पानी की फ़र्माबरदारी: मुरीद बरघूती /अनुवाद: आयेशा किदवाई

You can see the English translation of the original poem by the Palestinian poet Mourid Barghouti , after this translation into Hindustani by AYESHA KIDWAI

कितनी कला, बारीक़ सोच, हिचकिचाहट, और क़ुरबानी की रातें,
कम या ज़्यादा कीमत अदा कर,
तुम्हें लगती हैं एक सरल सा
आला अविष्कार करने में?

एक तानाशाह बनाने में तुम्हें सिर्फ
एक बार ही घुटना टेकना है.

****

नहीं, वो कोई राइनो नहीं है, ना कोई अजूबा,
दरअसल, हो सकता है कि वो तुम्हारी ही तरह दिखे. या मेरे जैसे.
बुद्धू मत बनो. वो उसके पंजे थोड़ी हैं
बस मामूली नाख़ून हैं, ठीक तुम्हारे जैसे.
और नहीं, ये उसके खुर नहीं
ये उसके सिर्फ आठ, या शायद नौ, नंबर के जूते हैं.
जितना तुम सोचते हो, वो उस से कहीं ज़्यादा हल्का है. नहीं, एक टन से कहीं कम.
एक आम आदमी का वज़न ही है उसका
सत्तर-अस्सी किलो से ज़्यादा नहीं
क्या वो उसका सींघ है? नहीं
वो बस उसकी छोटी, चपटी, चढ़ी हुई नाक है, और हाँ
तुम्हारे और मेरे जैसे, उसे भी नज़ला हो सकता है. ख़ून भी उसका बह सकता है.

जब वो कुर्सी पर विराजमान होता है
वो कोइ बादलों पर सवार आसमान से नहीं उतरता
नहीं, तुम्हारे और मेरे कन्धों पर लद-चढ़कर
काल की गद्दी पर पैर झुलाये बैठता है.
वो भी सिर्फ दो ही पैर हैं, छः नहीं, चेक करना चाहो तो.
उसका आइना उस पर फ़िदा है. वो अपने आइने पर फ़िदा है. दोनों का अमर प्रेम.

उसे क़ानून से बेहद लगाव है. जो भी घर वो जलाता है, जिसका भी वो क़त्ल करता है,
जिस भी नरसंहार का वो आदेश देता है, सब क़ानून के दायरे में ही होता है.
अपनी अक़्ल की तौहीन मत करो, मत बैठो
आस लगाए. इस जोत को टिमटिमाना है, बुझना है, और एकाएक फिर झिलमिलाना है
जब तक यह गद्दी पर है.

***

वो अपने नखरों को भी अपने बलबूते का निशाँ मानता है.
वो चाहता है कि हम  पानी की तरह बने
जो प्याले की तह में जमा रहे.
जब वो हमें उँडेले, हम झुक जाएं
बिना एक लफ्ज़ कहे.

पर जब हम, उसकी मर्ज़ी मुताबिक़, पानी बन गए
तो उसके हाथ  फ़रियाद में उठ पड़े,
हैरान कि  वो  डूब रहा है.

 The Obedience of Water
Mourid Barghouti
Translated into English by George Szirtes

How many nights of art, close study, hesitation and sacrifice, at little or great expense, do you need to invent
the simplest of gadgets?

All you need to invent a tyrant is a single
bend of the knee.

***

No, he’s not a rhino, not a miracle,
in fact he may look like you. Or me.
Don’t be fooled. Those are not his claws
they are perfectly normal nails like yours.
Nor are those hooves, no
they are his size eight,
possibly size nine, shoes.
He’s less heavy than you think. No, not a ton,
just the weight of an ordinary man,
say seventy or eighty kilos.
Is that his horn? No
its his smug little, snub little nose and, yes,
he might catch a cold like you and I
He might even bleed.

When he takes his seat he doesn’t descend from heaven
on a cloud, no, he climbs up on our shoulders, yours and mine
and sits in the saddle of time dangling his legs,
two legs not six, if you care to check
His mirror loves him. He loves his mirror. The love is mutual.

He adores the law. Any house he burns, anyone he kills,
any massacre he orders, is done in full accordance with the law.
Dont insult your own intelligence
by hoping. Let that flame flicker, die, and unaccountably flicker again
while he’s in charge.
***
He regards even his tantrums as a sign of strength.
He would prefer us to be as water,
to see us stagnating at the bottom of the cup.

We must bow when he pours us out, Not allowing a word to escape
and yet when we behaved like water as he intended
he raised his hands in mute appeal, astonished to be drowning.

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