मनुष्यता: भाव और अभाव

मुक्तिबोध शृंखला:19

‘स्व’ के प्रश्न से मुक्तिबोध जीवन भर जूझते रहे। स्व के प्रति सचेत होना व्यक्ति बनने के लिए अनिवार्य है। और व्यक्तित्व तो उसके बाद ही बन सकता है। लेकिन वह क्या आसान है? उसमें बहुत मेहनत है। कौन इस पचड़े में पड़े? उससे बेहतर है खुद को भूल जाना। भूल जाने के खूबसूरत तरीके या बहाने खोजना भी क्या इतना मुश्किल है? एक अधूरी टिप्पणी में मुक्तिबोध लिखते हैं,

“कुछ बुद्धिमान कहते हैं कि भीड़ में व्यक्तित्व खो जाता है। लेकिन मैं कहता हूँ कि इसमें बुराई क्या है। मुझे तो भीड़ में अपने से मुक्ति मिल जाती है। चहल-पहल,रौनक, रफ़्तार,और शोर में ही क्यों न सही, खुद का भूलना तो होता ही है।”

यह भरम कई तरीकों से पैदा किया जा सकता है। आप कह सकते हैं कि मैं तो समाज में लगा हुआ हूँ, कोई  कह सकता है कि मैं राजनीति में व्यस्त हूँ और मुक्तिबोध व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि कलाकार भी खुद को इस धोखे में रख सकते हैं,

“बहुत से लेखक और कलाकार अपनी चेतना को इस तरह जगाते हैं कि निजी व्यक्तित्व आँखों से ओझल हो जाता है। यह तो कहने की बातें हैं कि हम उच्चतर स्तर पर जागे हुए हैं।”

असली बात है हम खुद से छुटकारा पाना चाहते हैं। लेकिन क्या खुद को पूरी तरह जाना जा सकता है? वह तो ऐसा हिमखण्ड है जो जितना बाहर है उससे तीन चौथाई डूबा हुआ है। मुक्तिबोध के मुताबिक़ हर व्यक्ति एक गहरा रहस्य है। इसी कारण अपने स्व को या किसी और के स्व को पूरी तरह जानना सम्भव नहीं। जानने की पहली शर्त बाहरी इन्द्रियों के जरिए किसी को हासिल करना होता है। फिर तो वह वस्तु है। लेकिन क्या स्व उस प्रकार की वस्तु है? मुक्तिबोध कहते हैं कि आप कुछ हद तक उसका बोध कर सकते हैं। वह बोध हमेशा ही अधूरा होगा। स्व का आपका ज्ञान इस तरह कभी सम्पूर्ण, अंतिम नहीं हो सकता। आप उसे आख़िरी तौर पर जान लेने का दावा नहीं कर सकते,

“मेरा यह पक्का विश्वास है कि ‘स्व’ एक रहस्य है, किसी न किसी रूप में। रहस्य को जानना जानना नहीं होता। कोई भी व्यक्ति अपने चरित्र, अपने व्यक्तित्व को जान नहीं सकता।”

कई बार हम अपना खुद का एक चित्र खड़ा करके उसपर विश्वास करने लगते हैं। उसी को सत्य मानने लगते हैं। विश्वास की शक्ति अकल्पनीय है:

विश्वास! यह एक अद्भुत शक्ति है! सत्य वह है जिसे हम यह समझते हैं और विश्वास करते हैं कि वह सत्य है।

तथ्य और असत्य में इसीलिए एक द्वंद्व है। अपने सत्य के अनुसार हम तथ्य का चयन करते हैं और उसका स्वरूप निर्धारण भी करते हैं। फिर असल बात उस विश्वास पर आकर टिक जाती है जिस सहारे सत्य का निर्धारण होता है। उसकी गुणवत्ता पर। आखिर कौन सा विश्वास है जिसके सहारे आप जीवन के किसी चित्र को वास्तविक, यथार्थ मान लेते हैं? इस चर्चा से भ्रम न होना चाहिए कि मुक्तिबोध कोई दार्शनिक हैं। हैं तो वे कवि ही। इसलिए

“इस ‘स्व’ के रहस्य को लिए मैं भीड़ में खो जाता हूँ। और समझता हूँ कि हर-एक के पास अपने-अपने रहस्य हैं। और मैं उन सबके रहस्यों का आदर करता हूँ।”

हम पहले ही देख आए हैं कि ‘स्व’ की चेतना का अर्थ आत्मग्रस्तता नहीं है। ‘स्व’ को अपनी चिंता का विषय बनाकर एक अहंकार में डूबे रहने का तर्क खोजा जा सकता है। जयशंकर प्रसाद की रचना ‘कामायनी’ की आलोचना करते समय मुक्तिबोध उस खतरे से सावधान करते हैं। अपने होने की चेतना इतनी तीव्र कभी न थी। वे ‘आशा’ सर्ग से प्रसाद को उद्धृत करते हैं,

“मैं हूँ, यह वरदान सदृश क्यों

        लगा  गूँजने  कानों में।

मैं भी कहने लगा, ‘मैं रहूँ’

        शाश्वत नभ के गानों में।”

‘मैं’ का आत्मभाव ‘अपने रक्त की पूरी ऊष्मा’ के साथ खुद को स्थापित करता है। उसे अकेलापन मालूम होता है। वह खुद को किसी तरह के संबंध-सूत्र से युक्त नहीं कर पाता। यह कमी किसकी है? ‘मैं’ अगर किसी से जुड़ न पाए, निःसंग रह जाए तो वह विफल ही है। मुक्तिबोध फिर प्रसाद को उद्धृत करते हैं,

शैल-निर्झर न हो सका हतभाग्य

        गल नहीं सका जो कि हिम-खंड।

दौड़कर मिला न जलनिधि-अंक

         आह, वैसा  ही  हूँ  पाखण्ड।

मनु की आत्म-स्वीकृति में एक अहंकार है। आत्म भर्त्सना तो है लेकिन वह अप्रिय कार्यों से बचने का एक सुंदर तरीका है। ‘मैं’ की चेतना पर्याप्त नहीं है। ‘मैं’ सार्थक कैसे हो, इसके लिए उसे किस प्रकार की संलग्नता चाहिए, इसका ज्ञान आवश्यक है। मनु और श्रद्धा दोनों को ही निःसंगता का अहसास है। मनु से उलट श्रद्धा को मालूम है कि इस ‘मैं’ का प्रकटीकरण और परीक्षण, दोनों ही कार्य-जटिलता की प्रक्रिया में जूझते हुए कष्ट उठाने के दौरान होते हैं। काम से झिझकना, पेचीदगियों का अंदाज करके काम से झिझकना ही भविष्य से अनजान बनाता है। यानी भविष्य भी हम अपने काम के क्रम में ही निर्मित करते हैं। ऐसे लोग भी हैं और उनकी संख्या ज़्यादा है जो

“…इस कार्य-जटिलता से घबराते हैं, इसलिए किसी वास्तविक मूर्त लक्ष्य के प्रति अनुशासन-बद्ध गति से चल ही नहीं सकते।”  

प्रश्न निश्चय ही आत्म के उद्घाटन का है। इसका है कि क्यों आखिरकार वह खुद से अनजाना ही रह जाता है। ‘विपात्र’ में मुक्तिबोध सावधान करते हैं कि प्रायः यह आत्म-उद्घाटन छद्म होता है:

हमारा आत्म-प्रकटीकरण बहुत कुछ अंशों में वस्त्र-परिधान है, वास्तविक आत्मोद्घाटन नहीं। … आए हुए आदमी से हाथ मिलाने के लिए अपने सफ़ेद बिस्तर पर से ज़रा उठकर हाथ बढ़ाने की कभी-कभी तबीयत तो होती है लेकिन ताकत और हिम्मत हमेशा साथ नहीं देती। लेटी हुई देह हाथ मिलाने के लिए कभी-कभी अपना धड़ कुछ ऊपर उठाती है कि इतने में धड़ से गिर पड़ती है। बढ़ा हुआ हाथ ढीला होकर ढुलक जाता है।

आत्म का उद्घाटन तभी सम्भव है जब ‘मनुष्य के व्यक्तित्व का आतंरिक संगठन’ कर लिया गया हो। वह कैसे किया जाए? मुक्तिबोध कामायनी की आलोचना में उसे व्यावहारिक जगत् के संगठन के प्रश्न से जोड़ते हैं। इसका संबंध

व्यक्ति-प्रवृत्तियों, इच्छाओं तथा ज्ञान-शक्तियों के ऐसे संगठन से है, कि जो आत्म-संगठन, व्यक्ति को अपने और मानवता के इतिहास-प्राप्त समकालीन उद्धार-लक्ष्यों को ओर न केवल प्रवृत्त कराए, वरन उसे बुद्धि, कार्य तथा अनुभूति की सम्पूर्ण क्षमताओं से….

सम्पन्न करे। 

दायित्व आत्म-संगठन का है। वह व्यक्ति की प्रवृत्तियों और उसकी इच्छाओं और ज्ञान-शक्तियों के संयोजन या संगठन से ही सम्भव है। प्रवृत्ति और इच्छा का संगठन कैसे हो? वह मानवता के समकालीन उद्धार-लक्ष्य की समझ के बाद ही या उसी रास्ते हो सकता है। ‘मानवता के समकालीन उद्धार-लक्ष्य’ की यह अवधारणा इस तरह दिलचस्प है कि वह मानवता को हमेशा ही, इतिहास के हर दौर में किसी न किसी संकट से जूझते हुए देखती है। कभी भी आख़िरी उद्धार नहीं है।

इसके साथ ज़रूरी है

सत्य के प्रति, अन्यों के प्रति तथा अपने प्रति, वैज्ञानिक रूप से… मनुष्यतापूर्ण दृष्टि…।

यह मनुष्यता किसी औपचारिक शिक्षा की मुँहताज नहीं। आख़िरकार रूखी और तीखी धनिया में वह मनुष्यता कहाँ से आती है कि वह विजातीय और विधवा झुनिया को, जो बिना विवाह के उसके बेटे से गर्भवती हो गई है, अपने आसरे में खींच लेती है? मुक्तिबोध मनुष्यता और स्त्री को एक साथ रखते हैं बल्कि उसे पहले स्त्री का गुण मानते हैं,

“स्त्री की…  शक्ति उसकी भीतरी मनुष्यता है, जो अपने आराम, सुविधा, वासना के टुच्चे, ओछे, टटपुँजिएपन से ग्रस्त नहीं होती।

इस मनुष्यता को प्राप्त किया जा सकता है। शर्त है कि आप खुद को मानव-संबंधों से या में बाँध लें।प्रसाद की कामायनी से इस  उद्धरण  से वे अपनी बात स्पष्ट करते हैं:

 “दया, माया, ममता लो आज

               मधुरिमा लो अगाध विश्वास

    हमारा हृदय रत्न-निधि स्वच्छ

               तुम्हारे लिए खुला है पास।” 

भ्रम हो सकता है कि यह मनुष्यता एक आतंरिक गुण है। या तो वह होती है या नहीं होती। मनुष्यता को  मुक्तिबोध तरह-तरह से समझने की कोशिश करते हैं। उसके लिए ‘गहरा सूक्ष्म-दृष्टि-पूर्ण मानव-आस्थामय प्रेमभाव’ चाहिए। साथ ही ‘वस्तुपरक यथार्थग्राही दृष्टिकोण’। यह इतना सरल नहीं। मनुष्यता की समस्या को मुक्तिबोध समझते हैं:

यदि व्यक्ति में मनुष्यता है तो निश्चय ही वह अपने जीवन में प्राप्त वास्तविक मूर्त आदर्शों और लक्ष्यों की तरफ बढ़ेगा…

उस मनुष्यता के कारण वह अपने जीवन के अनुभवों का वैज्ञानिक आकलन करेगा और अपने तथा दूसरों के अनुभवों से सीखेगा भी। लेकिन समस्या यही है कि

… आदमी में इतनी मनुष्यता रहती ही नहीं। साथ ही उसका अभाव भी कभी नहीं होता। किसी में वह कम होती है, किसी में ज़्यादा, किसी में बहुत ज़्यादा। जिसमें जितनी अधिक मनुष्यता होती है, उसका वास्तविक सामाजिक संघर्ष भी उसे अधिक से अधिक सिखलाता है….”

बात फिर घूम कर वहीं आ जाती है। मनुष्यता अगर व्यक्ति का गुण है तो फिर वह संयोग से अधिक कुछ नहीं। फिर यह तर्क दिया जा सकता है कि अगर वह मुझमें नहीं है तो आप मुझे दोष नहीं दे सकते। लेकिन यदि मनुष्यता अर्जित की जा सकती है, अगर वह प्रयत्नसाध्य है तो हम अपनी मनुष्यता का विस्तार कर सकते हैं, उसे गहरा बना सकते हैं। खुद मुक्तिबोध बार-बार जिस ज्ञान की आवश्यकता पर बल देते हैं, वह हमें अधिक मनुष्य बना सकता है।

श्रद्धा में जो मनुष्यता है, वह मुक्तिबोध को पर्याप्त नहीं लगती। वह आधुनिक गाँधी-युग की ही एक वस्तु है।  उसमें भाववाद, रहस्यवाद, आदर्शवाद, मानवतावाद का मिश्रण है। मुक्तिबोध को उससे संतोष नहीं। अहिंसा से लेकर कण-कण में चेतन का दर्शन मुक्तिबोध को रास नहीं आता। लेकिन यह भी विडंबना ही है कि ‘अँधेरे में’ के सबसे अधिक दुविधाग्रस्त क्षण में जो बल देते हैं और आगे बढ़ने की हिम्मत, वे गाँधी ही हैं!

गाँधी स्वराज चाहते हैं जो मात्र अंग्रेज़ों की जगह भारतीयों का राज नहीं है। बल्कि ‘स्व’ की संप्रभुता है। इसके साथ गाँधी, मार्क्स और मुक्तिबोध की शिकायत भी पूँजीवाद से एक ही है: वह जनता के बहुलांश के व्यक्तित्वों के ध्वंसावशेष पर व्यक्ति-स्वाधीनता की घोषणा करता है। मुक्तिबोध इसके आलोचना करते हैं:

व्यक्ति की स्वाधीनता … गरीब जनता के लिए रिक्त स्वाधीनता है – इस अर्थ में कि व्यक्तित्व के सर्वपक्षीय विकास की परिस्थितिगत संभावनाओं को अत्यंत संक्षिप्त और सीमित कर दिया गया है।

कानून के द्वारा प्रदत्त समानता मात्र औपचारिक है। वह अर्थ तभी ग्रहण कर सकती है अब उसे साकार होने के लिए समान अवसरों की सामाजिक स्थिति संयोजित की जाए। समानता किसी की कीमत पर नहीं:

स्वाधीनता तथा समानता का लक्ष्य दूसरे को गुलाम बनाना नहीं है, उसे अपने से नीचा बनाना नहीं है।

दुर्भाग्य से यह उस व्यवस्था में नहीं हो सका जिससे इसकी अपेक्षा की गई थी। लेकिन जो पूँजीवाद खुद को उस स्व-विरोधी साम्यवाद से श्रेष्ठ बतलाता है, वह तो टिका ही हुआ है असमानता के सिद्धांत पर। स्पर्धा या प्रतियोगिता के सिद्धांत पर जिसमें हर किसी को अपनी योग्यता साबित करनी होती है। ‘स्पर्धा में जो उत्तम ठहरें वे रह जावें’ और वे ही संसृति का कल्याण करें शुभ मार्ग बतावें’, इससे न प्रसाद सहमत हैं, न मुक्तिबोध। न मार्क्स, न गाँधी। इस स्पर्धा के कारण ही व्यक्ति-चेतना स्वस्थ नहीं रह पाती। वह रागपूर्ण तो होती है। खुद का विस्तार करना चाहती है, कार्यशील होती है, विरक्त नहीं रह पाती लेकिन वह आगे बढ़ जाने की भावना के कारण ‘द्वेष-पंक में सतत सनी’ रहने को अभिशप्त है।

विस्तार की आकांक्षा दूसरों को अपने अधीन करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा में शेष हो सकती है। भ्रमणशीलता, दुस्साहस के नाम पर लोगों को गुलाम बनाया गया है। वास्तविक विस्तार अपने आत्म का है, स्व का है और वह दूसरे ‘स्व’ को स्वाधीन करके ही किया जा सकता है। साथ ही उसे अपने स्व से जोड़कर। अपने स्व को, निजता को, आत्म को समृद्ध बनाकर। इसके लिए लगातार अपने आपका इम्तहान करते रहना होता है:

आत्म-साक्षात्कार के बिना आत्म-चेतना सम्भव नहीं है।” लेकिन “आत्म-साक्षात्कार तो हम कर लेते हैं लेकिन अपने चरित्र से साक्षात्कार बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि स्वयं के ही चरित्र साक्षात्कार के लिए हमें प्रथम पुरुष के अतिरिक्त द्वितीय पुरुष, तृतीय पुरुष, चतुर्थ, पंचम अत्यादि पुरुषों की आवश्यकता होती है।

अन्यों के चरित्रों की तुलना में अपने आपको रखने की हमारी जो अपनी आदत होती है, उसके फलस्वरूप जीवन ज्ञान उत्पन्न होता है…

यह तुलनात्मकता मानवीय स्वभाव का अंग है ही लेकिन कब यह अपने चरित्र को पहचानने को प्रेरित करती है और कब मात्र उसके औचित्य साधन का सहारा बन जाती है?

One thought on “मनुष्यता: भाव और अभाव”

  1. ‘स्व’ की चेतना का अर्थ आत्मग्रस्तता नहीं है। ‘स्व’ को अपनी चिंता का विषय बनाकर एक अहंकार में डूबे रहने का तर्क खोजा जा सकता है।

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