जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!

मुक्तिबोध शृंखला : 14

‘पक्षी और दीमक’ मुक्तिबोध के पाठकों की जानी हुई कहानी है। लेकिन जैसा मुक्तिबोध की कई रचनाओं के बारे में कहा जा सकता है, इस कहानी में दो कहानियाँ हैं। और उनके बीच एक आत्म-चिंतन जैसा भी।

कहानी एक कमरे में शुरू होती है। लेकिन वह जितना कमरा है उतना ही किसी का मन भी हो सकता है। एक कमरा जिसके बाहर चिलचिलाती धूपभरी दोपहर है लेकिन भीतर ठंडी हलकी रौशनी। बाहर और भीतर के बीच सिर्फ एक खिड़की नहीं है, काँटेदार बेंत की झाड़ी और उससे लिपटी हुई बेल। मुक्तिबोध की रचनाओं को जन-संकुल माना जाता रहा है लेकिन कुदरत, जैसा हम पहले भी नोट कर आए हैं, उनकी बनावट को तय करती है। यह भी कह सकते हैं कि प्रकृति के बिना मुक्तिबोध की कल्पना नहीं की जा सकती है। वह उनसे उसी कदर गुँथी हुई है जैसे इस बेंत की झाड़ी से यह बेल।

“बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखनेवालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं।”

एक साथ इसमें कई संवेदनाएँ हैं- धूप की चिलचिलाहट का अनुमान, मद्धम उजाले की शीतलता, खिड़की का खुलापन, काँटेदार बेंत और आसमानी फूल।

इस लता ने पूरी तरह बेंत को लपेट रखा है। क्या ताज्जुब कि उसके काँटों से वह बचाते हुए ऐसा कर पाई है। वह लता ऐसे लिपट गई है मानो एक रस्सी सी बँट गई हो। नज़ाकतऔर सख्ती। यहाँ नाज़ुक ने सख्त का साथ लिया है। ज़िंदगी इसमें से खिलती है :

“किंतु इससे भी आश्‍चर्यजनक बात यह है कि उस लता ने अपनी घुमावदार चाल से न केवल बेंत की डालों को, उनके काँटों से बचते हुए, जकड़ रखा है, वरन उसके कंटक-रोमोंवाले पत्‍तों के एक-एक हरे फीते को समेट कर, कस कर, उनकी एक रस्‍सी-सी बना डाली है; और उस पूरी झाड़ी पर अपने फूल बिखराते-छिटकाते हुए, उन सौंदर्य-प्रतीकों को सूरज और चाँद के सामने कर दिया है।”

लता अपने फूलों को गर्वपूर्वक सूरज और चाँद के सामने कर देती है। यह उस लता का , जीवट से जीती हुई और जीवन को सजाती हुई लता का गर्व है,आत्मविश्वास है लेकिन क्या यह उस्की सूरज और चाँद से प्रतिस्पर्द्धा भी है ?

“एक रात, इसी खिड़की में से एक भुजंग मेरे कमरे में भी आया। वह लगभग तीन-फीट लंबा अजगर था। खूब खा-पी कर के, सुस्‍त हो कर, वह खिड़की के पास, मेरी साइकिल पर लेटा हुआ था। उसका मुँह ‘कैरियर’ पर, जिस्‍म की लपेट में, छिपा हुआ था और पूँछ चमकदार ‘हैंडिल’ से लिपटी हुई थी। ‘कैरियर’ से ले कर ‘हैंडिल’ तक की सारी लंबाई को उसने अपने देह-वलयों से कस लिया था। उसकी वह काली-लंबी-चिकनी देह आतंक उत्‍पन्‍न करती थी।

हमने बड़ी मुश्किल से उसके मुँह को शिनाख्‍त किया। और फिर एकाएक ‘फिनाइल’ से उस पर हमला करके उसे बेहोश कर डाला। रोमांचपूर्ण थे हमारे वे व्‍याकुल आक्रमण! ग‍हरे भय की सनसनी में अपनी कायरता का बोध करते हुए, हम लोग, निर्दयतापूर्वक, उसकी छटपटाती दे‍ह को लाठियों से मारे जा रहे थे।”

प्रकृति में भय भी है, रहस्य भी। खिड़की बंद रखी जाती है क्योंकि बेंत की इन झाड़ियों के अंतराल में पक्षियों के घोंसले हैं, वे वहां अंडे देते हैं. भोजन की तलाश में एक काला साँप अकसर वहाँ आता है। वह साँप या भुजंग भी प्रकृति है लेकिन मनुष्य उसे जीने नहीं देता,

उस साँप की काली लंबी चिकनी देह दशहत पैदा करती है। और उस दहशत की वजह से उसे बेहोश कर बेरहमी से मार डाला जाता है। यह क्रूरता है। और कायरता भी। इस पूरे प्रसंग को प्रतीकात्मक तरीके से पढ़ने का लोभ हो सकता है। धूप, मद्धम उजाला, कमरा, खिड़की, बेंत की काँटेदार झाड़ी, लता के आसमान फूल और फिर वह साँप।

क्या कहानी शुरू हो गई है या यह उसकी भूमिका है? या परिवेश जिसे आलोचक और अध्यापक कहा करते हैं / लेखक जिसका निर्माण करता है कि आप कहानी में प्रवेश कर सकें। कहानी एक मन की कही जा रही है। यह वर्णन उस मन का ही है। वह कितना पेचीदा और कितना दुर्बोध्य हो सकता है!

लेकिन बात यहाँ खत्म नहीं होती। देखिए, यह मन बनता कैसे है?

“इसी खिड़की से लगभग छह गज दूर, बेंत की झाड़ियों के उस पार, एक तालाब है… बड़ा भारी तालाब, आसमान का लंबा-चौड़ा आईना, जो थरथराते हुए मुस्‍कराता है। और उसकी थरथराहट पर किरनें नाचती रहती हैं।

मेरे कमरे में जो प्रकाश आता है, वह इन लहरों पर नाचती हुई किरनों का उछल कर आया हुआ प्रकाश है। खिड़की की लंबी दरारों में से गुजर कर वह प्रकाश, सामने की दीवार पर चौड़ी मुँडेर के नीचे सुंदर झलमलाती हुई आकृतियाँ बनाता है।

मेरी दृष्टि उस प्रकाश-कंप की ओर लगी हुई है। एक क्षण में उसकी अनगिनत लहरें नाचे जा रही हैं, नाचे जा रही हैं। कितना उद्दाम, कितना तीव्र वेग है उन झिलमिलाती लहरों में। मैं मुग्‍ध हूँ कि बाहर के लहराते तालाब ने किरनों की सहायता से अपने कंपों की प्रतिच्‍छवि मेरी दीवार पर आँक दी है।”

रौशनी जो कमरे के भीतर है, वह इस आसमान के आईने से उछलकर आया प्रकाश है। भीतर एक काँपता हुआ प्रकाश वृत्त है। वह बाहर के उस लहराते तालाब के बिना मुमकिन नहीं। और इसे देखकर एक निहायत इंसानी खयाल उभर आता है। वह इंसानी है और ख़ास मुक्तिबोधीय आकांक्षा है,

“काश, ऐसी भी कोई मशीन होती जो दूसरों के हृदयकंपनों को, उनकी मानसिक हलचलों को, मेरे मन के परदे पर चित्र रूप में उपस्थित कर सकती।”

हर मनुष्य, या व्यक्ति एक गहरा रहस्य है। उसे जानना आसान नहीं। पूरा जानने की इच्छा भी क्या ठीक है? लेकिन यह तो हर कोई चाहता है और उसी रास्ते वह मनुष्य हो सकता है कि वह महसूस कर सके जो दूसरे महसूस कर रहे हैं।


और फिर मुक्तिबोध अपने पाठक को जैसे साँसत से उबारते हैं। उस पाठक को जो उतावला हो रहा है कि अब कहानी शुरू हो। तो अब कहानी की संभावना नज़र आती है। जिस कमरे का जिक्र “मैं’ कर रहा है उसमें वह अकेला नहीं। वह जो चाहता है कि दूसरों के ख्याल, उनके भाव उसके हृतपटल पर अंकित हो सकें,वह कोई अमूर्त इच्छा नहीं। एक पात्र है जिसे वह जानता है और नहीं भी जानता,

“… मेरे सामने इसी पलंग पर, वह जो नारी-मूर्ति बैठी है, उसके व्‍यक्तित्‍व के रहस्‍य को मैं जानना चाहता हूँ, वैसे, उसके बारे में जितनी गहरी जानकारी मुझे है, शायद और किसी को नहीं।”

एक पुरुष और एक औरत । लेकिन वह उपन्यास पढ़ती हुई औरत है। सूरज का प्रकाश जो बाहर के तालाब के लहराते पानी से उछलकर बंद खिड़की की दरारों से होकर कमरे की दीवार पर काँपता है, वह उस औरत के गालों पर, उपन्यास के पन्नो पर और उसके आँचल पर फैल जाता है:

“इस धुँधले अँधेरे कमरे में वह मुझे सुंदर दिखाई दे रही है। दीवार पर गिरे हुए प्रत्‍यावर्तित प्रकाश का पुन: प्रत्‍यावर्तित प्रकाश, नीली चूडियोंवाले हाथों में थमे हुए उपन्‍यास के पन्‍नों पर, ध्‍यानमग्‍न कपोलों पर और आसमानी आँचल पर फैला हुआ है।”

दोनों एक ही कमरे में एक साथ दीख रहे हों लेकिन अलग-अलग संसार में हैं। फिर भी उनके चलते और उनकी इस एक दूसरे से स्वतंत्र मनोदशा के बावजूद (या उसी के कारण?) गहरे लगाव की तड़प भी है,

“यद्यपि इस समय हम दोनों अलग-अलग दुनिया में (वह उपन्‍यास के जगत में और मैं अपने खयालों के रास्‍तों पर) घूम रहे हैं, फिर भी इस अकेले धुँधुले कमरे में गहन साहचर्य के संबंध-सूत्र तड़प रहे हैं और महसूस किए जा रहे हैं।”

यह साहचर्य किस प्रकार का होगा? क्या उसे प्रचलित अर्थ में प्रेम कहा जा सकेगा? क्योंकि यह औरत उपन्यास पढ़नेवाली औरत है। वह जो उपन्यास पढ़ता है, उससे किस रूप में अलग होता है जो उपन्यास नहीं पढ़ता या पढ़ पाता?

जो हो, यह औरत, जिसका नाम श्यामला है, एक मुश्किल शै है:

श्‍यामला के बारे में मुझे शंका रहती है। वह ठोस बातों की बारीकियों का बड़ा आदर करती है। वह व्‍यवहार की कसौटी पर मनुष्‍य को परखती है। वह मुझे अखरता है। उसमें मुझे एक ठंडा पथरीलापन मालूम होता है। गीले-सपनीले रंगों का श्‍यामला में सचमुच अभाव है।”

और कहानी अब कमरे के बाहर निकलती है। वह औरत उपन्यास छोड़कर चिलचिलाती धूप में घूमने का अटपटा-सा प्रस्ताव देती है:

“उपन्‍यास फेंक कर श्‍यामला ने दोनों हाथ ऊँचे करके जरा-सी अँगड़ाई ली। मैं उसकी रूप-मुद्रा पर फिर से मुग्‍ध होना ही चाहता था कि उसने एक बेतुका प्रस्‍ताव सामने रख दिया। कहने लगी, ‘चलो, बाहर घूमने चलें।’ “

नियम के अनुसार कुछ घटित होना चाहिए था इस कमरे में, लेकिन उस रूमानी ख्याल को श्यामला चूर कर देती है। उसका आमंत्रण सुखद नहीं है:

“मेरी आँखों के सामने बाहर की चिलचिलाती सफेदी और भयानक गरमी चमक उठी। खस के परदों के पीछे, छत के पंखों के नीचे, अलसाते लोग याद आए। भद्रता की कल्‍पना और सुविधा के भाव मुझे मना करने लगे। श्‍यामला के झक्‍कीपन का एक प्रमाण और मिला।

उसने मुझे एक क्षण आँखों से तौला और फैसले के ढंग से कहा, ‘खैर, मैं तो जाती हूँ। देख कर चली जाऊँगी… बता दूँगी।’ “

‘मैं’ अपनी कमजोरी के बावजूद उसकी निगाह में गिरना नहीं चाहता :

लेकिन चंद मिनटों बाद, मैंने अपने को चुपचाप उसके पीछे चलते हुए पाया। तब दिल में एक अजीब झोल महसूस हो रहा था। दिमाग के भीतर सिकुड़न-सी पड़ गई थी। पतलून भी ढीला-ढाला लग रहा था, कमीज के ‘कॉलर’ भी उल्‍टे-सीधे रहे होंगे। बाल अन-सँवरे थे ही। पैरों को किसी-न-किसी तरह आगे ढकेले जा रहा था।

लेकिन यह सिर्फ दुपहर के गरम तीरों के कारण था, या श्‍यामला के कारण, यह कहना मुश्किल है।”

और अब आप इस निगाह को देखिए। उपन्यास पढ़ती हुई औरत के पैरों और एड़ियों को, जो पुरुष कवियों के लिए कितने प्रिय रहे हैं:

“वह मेरे आगे-आगे चल रही थी, लेकिन मेरा ध्‍यान उसके पैरों और तलुओं के पिछले हिस्‍से की तरफ ही था। उसकी टाँग, जो बिवाइयों-भरी और धूल-भरी थी, आगे बढ़ने में, उचकती हुई चप्‍पल पर चटचटाती थी। जाहिर था कि ये पैर धूल-भरी सड़कों पर घूमने के आदी हैं।”

कहानी के भीतर एक कहानी और सर उठाती है। मसला एक संस्था में एक मैदान के बराबर किए जाने के खर्च तय किए जाने का है। क्या “मैं” उसकी बैठक में सही स्टैंड ले पाएगा? यह श्यामला जानना चाहती है। क्या वह अपनी कायरता पर से पर्दा उठा दे ? लेकिन ऐसा करके वह उसकी नज़रों में गिर जाएगा जिसके सामने वह अपना सुंदरतम चित्र ही रखना चाहता है।

अपनी संस्था में होनेवाले भ्रष्टाचार से वह परिचित है. वह “जी हाँ!” प्रकृति का है। अपनी शान्ति भंग नहीं करना चाहता. ‘जी हाँ ‘ से ‘जी हुजूर’ तक की दूरी आखिर कितनी है! श्यामला के स्वर में उसके इस भीरु स्वभाव के लिए भर्त्सना है। उसे अपनी संस्था का सर्वेसर्वा याद आ जाता है।

“कि इतने में मुझे उस मैदानी-आसमानी चमकीले खुले-खुलेपन में एकाएक, सामने दिखाई देता है – साँवले नाटे कद पर भगवे रंग की खद्दर का बंडीनुमा कुरता, लगभग चौरस मोटा चेह‍रा, जिसके दाहिने गाल पर एक बड़ा-सा मसा है, और उस मसे में बारीक बाल निकले हुए।”

और उसकी लंबी गाड़ी:

“… अभरक-मिली लाल मिट्टी के चमचमाते रास्‍ते पर सुंदर काली ‘शेवरलेट’।

उस भगवे खद्दरधारी शेवरलेट के मालिक के साथ उसके इस रिश्ते ने “मैं” का, उसकी शक्ल-सूरत का क्या कर डाला है?

“भगवे खद्दर-कुरते वाले की ‘शेवरलेट’, जिसके जरा पीछे मैं खड़ा हूँ, और देख रहा हूँ – यों ही, कार का नंबर – कि इतने में उसके चिकने काले हिस्‍से में, जो आईने-सा चमकदार है, सूरत दिखाई देती है।

भयानक है वह सूरत! सारे अनुपात बिगड़ गए हैं। नाक डेढ़ गज लंबी और कितनी मोटी हो गई है। चेहरा बेहद लंबा और सिकुड़ गया है। आँखें खड्डेदार। कान नदारद। भूत-जैसा अप्राकृतिक रूप। मैं अपने चेहरे की उस विद्रूपता को, मुग्‍धभाव से, कुतूहल से और आश्‍चर्य से देख रहा हूँ, एकटक।

कि इतने में मैं दो कदम एक ओर हट जाता हूँ; और पाता हूँ कि मोटर के उस काले चमकदार आईने में मेरे गाल, ठुड्डी, नाम, कान सब चौड़े हो गए हैं, एकदम चौड़े। लंबाई लगभग नदारद। मैं देखता ही रहता हूँ, देखता ही रहता हूँ कि इतने में दिल के किसी कोने में कई अँधियारी गटर एकदम फूट निकलती है। वह गटर है आत्‍मालोचन, दु:ख और ग्‍लानि की।

और, सहसा मुँह से हाय निकल पड़ती है। उस भगवे खद्दर-कुरते वाले से मेरा छुटकारा कब होगा, कब होगा।

और, तब लगता है कि इस सारे जाल में, बुराई की इस अनेक चक्रोंवाली दैत्‍याकार मशीन में, न जाने कब से मैं फँसा पड़ा हूँ। पैर भिंच गए हैं, पसलियाँ चूर हो गई हैं, चीख निकल नहीं पाती, आवाज हलक में फँस कर रह गई है।”

क्या इस क्षुद्रता से मुक्ति संभव है?

“कि इसी बीच अचानक एक नजारा दिखाई देता है। रोमन स्तंभोंवाली विश्‍वविद्यालय के पुस्‍तकालय की ऊँची, लंबी, मोतिया सीढ़ियों पर से उतर रही है एक आत्‍म-विश्‍वासपूर्ण गौरवमय नारीमूर्ति।

वह किरणीली मुस्‍कान मेरी ओर फेंकती-सी दिखाई देती है। मैं इस स्थिति में नहीं हूँ कि उसका स्‍वागत कर सकूँ। मैं बदहवास हो उठता हूँ।

वह धीमे-धीमे मेरे पास आती है। अभ्‍यर्थनापूर्ण मुस्‍काराहट के साथ कहती है, ‘पढ़ी है आपने यह पुस्‍तक।’

काली जिल्‍द पर सुनहले रोमन अक्षरों में लिखा है, ‘आई विल नाट रेस्‍ट।’

मैं साफ झूठ बोल जाता हूँ, ‘हाँ पढ़ी है, बहुत पहले।’ “

मुक्ति का रास्ता है लेकिन क्या उसपर चलना इतना सहज है?

मुक्तिबोध की कहानी का लक्ष्य शायद कुछ भी नहीं। कोई मंजिल नहीं. एक लंबा सफर है, लंबा रास्ता। जिसके बीच चौड़ा मैदान है, पेड़ हैं

पेड़।

“अजीब पेड़ है, (यहाँ रका जा सकता है), बहुत पुराना पेड़ है, जिसकी जड़ें उखड़ कर बीच में से टूट गई हैं और साबित है, उनके आस-पास की मिट्टी खिसक गई है। इसलिए वे उभर कर ऐंठी हुई-सी लगती हैं। पेड़ क्‍या है, लगभग ठूँठ है। उसकी शाखाएँ काट डाली गई हैं।

लेकिन, कटी हुई बाँहोंवाले उस पेड़ में से नई डालें निकल कर हवा में खेल रही हैं! उन डालों में कोमल-कोमल हरी-हरी पत्तियाँ झालर-सी दिखाई देती हैं। पेड़ के मोटे तने में से जगह-जगह ताजा गोंद निकल रहा है। गोंद की साँवली कत्‍थई गठानें मजे में देखी जा सकती हैं।

अजीब पेड़ है, अजीब! (शायद, यह अच्‍छाई का पेड़ है) इसलिए कि एक दिन शाम की मोतिया-गुलाबी आभा में मैंने एक युवक‍-युवती को इस पेड़ के तले ऊँची उठी हुई, उभरी हुई, जड़ पर आराम से बैठे हुए पाया था। संभवत: वे अपने अत्यंत आत्‍मीय क्षणों में डूबे हुए थे।

मुझे देख कर युवक ने आदरपूर्वक नमस्‍कार किया। लड़की ने भी मुझे देखा और झेंप गई। हलके झटके से उसने अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया। लेकिन उसकी झेंपती हुई ललाई मेरी नजरों से न बच सकी।

इस प्रेम-मुग्‍ध को देख कर मैं भी एक विचित्र आनंद में डूब गया। उन्‍‍हें निरापद करने के लिए जल्‍दी-जल्‍दी पैर बढाता हुआ मैं वहाँ से नौ-दो ग्‍यारह हो गया।”

सामने मैदान-ही-मैदान हैं, भूरे मटमैले! उन पर सिरस और सीसम के छायादार विराम-चिह्र खड़े हैं। मैं लुब्‍ध और मुग्‍ध हो कर उनकी घनी-गहरी छायाएँ देखता रहता हूँ…

क्‍योंकि… क्‍योंकि मेरा यह पेड़, य‍ह अच्‍छाई का पेड़ छाया प्रदान नहीं कर सकता, आश्रय प्रदान नहीं कर सकता, (क्‍योंकि वह जगह-जगह काटा गया है) वह तो कटी शाखाओं की दूरियों और अंतरालों में से केवल तीव्र और कष्‍टप्रद प्रकाश को ही मार्ग दे सकता है।”

अच्छाई के पेड़ की शाखाओं से तकलीफदेह रौशनी ही आ सकती है। उससे किसी छाया की उम्मीद, किसी इत्मीनान की, बेकार है।

“मैं और श्यामला उस अच्छाई के पेड़ के नीचे कुछ पल के लिए बैठे हैं. और “मैं” अपनी हीन अवस्था के बारे में, अपने बारे में सब कुछ कह डालना चाहता है. आत्म-स्वीकार करना चाहता है. जो उससे चाहती है,वह करना क्यों कठिन है उसके लिए,

लेकिन क्‍या वह मेरी बातें समझ सकेगी? किसी तनी हुई रस्‍सी पर वजन साधते हुए चलने का, ‘हाँ’, और ‘ना’ के बीच में रह कर जिंदगी की उलझनों में फँसने का तजुर्बा उसे कहाँ है!

हटाओ, कौन कहे।”

दोनों के बीच मतभेद है। लेकिन उसका रिश्ता दोनों के ही किसी स्वार्थ से नहीं। इसलिए खुलकर बहस हो सकती है। बहस या संवाद की यह प्राथमिक शर्त है।

लेकिन यह स्‍त्री शिक्षिता तो है! बहस भी तो करती है! बहस कर बातों का संबंध न उसके स्‍वार्थ से होता है, न मेरे। उस समय हम लड़ भी तो सकते हैं। और ऐसी लड़ाइयों में कोई स्‍वार्थ भी तो नहीं होता। सामने अपने दिल की सतहें खोल देने में न मुझे शर्म रही, न मेरे सामने उसे। लेकिन वैसा करने में तकलीफ तो होती ही है, अजीब और पेचीदा, घूमती-घुमाती तकलीफ! “

“मैं अपनी उलझन एक कहानी के जरिए बतलाना चाहता है। यह एक पक्षी की कहानी है। नीले आसमान में खूब ऊँचे उड़नेवाला एक पक्षी। जिसकी निगाहें बहुत तेज़ थीं। और वह ज़मीन पर चल रही दीमकों को भी देख लेता था। उसे दीमकों का बहुत शौक था। योन तो हवा में भी कीड़े मिल जाते लेकिन वह दीमक का शौक़ीन था। वे आसानी से नहीं मिलती थीं।

“एक दिन वह नौजवान पक्षी जमीन पर चलती हुई एक बैलगाड़ी को देख लेता है। उसमें बड़े-बड़े बोरे भरे हुए हैं। गाड़ीवाला चिल्‍ला-चिल्‍ला कर कहता है, ‘दो दीमकें लो, एक पंख दो।’

…..

नौजवान पक्षी को लगा – यह बहुत बड़ी सुविधा है कि एक आदमी दीमकों को बोरों में भर कर बेच रहा है।

वह अपनी ऊँचाइयाँ छोड़ कर मँडराता हुआ नीचे उतरता है और पेड़ की एक डाल पर बैठ जाता है।

दोनों का सौदा तय हो जाता है। अपनी चोंच से एक पर को खींच कर तोड़ने में उसे तकलीफ भी होती है; लेकिन उसे वह बरदाश्‍त कर लेता है। मुँह में बड़े स्‍वाद के साथ दो दीमकें दबा कर वह पक्षी फुर्र से उड़ जाता है।”

अब वह पक्षी रोज़ एक पर देकर दो दीमकें खरीद लेता। यह सिलसिला कितना चलता?

“… उसके पंखों की संख्‍या लगातार घटती चली गई। अब वह, ऊँचाइयों पर, अपना संतुलन साध नहीं सकता था, न बहुत समय तक पंख उसे सहारा दे सकते थे। आकाश-यात्रा के दौरान उसे जल्‍दी-जल्‍दी पहाड़ी चट्टानों गुंबदों और बुर्जो पर हाँफते हुए बैठ जाना पड़ता। उसके परिवार वाले तथा मित्र ऊँचाइयों पर तैरते हुए आगे बढ़ जाते। वह बहुत पिछड़ जाता। फिर भी दीमक खाने का उसका शौक कम नहीं हुआ। दीमकों के लिए गा‍ड़ीवाले को वह अपने पंख तोड़-तोड़ कर देता रहा।”

और तब उसने अपनी इस अवस्था से समझौता कर लिया,

फिर उसने सोचा कि आसमान में उड़ना ही फिजूल है। वह मूर्खों का काम है। उसकी हालत यह थी कि अब वह आसमान में उड़ ही नहीं सकता था, वह सिर्फ एक पेड़ से उड़ कर दूसरे पेड़ तक पहुँच पाता। धीरे-धीरे उसकी यह शक्ति भी कम होती गई। और एक समय वह आया जब वह बड़ी मुश्किल से, पेड़ की एक डाल से लगी हुई दूसरी डाल पर, चल कर, फुदक कर पहुँचता। लेकिन दीमक खाने का शौक नहीं छूटा।

बीच-बीच में गाड़ीवाला बुत्‍ता दे जाता। वह कहीं नजर में न आता। पक्षी उसके इंतजार में घुलता रहता।”

फिर उसने सोचा कि कि वह खुद दीमक खोजेगा, इकट्ठा करेगा और उसने जो पंख दीमकों के बदले गाड़ीवान को दिए हैं, उन्हें वापस ले लेगा। एक दिन गाड़ीवान उसे दीख गया और उसने उससे यह सौदा करने को कहा,

गाड़ीवाला ठठा कर हँस पड़ा। उसने कहा, ‘बेवकूफ, मैं दीमक के बदले पंख लेता हूँ, पंख के बदले दीमक नहीं।’

गाड़ीवाले ने ‘पंख’ शब्‍द पर जोर दिया था।”

गाड़ीवाला चला गया। पक्षी छटपटा कर रह गया। एक दिन एक काली बिल्‍ली आई और अपने मुँह में उसे दबा कर चली गई। तब उस पक्षी का खून टपक-टपक कर जमीन पर बूँदों की लकीर बना रहा था।”


मैं को यह कहानी कहते ही अपनी अवस्था का बोध हुआ,

“कहानी कह चुकने के बाद, मुझे एक जबरदस्‍त झट‍का लगा। एक भयानक प्रतिक्रिया – कोलतार-जैसी काली, गंधक-जैसी पीली-नारंगी!

नहीं, मुझमें अभी बहुत कुछ शेष है, बहुत कुछ। मैं उस पक्षी-जैसा नहीं मरूँगा। मैं अभी भी उबर सकता हूँ। रोग अभी असाध्‍य नहीं हुआ है। ठाठ से रहने के चक्‍कर से बँधे हुए बुराई के चक्‍कर तोड़े जा सकते हैं। प्राण‍शक्ति शेष है, शेष ।’ “

क्या वह ऐसा कर सकता है? लेकिन अगर उसे श्यामला का साथ चाहिए तो खुद से यह युद्ध करना होगा। श्यामला में आदिवासियों जैसा अमिश्रित आदर्शवाद है।

“… वह तो एक गाँधीवादी कार्यकर्ता की लड़की है, आदिवासियों की उस कुल्‍हाड़ी-जैसी है जो जंगल में अपने बेईमान और बेवफा साथी का सिर धड़ से अलग कर देती है। बारीक बेईमानियों का सूफियाना अंदाज उसमें कहाँ!

किंतु फिर भी आदिवासियों जैसे उस अमिश्रित आदर्शवाद में मुझे आत्‍मा का गौरव दिखाई देता है, मनुष्‍य की महिमा दिखाई देती है, पैने तर्क की अपनी अंतिम प्रभावोत्‍पादक परिणति का उल्‍लास दिखाई देता है – और ये सब बाते मेरे हृदय का स्‍पर्श कर जाती हैं। तो, अब मैं इसके लिए क्‍या करूँ, क्‍या करूँ!”

यह सब कुछ आसान नहीं:

और अब मुझे सज्‍जायुक्‍त भद्रता के मनोहर वातावरण वाला अपना कमरा याद आता है… अपना अकेला धुँधला-धुँधला कमरा। उसके एकांत में प्रत्‍यावर्तित और पुन: प्रत्‍यावर्तित प्रकाश कोमल वातावरण में मूल-रश्मियाँ और उनके उद्गम स्‍त्रोतों पर सोचते रहना, खयालों की लहरों में बहते रहना कितना सरल, सुंदर और भद्रतापूर्ण है। उससे न कभी गरमी लगती है, न पसीना आता है, न कभी कपड़े मैले होते हैं।”

किसी सतह से टकराकर अपनी सारी तपिश छोड़कर जो रौशनी जीवन के प्रकाशित होने का भरम देती है, उसके लुभावने भुलावे को छोड़ सीधे क्या प्रकाश के स्रोत का सामना किया जा सकता है?

“किंतु प्रकाश के उद्गम के सामने रहना, उसका सामना करना, उसकी चिलचिला‍ती दोपहर में रास्‍ता नापते रहना और धूल फाँकते रहना कितना त्रास-दायक है। पसीने से तरबतर कपड़े इस तरह चिपचिपाते हैं और इस कदर गंदे मालूम होते हैं कि लगता है… कि अगर कोई इस हालत में हमें देख ले तो वह बेशक हमें निचले दर्जे का आदमी समझेगा। सजे हुए टेबल पर रखे कीमती फाउंटेनपेन-जैसे नीरव-शब्‍दांकन-वादी हमारे व्‍यक्तित्‍व जो बहुत बड़े ही खुशनुमा मालूम होते हैं – किन्‍हीं महत्‍वपूर्ण परिवर्तनों के कारण – जब वे आँगन में और घर-बाहर चलती हुई झाड़ू जैसे काम करनेवाले दिखाई दें, तो इस हालत में यदि सड़क-छाप समझे जाएँ तो इसमें आश्‍चर्य की ही क्‍या बात है!”

ऐसा करने में भद्रता के दर्जे से गिर जाने का खतरा है। क्या नीरव-शब्दांकन वादी व्यक्तित्व अपना ख़ुशनुमापन छोड़कर झाड़ू लगानेवालों की मलिनता अपना सकेंगे? क्यों नहीं यह किया जा सकता। इंसानी इतिहास में कितनी ही बार यह किया गया गया है, फिर संकोच क्यों?

“… मैं अब ऐसे कामों की शर्म नहीं करूँगा, क्‍योंकि जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!”

असल बात अपने दिल की खोज की है।

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