मुक्तिबोध के ‘नौजवान का रास्ता’

मुक्तिबोध शृंखला:2

“मैं कुछ शिकायत करना चाहता था इस दुनिया के खिलाफ लेकिन मैं रुक गया, सोचते हुए कि आखिर मैं अपने को दुनिया से अलग क्यों मान लूँ. दुनिया का खाकर, दुनिया का पीकर, दुनिया के मनुष्य से प्रेम कर, उससे अलग समझना अपने स्व को ज़रूरत से अधिक ऊँचा रखना है—दुनिया ने हमको बनाया, अब हमीं दुनिया को बनाएँगे.”

‘आधुनिक समाज का धर्म’ नामक टिप्पणी की शुरुआत यों होती है. यह आत्मविश्वास कि हम इस दुनिया को बना सकते हैं इस विनम्रता से संयमित किया जाता है कि उसके साथ ही खुद को बनाने की जिम्मेवारी भी है. उसके साथ पहली शर्त इस ज़िंदगी से मोहब्बत. ‘नौजवान का रास्ता’ के आरम्भिक अंश की पंक्तियाँ हैं,

“ज़िंदगी बड़ी खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं. अच्छे आदमी क्यों दुःख भोगें—इतने नेक और इतने अभागे. दुनिया में बुरे आदमियों की संख्या नगण्य है, अच्छे आदमियों के सबब ज़िंदगी बहुत खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं.”

शहादत इसलिए किसी के, खासकर नौजवान की ज़िंदगी का उसूल नहीं हो सकता. उसे ज़िंदगी से जूझना है. इसी उदास और विषादपूर्ण जीवन से. और वह खुद जीवित रहने की इच्छा को ज़िंदा रखते हुए. अपनी ज़िंदगी किसी और के हवाले नहीं की जा सकती. उसपर अपना नियंत्रण ही होना चाहिए.

नौजवान है कौन?

“नौजवान में श्रद्धा का जो आवेग होता है, हृदय की जो तेज़ निगाहें होती हैं, उनपर जिन्हें आप ज़िंदगी के तजुर्बात कहते हैं (यानी सांसारिक दृष्टि) उसकी धूलभरी परतें नहीं छाई रहतीं. फलतः नौजवान यदा-कदा आपको, अपने अनुभव के कारण, मूरख प्रतीत हो सकता है. लेकिन यही उसकी अच्छाई है.”

नौजवान को समझदार होने की सलाह देना जवानी का खून कर देना है:

“जो नौजवान 19-20-21 साल में ही बूढों की खूसट सांसारिक आँखों से ही दुनिया को देखने लगता है, समझ लीजिए उसमें साहस की प्रवृत्ति, नए अनुभव प्राप्त करने की जिज्ञासा और क्षमता, तथा जीवन के नव-नवीन उन्मेष का नितांत अभाव है. ऐसा नौजवान नायब तहसीलदार या आई ए एस हो सकता है. लेकिन वह देश के किस काम का!”

यह सब तो ठीक है लेकिन नौजवान इस दुनिया में अपना रास्ता बनाए कैसे आखिर? क्या भगत सिंह, सुभाष बोस  की कीर्ति गाथा गाकर, ग़दर पार्टी और अनुशीलन दल की यशोगाथा सुनाकर यह किया जाएगा? नौजवानों के आगे जो उलझनें हैं, उनको समझने का प्रयास न तो हमारे उपन्यास ने किया, न किसी और ज्ञानशास्त्रीय व्यवस्था ने. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद के नामोच्चार भर से नौजवान के मन में जो ढेर सारे सवाल एक दूसरे से टकराते हुए घूम रहे हैं, उनके जवाब नहीं मिलते. आखिर बुजुर्गों की दुनिया में उसे ‘नौकरी करो, पैसा लाओ’, परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ाओ के नारे ही सुनने को मिलते हैं. लेकिन नौजवानी की ताब लाना सबके बस की बात नहीं:

“किसमें वह ताकत है कि जो उसके जोश, उत्साह और उमंगों का भार अपने हृदय में झेल सके, उसके आदर्शवादी प्रेम और त्यागभरी श्रद्धा के समस्त अभिप्रायों को समझ सके! बहुत कम लोग होते हैं, जनाब, जिनमें यह ताकत, यह फौलादी सीना है.”

तजुर्बेकार लोग ‘नमक के दारोगा’ मुंशी वंशीधर के पिता की तरह ही होते हैं अक्सर. समझौते को बुद्धिमानी और प्रतिभा का नाम देते हैं. “लेकिन नौजवान मूलभूत प्रश्न उठाता है!! और उसके जवाब!!”

मूलभूत प्रश्न है कि

“हिंदुस्तान जैसे देश में – जहाँ अनन्य भूमि है, रत्नगर्भा धरित्री है, और उर्वर वसुंधरा है, निरभ्र आकाश है, भव्य गंभीर मेघराज है, और उत्तरस्थ हिमालय नगाधिराज है, विद्युत् शक्ति जल शक्ति भूमि शक्ति है, उस देश में अगर नौजवानों के छाती की हड्डियाँ निकल आएँ, चप्पल की कीलें पैर में लगातार छेद कर रही हों…”

यानी समाज के बड़े नौजवान तबके को अपनी ज़िंदगी का मकसद न मिल पाए, उसके नशे और पेशे का मेल न हो पाए, उस समाज से नौजवान तालमेल कैसे बैठाए? जिस समाज ने “मनुष्यता के रत्नों, इन नौजवानों को इस कदर पीस डाला है”, उसे “हमेशा के लिए ज़मीन में गाड़ देने के लिए भुजा ऊपर उठ जाती है.”

सवाल मुक्तिबोध भी वही उठाते हैं जो उनके बहुत पहले प्रेमचंद ने उठाए थे:

“…साधारण मध्यवर्गीय और अन्य गरीब वर्ग में ईमानदार और प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और कार्योत्सुक, दुर्दमनीय और त्याग के लिए आकुल नौजवानों की कमी नहीं है, जिनकी मेधा, जिनकी प्रतिभा, जिनकी सूक्ष्म दृष्टि, जिनका धीरज, जिनकी गंभीरता किसी सर्वोच्च देश के नौजवानों से बराबरी का मुकाबला कर सकती है.”

फिर यह युवता इतनी जल्दी मुरझा क्यों जाती है? क्यों यह प्रश्नाकुलता स्वीकार की मुद्रा में शिथिल हो जाती है? कारण है तालीम का अकाल.

“साक्षरता प्रसार, समाज-शिक्षा तालीम का स्थान नहीं ले सकते. तालीम के अंतर्गत अपने पेशे का सिर्फ ज्ञान नहीं आता, वरन् दुनिया के सभी मुख्य विषयों की अच्छी खासी जानकारी भी सम्मिलित है.”

इस तालीम से नौजवानों को वंचित रखा जा रहा है. बिना इस तालीम के, जो ज्ञानार्जन का जरिया है, युवा अपना पूरा अर्थ, अपने जीवन का मकसद भी नहीं समझ पाएँगे. उस शिक्षा को सिर्फ एक वर्ग तक सीमित रखकर जो साजिश नौजवानों के खिलाफ की जा रही है, जबतक उससे नहीं लड़ें, नौजवानों से शिकायत का कोई मतलब नहीं. साहस या दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी ज्ञान से जुड़ी है. आगे चलकर मुक्तिबोध ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान की अवधारणा का आविष्कार करनेवाले हैं, लेकिन ज्ञान और संवेदना के बीच जो रिश्ता है, उसकी तरफ इस लेख में इशारा किया जा रहा है. प्रश्न सिर्फ तालीम के हक का नहीं, ज्ञान के अधिकार का भी है. बौद्धिकता को संकुचित नहीं किया जा सकता.

जिस किस्म के समाज में हम हैं, वह नौजवानी को कुचलकर नष्ट कर देने में उस्ताद है. उसके नौजवान की सारी ऊर्जा, पूरी ताकत सिर्फ अपने लिए जीविकोपार्जन का साधन खोजने और उसमें कार्यकुशलता प्राप्त करने में खर्च हो जाती है.

“चिंता-व्यथा उसके भाग्य में लिखी हुई-जैसी लगती है. वह ऊपर से चाहे जितना हँसता रहे, उदासी उसे घेरे रहती है.”

फिर क्या करें?

“सिर्फ ज़माने भर को गाली देने से, मात्र सामाजिक आलोचना से, व्यक्ति खुद को बुद्धिमान भले घोषित कर ले सके, वह निज के सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों से, व्यक्तिगत और नितांत आत्मपरक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से कभी भी बरी नहीं हो सकता.”

कई बार सामाजिक आलोचना अपने “कमजोर अहं” की रक्षा का एक उपाय बन जाती है.

“किन्तु यह स्पष्ट है कि इस रक्षा पाँतियों के अंदर रहकर कमजोर अहं सुदृढ़ नहीं हो सकता.”

समाज के अन्याय का हवाला देकर इस कमजोर अहं को सहलाते रहने से उसकी मदद नहीं होती. यह अहं है क्या? मुक्तिबोध के पाठकों को इसने काफी परेशान किया है. उसे समझना इतना भी मुश्किल नहीं:

“अहं से मेरा मतलब अपनी निजता की सत्ता से है.”

इस निजता की सत्ता की गरिमा को समझे बिना जनता या समाज के लिए संघर्ष भी नहीं किया जा सकता. इसीलिए

“शोषण व्यवस्था की निंदा तथा प्रतिक्रियावादियों के विरुद्ध आलोचना करने के साथ-ही साथ हमारा यह आदि कर्तव्य हो जाता है कि हम आत्म आलोचन के हथियार से खुद पर नश्तर लगाकर वे सब कमजोरियाँ दूर करें जो हमारे उत्तरदायित्व की पूर्ति के मार्ग में बाधक हो रही हैं या बाधक बन सकती हैं.”

आत्मालोचन और आत्मभर्त्सना में फर्क को याद रखना ही चाहिए. वैसे ही जैसे समाज की आलोचना और उसमें किसी तरह की संभावना से इंकार में होना चाहिए. आत्म पीड़ा, आत्म भर्त्सना और आत्म दया निष्क्रियता का  सुंदर बहाना भी है.

“आत्मभर्त्सना कभी कभी सही भी होती है, किन्तु अपने अन्दर प्रवृत्ति रूप में उसकी उपस्थिति आत्मविश्वास को सुरंग लगा देती है और फलतः व्यक्तित्व को अंदर से खोखला कर देती है.”

आत्मालोचना अगर आपको लाचार कर रही है, अगर वह “भुजाओं में ताकत..मस्तिष्क में अधिक तेज…” नहीं पैदा कर रही तो उससे सावधान हो जाने की ज़रूरत है. जो आपको खुद को नाचीज़ मानने, गया गुजरा मानने को मजबूर करती है, उससे दूर रहने में भलाई है.

आगे एक दूसरी जगह मुक्तिबोध ने आलोचना के विषय में यह लिखा है कि उसमें आलोच्य के प्रति एक गहरी श्रद्धा होती है. वह उसकी संभावना में विश्वास करती है. वह एक तरह से उससे रिश्ता बनाने की कोशिश है. हम समाज की आलोचना इसलिए नहीं करते कि उसे नष्ट होते देखना चाहते हैं.

आलोचना में ईमानदारी भरा संतुलन आवश्यक है. आलोचक को खुद अपने आप को देखते रहने की ज़रूरत है. लेकिन आलोचक के आगे कुछ खतरे हैं. एक तरह के लोग वे हैं

“…जो अपनी बातचीत के द्वारा, भाषण कला के द्वारा, लिखाई के जरिए, किसी न किसी प्रकार से असर कायम करते हैं…”

मुक्तिबोध सावधान करते हैं कि इनमें से कई लोग

“…किसी न किसी रूप से, कहीं न कहीं, किसी विशेष स्तर पर, या साधारण रूप से अहंकारी होते हैं.”

जो आलोचक है, जिसका यह दावा है कि वह इस दुनिया को दूसरों से बेहतर जानता-बूझता है, उसके इस अहंकार का नुकसान उस उद्देश्य को होता है जिसके लिए काम करने का वह दावा करता है, खुद उसे भी होता है,

“निश्चय ही, इस अहंकार का जनता के लक्ष्यों से असामंजस्य है. अहंकार से कुछ लोगों में रंग भले ही पैदा हो, उसके द्वारा दिलोदिमाग के दरवाजे बंद हो जाते हैं.”

दंभ, अहंकार घातक है, हर तरह से. इसका व्यावहारिक आशय है,

“अहंकार से सूक्ष्म और स्थूल प्रकार की बेईमानी, बददयानती, अवसरवादिता, दादागिरी, रंगदारी, वाचालता, ढीली ज़बान, निंदाप्रचार, असावधानता और जिज्ञासा का सर्वनाश आदि दोष उत्पन्न होते हैं.”

इनमें से हरेक जुर्म है.

“एक जुर्म से दूसरा जुर्म पैदा होता है. व्यक्तित्व में ह्रास शुरू होता है. जिस प्रकार विकास की मंजिलें होती हैं, उसी प्रकार ह्रास की प्रक्रिया की भी अधोगामी सीढ़ियों का विस्तार होता है.”

अहंकारी व्यक्ति की चतुराई यह है कि वह खुद को विनयशील दिखलाता है,

“अहंकारी व्यक्ति की बुद्धि की खूबी यह है कि सच में कितना झूठ मिलाया जाए कि वह प्रभावकारी हो सके और रंग जमा सके. वह जानता है. इन्हीं बुद्धिमान अहंकारियों में हजारों नौजवान लीडरी के क्षेत्र में आते हैं….देखा सिर्फ इतना जाता है कि खुद टोटे में न रहें. इस बचाव को ख्याल में रखते हुए, फिर सभी गुण—जैसे हार्दिकता, मार्मिकता, सूक्ष्मता, सत्योद्घाटन, सत्य वचन, ऊपरी तौर की मेहनत, आदि बातें सामने रखी जाती हैं, कि जिससे लोग उनकी अच्छाइयों को (जिसको वे मानवता कहेंगे) को देख सकें.”

इस झूठ को पहचानना इतना आसान नहीं. फिर भी इसके प्रति सावधान रहना आवश्यक है. यह सिर्फ औरों में हो ऐसा नहीं. खुद में भी इसके बीज पाए जा सकते हैं.

दूसरे किस्म के नौजवान वे हैं जो बहुत जल्दी अनेक प्रकार के आकर्षणों और प्रभावों के वशीभूत हो जाते हैं. अनुगामित्व उनका स्वभाव बन जाता है. ये बंद व्यक्तित्व हैं और एक तरह से सुरक्षावादी स्वभाव के होते हैं. इनमें चालाकी भले न हो, स्वयं ये ईमानदार हों लेकिन अपनी मौलिक शक्तियों का विकास नहीं कर पाते और न उनके भीतर की मौलिकता का उपयोग हो पाता है.

नौजवान के भीतर की मौलिकता की संभावना का आदर किया जाना चाहिए लेकिन उसे इसके मद में आत्मनिरीक्षण छोड़ नहीं देना चाहिए.

नौजवान को कौन से गुण परिभाषित करते हैं? मुक्तिबोध के शब्दों में

“तर्कसंगत शुद्ध विचार-सरणि और जिज्ञासा, तथ्यों को पहचानने, उनको संगठित कर उनके निष्कर्ष निकालने की शक्ति; उज्ज्वल आदर्शवाद…;

ज्ञान के सामने, सत्य के सामने, हार्दिकता और मार्मिकता के सामने, प्रेम और त्याग के सामने निरंतर नम्रता और विनय;

मानव के सतत संघर्षमय विकास में आस्था;….मनुष्य के स्वाभाविक प्रकृतिजन्य शुद्ध हृदय में विश्वास;

जनता के उद्धार में श्रद्धा; उनके संघर्षों की सफलता में आध्यात्मिक विश्वास; जनता की सृजनशील ऐतिहासिक शक्तियों की विजय का स्वप्न…”

फिर से मुक्तिबोध की वैचारिक सावधानी उनके भाषा के सचेत प्रयोग में प्रकट होती है. आख़िरी पंक्तियों पर ध्यान दीजिए : श्रद्धा, आध्यात्मिक विश्वास और स्वप्न के प्रयोग पर विचार कीजिए. अभी जब मैं मुक्तिबोध को पढ़ रहा हूँ और यह ध्यान आता है कि आज भारत के किसानों की स्वायत्तता के संघर्ष के 6 महीने हो गए हैं तो मुझे क्या इस संघर्ष की सफलता पर अध्यात्मिक विश्वास की, खुद अपने लिए ज़रूरत नहीं?

ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध प्राथमिक शिक्षक की तरह बुनियादी बातें बतला रहे हैं जबकि हम काफी आगे निकल आए हैं. लेकिन क्या सचमुच इस बुनियादी तालीम की तरफ लौटने की ज़रूरत नहीं है? जब मुक्तिबोध दूसरों की गलतियों और दुर्गुणों के सहानुभूतिपूर्ण, ईमानदार विश्लेषण का आग्रह करते हैं और उसमें उदारता का अनुरोध करते हैं तो वे आलोचना की संस्कृति में बदलाव लाने की बात कर रहे हैं. मानवीयता की संभावना हर जगह है. उससे इनकार कर देना ही अपनी पराजय है.

यह सब कुछ नौजवानों के व्यक्तिगत जीवन के संगठन के लिए लिखा हुई मुक्तिबोध ने. लेकिन इस पर वे भी अमल करें वो जिनका यौवन पीछे छूट गया है तो शायद यह उन्हें गुन ही करे!    

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