इस नगरी में सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है

मुक्तिबोध शृंखला : 15

‘पक्षी और दीमक’ कहानी में अपने पंख देकर दीमक मोल लेने वाले पक्षी की त्रासदी हमारी-आपकी, सबकी हो सकती है। कहानी सुनाते- सुनाते और उसके अंत तक पहुँचते ही ‘मैं’ को धक्का-सा लगता है। जब आप एक एक कर अपने पंख देते जाएँ तो फिर एक दिन रेंगने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। पक्षी को तंबीह की गई थी कि दीमक उसका स्वाभाविक आहार नहीं। और कुछ हो, पक्षी को अपने पंख नहीं देने चाहिए। लेकिन उसे तो दीमक की चाट लग गई। फिर दीमक बेचनेवाले गाड़ीवान को दो दीमकों के बदले अपना एक पंख देने की उसकी आदत पड़ गयी। एक-एक कर अपने पंख गँवाते हुए वह उड़ने की ताकत खो बैठा। और फिर एक दिन एक बिल्ली का ग्रास बन गया।

कहानी के अंत तक पहुँचकर कहानी सुनानेवाले को धक्का लगता है। उसे जान पड़ता है कि कहीं वह अपनी ही कहानी तो नहीं कह रहा! वह संकल्प लेता है कि वह खुद को धोखा नहीं देगा। आसान ज़िंदगी नहीं चुनेगा। जहाँ उसका दिल होगा वहीं उसका नसीब होगा।

उसका दिल या उसका प्रिय उसे ठंडे प्रकाशवाले कमरे से चिलचिलाती धूप में चौड़े मैदान में खींच ले जाता है। उस वीराने में एक भव्य इमारत से उतरती हुई एक मूर्ति उसे एक किताब देती है, “”आई विल नॉट रेस्ट” । उस बीच जब वह अपनी प्रिय के ‘आमंत्रण'(!) पर कमरे का आराम छोड़ मैदान नापता है, उसे अपने जीवन की तुच्छता का अहसास होता है। वह खुद ही पक्षी और दीमक की कहानी सुनाता है। मानो अपना भविष्य खुद को दिखला रहा हो। और दहशत में चौंक उठता है। क्या वह खुद को इस अंत से बचा सकता है? क्या वह प्रकाश के भ्रम से निकलकर प्रकाश के स्रोत के सामने खड़ा रह सकता है? क्या उसकी आँखें, उसका पूरा वजूद उस रौशनी की ताब ला सकता है?

मुक्तिबोध की इस कहानी में लोककथा जैसी सरलता है। बल्कि एक स्तर पर वह नीति- कथा या पैरेबल जान पड़ती है। आम तौर पर हम कलात्मकता की पहचान यह मानते हैं कि रचना से कोई सन्देश या उपदेश न मिले। लेकिन सारी बड़ी रचनाएँ हमें इस सवाल का जवाब खोजने को कहती हैं कि एक अच्छा, भला, मानवीय जीवन कैसे जिया जा सकता है। उस जीवन को पहचाना कैसे जाए- सबसे बड़ी समस्या यह है। मुक्तिबोध की सारी रचनाओं में , वह कहानी हो या कविता या निबंध, इसी प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश दिखलाई पड़ती है।

इस सवाल का जवाब तभी मिल सकता है जब हम खुद अपने आप पर निर्मम रौशनी डालते रहें। अपना इम्तहान करते रहें। भला जीवन क्या है? उसकी शर्तें क्या हैं ?भला जीवन कौन जी सकता है? उस व्यक्ति का निर्माण वह खुद अपने भीतर से कैसे कर सकता है?

‘पक्षी और दीमक’ जैसी ही एक दूसरी कहानी है जो मुक्तिबोध के पाठकों के लिए परिचित भी है और प्रिय भी : ‘समझौता’। इस कहानी की बनावट भी वैसी ही है। कहानी के भीतर कहानी। पिछली कहानी एक कमरे में शुरू हुई थी। कमरा जिमसें बाहर से जल की सतह से प्रत्यावर्तित प्रकाश दीवार पर था और उससे कमरे में उजाला था। वह प्रत्यावर्तित प्रकाश का प्रत्यावर्तन था। ‘समझौता’ कहानी भी एक बंद कॉरीडोर में शुरू होती है:

“अँधेरे से भरी, धुँधली, सँकरी प्रदीर्घ कॉरिडार और पत्थर की दीवारें। ऊँची घन की गहरी कार्निस पर एक जगह कबूतरों का घोंसला, और कभी-कभी गूँज उठनेवाली गुटरगूँ, जो शाम के छह बजे के सूने को और भी गहरा कर देती है। सूनी कॉरिडार घूमकर एक ज़ीने तक पहुँचती है। ज़ीना ऊपर चढ़ता है, बीच में रुकता है और फिर मुड़कर एक दूसरी प्रदीर्घ कॉरिडार में समाप्त होता है।

दूर, सिर्फ़ एक कमरा खुला है। भीतर से कॉरिडार में रोशनी का एक ख़याल फैला हुआ है। रोशनी नहीं, क्योंकि कमरे पर तक हरा परदा है। पहुँचने पर बाहर, धुँधले अँधेरे में एक आदमी बैठा हुआ दिखाई देता है।

रौशनी नहीं,रौशनी का ख़याल है। प्रकाश भी कमरे के भीतर से आ रहा है। उसपर पड़े हरे परदे से छनता।


‘मुझे चाहिए मेरा असंग बबूलपन’ कविता में प्रकाश के इस आभास की बात यों की जाती है:

मैंने नहीं कहा था
मेरी उस ज़िंदगी के बंद किवार की से
दरार से

रश्मि सी घुसो और

विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों पर
प्रत्यावर्तित होती रहो

है तो यह प्रकाश ही! फिर उससे उलझन क्यों?

सत्य है कि
बहुत भव्य रम्य विशाल मृदु
कोई चीज़
कभी-कभी सिकुड़ती है इतनी कि
तुच्छ और क्षुद्र ही लगती है।

इसलिए प्रत्यावर्तित प्रकाश नहीं, सीधी रौशनी!

शिकायत उस जमाने से है, उस समाज से जिसके पास अपना सूरज नहीं, अपनी रौशनी की तपन नहीं:

इस नगरी में चाँद नहीं है, सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है

….
इस नगरी में चाँद नहीं है, सूर्य नहीं है
भीतर पावन ज्वाल नहीं है
.”

जिस नगरी में सूर्य नहीं है, उसमें ब्रह्मराक्षसों की छायाएँ गाँधी की चप्पलें पहने घूम रही हैं। इसके किले कँगूरे पर विभिन्न स्वार्थों के बन्दर लंगूर बैठे हैं:

इस नगरी में अच्छे-अच्छे
लोग हुए जाते हैं देखो
शैतानों के झबरे बच्चे।

वे जो आज ऐसे हो गए हैं, कभी भले थे, जनता के आँगन में खेले थे लेकिन आज उनके चेहरे पर ” विद्युत् वज्र गिरानेवाले/बादल की कठोर छाया है.”

इस नगरी में

अपने स्वार्थी मालिक की-सी सूरत लेकर
लम्बे-लम्बे बालोंवाले एक बने श्वान भयंकर
आधी आँखें मूँदे बैठे
या चबूतरे पर जा लेटे
खूब उन्होंने रखवाली की
कइयों के घर-बार उजाड़
आँतें फाड़ीं।

जो लठैत हैं उनकी सूरत उनके स्वार्थी मालिक जैसी हो जाती है। हैं लेकिन वे चाकर ही उसके स्वार्थों के।

यह मालिक है या कोई अदृश्य जादूगर
अपने आँगन बाँध दिया है बड़े-बड़ों को
गधे बनाकर कई विरोधी
उसके रथ में घोड़े बनकर जुटे हुए हैं
कई सत्य के शोधी-बोधी

सत्य के शोधी-बोधी‘ पर ध्यान दीजिए।

बहरहाल! हम कहानी पर लौट आएँ।

रौशनी के फैले हुए ख़याल वाले उस कॉरिडोर से होते हुए ‘मैं’ को उसी कमरे में जाना जिससे प्रकाश बाहर आ रहा है।

कमरा जगमगा रहा है। मेरी आँखों में रोशनी भर जाती है। एक व्यक्ति काला ऊनी कोट पहने, जिसके सामने टेबिल पर काग़ज़ बिखरे पड़े हैं, अलसायी-थकी आँखें पोंछता हुआ मुसकराकर मुझसे कहता है, “आइए, हुज़ूर, आइए!

मेरा जी धड़ककर रह जाता है, ‘हूज़ूर’ शब्द पर मुझे आपत्ति है। उसमें गहरा व्यंग्य है। उसमें एक भीतरी मार है। मैं कन्धों पर फटी अपनी शर्ट के बारे में सचेत हो उठता हूँ। कमर की जगह पैंट तानने के लिए बेल्टनुमा पट्टी के लिए जो बटन लगाया गया था, उसकी ग़ैरहाज़िरी से मेरी आत्मा भड़क उठती है।”

वह जो मेज के उस ओर बैठा है उसका आदरपूर्ण संबोधन “मैं” को अपनी क्षुद्रता के प्रति और सचेत कर देता है। उसका मन इस स्थिति को लेकर विद्रोह कर उठता है:

मैं एक गहरी साँस भरता हूँ और उसे धीरे-धीरे छोड़ता हूँ। मुझे हृदय-रोग हो गया है- गुस्से का, क्षोभ का, खीझ का और अविवेकपूर्ण कुछ भी कर डालने की राक्षसी क्षमता का।

मेरे पास पिस्तौल है। और, मान लीजिए, मैं उस व्यक्ति का- जो मेरा अफ़सर है, मित्र है, बन्धु है – अब खून कर डालता हूँ।

लेकिन पिस्तौल अच्छी है, गोली भी अच्छी है, पर काम- काम बुरा है। उस बेचारे का क्या गुनाह है? वह तो मशीन का एक पुर्ज़ा है। इस मशीन में गलत जगह हाथ आते ही वह कट जाएगा, आदमी उसमें फ़ँसकर कुचल जाएगा, जैसे बैगन। सबसे अच्छा है कि एकाएक आसमान में हवाई जहाज़ मँडराये, बमबारी हो और वह कमरा ढह पड़े, जिसमें मैं और वह दोनों खत्म हो जाएँ। अलबत्ता, भूकम्प भी यह काम कर सकता है।

जो मेज के उस ओर है वह इस ‘मैं’ का मित्र ही है। क्या वह उसका ही प्रतिरूप है? सिर्फ दोनों की जगह बदल गई हो मानो? ‘मैं’ उस ओर भी हो सकता था. तब क्या स्थिति बदलती या निर्णय कुछ और होता?

एक दफ़्तरी सीन है। किसी की गलती है लेकिन वह जो उस तरफ है, जिसका नाम इत्तफ़ाक़न मेहरबान सिंह है, उसके लिए “मैं” को ‘मेमो’ देने जा रहा है। यह नाइंसाफी है:

उन्होंने कहा,”करो दस्तख़त…यहाँ… यहाँ “
मैं धीरे-धीरे कुरसी पर बैठा। आँखें काग़ज़ पर गड़ायीं। भवें सिकुडीं, और मैं पूरा-का-पूरा, काग़ज़ में समा गया।
मैंने चिढ़कर अँगरेज़ी में कहा,”यह क्या है?”
उन्होंने दृढ़ स्वर में जवाब दिया,”इससे ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता।”
विरोध प्रदर्शित करने के लिए मैं बेचैनी से कुरसी से उठने लगा तो उन्होंने आवाज़ में नरमी लाकर कहा,”भाई मेरे, तुम्हीं बताओ, इससे ज़्यादा क्या हो सकता है! दिमाग़ हाज़िर करो, रास्ता सुझाओ “
“लेकिन मुझे ‘स्केपगोट’ बनाया जा रहा है, मैंने क्या किया!”
चाय के कप में शक्कर डालते हुए उन्होंने, एक और काग़ज़ मेरे सामने सरका दिया और कहा, “पढ़ लीजिए “
मुझे उस काग़ज़ को पढ़ने की कोई इच्छा नहीं थी। चाहे जो अफ़सर मुझे चाहे जो काम नहीं कह सकता। मेरा काम बँधा हुआ है।
नियम के विरुद्ध मैं नहीं था, वह था। …
मेहरबानसिंह ने कहा,”भाई, ग़लती मेरी भी थी, जो मैंने यह काम तुम्हारे सिपुर्द करने के बजाय, उसको सौंप दिया। लेकिन चूँकि फ़ाइलें दौड़ गयी हैं, इसलिए ऐक्शन तो लेना ही पड़ेगा। और उसमें है क्या वार्निंग है, सिर्फ़ हिदायत!”

कमरे में आते वक्त ही “मैं” को मालूम है कि क्या होनेवाला है। मेहरबान सिंह कोई शत्रु नहीं और न शैतान हैं। उनकी आदमीयत का सबूत यह है कि इस हालत में भी उन्होंने “मैं” के लिए चाय मँगाई। जैसे प्रकाश नहीं उसका आभास था वैसे ही मेहरबान सिंह के कमरे में आदमीयत की गंध फैली हुई है। उसका रिश्ता अफसर और मातहत का है लेकिन यहाँ दोनों उस क्षण में हैं जिसमें मातहत को बराबरी का अहसास दिलाया जाता है।

‘पक्षी और दीमक’ में कहानी के मैदान में पहुँच जाने के बाद ‘मैं’ कहानी सुनाता है। यहाँ अपने प्रति हो रहे अन्याय को पी लेने के लिए तैयार किए जाते या खुद उसके लिए प्रस्तुत होते ‘मैं’ को किस्सा सुनाया जाता है।

“एकाएक उन्हें ज़ोर की गगन-भेदी हँसी आयी। मैं विस्मित होकर देखने लगा। जब उनकी हँसी का आलोड़न खत्म होने को था कि उन्होंने कहा,”लो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। तुम अच्छे, प्रसिद्ध लेखक हो। सुनो और गुनो!”
और मेहरबान सिंह का छोटा-सा चेहरा गम्भीर होकर कहानी सुनाने लगा।

....मुसीबत आती है तो चारों ओर से। ज़िन्दगी में अकेला, निस्संग और बी.ए. पास एक व्यक्ति। नाम नहीं बताऊँगा।
कई दिनों से आधा पेट। शरीर से कमज़ोर। ज़िंदगी से निराश। काम नहीं मिलता। शनि का चक्कर।
हर भले आदमी से काम माँगता है। लोग सहायता भी करते हैं। लेकिन उससे दो जून खाना भी नहीं मिलता, काम नहीं मिलता, नौकरी नहीं मिलती। चपरासीगिरी की तलाश है, लेकिन वह भी लापता। कपबशी धोने और चाय बनाने के काम से लगता है कि दो दिनों बाद अलग कर दिया जाता है। जेब में बी.ए. का सर्टिफ़िकेट है।

यह कहानी “मैं” की है या… ?

मैंने सोचा, मेहरबानसिंह अपनी ज़िन्दगी की कथा कह रहे हैं। मुझे मालूम तो था कि मेरे मित्र के बचपन और नौजवानी के दिन अच्छे नहीं गये हैं। मैं और ध्यान से सुनने लगता हूँ।

मेहरबानसिंह का छोटा-सा काला चौकोर चेहरा भावना से विद्रूप हो जाता है। वह मुझसे देखा नहीं जाता। मेहरबानसिंह कहता है- नौकरी भी कौन दे? नीचे की श्रेणी में बड़ी स्पर्धा है। चेहरे से वह व्यक्ति एकदम कुलीन, सुंदर और रौबदार, किन्तु घिघियाया हुआ। नीचे की श्रेणी में जो अलकतियापन है, गाली-गलौज की जो प्रेमपदावली, फटेहाल ज़िन्दगी की जो कठोर, विद्रूप, भूखी, भयंकर सभ्यता है, वहाँ वह कैसे टिके।

नीचे की श्रेणी उस पर विश्वास नहीं कर पाती। उसे मारने दौड़ती है। उसका वहाँ टिकना मुश्किल है। दरमियानी वर्ग में वह जा नहीं सकता। कैसे जाए, किसके पास जाए! जब तक उसकी जेब में एक रुपया न हो।

जीने, सिर्फ ज़िंदा रहने की इस जंग की कहानी कहना आसान नहीं:

मेहरबानसिंह के गले में आँसू का काँटा अटक गया। मैं सब समझता हूँ, मुझे खूब तज़रबा है, इस आशय से मैंने उनकी तरफ़ देखा और सिर हिला दिया।

उन्होंने सूने में, अजीब से सूने में, निगाह गड़ाते हुए कहा- शायद उनका लक्ष्य आँखों-ही-आँखों में आँसू सोख लेने का था, जिन्हें वे बताना नहीं चाहते थे- आत्महत्या करना आसान नहीं है। यह ठीक है कि नई शुक्रवारी-तालाब में महीने में दो बार आत्महत्याएँ हो जाती हैं। लेकिन छः लाख की जनसंख्या में सिर्फ़ दो माहवार, यानि साल में चौबीस। दूसरे ज़रियों से की गयी आत्महत्याएँ मिलायी जाएँ तो सालाना पचास से ज़्यादा न होंगी। यह भी बहुत बड़ी संख्या है। आत्महत्या आसान नहीं है।

कहानी कौन कह रहा है? किसकी कहानी कह रहा है? और कौन सुन रहा है?

उनके चेहरे पर काला बादल छा गया। अब वे पहचान में नहीं आते थे। अब वे मेरे अफ़सर भी न रहे, मेरे परिचित भी नहीं। सिर्फ़ एक अजनबी- एक भयानक अजनबी। मेरा भी दम घुटने लगा। मैंने सोचा, कहाँ का क़िस्सा छेड़ दिया।

लेकिन अब अफसर कहानीकार है, इसलिए

मेहरबानसिंह ने मेरी ओर कहानीकार की निगाह से देखा और कहा….”

फिर वे एक सर्कस का किस्सा सुनाते हैं जिसके मैनेजर के पास यह नौजवान नौकरी के लिए जाता है। उसने सर्कस का प्रचार करते जोकरों को देखा है. क्या वह जोकर नहीं हो सकता? क्यों नहीं?

एक आइडिया, एक खयाल आँखों के सामने आया। जोकर होना क्या बुरा है! ज़िन्दगी-एक बड़ा भारी मज़ाक है; और तो और, जोकर अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकता है। चपत जड़ सकता है। एक-दूसरे को लात मार सकता है, और, फिर भी, कोई दुर्भावना नहीं है। वह हँस सकता है, हँसा सकता है। उसके हृदय में इतनी सामर्थ्य है।

मेहरबान सिंह ने मेरी ओर अर्थ-भरी दृष्टि से देखकर कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि जोकर का काम करना एक परवर्शन-अस्वाभाविक प्रवृत्ति है। मनुष्य की सारी सभ्यता के पूरे ढांचे चरमराकर नीचे गिर पड़ते हैं, चूर-चूर हो जाते हैं। लेकिन असभ्यता इतनी बुरी चीज़ नहीं, जितना आप समझते हैं…।

मेहरबान सिंह के इस वक्तव्य से मुझे लगा कि वह उनका एक आत्मनिवेदन मात्र है।…लेकिन मेरे ख़याल की उन्होंने परवा नहीं की। और उनकी कहानी आगे बढ़ी।

वह बेरोजगार जोकर बनना चाहता है लेकिन उसे बताया जाता है कि सर्कस में उसके लिए काम नहीं है। उसे मैनेजर से मिलने नहीं दिया जाता। और इसी समय कुछ होता है। …
मेहरबानसिंह ने कहा कि यहाँ से कहानी एक नये और भयंकर तरीके से मुड़ जाती है।

वह मैनेजर को देखने का प्रयत्न करे, या वापस हो! बताइए, आप बताइए! और, उन्होंने मेरी आँखों में आँखें डालीं।
उनके प्रश्न का मैं क्या जवाब देता! फिर भी मैंने अपने तर्क से कहा कि स्वाभाविक यही है कि वह मैनेजर से मिलने की एक बार और कोशिश करे। जोकर की कमाई भी मेहनत की कमाई होती है! कोई धर्मादाय पर जीने की बात तो है नहीं।

वह मैनेजर से किसी भी कीमत पर मिलना चाहता है। इसके लिए भूख हड़ताल ही क्यों न करनी पड़े।

“… यह निर्णय उसके आगे आनेवाले भीषण दुर्भाग्य का एकमात्र कारण था। वह निर्णयात्मक क्षण था, जब उसने यह तय किया कि मैनेजर से मिलने के लिए सर्कस के सामने वह भूख-हड़ताल करेगा। उसने यह तय किया, संकल्प किया, प्रण किया। और, वह प्रण आगे चलकर उसके नाश का कारण बना!

लेकिन सच तो यह है कि
दिल की सचाई, और सही-सही निर्णय से, दुर्भाग्य का कोई सम्बंध नहीं है। उसका चक्र स्वतन्त्र है, उसके अपने नियम हैं।

उसे मैनेजर से मिलवाया जाता है। वह काम देने से इंकार करता है लेकिन यह कुछ भी करने को तैयार है।

मैनेजर ने घृणा, तिरस्कार और रौब से उसके सामने एक रुपया फ़ेंकते हुए कहा,”जाओ, खा आओ, कल सुबह आना!” और मुँह फिराकर वह दूसरी ओर चलता बना। एक सीन ख़त्म हुआ।
दुर्भाग्य के मारे इस व्यक्ति ने फिर उस मैनेजर का चेहरा कभी नहीं देखा।

और फिर उसे एक पिंजरे में बंद कर दिया जाता है। उसकी ट्रेनिंग शुरू होती है। उस ब्योरे के सारांश मात्र से यह मालूम नहीं होगा कि मेहरबान सिंह और मैं का रिश्ता क्या होनेवाला है। सो कहानी सुनिए:

किस्सा मुख्तसर में यों है कि दूसरे दिन जब तड़के ही वह व्यक्ति सर्कस में दाखिल हुआ तो दो अजनबी आदमियों ने उसकी बाँहे पकड़ ली और एक बंद कोठे में ले गये। उसे कहा गया कि उसकी ड्यूटी सिर्फ़ कमरे में बैठे रहना है। …वह व्यक्ति एक दिन और एक रात वहाँ पड़ा रहा।

… लगभग दो घंटे घुप अँधेरे में रहने के बाद दरवाज़ा चरमराया और वास्कट पहने हुए दो काले व्यक्ति हंटर लिए हुए वहाँ पहुँचे।
वे न मालूम कैसी-कैसी भयंकर कसरतें करवाने लगे, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे कसरतें नहीं थीं, शारीरिक अत्याचार था। ज़रा ग़लती होने पर वे हंटर मारते। इस दौरान उस व्यक्ति की काफ़ी पिटाई हुई। उसके हाथ, पैर, ठोढ़ी में घाव लग गये।

उसे प्रतीत होने लगा कि वह किसी क़ब्र के भीतर के अन्तिम पत्थर के नीचे गड़ा हुआ सिर्फ़ एक अधमरा प्राण है।
एकाएक तीन-चार आदमियों ने प्रवेश किया और उसे उठाकर, मानो वह प्रेत हो, एक साफ़-सुथरे कमरे में ले गये। वहीं उसे दो-चार दिन रखा गया, अच्छा भोजन दिया गया।
कुछ दिनों बाद, ज्यों ही उसके स्वास्थ में सुधार हुआ, उसे वहाँ से हटाकर रीछों के एक पिंजरे में दाखिल कर दिया गया।
अब उसके दोस्त रीछ बनने लगे। वहीं उसका घर था, कम-से-कम वहाँ हवा और रोशनी तो थी।
लेकिन, उसकी यह प्रसन्नता अत्यन्त क्षणिक थी। उससे …रीछों के मुँह में हाथ डलवाये जाते, रीछ छाती पर बढ़वाया जाता और ज़रा गलती की कि हंटर। … शुरू-शुरू में, व्यक्ति को भुना हुआ मांस मिलता। अब उसके सामने कच्चे माँस की थाली जाने लगी। अगर न खाए तो मौत, खाए तो मौत।


और तब उसे मालून होता है कि उसे ट्रेनिंग किस चीज़ की दी जा रही है:

वह यह पहचान गया कि उसे जान-बूझकर पशु बनाया जा रहा है। पशु बन जाने की उसे ट्रेनिंग दी जा रही है। उसके शरीर के अंदर नई सहनशक्ति पैदा की जा रही है।

अब उसे कोठे से निकाल बाहर किया गया और एक दूसरे छोटे पिंजरे में बंद कर दिया गया। …उसके शरीर पर ज़बरदस्ती रीछ का चमड़ा मढ़ दिया गया और उससे कह दिया गया कि साले अगर रीछ बनकर तुम नहीं रहोगे तो गोली से फ़ौरन से पेश्तर उड़ा दिये जाओगे।
यहाँ से उस व्यक्ति का मानव-अवतार समाप्त होकर ऋक्षावतार शुरू होता है।

उस नई ज़िंदगी में वह खुद को पहचान नहीं पाता:

सुबह उठता है तो विश्वास नहीं कर पाता है कि वह इन्सान है। …
लेकिन वह अपने पर ही विस्मित हो उठा। यह सब वह सह सका, ज़िन्दा रह सका, कच्चा मांस खा सका। मार खा सका और जीवित रह सका। क्या वह आदमी है? शायद, पशु बनने की प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो गई थी।

और फिर उसे एक शेर के सामने छोड़ दिया जाता है:

ऋक्षावतार का रोम-रोम काँप उठा, कण-कण में भय की मर्मान्तक बिजली समा गई। …शेर की साँस उसके आसपास फैल गई, शेर के चमड़े की दुर्गन्ध उसके कानों में घुसी थी कि इतने में उसके कान में कुछ कम्पन हुआ, कुछ स्वर-लहरें घुसी जो कहने लगीं:
“अबे डरता क्या है, मैं भी तेरे ही सरीखा हूँ, मुझे भी पशु बनाया गया है, सिर्फ़ मैं शेर की खाल पहने हूँ, तू रीछ की!

…शेर ने कहा,”तुम पर चढ़ बैठने की सिर्फ़ मुझे कवायद करनी है, मैं तुझे खा डालने की कोशिश करूँगा, खाऊँगा नहीं। कवायद नहीं की तो हंटर पडेंगे तुमको और मुझको भी! आओ, हम दोस्त बन जाएँ, अगर पशु की ज़िन्दगी बितानी है तो ठाठ से बिताएँ, आपस मे समझौता करके।” “

‘मैं’ के सामने पूरा रूपक खुल जाता है। सारा तनाव घुल जाता है। यह तो उन दोनों की कहानी है:

मेरे मुँह से निकल पड़ा,”तो गोया आप शेर हैं, और मैं रीछ।”…
दार्शनिक भाव से मेरे अफ़सर ने कहा,”भाई, समझौता करके चलना पड़ता है ज़िन्दगी में, कभी-कभी जान-बूझकर अपने सिर बुराई भी मोल लेनी पड़ती है। लेकिन उससे फ़ायदा भी होता है। सिर सलामत तो टोपी हज़ार।”

और “मैं” को सारी बात समझ आ जाती है:


मैंने पूछा,”तो मैं इस काग़ज़ पर दस्तख़त कर दूँ?”
उसने दबाव के साथ कहा,”बिला शक, वार्निंग देनेवाला मैं, लेनेवाले तुम, मैं शेर तुम रीछ।”
यह कह कर हँस पड़ा, मानो उसने अनोखी बात कही हो। मैंने मज़ाकिया ढंग से पूछा,”मैं देखना चाहता हूँ कि शेर के कहीं दाँत तो नहीं हैं।”
“… तुमसे पहले पशु बना हूँ। सीनियॉरिटी का मुझे फ़ायदा भी तो है। कभी आगे तुम भी शेर बन जाओगे।” बात में गम्भीरता थी, मज़ाक भी। मज़ाक का मज़ा लिया, गम्भीरता दिल में छिपा ली।

असल किस्सा यहाँ खत्म होने को है। इसके बाद दोनों का असल रिश्ता भी बहाल हो जाएगा। तो इस जाते क्षण में वह पूछ बैठता है

“…उससे सहज जिज्ञासा के भोले भाव से पूछा,”तो क्या उसने सचमुच फिर से मैनेजर को नहीं देखा।

वह मुस्कराया। मुसकराता रह गया। उसके मुँह से सिर्फ़ इतना ही निकला,”यह तो सोचो कि वह कौन मैनेजर है जो हमें-तुम्हें, सबको रीछ-शेर-भालू-चीता-हाथी बनाये हुए है।” मेरा सिर नीचे लटक गया। किसी सोच के समन्दर में तैरने लगा। तब तक चाय बिलकुल ठंडी हो चुकी थी और दिल भी।

क्या अपने असंग बबूलपन की याद दोनों को ही आ रही है? क्या हमें भी और आपको भी?

One thought on “इस नगरी में सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है”

  1. बिल्कुल सर, यही इस कहानी का सार तत्व है:-
    “वह खुद को धोखा नहीं देगा। आसान ज़िंदगी नहीं चुनेगा। जहाँ उसका दिल होगा वहीं उसका नसीब होगा।”

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