प्रगतिवाद : मानवता-सिंधु में डूबी व्यक्ति-धारा ?

मुक्तिबोध शृंखला:29 

मुक्तिबोध मार्क्सवादी हैं। मार्क्सवादी होने के साथ-साथ प्रगतिवादी भी। क्या मार्क्सवादी दृष्टि ही साहित्य और कला में प्रगतिवाद के नाम से जानी जाती है? क्या कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रभाव विस्तार करने के लिहाज से ही प्रगतिशील आंदोलन का महत्त्व है? क्या प्रगतिवाद और प्रगतिशील आंदोलन या संगठन एक दूसरे में गुँथे हुए हैं? 

मुक्तिबोध का रिश्ता प्रगतिवाद और प्रगतिशील लेखक संघ से पेचीदा रहा। मार्क्सवादी होने के कारण और राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की वजह से वे प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े। लेकिन उस दायरे में साहित्य को देखने के तरीके को लेकर उनकी बहस उन लोगों से होती रही जो इस आंदोलन या संगठन के विचारधारात्मक नेता थे। दृष्टि के संगठन में बदलते ही एक प्रकार की दृष्टिबद्धता दिखलाई पड़ने लगी। यह मुक्तिबोध के स्वभाव के विरुद्ध था। याद कीजिए ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में शमशेर बहादुर सिंह की भूमिका का वह अंश:

” ” तुम क्यों उनका दमन कर रहे हो!” वह बेहोशी में भी बड़बड़ा कर पूछता है। …. “अपने अपने आइडियाज़ हैं।”…”

लेकिन जब एक संगठित आंदोलन चल रहा हो तो वह बेहोश नहीं हो सकता। सबको अपने आइडियाज़ रखने की छूट नहीं दी जा सकती। उदारता संगठन के स्वभाव के ही विरुद्ध है शायद। और संवाद की जगह विवादात्मकता को संगठन अपनी शैली बना लेता है। प्रगतिवाद पहली ऐसी साहित्यिक प्रवृत्ति थी जिसने एक संगठन के सहारे अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने की कोशिश की।

आज इस पर हम बहस कर सकते हैं कि प्रगतिवाद का यह दावा कितना ठीक था कि वह पहली साहित्यिक दृष्टि थी जिसने व्यक्ति की जगह समाज को प्रधानता दी। यह भी कि उसने पहली बार साधारण जन को साहित्य के केंद्र में प्रतिष्ठित किया। प्रेमचंद के ही जिस निबंध को प्रगतिवाद का घोषणापत्र कहा जाता है, वह संयोग से उनके साहित्यिक जीवन के अंतिम वर्ष में लिखा और पढ़ा गया था। उसके पहले वे सारे उपन्यास और कहानियाँ लिखी जा चुकी थीं जिनके पीछे की साहित्यिक दृष्टि उनके व्याख्यान में व्यक्त हुई।

मुक्तिबोध की समझ भी यही थी कि प्रगतिवाद के पहले

अब तक की जितनी कला-प्रणालियाँ विकसित हुईं, वे थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ व्यक्ति की प्रधानता में ही अवसित हुईं। यह व्यक्ति की प्रधानता सामाजिक तत्त्व की दृष्टि से बाहर रहकर परिपुष्ट हुई।”

प्रगतिवाद ने सामाजिकता की प्रधानता के साथ-साथ ही यथार्थवादी दृष्टि भी प्रदान की, यह मुक्तिबोध की समझ थी और प्रगतिवाद का दावा भी था। लेकिन यह बात पूरी तरह ठीक नहीं थी। और लेखकों को छोड़ दें, चंद्रधर शर्मा गुलेरी के निबंध “हिंदी भाषा के उपन्यास-लेखकों के नाम” को पढ़ें जो 1905 में एक चिट्ठी की शक्ल में लिखा गया था। गुलेरीजी उपन्यास के पात्रों के चयन और उनके चित्रण के विषय में लिखते हैं,

“… मेरा (अर्थात् सच्चे उपन्यास लेखक का) सब से प्रबल पर्यटन यही होता है कि …मनुष्य और वस्तुओं का वैसा ही सच्चा चरित्र दूँ जैसे कि वे मेरे ह्रदय के काँच में अंकित हुए हैं।”

गुलेरीजी उपन्यास लिखनेवालों को दुनिया की पेचीदगी और उलझन को मनचाहे तरीके से सुलझाने के प्रलोभन पर नियंत्रण करने की सलाह देते हैं,

ठीक जैसा हम चाहते हैं, वैसा तो या जगत् है ही नहीं; कुछ इसको रसमयी पेन्सिल से रंग दो और विश्वास करा दो कि यह इतना उलझा हुआ मामला नहीं है।” 

आगे वे कहते हैं,

इन साथी मर्त्यों में से प्रत्येक जैसा है उसको वैसा ही लेना और समझना पड़ेगा; तुम न उनके नाक सीधे कर सकते हो, न उनकी हँसी को चमका सकते हो, न उनके स्वभावों को ठीक कर सकते हो, और इन लोगों को ही, जिनमें आपको अपना जीवन बिताना पड़ेगा, सहना, सम्हालना और प्यार करना तुम्हें आवश्यक है। ये न्यूनाधिक कुरूप, मूर्ख और असंबद्ध मनुष्य वे हैं जिनकी भलाई की बड़ाई करने को तुम्हें समर्थ होना चाहिए और जिनके लिए तुम्हें यथासंभव आशा और यथासंभव सतोष काम में लाना पड़ेगा।”

मुक्तिबोध जिस तरह साँवले गुलाब और काली सेवंती को अपना स्नेह देना चाहते हैं वैसे ही गुलेरीजी,

“…अपने काम से घसे हाथों से आलू उबालती हुई बुढ़ियाओं को, उन गोल पीठों और सब ऋतुओं को सहनेवाले चेहरों को जिन्होंने हल और कुदाली पर झुक-झुककर काम किया यही, होली में थोड़ी-सी भाँग पर मस्त गँवारों को, उन पीतल के बर्तनोंवाले घरों, मट्टी की हांडियों, लेंडी कुत्तों और प्याज के छिलकों”

को।

मुक्तिबोध ने लेकिन प्रगतिवाद की विशिष्टता दूसरी जगह देखी,

प्रगतिवाद … कहता है कि जब तक सामाजिक न्याय नहीं हुआ तब तक व्यक्ति के चिंतन में हमेशा दोष उत्पन्न होते रहेंगे। सुसंगति और समस्वरता के निरंतर चेष्टा करते रहने के बाद भी वह ठीक-ठीक अर्थ में आदर्श प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक वह समाज के प्रति सुसंगत न हो लें।

यह सुसंगति बाह्य होगी। आज तक की कला जिस समाज की रही, वह

शोषण के बल पर एक निम्न वर्गदलित वर्ग के आधार पर खड़ा होने के कारण उसके कला-विचार के आस-पास एक मर्यादा रेखा आप-ही आप खिंच गई जिसके परे और बाहरविचारकों की दृष्टि न जा सकी।

मुक्तिबोध और प्रगतिवादी साहित्य के अन्य सिद्धांतकार खुद को छायावाद की अपेक्षा प्रगतिशील मान रहे थे। लेकिन साहित्य मात्र कविता ही तो नहीं था। साहित्य के सिद्धांत निरूपण में गद्य, उपन्यास और कहानियों की दुनिया को प्रायः उपेक्षित कर दिया गया। जो छायावाद का समय था वही प्रेमचंद का काल भी था। उसी समय निराला भी अपना कथा साहित्य रच रहे थे। वह व्यक्तिबद्ध संसार कला का न था। और छायावाद का मैं भी सामाजिक मैं ही था।

फिर भी मुक्तिबोध यह मानते थे कि प्रगतिवाद की विशिष्टता यह है कि वह ‘जनता के अथाह हृदय के सम्पर्क’ से ‘कला-शरीर की नसों में नया रक्त और नवस्फूर्ति’ का संचार करेगा।’ जनता से ‘चैतन्यमय सहानुभूति’ प्राप्त कर तेज प्राप्त करना साहित्यकार का दायित्व होगा। इसके लिए

कलाकार संकुचित वृत्ति को छोड़कर सम्पूर्ण जनता के आवश्यक साम्य के सिद्धांत को स्वीकार कर तदनुसार अपनी अनुभूतियों की रचना करे उनको अधिक व्यापक और गम्भीर बनाए।

यह तय कौन करेगा कि कलाकार ऐसा कर रहा है? कौन इस कसौटी पर उसकी रचना को कसकर उसे पास और फेल करेगा? क्या यह काम संगठन करेगा, उसके सैद्धांतिक नेता? आगे चलकर मुक्तिबोध को खुद उनके आगे जवाबदेह होना था। इसकी कुछ आशंका उन्हें थी, संभवतः इसी कारण इसी लेख में उन्होंने सावधान किया

“…व्यापकता का सिद्धांत स्वीकार करते हुए भी अनुभूतियाँ ढाली नहीं जा सकतीं।

प्रगतिवादी कौन है? वह जो वर्ग विहीन सत्ता का हिमायती हो। इसके लिए आवश्यक क्रांति का पुजारी हो। उसका दायित्व है जनता के अधिक से अधिक सम्पर्क में आना और क्रांति को ‘शीघ्र आगमनशील’ बनाना।

यह कैसे तय होगा कि रचनाकार सही क़िस्म की जनता के सम्पर्क में है और उसकी रचनाएँ क्रांति को निकट लाने में मदद कर रही हैं? इस लेख के लिखे जाने के बाद दो दशकों के अपने सर्जनात्मक जीवन में मुक्तिबोध को ही यह आरोप झेलना पड़ा कि उनकी दृष्टि साफ़ नहीं है, वे व्यक्ति के मन में डूबे  हुए हैं और उनकी रचनाएँ भ्रम उत्पन्न कर रही हैं।

मुक्तिबोध कार्य-कारणवाद को अस्वीकार करते हैं और कहते हैं कि

प्रगतिवादी एक निश्चित दार्शनिक ऐटीट्यूड उत्पन्न करता है, जो न स्वसे अधिक बाह्यको, बाह्यसे अधिक स्वको महत्त्व देता है।

स्व और बाह्य के इस संबंध पर मुक्तिबोध के संदर्भ में ही आगे विवाद होनेवाला था। इन दोनों में प्राथमिकता किसकी होगी? अपने एक दूसरे निबंध ‘साहित्य में व्यक्तिगत आदर्श’ में वे लिखते हैं,

व्यक्ति-धारा जब मानवता-सिंधु में डूब जाती है तब उसके संगमस्थल पर जो कलरव होता है वही कला बन जाती है।

न तो मानवता के इस सिंधु की उपेक्षा की जा सकती है और न व्यक्ति-धारा को निषिद्ध किया जा सकता है,

कला मानव-समाज की वाणी में झंकृत व्यक्तिगत कम्पन है।

इन दोनों लेखों में एक साल का अंतर है। जैसे यह पिछले लेख के उत्साह का परिमार्जन कर रहा है। समाज के नाम पर व्यक्ति की हत्या की जा सकती है, इसके उदाहरण साम्यवादी देशों में थे लेकिन उनसे भारत के प्रगतिशील या प्रगतिवादी परिचित न थे। इसलिए इस लेख में मानवता, समाज, क्रांति के बावजूद ज़ोर व्यक्ति पर है,

विश्वात्मक संघर्ष की लहरों को अपने अंदर पानेवाला व्यक्ति है और उसके अनुभव व्यक्तिगत हैं। वह महत्तर बाह्य से किरणें और पानी लेता है और हृदय में नया ओज अनुभव करता है।

इस ओज को फिर वह विराट विस्तार में लीन कर देता है। इसके बाद जो मुक्तिबोध लिखते हैं, वह प्रगतिवाद के सिद्धांतीकरण में उनका योगदान है:

“ …इस महान बाह्य से वह स्वयं महानहोना चाहता है। और उसके अपने महानहोने का रूप उसका मूर्त आकार वह निजी तत्त्वों से बनाना चाहता है।

यह निजता प्रकृति ने ही प्रदान की है:

ये निजी तत्त्व प्रकृति का वह वैविध्य है जिसका केंद्र और एकत्व स्वयं प्रकृति है।

प्रकृति की विविधता का अर्थ ही है विभिन्न निजताओं की रक्षा:

प्राकृतिक क्रियमाणता के एकत्व की अभिव्यक्ति इसी वैविध्य-सृजन और रक्षण के मार्ग द्वारा होती है।

तो कला का और राजनीति का भी उद्देश्य वैविध्य के सृजन और उसके रक्षण का है। यह प्रकृति प्रदत्त है। तो मामला सिर्फ़ व्यक्ति और समाज के बीच के संबंध का नहीं रह जाता। व्यक्ति के भीतर प्रकृति की यह विराटता बंद है:

व्यक्ति, समाज और समाजोत्तर प्रकृति, तीन हिस्से हैं। व्यक्ति के लिए समाज एक परिस्थिति है, दूसरी समाज-बाह्य प्रकृति। समाज के लिए केवल समाज-बाह्य प्रकृति एकमात्र परिस्थिति है। और प्रकृति इन तीनों को अंतर्भूत करती है।

प्रकृति की इस प्रधानता और उसकी हर क्षण उपस्थिति के बोध से क्या फ़र्क़ पड़ सकता है? मुक्तिबोध ने आगे अपने लेखों में इस चर्चा को विस्तार नहीं दिया लेकिन व्यक्ति के लिए मात्र समाज एक संदर्भ नहीं है, यह तो इस लेख में वे कह ही रहे हैं। आगे वे लिखते हैं,

प्रकृति अपने स्पेसीज़ के द्वारा ही अपनी गति जारी रखती है। अतः विशालतम समन्वय में भी व्यक्ति की छाप बनी रहती है।

व्यक्ति ही समाज का ‘अनुभव-केंद्र’ है। ‘आंतरिक व्यक्तित्व की माँग’ और ‘आत्म-तृषा’ ही व्यक्ति को रचनात्मक तरीक़े से सक्रिय रख सकती है। मुक्तिबोध एक सच्चे प्रगतिवादी की तरह सावधान करते हैं कि यह आत्म तृषा वर्ग-निरपेक्ष नहीं है। वह आत्म-तृषा समूह

उस वर्ग का अभिन्न अंग होगा जिसका प्रतिनिधि होकर कलाकार अपनी बात कह रहा है, कि जिस वर्ग में उसकी आत्म-तृषाओं की परिपूर्णता की आशा है…”

यह वर्ग-चेतन व्यक्ति है लेकिन इसी एक वाक्य में वे यह भी जोड़ते  हैं,

अपने को इनकार करके वह उस वर्ग-विश्व को इनकार करता है। अपने को इनकार करके मनुष्य विश्व को इनकार करता है…”

मुक्तिबोध अनुमान कर पा रहे हैं कि वर्ग हो या समाज, वह व्यक्ति की इस अपनी तृषा से ही इनकार कर दे सकता है। वे फ़्रायड के सहारे मनुष्य के अवचेतन के महत्त्व की तरफ इशारा करते हैं। वह अवचेतन ‘प्राकृत शक्ति का गतिमान प्रवाह’ है। इस प्रवाह के तत्त्व समाज से प्राप्त होते हैं। फिर भी एक ‘जेनोटाइप’ है, ‘व्यक्तिगत’ है, निजी है, जिससे इनकार करने का अर्थ होगा व्यक्ति की हत्या।

मनुष्य का या व्यक्ति का समाज से एक गतिमान संबंध है। व्यक्ति का अवचेतन अपने चेतन के साथ भी एक गतिमान संबंध में बंधा है। सृजन के लिए आवश्यक ‘शक्ति-धारा’ अवचेतन से प्राप्त होती है जबकि चेतन ‘कन्सेप्शन’ निर्मित करता है। इस गतिमानता में दोनों का सामंजस्य होने पर ही सृजन होता है। यह सामंजस्य तभी हो सकता है जब

मनुष्य को उसकी आंतरिक आवश्यकता के अनुसार सामाजिक रोल प्राप्त हो।

किसी व्यक्ति की आंतरिक आवश्यकता का निर्धारण कौन करेगा? यह प्रश्न अमूर्त और मात्र सैद्धांतिक न था। साम्यवादी विश्व में यह एक यथार्थ प्रश्न बन गया था। कलाकारों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न। वर्ग-चेतना क़िसमें पर्याप्त है और क्या वह उचित परिमाण में, उपयुक्त रूप में प्रकाश प्राप्त कर रही है, यह कैसे तय होगा? कौन से मनोभाव स्वीकार किए जाएँगे और कौन से तिरस्कृत? उनकी शैली क्या होगी? किस शैली, किस रूपाकार को माना जाएगा कि वह वर्ग-संवेदना की सच्ची और खरी अभिव्यक्ति है?

मुक्तिबोध को इन प्रश्नों का सामना करना था। प्रगतिवाद आगे चलकर मात्र एक ‘ऐटिट्यूड’ न रहनेवाला था। वह विषय और शैली या शिल्प की भी दर्ज़ाबंदी करनेवाला था। मुक्तिबोध को इस समस्या का सामना करना था कि वे अपनी जिस आंतरिकता की अभिव्यक्ति का संघर्ष कर रहे थे, उसके प्रति प्रगतिवादी दायरे में बहुत उत्साह न था। ’वस्तु और रूप’ शीर्षक लेख माला में मुक्तिबोध ने स्वीकार किया कि उनकी कविताएँ

प्रगतिवादी ढाँचे की नहीं हैं, न उनकी तत्त्व व्यवस्था विशुद्ध सामाजिक-राजनैतिक है, यद्यपि ये सामाजिक-राजनैतिक तत्त्व बेमालूम तरीक़े से उनमें मिले हुए हैं।

यह अनजाने नहीं हुआ है,

सच तो यह है कि मैंने काव्य-जगत् के आत्मीय क्षेत्र में प्रगतिवाद-विशिष्ट यांत्रिक रूप से चलनेवाले राजनैतिक-सामाजिक विचार-भाव, यंत्रिक ओज और यांत्रिक छंद अस्वीकार कर दिए।

यह क्यों किया मुक्तिबोध ने?

मुझे प्रतीत हुआ कि काव्य में मनुष्य की सामाजिक-राजनैतिक इयत्ता ही नहीं प्रकट होनी चाहिए (किंतु उसको काटकर नहीं फेंका जा सकता … ), किंतु पूर्ण मनुष्य के दर्शन, मानव-जीवन के सभी पक्षों के दर्शन होने चाहिए, सपंदनशील वैविध्यपूर्ण महान गुणों से युक्त साहसिक मानव-जीवन की प्रतिष्ठा होनी चाहिए।

प्रगतिवाद इस महान जीवन से सम्पर्क को सुगम नहीं कर रहा था, वह एकक्षेत्रीय, यंत्रवत होने के कारण गतिशीलता खो बैठा था। ऐसा क्यों हुआ होगा कि जो विचार आत्मबद्धता से मनुष्य को मुक्त कर एक विराट व्यापकता से संयुक्त करने का आश्वासन था, वह उसे सीमाबद्ध करने लगा? क्यों वह आंतरिकता का शत्रु हो उठा?

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