लो मैं उठी: माया एंजलो/अनुवाद: निवेदिता मेनन

MAYA ANGELOU recites her iconic poem Still I Rise, followed by the translation into Hindustani by NIVEDITA MENON below.

 

चाहे लिख दो मेरी कहानी,

झूठी, विकृत, कडवी सी,

चाहे कुचल दो  मिट्टी में,

उड़ जाऊंगी, मैं धूल सी.

 

मेरी गुस्ताखी से हो नाराज़?

क्या इतना दुःख है दिल में?

मेरी चाल का यह गुरूर,

मानो तेल के कुँए बैठक में.

 

निश्चित जैसे चाँद सूरज,

निश्चित जैसे ज्वार,

जैसे उम्मीदों  का उछलना,

वैसी  मेरी भी उड़ान

 

चाहा देखना मुझे टूटी  हुई ?

झुका सर, आँखें झुकी?

गिरते कंधे, आंसू जैसे,

अपनी चीखों से थकी?

 

मेरे अहंकार से इतना गुस्सा?

सुनके गोया निकले  जान,

मेरा हँसना जैसे आँगन में

उभरे सोने के खदान?

 

शब्दों से चाहे  मारो  गोली,

हो नज़र पैनी छूरी सी,

दफना लो अपनी नफरत से,

उड़ जाऊंगी, मैं हवा सी.

 

हूँ मैं सेक्सी, करोगे क्या?

डूबोगे हैरत और गम में?

मैं नाचती ज्यों जडे हैं हीरे,

जांघों के संगम में?

 

लो मैं उठी

शर्मनाक इतिहास की झोपड़ियों से.

लो मैं उठी,

दर्द में डूबे अतीत से.

हूँ मैं काला समंदर, उछलता, अपरम्पार,

बढती, उमड़ती, खेलती हुई, लिए प्रलय का  ज्वार.

 

छोड़ आई मैं दहशत की रातें,

लो मैं उठी,

सुबह की अद्भुत उजियारी में,

लो मैं उठी.

 

पुरखों  से तोहफे लायी हूँ मैं,

गुलाम की उम्मीद मैं, सपना हूँ मैं.

उठती हूँ मैं

उठती हूँ मैं,

उडती हूँ मैं.

 

2 thoughts on “लो मैं उठी: माया एंजलो/अनुवाद: निवेदिता मेनन”

  1. What an overwhelming translation and how beautiful the thouhts flow from one language to another!

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