% लोगों की पुष्टि नहीं हुई यानी लगभग 63 करोड़ जिन्होने ने आधार के माध्यम से पुष्टि का प्रयास किया उन में से लगभग 4 करोड़ की पुष्टि नहीं हुई (पृष्ठ63)। यह आंकड़ा 0.14% (या 0.24%) से कई गुना ज़्यादा है और यह तो तब है जब यह स्पष्ट किया गया है कि इन आंकड़ों में एक व्यक्ति के कई बार पुष्टिकरण में फ़ेल होने को भी एक बार ही गिना गया है। अगर हर बारी पुष्टीकरण न होने की स्थिति को गिना जाएगा तो ये आंकड़ा कहीं अधिक होगा। (पुष्टीकरण न हो सकने के कुछ ऐसे मामले हो सकते हैं जिन में नकली व्यक्ति पेश हुआ हो पर जब व्यक्ति को पता हो कि उंगली/पुतली की छाप का मिलान होगा, तो ऐसे नकली व्यक्ति पेश होने की संभावना काफी कम हो जाती है। इस लिए हम इन आंकड़ों को पुष्टीकरण में परेशानी के आंकड़े मान सकते हैं।) इस के अलावा बहुमत निर्णय में ही अदालत ने 2016 के (सरकारी) आर्थिक सर्वेक्षण को उद्धृत किया है कि झारखंड में 49% और राजस्थान में 37% मामलों में पुष्टीकरण नहीं हो पाया। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी माना गया कि योग्य व्यक्ति का पुष्टीकरण न होने से वह लाभ से वंचित रह जाता है (पृष्ठ 313)। अदालत ने आंध्र प्रदेश के 2015 के एक सरकारी अध्ययन का भी हवाला दिया है जिस में पाया गया कि 50% लाभार्थी पुष्टीकरण न होने से राशन से वंचित रहे (पृष्ठ 938)। परन्तु इस सब को नोट करने के बावजूद अदालत के बहुमत के फैसले ने पुष्टीकरण न होने से, वंचितों की संख्या को विवादास्पद मुद्दा मान कर, इन आंकड़ों की विश्वसनीयता की पुष्टि न होने के कारण, इस पर विचार करने से ही इंकार कर दिया (पृष्ठ 386)। सवाल यह उठता है कि वंचितों के दावों की पुष्टि करने की, सच्चाई का पता लगाना की ज़िम्मेदारी किस की है? क्या माननीय अदालत को सच्चाई पता नहीं करनी चाहिए थी?
यहाँ एक ओर विषय पर चर्चा करनी आवश्यक है। हालांकि सरकार का यह भी दावा है कि आधार की अनिवार्यता के चलते किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं होगा और लाभार्थी के पुष्टीकरण की वैकल्पिक व्यवस्था की गई है (पृष्ठ 63)। यह व्यवस्था आधार कानून की धारा 7 में है पर विभिन्न विभागों/मंत्रालयों द्वारा इस धारा को लागू करने के लिए जारी की गई घोषणाओं में वैकल्पिक पहचान व्यवस्था केवल आधार बनवाने के लिए निश्चित की गई अंतिम तिथि तक ही है। वैकल्पिक पहचान व्यवस्था इस के बाद की अवधि के लिए नहीं है। आधार होने के बावजूद पुष्टीकरण न होने की स्थिति के बारे में 19-12-2017 के नवीनतम निर्देशों के अनुसार व्यवस्था यह है कि उंगली से पहचान का पुष्टीकरण न हो पाये तो आँख की पुतली की छाप से पुष्टीकरण किया जाए। वास्तविकता यह है कि आखों की छाप लेने की व्यवस्था ज़्यादा महंगी पड़ती है और इस लिए यह व्यवस्था हर जगह होती ही नहीं। यह भी कहा गया है कि अगर इंटरनेट काम न करे तो फोन पर ओटीपी/पासवर्ड मँगवा कर या बार कोड/क्यूआर से पुष्टि कर ली जाये पर प्राधिकरण से पुष्टि ज़रूर कर ली जाए। पर इस के लिए भी फोन तो चलना चाहिए। अंतिम विकल्प के तौर, पर अगर किसी भी तरीके से प्राधिकरण से पुष्टि करना संभव न हो, उस स्थिति में केवल आधार कार्ड को देख कर एवं विवरण रजिस्टर में दर्ज़ कर के सेवा/भुगतान करने का विकल्प भी दिया गया है। इस के साथ ही यह भी जोड़ा गया है कि इन सब मामलों की समय-समय पर विशेष जांच करनी होगी। सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सामान्य तौर पर कोई कर्मचारी किसी गरीब और वंचित व्यक्ति की सेवा करने में इतना तत्पर नहीं होगा कि वह वो तरीका अपना कर भी सेवा उपलब्ध कराये जिस में उसे विशेष जांच का सामना करना पड़े। आधार कानून को अवैध ठहराने वाले एक मात्र जज ने अपने फैसले में यह दर्ज़ किया है कि हालांकि कानून में यह व्यवस्था की गई है कि व्यक्ति को पुष्टीकरण की वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सूचित करना अनिवार्य है और पुष्टीकरण के लिए शारीरिक छाप लेने के लिए उस की सहमति लेना आवश्यक है पर यह वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी और शारीरिक छाप से पहचान के पुष्टीकरण की सहमति न होने पर क्या करना होगा, यह कहीं स्पष्ट नहीं किया गया है (पृष्ठ 209/776) और पुष्टीकरण हेतु वैकल्पिक व्यवस्था भी पुष्टीकरण करने वाली संस्था पर छोड़ी दी गई है (पृष्ठ 309/876)। बहुमत के मुख्य फैसले में भी मात्र इतना यह कहा गया है कि ‘हमें बताया गया है कि किसी भी लाभार्थी को पुष्टीकरण में असफलता के चलते लाभ से वंचित नहीं किया जाएगा’। यह नोट करते हुए अदालत के बहुमत ने यह भी निर्देश देना आवश्यक समझा कि नियमों में पहचान की पुष्टि की उपयुक्त वैकल्पिक व्यवस्था कर दी जाए (554)। यह है सरकार के इस दावे की वास्तविकता कि आधार के चलते कोई भी लाभार्थी अपने अधिकार से वंचित नहीं रहेगा ।
इस लिए आधार लागू करने की सरकारी आर्थिक लागत में जोड़ी जानी चाहिए वंचित लोगों के पंजीकरण और पुष्टीकरण न होने के कारण अपने अधिकार से वंचित होने की सामाजिक लागत। फिर इस में जोड़नी होगी वो लागत जो पुष्टीकरण कर पाने वाले को भी वहन करनी होगी (वृद्ध को खुद चल कर जाना होगा, परिवार का कोई सदस्य या पड़ोसी उस की जगह नहीं जा पाएगा)। इन तीनों को मिला कर निकलेगी आधार की वास्तविक लागत। इस की तुलना आधार के चलते सरकारी आर्थिक सहायता में किसी व्यक्ति के एक बार से ज़्यादा लाभ लेने की संभावना पर रोक लगने के कारण, जो अदालत के निर्णय के बाद आधार का एक मात्र लाभ होने वाला है, सरकारी खर्च में होने वाली बचत से की जानी चाहिए। पर दुर्भाग्य से अदालत के फैसले में इस तुलना का ज़िक्र भी नहीं है। यहाँ तक कि आधार की गरीबों और वंचितों द्वारा चुकाई जाने वाली सामाजिक लागत को छोड़ो, आधार पर होने वाले खर्च तक का कोई अनुमान नहीं है।
आयकर दाताओं के लिए भी आधार अनिवार्य करने से उपरी तौर पर यह लग सकता है कि आधार अमीर-गरीब सब के लिए लागू हो गया है पर यह उपरी बराबरी झूठी है, छलावा है। यह सही है कि आयकरदाता को भी आधार पंजीकरण कराना होगा और आधार क्रमांक को अपनी रिटर्न में देना होगा। आधार पंजीकरण के लिए उसे अपनी शारीरिक पहचान, आँख की पुतली और उंगलियों के निशानों की छाप एक बार देनी होगी। परन्तु उस के बाद उसे फिर कभी यह छाप दोबारा नहीं देनी होगी (और जैसा पहले आ चुका है कालेधन वाले को तो कभी भी यह छाप नहीं देनी होगी)। इस के विपरीत गरीब को, किसान को या जिस किसी को भी सरकार से छोटी मोटी आर्थिक सहायता लेनी है, उसे तो अपनी उंगली की छाप बार-बार, हर बार देनी होगी।

वास्तव में आधार कार्ड का कोई वैधानिक आधार नहीं है। इस लिए इस पर किसी के हस्ताक्षर भी नहीं होते जब कि अन्य पहचान पत्रों पर जारी करने वाले के हस्ताक्षर अवश्य होते हैं। वैधानिक आधार तो आधार क्रमांक का है और यह आधार क्रमांक बिना शारीरिक पहचान यानी उंगली या पुतली की छाप, के बेमानी है। यह शारीरिक पहचान का प्रयोग ही है जो आधार को बाकी पहचान पत्रों से अलग और विशेष बनाता है। बिना शारीरिक पहचान की पुष्टि के केवल आधार क्रमांक का प्रयोग अतार्किक और बेमानी है। वर्तमान में जहां जहां बिना उँगलियों की छाप के, केवल आधार नंबर देने से काम चल रहा है, वह केवल तात्कालिक व्यवस्था है, आधार को एक बार फैलाने का तरीका है, इस का एक बार बाज़ार बनाना है। अंतत, जहां भी आधार अनिवार्य होगा, वहाँ कुछ बेहद सीमित अपवादों को छोड़ कर, बिना उंगली या पुतली की छाप दिये बिना काम नहीं चलने वाला। इस लिए गरीब का पुष्टीकरण में होने वाली परेशानियों से बार बार सामना होगा।
दूसरी ओर बाकी सब को, जिसे न सरकार से छोटी मोटी आर्थिक सहायता, जैसे बुढ़ापा पेंशन, या फसल मुआवजा लेना है और न जिस की एक नंबर की कमाई कर-योग्य है उसे आधार में पंजीकरण करवाना ही नहीं है क्योंकि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार बैंक खाते, फोन जैसी अन्य सब सेवाओं के लिए आधार की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है। यानी दो नंबर की कमाई वालों पर आधार का कोई असर नहीं होगा। एक नंबर की कमाई वाले बहुसंख्यक मध्यम वर्ग के लिए भी आधार के लिए केवल पंजीकरण अनिवार्य है, इस के अलावा उन का जीवन वैसे ही चलता रहेगा जैसे आधार से पहले चलता था। इस से स्पष्ट है कि आधार की मार मुख्य तौर पर वंचित और गरीब पर ही पड़नी है। इस संदर्भ में एक आंकड़े पर ध्यान देना आवश्यक है। सरकारी तौर पर यह बताया गया है कि 110 करोड़ से अधिक लोगों ने आधार कार्ड बनवा लिए हैं पर उपर दिये गए आंकड़ों के अनुसार अब तक केवल 63 करोड़ लोगों ने कम से कम एक बार पुष्टीकरण कराया है यानी केवल 63 करोड़ लोगों ने आधार का कम से कम एक बार प्रयोग किया है, इस के लिए दोबारा अपनी उंगली/पुतली के निशान दिये हैं । शेष 57 करोड़ लोगों ने आधार कार्ड लिया तो है पर उस का दोबारा प्रयोग नहीं किया है (जैसे हमने ऊपर दर्शाया है बिना उंगली के निशान दिये खातों इत्यादि को आधार से जोड़ना आधार का वास्तविक प्रयोग नहीं है, भले ही इस की आधिकारिक मान्यता हो, क्योंकि आधार की विशिष्टता ही पहचान को उंगली/पुतली की छाप से जोड़ना है।)
हालांकि ज़्यादा ज़ोर आधार के माध्यम से कर-चोरी, कालेधन और भ्रष्टाचार को रोकने, आतंकवाद से लड़ने और राष्ट्रीय सुरक्षा, और सब को, विशेष तौर पर जिस के पास कोई पहचान नहीं है, उसे एक पहचान और ऐसी पहचान जो देश में कहीं भी किसी भी काम में प्रयोग की जा सके और व्यक्ति को कई कई पहचान पत्र न रखने पड़ें, एक सर्व-स्वीकार्य पहचान देने पर था परन्तु दो और लक्ष्य भी थे; एक पूरी तरह स्पष्ट और एक अध्छुपा। एक था अधिकाधिक सरकारी सेवाओं एवं सुविधाओं का नकदीकरण जिसे सरकारी भाषा में ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (डीबीटी) कहा गया है। इस के लिए सरकार ने अलग से एक वेब साइट भी बना रखी है)। इस नकदीकरण को रसोई गैस के संदर्भ में लागू भी कर दिया गया है पर यह नकदीकरण रसोई गैस तक सीमित नहीं रहना था/है। न ही यह वजीफे/पेंशन का सीधे लाभार्थी को भुगतान करने तक सीमित रहना था/है। अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका को कम से कम करने और मुक्त बाज़ार व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए अधिकाधिक सरकारी सेवाओं और सुविधाओं का नकदीकरण सरकारों की नीति बन चुकी है। स्वास्थ्य बीमा योजना और खाद्यान्न खरीद के स्थान पर भावांतर सरीखी योजनाएँ इस नकदीकरण की मुहिम का ही अंग हैं। और नकदीकरण के लिए आधार आवश्यक है ताकि एक व्यक्ति बार बार पैसा न ले जाये। हस्पताल में इलाज तो आदमी दो बार नहीं करा सकता, फसल भी दो बार नहीं बेच सकता, एक ही फसल की दो बार खरीदी भी नहीं दिखा सकते, पर अगर आप्रेशन करवाने के स्थान पर, फसल बेचने के स्थान पर उस के एवज़ में भुगतान लेना/देना है तो वो कई-कई बार लेने/देने की संभावना बढ़ जाती है। अनिवार्य आधार इस दोहराव पर निश्चित तौर पर काफी हद तक रोक लगाता। यही इस का मुख्य लाभ हो सकता था।
आधार के जिस फायदे का औपचारिक तौर पर खास ज़िक्र नहीं था, दबा छुपा था, वो था आंकड़ों को एकत्रित करना और उस का व्यावसायिक प्रयोग। आज आंकड़े सोना हैं, बड़ी कमाई का आधार हैं। हर व्यक्ति और हर काम के लिए ‘अनिवार्य’ आधार के माध्यम से हर व्यक्ति के हर दिन के व्यवहार संबंधी बहुत सारे आंकड़े इकट्ठे हो जाते जिस के चलते हर व्यक्ति की 24 घंटे या जिसे आज कल 24x 7 कहते हैं यानी हर क्षण निगरानी, जासूसी हो सकती थी। इस लिए ही निजता हनन का खतरा आधार विवाद में सब से बड़ा मुद्दा बना है और आधार कानून के कई हिस्सों को अवैध ठहराया गया है। इन आंकड़ों का व्यावसायिक उपयोग भी हो सकता था। कंपनियों के इस व्यावसायिक उपयोग के माध्यम से ही आधार परियोजना पर आने वाले खर्च की भरपाई और कमाई होनी थी (बाकी भरपाई आधार के प्रयोग के लिए लगने वाले शुल्क से होनी थी)। पर इस तरह की आंकड़ों की प्राप्ति और उस के व्यावसायिक प्रयोग के लिए यह आवश्यक है आधार का हर व्यक्ति और हर काम के लिए अनिवार्य होना। इस लिए ही सरकार इस पर इतना ज़ोर लगा रही थी, हर काम के लिए इसे आवश्यक बना रही थी।
परंतु ऐसी सर्वव्यापी आधार परियोजना के खतरों को देखते हुये ही कांग्रेस सरकार के समय 2010 में संसद में लाया गया आधार बिल भारतीय जनता पार्टी के श्री यशवंत सिन्हा के नेतृत्व वाली संसदीय समिति की अनुमति भी न पा सका, संसद की बात तो दूर रही। भाजपा के यशवन्त सिन्हा की अध्यक्षता वाली इस संसदीय समिति ने प्रस्तावित कानून को अनुमोदित न करने के कई कारण बताए थे । उन में से कुछ निम्नलिखित हैं: ग़ैर-नागरिकों का भी इस में शामिल किया जाना; अन्य कार्डों की आवश्यकता का फिर भी बने रहना; लाभार्थियों की सही पहचान की समस्या का बने रहना; धोखाधड़ी का ख़तरा होना; पंजीकरण और सत्यापन में आने वाली दिक्कतें; सरकार के भीतर विभिन्न मन्त्रालयों में इस मुद्दे पर मतभेद; अब तक का अन्तर्राष्ट्रीय अनुभव अच्छा न होना; व्यवहार्यता और लाभ-लागत विश्लेषण की कमी; तकनीक/प्रौद्योगिकी की अविश्वसनीयता; अपनाई गई प्रक्रियाओं और निजी कम्पनियों के शामिल होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा को होने वाला ख़तरा इत्यादि। आधार कानून बन जाने से यशवन्त सिन्हा संसदीय समिति की केवल एक आपत्ति का निदान हुआ है। समिति ने यह भी कहा था कि इस का कोई कानूनी आधार नहीं है (क्योंकि तब इसे बिना संसद की अनुमति के शुरू किया गया था)। चूंकि अब आधार को कानूनी जामा पहना दिया गया है इस लिए इस आपत्ति का निदान हो गया है। भाजपा के श्री यशवंत सिन्हा समिति की बाकी आपत्तियाँ जस की तस हैं।
क्योंकि बिना यशवंत सिन्हा संसदीय समिति की आपत्तियों का निदान किए इसे संसद (दोनों सदनो) से पास करना संभव नहीं था, इस लिए आधार को लागू करने की ज़िद में आधार विधेयक को ‘धन’ विधेयक के तौर पर केवल लोकसभा से पास करा कर, इसे लागू कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अब इसे वैधानिक दर्जा भी दे दिया है पर कोर्ट ने जिस रूप में, जितनी काँट-छांट के साथ इसे यह वैधानिक दर्जा दिया है उस के चलते अब आधार केवल गरीब के लिए (या आयकरदाता के लिए) अनिवार्य रहा है, और वो भी केवल कुछ सरकारी सेवाओं/सुविधाओं के लिए। अब यह अपने प्रारूप के अनुरूप व्यापक तौर पर अनिवार्य नहीं रहा। आधार के अनिवार्य न रहने से, इस के आवांछित और खतरनाक होने के बावजूद, जो थोड़े बहुत लाभ मिल सकते थे, जैसे अपराधियों की पहचान, काले धन पर रोक, वो भी अब नहीं मिल पाएंगे। ‘धन’ विधेयक के तौर पर आधार को लागू करने का दाव सरकार को उल्टा पड़ गया है। गरीब का जीना मुश्किल करने वाला आधार अब सफ़ेद हाथी साबित होगा क्योंकि मोटे तौर पर पूरी व्यवस्था पर खर्चा तो उतना ही रहेगा पर इस से मिलने वाले सीमित लाभ और भी कम हो गए हैं। पर अगर सरकार नकदीकरण की अपनी आर्थिक नीति पर कायम रहती है तो इसे आधार को अनिवार्य और सर्वव्यापी बनाना ही होगा वरना सरकार का खर्च और बढ़ जाएगा जिस के लिए कर बढ़ाने पड़ेंगे और सारा झगड़ा सरकार का खर्च और कर कम करने का ही है। भले ही आज सरकार अदालत के निर्णय को अपनी जीत बता रही हो, पर अगर सरकार वर्तमान आर्थिक नीति पर चलती रही तो देर सवेर, शायद अगले चुनावों के बाद, सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को चुनौती देगी और आधार को फिर अनिवार्य और सर्वव्यापी बनाने का प्रयास करेगी।
दूसरी ओर, मानव अधिकार हनन के नजरिये से, गरीबों और वंचितों के पक्ष में आधार का विरोध करने वाले भी आधार को अदालती चुनौती देंगे ही क्योंकि उन की समस्याओं का कोई निदान नहीं हुआ है। आधार का फैलाव सीमित होने से, कुछ हद तक केवल मध्यम वर्ग को राहत मिली है। गरीब और वंचित तबको की दृष्टि से देखें तो उन पर आधार की जकड़न जस की तस है। जिन दिक्कतों का ज़िक्र ऊपर आ चुका है, उन के अलावा एक ओर बड़ा व्यावहारिक खतरा यह है कि मशीन असली उंगली और नकली उंगली में फर्क ही नहीं कर सकती। इस का अर्थ है कि आप की उंगली के निशान की नकल कर के कोई अपराधी ‘आप’ बन कर अपराध कर सकता है। यानी आप की पहचान चोरी हो सकती है। यह दूर की कौड़ी नहीं है आप खुद प्रयोग कर के देख सकते हैं। आज कल ऐसे फोन आ गए हैं जो उंगली रखने से खुलते हैं। मोमबती जला कर फोन के मालिक की उँगलियों पर थोड़ा सा मोम डाल कर उँगलियों की छाप मोम पर ली जा सकती है और फिर यह मोम वाली छाप का प्रयोग कर, कोई भी उस फोन को खोल सकता है। यह प्रयोग कर के देखना चाहिए। इतना आसान है आप की उँगलियों की छाप को चोरी करना और फिर उस का दुरुपयोग करना। उँगलियों की छाप की चोरी यानी आप की पहचान की चोरी।
तो संभावना यह है कि आधार को दोनों पक्षों की ओर से अदालत में चुनौती मिलेगी। पर क्या आधार केवल कानूनी दाव पेचों का मसला है? अभी तक आधार को केवल कानूनी चुनौती मिली है, और वो भी कुछ लोगों के दृढ़ निश्चय के चलते। देश में यह सड़क पर उतरने का मसला नहीं बना। इस का एक कारण यह है कि आज की आर्थिक नीतियों की संगति में होने के कारण मुख्य धारा की पार्टियों का आधार को समर्थन रहा है। कांग्रेस के राज में आधार परियोजना की शुरुआत हुई थी और अब उस की धुर विरोधी वर्तमान सरकार ने बड़े ज़ोर शोर से इसे आगे बढ़ाया है। जब मुख्य धारा की पार्टियों में किसी मुद्दे पर सहमति होती है तो आम जनता को तो सच्चाई का पता ही नहीं चलता। उसे पता ही नहीं चलता की क्या उस के हित में है और क्या नहीं? इस के चलते गरीबों और वंचितों के पक्ष में काम करने वाले लोगों ने भी ज़ोर-शोर से आधार बनवाने का काम शुरू कर दिया था, मोहल्ला कमेटियों ने आधार पंजीकरण शिविर लगवाने शुरू कर दिये। आधार के खतरों की खबर कुछ लोगों को लगी और उन्होने ने तन मन धन से इसे कानूनी चुनौती दी। व्यक्ति तो अधिक से अधिक कानूनी चुनौती ही दे सकते हैं (हालांकि कानूनी चुनौती भी अकेले अकेले नहीं दी जाती; इस के लिए भी सामूहिकता ज़रूरी होती है, कई लोगों की मेहनत होती है पर फिर भी यह छोटा संगठित प्रयास होता है)। आंदोलन करने के लिए तो संगठन चाहिए और आधार का संगठित विरोध नहीं हुआ है।
आधार कानूनी मुद्दा बाद में है, पहले यह सरकारी नीति का प्रश्न है। अदालत केवल कानूनी दृष्टि से ही आधार का मूल्यांकन कर सकती है, अन्यथा नहीं; यह बिन्दु अदालत ने भी कई बार रेखांकित किया है। नीतिगत मुद्दों को राजनैतिक चुनौती दी जानी चाहिए। इन्हें जनता की अदालत में ले जाना चाहिए। अब समय आ गया है कि आधार को सड़कों पर चुनौती दी जाये, संगठित चुनौती दी जाये, राजनैतिक चुनौती दी जाये। चूंकि अब आधार अधमरा हो चुका है, एक शुभेच्छा यह हो सकती है कि सरकार को सद्बुद्धि आएगी और अब मात्र दोहराव/दोहरा लाभ रोकने के सीमित उद्देश्य के लिए आधार को लागू नहीं करेगी। परंतु, क्योंकि आधार आज की आर्थिक और (लोकतन्त्र विरोधी) राजनैतिक नीतियों की संगत में हैं इस लिए ज़्यादा संभावना यही है कि सरकार पीछे हटने की बजाय, इसे अनिवार्य करने की ओर बढ़ेगी; भले ही यह तुरंत न हो कर अगले चुनावों के बाद हो। इस लिए न सरकार की सदिच्छा पर निर्भर रहना चाहिए और न कानूनी दाव पेच पर। इसे सड़कों पर, जनता की अदालत में, राजनैतिक तौर पर लड़ना चाहिए।
एक दो बाते ओर। जैसा कई बार रेखांकित किया जा चुका है अदालत के फैसले के बाद, आधार केवल एक व्यक्ति का एक से अधिक बार किसी योजना का लाभ रोकने में सफल होगा, दोहराव रोकने में सफल होगा। सवाल उठता है क्या इस दोहराव को रोकने का कोई और तरीका नहीं हो सकता? हमने ऊपर चर्चा की है कि बिना आधार के भी कंप्यूटरीकरण मात्र से भी ये दोहराव काफी हद तक कम हो सकता है, हुआ है। लेकिन दोहराव रोकने के अन्य, गैर-तकनीकी तरीके भी है। जहां तक सरकारी स्कीमों में ‘लीकेज’ (यानी सही व्यक्ति तक सहायता/सेवा न पहुँचना) की बात है, जिसे सरकारी दावों में 50% तक कहा गया है, उन के बारे में वर्तमान कानूनी व्यवस्था यह है कि, कम से कम ग्रामीण इलाकों में, ऐसी सब सरकारी फायदे ग्राम सभा की अनुमति के बाद ही मिलते हैं, फिर चाहे विधवा पेंशन हो या बुढ़ापा पेंशन। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की सूची ग्राम सभा द्वारा पारित होनी अनिवार्य है। क्या जो सरकार प्रचंड बहुमत से आने का दावा करती है, जिसके करोड़ों सदस्य हैं और जिस के प्रधान सीधे जनता से मन की बात करते हैं, जिस के न केवल बूथ प्रभारी हैं, बल्कि जिस के पन्ना (या आधा पन्ना?) प्रभारी (वोटर लिस्ट के एक पन्ने के प्रभारी) पूरे देश में फैले हैं, जिस स्वयंसेवक संघ की देश भर में हजारों नियमित शाखाएँ लगती हों, वो यह सुनिश्चित नहीं कर सकता की ग्राम सभा की बैठके कागज़ी न रह कर वास्तविक हों और वहाँ लाभार्थियों का चयन सही हो? अगर नहीं कर सकता तो किस काम के हैं ये बूथ प्रभारी, और किस काम की है ये मन की बात। (और यह बात युवा दिलों की धड़कन सरीखे अन्य सब नेताओं और पार्टियों पर भी लागू होती है।) अगर ग्रामसभा वास्तव में होने लग जाएँ, तो आधार से आगे बढ़ कर न केवल दोहरे लाभ लेने पर रोक लगेगी अपितु नकली गरीबो पर भी रोक लगेगी और असली गरीब को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जाएगा; यानी वो काम भी हो पाएगा जो काम आधार कर ही नहीं सकता। पर आज के दौर में शायद बूथ प्रभारियों का काम केवल चुनाव जीतना है, समाज को सही दिशा देना नहीं, यह सामाजिक क्रांति का नहीं जुमलों का दौर है और जुमले वाले व्यक्ति या समाज को बदलने पर कम और तकनीक बदलने पर ज़्यादा भरोसा करते हैं, तकनीक को सर्वव्यापक अमृतबाण मानते हैं। पर जो सरकार/पार्टी/व्यवस्था यह सुनिश्चित नहीं कर सकती की ग्राम सभाएं वास्तव में हो, जो वर्तमान कानून को वास्तविक अर्थों में लागू नहीं कर सकती, उस से यह आशा करना कि वो नए कानून को सही अर्थ में लागू कर पाएगी और कंपनियों, विशेष तौर पर विदेशी कंपनियों पर नियंत्रण कर के यह सुनिश्चित करेगी कि हमारी उँगलियों की पहचान सुरक्षित रहे, हमारा डाटा सुरक्षित रहे, भोलापन नहीं बेवकूफी होगी। और इस मामले में दाव पर केवल गरीब ही नहीं हैं, अपितु सब आयकर दाता, यानी ईमानदार मध्यम वर्ग भी है। (वैसे भी बहुमत के फैसले में यह कहा गया है कि आधार कानून की धारा 7, जिस के तहत सब्सिडी इत्यादि के लिए आधार को अनिवार्य किया गया है, उस परिभाषा को सर्वव्यापी न बना कर सीमित योजनाओं को इस के तहत लाना चाहिए (पृष्ठ 555) यानी आधार के दायरे का बढ़ कर मध्यम वर्ग को भी लपेट में लेने का खतरा तो बना हुआ है।) हम रोज़ देखते हैं कि जो सरकार/व्यवस्था स्कूल/हस्पताल ठीक से नहीं चला सकती, वो सरकार, शिक्षा और स्वास्थ्य के बाज़ार या निगमों को ठीक से नियंत्रित भी नहीं कर सकती।
अंत में, आखिर आधार क्यों? आधार तो ब्रांड का नाम है, प्रचलित नाम है। इस का वास्तविक नाम तो ‘विशिष्ट पहचान क्रमांक’ है। उच्चतम न्यायालय के बहुमत के निर्णय के शुरुआत में ही इस विशिष्टता को रेखांकित किया गया है: यह कहा गया है कि ‘विशिष्ट होना सर्वोतम होने से भी बेहतर होता है क्योंकि विशिष्ट होने का अर्थ है आप सरीखा कोई भी नहीं है’। पर क्या उँगलियों और पुतलियों की पहचान वास्तव में विशिष्ट होती है? इस के पक्ष और विरोध में बहुत से तर्क दिये जाते हैं, पर हमारा तो एक ही प्रश्न है कि अगर यह पहचान विशिष्ट/अपरिवर्तनीय होती है तो हर 10 साल बाद (बच्चों के लिए हर 5 साल बाद) दोबारा इस शारीरिक पहचान का पंजीकरण करने का प्रावधान क्यों है, धारा 6 में नियमित अंतराल पर शारीरिक पहचान दोबारा मांगने का प्रावधान क्यों? क्या 5/10 साल बाद दोबारा उँगलियों/पुतली की छाप देने की व्यवस्था ही यह स्पष्ट तौर पर इंगित नहीं करती कि यह पहचान भी पूरी तरह विशिष्ट/अपरिवर्तनीय नहीं है? स्पष्ट है कि आधार/‘विशिष्ट पहचान क्रमांक’ का कोई तकनीकी आधार नहीं है भले ही अब इसे उच्चतम न्यायालय का सीमित समर्थन मिल गया हो।
पुंश्चय: आधार को सर्वव्यापक और अनिवार्य बनाने पर रोक लगाने के अलावा अदालत ने यह भी आदेश दिया है कि सब्सिडी इत्यादि लाभ के लिए आधार की अनिवार्यता कानूनी होने के बावजूद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी पात्र व्यक्ति के अधिकारों का हनन न हो और इस के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाए। विशेष तौर पर अदालत ने न केवल स्कूलों में दाखिले के लिए आधार की अनिवार्यता को अवैध ठहराया है अपितु स्पष्ट रूप से यह भी कहा है कि छात्रवृति इत्यादि के लिए आधार की अनिवार्यता वैध होने के बावजूद यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई योग्य छात्र इस से वंचित न रहे (पृष्ठ 402)। पर जिस देश में बिना कानून के आधार लगभग सर्वव्यापक बनाया जा सकता है, वहाँ कोई छात्र/व्यक्ति कैसे इस निर्देश का फायदा उठा पाएगा। इस के लिए भी संगठित संघर्ष आवश्यक होगा।

(राजेन्द्र चौधरी, भूतपूर्व प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक एवं ‘आधार’ और ‘सब्सिडी’ की पाठशाला (2014) के लेखक हैं. संपर्क : rajinderc@gmail.com)


4 thoughts on “‘आधार’ न बचा, न मरा, बचा केवल मदमस्त सफ़ेद हाथी : राजेन्द्र चौधरी

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