मार्क्सवाद : वीरान अमानवीय दूरियाँ

मुक्तिबोध शृंखला:27

मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की शताब्दी के मौक़े पर उसकी सांसारिक उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए भी उसे समाजवादी व्यवस्था मानने से इनकार किया है। उसका कारण उनके मुताबिक़ यह है कि चीन में व्यक्ति अभी भी पार्थक्यविहीन जीवन नहीं जी रहा है। चीन का जन आज भी खंडित जन ही है। यानी उसकी सर्जनात्मकता पर उसका अधिकार नहीं है। उसका समय उसका नहीं है। अपने वजूद का मालिक वह खुद नहीं है, उसकी पार्टी है। दूसरे शब्दों में, वह स्वतंत्र या स्वाधीन नहीं है। स्वाधीनता चीन में अपराध है और ख़तरनाक है। इस मत से अलग कुछ कम्युनिस्ट पार्टियों की समझ है कि चीन ने अपने क़िस्म का समाजवाद विकसित किया है।

60 साल पहले ‘वसुधा’ में चीन के साहित्य को लेकर गोरखनाथजी की आपत्ति का उत्तर मुक्तिबोध ने दिया था। उनकी आपत्ति यह थी कि चीन का साहित्य सौंदर्य पक्ष की उपेक्षा करता है। साथ ही उन्होंने मौलिकता और साहित्य की श्रेष्ठता का प्र्श्न भी उठाया था। समाजवादी मुल्कों में क्यों तोलस्तोय जैसे लेखक पैदा नहीं होते, यह सवाल भी था। इन 60 वर्षों में इन प्रश्नों पर काफ़ी बहस हो चुकी है। गोरखनाथ की शिकायत यह थी कि जन-मंगल की भावना से प्रेरित होते हुए भी साम्यवादी साहित्य कलाहीन है, श्रीहीन है, अनुभूति-प्रवण नहीं है। ’मार्क्सवादी साहित्य का सौंदर्य पक्ष’ शीर्षक इस निबंध में मुक्तिबोध ने कहा कि चीन की जनता मुक्ति के वातावरण में साँस ले रही है और अपने देश के पुनर्निर्माण में लगी है। वह अपना साहित्य भी तैयार कर रही है।

मुक्तिबोध यह भी  कहते हैं कि साम्यवादी संसार में सबसे विकसित साहित्य रूस का है, सो उदाहरण वहाँ से लेना चाहिए। लेकिन वे जिन ‘श्रेष्ठ’ लेखकों की सूची गोरखनाथ के आरोप को काटने के लिए पेश करते हैं, उनमें से ज़्यादातर सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक रूप से स्वीकृत लेखक ही थे और ‘सकारात्मक’ लेखन करने के लिए वे तत्कालीन सत्ता के प्रिय पात्र थे। अब उस अवधि के बारे में बात करने पर मुक्तिबोध की सूची से एकाध नाम ही ठहर पाते हैं।

इस बात को लेकर 2021 में 1960 के मुक्तिबोध की आलोचना ग़लत है। यह इसलिए कि उनके पास बहुत सारी सूचनाएँ नहीं थीं। उन लेखकों के बारे में जिन्हें इन साम्यवादी देशों में ‘बहिष्कृत’ किया गया था या पतनशील घोषित करके बदनाम कर दिया गया था। या उनके बारे में जो मारे गए या जिन्होंने आत्महत्या कर ली या जिन्हें वतन छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। सिर्फ़ लेखक नहीं, कलाकार, रंगकर्मी और वैज्ञानिक या दार्शनिक भी। मुक्तिबोध की महान लेखकों की सूची में मायकोव्सकी का नाम था। उन्होंने क्यों आत्महत्या की, यह मुक्तिबोध ने नहीं क्यों नहीं पूछा ? 

यह क्या मात्र ज्ञान का तथ्यों को जानकारी का अभाव है? जैसा ‘विचार और चरित्र’ नामक एक निबंध में खुद मुक्तिबोध लिखते हैं, 

“…लोग न्याय-भावना से प्रेरित होकर भी बहुत अन्याय कर जाते हैं, इसलिए कि वे ज़िंदगी के बहुतेरे तथ्य नहीं जानते। उनके विशाल ज्ञान में विशालतर अज्ञान के सम्मिश्रण से, उनकी न्याय-प्रेरित बुद्धि अहंकार युक्त होकर भयानक अन्याय कर जाती है।”

आज हम जानते हैं कि बात सिर्फ़ ज्ञान में अज्ञान के मिश्रण की न थी। लेकिन यह मात्र मुक्तिबोध की अक्षमता न थी। 1956 के सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन की रिपोर्ट में स्तालिन के दौर की तानाशाही और दमन को उजागर कर दिए जाने के तीन दशक बाद भी हम जैसे मार्क्सवादी भी वही कह रहे थे जो 1960 में मुक्तिबोध ने लिखा था। और उस समय भी जब रूस खुद को स्तालिन से आज़ाद कर रहा था, वह हंगरी के जन-विद्रोह का दमन भी कर रहा था। मुक्तिबोध, जिनके पास पूरी दुनिया की खबर रहती थी, इस समाचार से अनभिज्ञ होंगे, मानना सम्भव नहीं। इसके बाद उन्होंने ‘अँधेरे में’ कविता लिखना शुरू किया था। उसमें जिस जन-विद्रोह का और उसके दमन का जो चित्र और रूपक है, क्या उसपर हंगरी के विद्रोह और उसके दमन की कोई छाया नहीं? क्या वह मात्र भारत के लिए भविष्यवाणी है?

जैसा हम पहले कह आए हैं, गड़बड़ी पार्टी का सदस्य होने के बाद उसे अपनी दृष्टि सौंप देने की थी। बावजूद इसके कि भारत में और भारत के बाहर भी साम्यवादी जगत में रेजिमेंटेशन और सेंसरशिप को लेकर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका था। हमने उस सबको संदेह की निगाह से देखा क्योंकि हम यह स्वीकार करने को तैयार न थे कि साम्यवादी पार्टी ‘साम्यवादी’ विचार और स्वप्न को कुचल भी सकती है। हमने सत्ता के स्वभाव को पहचानने में भी भूल की थी।

जो बात इतने सरल तरीक़े से ‘एनिमल फ़ार्म’ ने समझा दी थी, उसे हम देखने से भी इनकार कर रहे थे। क्या इसकी वजह यह थी कि कौन सा ज्ञान कब किस प्रयोजन को सिद्ध करता है, यह नाप-जोख कर हम उसके प्रति अपना रवैया तय करने के आदी हैं? जो सोवियत संघ और साम्यवादी देशों में सेंसरशिप की आलोचना करते हैं, वे इसकी व्याख्या कैसे करेंगे कि स्वतंत्र विश्व में टी. एस. इलियट जैसे व्यक्ति ने भी ‘एनिमल फार्म’ को तब प्रकाशन योग्य नहीं माना था? इसलिए कि उस वक्त स्तालिन के साथ ‘स्वतंत्र’ विश्व का समझौता था और वे स्तालिन को नाराज़ नहीं कर सकते थे। ज्ञान को सीमित प्रयोजनयीता या उपयोगिता की दृष्टि से स्वीकार, अस्वीकार करने का आरोप क्या मात्र साम्यवादियों पर लगाया जा सकता है? उनसे बेहतर तरीक़ा सोचने का फिर रबीन्द्रनाथ टैगोर का है जो ज्ञान के प्रसंग में भी प्रयोजनीयता के स्थान पर मूल्य को तरजीह देते हैं।

सूचना न होने का बहाना पर्याप्त नहीं है। गड़बड़ी ज्ञान के प्रति रणनीतिक दृष्टिकोण में है। 

स्तालिन की आलोचना के बाद रूस में या साम्यवादी विश्व में सब कुछ ठीक हो गया हो, ऐसा नहीं है। और समस्या स्तालिन के कारण थी, यह भी नहीं है। सर्वहारा को उदीयमान वर्ग मान लेने के बाद भी अगुआ दस्ता और पार्टी की सर्वोच्चता के सिद्धांत ने पार्टी के नेतृत्व को प्रश्नातीत बना दिया। फिर ज्ञान भी वही था, जो नेतृत्व द्वारा प्रमाणित किया गया हो।

इसके कारण यथार्थ को पहचानने और स्वीकार करने में जो अक्षमता पैदा हुई वह हम सबकी थी जो खुद को मार्क्सवादी कहते थे और वह एक हद तक अभी भी बनी हुई है। मुक्तिबोध के मार्क्सवाद पर विचार करते वक्त और उनकी सीमाओं पर चर्चा करते वक्त इसे नज़रअंदाज़ करना बेईमानी होगी। एक अर्थ में मुक्तिबोध को पढ़ना हम जैसे लोगों के लिए आत्मावलोकन भी है। अपने जीवन को साथ-साथ देखना जो मुक्तिबोध को पढ़ते हुए बढ़ता रहा। मुक्तिबोध के गुजर जाने के दो दशक बाद भी हम क्यों उन्हीं सीमाओं में क़ैद रहे? क्यों हमने अपने पढ़ने की आज़ादी भी खुद ही गँवा दी? 

मुक्तिबोध का मार्क्सवाद काफ़ी कुछ कार्ल मार्क्स की 1844 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों के मार्क्सवाद से मिलता है। हालाँकि उनके रहते रहते वह किताब भारत आई हो, इसका प्रमाण नहीं। उनके यहाँ तरुण मार्क्स और प्रौढ़ मार्क्स की बहस भी नहीं है। इसलिए उन दोनों में किसे चुनें, यह सवाल उनके सामने नहीं है। लेकिन यह दिलचस्प है कि अलगाव या पार्थक्य का जो सिद्धांत इन पांडुलिपियों में मार्क्स ने विकसित किया, वह मुक्तिबोध के लिए स्वतंत्र रूप से एक समस्या थी। इस सिद्धांत का विकास अपनी रचनाओं में शुरू से कर रहे थे।

उनके लिए बुनियादी सवाल मनुष्य के टूट जाने या खंडित हो जाने का है। वह अपने श्रम से अलग हो जाता है। वह अजनबी हो उठता है। उस श्रम से उसका रिश्ता आनंद का नहीं है। उस श्रम के माध्यम से वह जिस वस्तु का निर्माण करता है, वह वस्तु न सिर्फ़ उससे अलग हो जाती है बल्कि वह उसकी शत्रु भी हो उठती है। वह उसकी मालिक बन जाती है। इसलिए मुक्तिबोध की रचनाओं में ‘अकारथ’ मेहनत का ज़िक्र बार बार आता है। श्रम आनंद का स्रोत नहीं है क्योंकि वह कभी भी खुद को प्राप्त करने या व्यक्त करने का माध्यम नहीं रह पाता। यहाँ तक कि मैं उसकी कीमत भी नहीं तय कर सकता।

अलगाव या अजनबीयत मानवीय स्थिति बन जाती है। मैं अपनी ऐंद्रिक क्षमताओं से भी वंचित हो जाता हूँ। या मेरी इंद्रियाँ अपनी क्षमता गँवा देती हैं। देखना हो या सूँघना या छूना या स्वाद, एक सीमा में क़ैद! क्या मैं सब कुछ देख सकता हूँ? मेरे कान भी सब कुछ नहीं सुन पाते। प्रकृति के दृश्य, रंग गुजर जाते हैं, मुझे विभोर नहीं कर पाते। कितनी ध्वनियाँ हैं जिन्हें मेरे कान ग्रहण ही नहीं कर पाते। मैं कितने-कितने स्वादों से वंचित रह जाता हूँ। मेरी इंद्रियों का संवेदनाहीन होते जाना, उनका मुरझा जाना क्या मेरा अपराध है? मेरा जीवन उन अनुभवों से वंचित रह जाता है जो प्रकृति और शेष मनुष्यता ने ही सृजित और संचित किए हैं। क्या मेरी ज़िंदगी इंसानी ज़िंदगी कही जा सकती है? 

क्यों मैं वह इंसानी ज़िंदगी नहीं जी पाता?

“मैं क्या हो सकता था, लेकिन नहीं हुआ ! मेरे विकास के सम्भावित विकल्प खड़े हो गए। और, मैंने पाया कि वह महान आत्मशक्ति मुझमें नहीं, जो मुझमें पूर्ण रूपांतर उपस्थित कर दे, मैं क्या का क्या हो जाऊँ! मैं खुद अपने कंधों पर चढ़ जाना चाहता हूँ, आकाश छूना चाहता हूँ, चाहे उस आकाश में हाइड्रोजन-अणु का धुँआ ही क्यों न हो। मैं पृथ्वी के पेट में घुस जाना चाहता हूँ।”

क्या यह तड़प भी हर कोई महसूस कर पाता है? क्यों नहीं? मेरे और मेरे पूर्ण बोध के बीच जो दूरी खिंच गई है, जो खाई पैदा हो गई है, उसके लिए मैं ही ज़िम्मेदार हूँ?

“…वीरान अमानवीय दूरियाँ मुझे घेरे हुए हैं। आदिम प्रज्ज्वलनशील द्रव्य का एक पुंजीभूत तारा, जो सिर्फ़ दूरियों के बीच जलता हुआ चलता है! यह पार्थक्य घनघोर है। यह मेरा किया नहीं है। मैं इस पार्थक्य का विधाता नहीं। यह मेरे जमाने की बदनसीबी है। जिस चबूतरे पर मैं खड़ा हूँ, उसके पाये का यह पाप है।”

ज्ञान भी एक अनुभव है। ज्ञान का अनुभव भी कितना सीमित है। क्यों मनुष्यता का बड़ा हिस्सा ज्ञान का विषय है और लक्ष्य है लेकिन वह स्वयं ज्ञान का सृजनकर्ता नहीं? क्यों वह ज्ञान का स्रोत नहीं बन पाता? इस धारणा में लेकिन एक दोष है। आज़ादी के आंदोलन के दौरान अपने पार्टी के सहयोगियों के साथ मथुरा के एक गाँव में एक किसान से बातचीत का ज़िक्र मुक्तिबोध के प्रिय जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बेटी इंदिरा को लिखे ख़त में किया है। उस किसान ने उन्हें नहाने के लिए कुँए से पानी लेने के पहले सावधान किया कि पहले पाँच मोट कन्हैयाजी और अन्य प्रिय देवी देवताओं के नाम समर्पित हैं। नेहरू के साथी ने उसे आश्वस्त किया कि वे इस प्राचीन प्रथा को तोड़ना नहीं चाहते। उनके और किसानों के बीच सुमति है। नेहरू लिखते हैं कि उस किसान ने कहा हाँ! और तुरत ही तुलसी को उद्धृत किया, ‘जँह सुमति तँह संपति नाना’।

आगे नेहरू अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं कि उनका संबंध इस जीवन और भाषा से टूट गया है। एक तरह से वे सीमित और खंडित अनुभव करते हैं। नेहरू की तरह क्या हम यह स्वीकार कर पाते हैं कि समाज एक बड़ी हद तक हमारे लिए अजनबी है। लोगों के प्रति सद्भाव, सहानुभूति, उनसे लगाव, उनमें दिलचस्पी क़िसमें है? क्या वे किसी न किसी का, किसी न किसी के लिए ज़रिया भर नहीं हैं?  

पूँजी की वृद्धि के लिए वे बलि किए जा सकते हैं और किसी सिद्धांत को साबित करने के लिए भी उन्हें कुरबान किया जा सकता है। जन संहार से किसे परहेज़ है? जनता एक अमूर्त अवधारणा ही तो है! पूँजीवादी समाज के लिए यह जितना सच है, उतना ही साम्यवादी समाजों के लिए भी सच रहा है। कितने मार्क्सवादियों ने नेहरू की तरह जवाब दिया जब उनसे पूछा गया कि भारत की समस्या उनके लिए क्या है? उन्होंने कहा कि मैं उसे 35 करोड़ दिलों और दिमाग़ों की समस्या की तरह ही देख पाता हूँ। हरेक एक सोचता हुआ दिमाग़ और धड़कता हुआ दिल है। 

1939 में लिखे एक निबंध ‘आधुनिक समाज का धर्म’ में वे लिखते हैं,

“मैं साम्यवादी या समाजवादी भी नहीं हूँ। विश्व-समाज आजकल पतन के गहन गर्त में है, जिसका कारण है उसका ग़लत दर्शन शास्त्र … । आजकल का समाज व्यक्ति की गुणमत्ता (genious)को कुचल देता है, केवल मूर्ख और पेटू majority के लिए। लोगों को निर्जीव और जड़वत समझ लिया गया है। उनको चाहे जिस काम में लाया जा सकता है।”

“समाज का धर्म बुद्धिमान और गुणवान (genius)मनुष्यों को पैदा करना होना चाहिए। हाँ, जो नहीं है उनका नाश इष्ट न होकर उनको अधिकाधिक सुयोग्य बनाना, उनकी शक्ति, मेधा और प्रतिभा को विकसित करना उसका ध्येय होना चाहिए।… मैं degenerated समाज को बुद्धि और गुणवाले व्यक्ति को कुचलते हुए नहीं देख सकता।”

फिर क्या हुआ कि साम्यवादी समाजों ने इस धर्म को भुला दिया? जैसे पूँजी व्यक्तित्व का अपहरण कर लेती है, वैसे ही पार्टी भी? 

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