मारूति-सुजुकि मज़दूरों को उम्र कैद व अन्य नाजायज सजाओं के खिलाफ़ पंजाब में उठी जोरदार आवाज़: लखविन्दर

अतिथि post: लखविन्दर

मारूति-सुजुकि मज़दूरों को उम्र कैद व अन्य नाजायज सजाओं के गुड़गांव अदालत के फैसले को घोर पूँजीपरस्त, पूरे मज़दूर वर्ग व मेहनतकश जनता पर बड़ा हमला मानते हुए पंजाब के मज़दूरों, किसानों, नौजवानों, छात्रों, सरकारी मुलाजिमों, जनवादी अधिकारों के पक्ष में आवाज उठाने वाले बुद्धिजीवियों व अन्य नागरिकों के संगठनों ने व्यापक स्तर पर आवाज़ बुलन्द की है। 4 और 5 अप्रैल को देश व्यापी प्रदर्शनों में पंजाब के जनसंगठनों ने भी व्यापक शमूलियत की है। विभिन्न संगठनों ने व्यापक स्तर पर पर्चा वितरण किया, फेसबुक, वट्सएप पर प्रचार मुहिम चलाई। अखबारों, सोशल मीडिया आदि से इन गतिविधियों की कुछ जानकारी प्राप्त हुई है।

​5 अप्रैल को लुधियाना में लघु सचिवालय पर डीसी कार्यालय पर टेक्सटाईल-हौजऱी कामगार यूनियन, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियनें, मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान, नौजवान भारत सभा, पी.एस.यू., एटक, सीटू, एस.एस.ए.-रमसा यूनियन, पेंडू मज़दूर यूनियन, डी.टी.एफ., रेलवे पेन्शनर्ज वेल्फेयर ऐसोसिएशन, जमहूरी अधिकार सभा, आँगनवाड़ी मिड डे मील आशा वर्कर्ज यूनियन, कामागाटा मारू यादगारी कमेटी, स्त्री मज़दूर संगठन, कारखाना मज़दूर यूनियन, पेंडू मज़दूर यूनियन (मशाल), कुल हिन्द निर्माण मज़दूर यूनियन आदि संगठनों के नेतृत्व में जोरदार प्रदर्शन हुआ और राष्ट्रपति के नाम माँग पत्र सौंपा गया जिसमें माँग की गई कि सभी मारूति-सुजुकि के सभी मज़दूरों को बिना शर्त रिहा किया जाए. उनपर नाजायज-झूठे मुकद्दमे रद्द हो, काम से निकाले गए सभी मज़दूरों को कम्पनी में वापिस लिया जाए।


​लुधियाना में 5 अप्रैल के प्रदर्शन की तैयारी के लिए हिन्दी और पंजाबी पर्चा वितरण भी किया गया जिसके जरिए लोगों को मारूति-सुजुकि मज़दूरों के संघर्ष, उनके साथ हुए अन्याय, न्यायपालिका-सरकार-पुलिस के पूँजीपरस्त और मज़दूर विरोधी-जनविरोधी चरित्र से परिचित कराया गया और प्रदर्शन में पहुँचने की अपील की गई। लुधियाना में 16 मार्च को भी बिगुल मज़ूदर दस्ता, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियनों, मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान, आदि संगठनों द्वारा रोषपूर्ण प्रदर्शन किया गया था।

​जमहूरी अधिकार सभा, पंजाब द्वारा बठिण्डा व संगरूर में 4 अप्रैल, बरनाला में 8 अप्रैल को, लुधियाना में 1 अप्रैल को पिछले दिनों देश की अदालतों द्वारा हुए तीन जनविरोधी फैसलों मारूति-सुजुकि के मज़दूरों को उम्र कैद व अन्य सजाएँ, जनवादी अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. साईबाबा सहित अन्य बेगुनाह लोगों को उम्र कैद की सजाओं, और हिन्दुत्वी आतन्कवादी असीमानन्द को बरी करने के मुद्दों पर कन्वेंशनें, सेमिनार, प्रदर्शन, मीटिंगें आदि आयोजित किए गए जिनमें अन्य जनसंगठनों नें भी भागीदारी की। जमहूरी अधिकार सभा ने इन मुद्दों पर एक पर्चा भी प्रकाशित किया जो बड़े स्तर पर पंजाब में बाँटा गया।

 पटियाला में 4 अप्रैल को मज़दूरों, छात्रों, किसानों के विभिन्न संगठनों द्वारा रोष प्रदर्शन किया गया। बिजली मुलाजिमों ने भी टेक्नीकल सर्विसज़ यूनियन के नेतृत्व में 4 अप्रैल को अनेकों जगहों पर प्रदर्शन किए। लहरा थरमल पलांट के ठेका मज़दूरों ने 4 अप्रैल को रोष रैली के जरिए मारूति-सुजुकि मज़दूरों के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए उनके समर्थन में आवाज़ उठाई। मारूति-सुजुकि मज़दूरों के समर्थन में पंजाब में उठी आवाज़ की कड़ी में लोक मोर्चा पंजाब ने 8 अप्रैल को लम्बी (जिला बठिण्डा) में रैली और रोष प्रदर्शन किया। लम्बी में आर.एम.पी. चिकित्सकों द्वारा भी प्रदर्शन किया गया। अनेकों गाँवों में मज़दूर-किसान-नौजवान संगठनों ने अर्थी फूँक प्रदर्शन भी किए हैं। आप्रेशन ग्रीन हण्ट विरोधी जमहूरी फ्रण्ट, पंजाब ने मोगा में 12 अप्रैल को कान्फ्रेंस और प्रदर्शन आयोजित किया।

मारूति-सुजुकि मज़दूरों का जिस स्तर पर कम्पनी में शोषण हो रहा था और इसके खिलाफ़ उठी आवाज़ को जिस घृणित बर्बर ढंग से कुचलने की कोशिश की गई है उसके खिलाफ़ आवाज़ उठनी स्वाभाविक और लाजिमी थी। पंजाब के इंसाफपसंद लोगों का हक, सच, इंसाफ के लिए जुझारू संघर्षों का पुराना और शानदार इतिहास रहा है। अधिकारों के जूझ रहे मारूति-सुजुकि मज़दूरों का साथ वे हमेशा निभाते रहेंगे।

पूरे देश में मज़दूरों का देशी-विदेशी पूँजीपतियों द्वारा भयानक शोषण हो रहा है। जब मज़दूर आवाज़ उठाते हैं तो पूँजीपति और उनका सेवादार पूरा सरकारी तंत्र दमन के लिए टूट पड़ता है। ऐसा ही मारूति-सुजुकी, मानेसर (जिला गुडग़ांव, हरियाणा) के संघर्षरत

 मज़दूरों के साथ हुआ है। एक बहुत बड़ी साजिश के तहत कत्ल, इरादा कत्ल जैसे पूरी तरह झूठे केसों में फँसाकर पहले तो 148 मज़दूरों को चार वर्ष से अधिक समय तक, बिना जमानत दिए, जेल में बन्द रखा गया और अब गुडग़ाँव की अदालत ने नाज़ायज ढंग से 13 मज़दूरों को उम्र कैद और चार को 5-5 वर्ष की कैद की कठोर सजा सुनाई है। 14 अन्य मज़दूरों को चार-चार साल की सजा सुनाई गई है लेकिन क्योंकि वे पहले ही लगभग साढे वर्ष जेल में रह चुके हैं इसलिए उन्हें रिहा कर दिया गया है। 117 मज़दूरों को, जिन्हें बाकी मज़दूरों के साथ इतने सालों तक जेलों में ठूँस कर रखा गया उन्हें बरी करना पड़ा है। सबूत तो बाकी मज़दूरों के खिलाफ़ भी नहीं है लेकिन फिर भी उन्हें जेल में बन्द रखने का बर्बर हुक्म सुनाया गया है।

​जापानी कम्पनी मारूति-सुजुकि के खिलाफ़ मज़दूरों ने श्रम अधिकारों के उलण्घन, कमरतोड़ मेहनत करवाने, कम वेतन, लंच, चाय, आदि की ब्रेक के बाद एक मिनट के देरी के लिए भी आधे दिन का वेतन काटने, छुट्टी करने के लिए हजारों रूपए वेतन से काटने जैसे भारी जुर्माने लगाने, आदि के खिलाफ़ कुछ वर्ष पहले संघर्ष का बिगुल बजाया था। कम्पनी की दलाल तथाकथित मज़दूर यूनियन की जगह उन्होंने अपनी यूनियन बनाई। नई यूनियन के पंजीकरण में कम्पनी ने ढेरों रूकावटें खड़ी कीं। उस समय हरियाणा में कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा ने सरेआम पूँजीपतियों की दलाली का प्रदर्शन करते हुए कहा था कि कारखाने में नई यूनियन नहीं बनने दी जाएगी। मज़दूरों ने लम्बी-लम्बी हड़तालें लड़ीं, अपने अथक संघर्ष से यूनियन का पंजीकरण कराके जीत हासिल की। मज़दूर संघर्ष कम्पनी और समूचे सरकारी तंत्र की आँख की किरकरी बना हुआ था। संघर्ष कुचलने के लिए साजिश रची गई। 18 जुलाई 2012 को कारखाने के भीतर पुलीस की हाजिरी में सैंकड़ों हथियारबन्द गुण्डों से मज़दूरों पर हमला करवाया गया। बड़ी संख्या मज़दूर जख्मी हुए। कारखाने में आग लगवा दी गई। एक मज़दूर पक्षधर मैनेजर की इस दौरान मौत हो गई। साजिश के तहत इसका दोष मज़दूरों पर मढ़ दिया गया। बड़े स्तर पर गिरफतारियाँ की गईं, यातनाएँ दी गईं। ढाई हज़ार मज़दूरों को गैरकानूनी रूप से नौकरी से निकाल दिया गया। 148 मज़दूरों को जेल में ठूँस दिया गया। जमानत की अर्जी पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर जमानत दी गई तो भारत में विदेशी पूँजी का निवेश रुकेगा। जिन 13 मज़दूरों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है उनमें 12 लोग यूनियन नेतृत्व का हिस्सा थे। इससे इस झूठे मुकद्दमे का मकसद समझना मुश्किल नहीं है।

अदालत का फैसला कितना अन्यायपूर्ण है इसका अन्दाजा लगाने के लिए सिर्फ कुछ तथ्य ही काफ़ी हैं। कम्पनी में चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हुए हैं लेकिन अदालत में कहा कि उसके पास 18 जुलाई काण्ड की कोई वीडियो है ही नहीं! कम्पनी के गवाहों के ब्यानों से साफ पता चल रहा था कि झूठ बोल रहे हैं। वो तो मज़दूरों को पहचान तक न सके। गुण्डों व उनका साथ देने वाले मैनेजरों व अन्य स्टाफ के मैंबरों से कहीं अधिक संख्या में मज़दूर जख्मी हुए थे। पोस्ट मार्टम में पाया गया कि मैनेजर अवनीश कुमार की मौत दम घुटने से हुई है न कि जलाए जाने से जिससे साफ़ है कि यह हत्या का मामला है ही नहीं। और भी बहुत सारे तथ्य स्पष्ट तौर मज़दूरों का बेगुनाह होना साबित कर रहे थे लेकिन इन्हें अदालत ने नजरान्दाज कर मज़दूरों को ही दोषी करार दे दिया क्योंकि पूँजी निवेश को बढ़ावा जो देना है! वास्तव में मारूति-सुजुकी घटनाक्रम के जरिए लुटेरे हुक्मरानों ने ऐलान किया है कि अगर कोई लूट-शोषण के खिलाफ़ बोलेगा वो कुचला जाएगा।

ये फैसला तब आया है जब असीमानन्द और अन्य संघी आतन्कवादियों के खिलाफ ठोस सबूत होने, असीमानन्द द्वारा जुर्म कबूल कर लेने के बावजूद भी बरी कर दिया जाता है। दंगे भड़काने वाले, बेगुनाहों का कत्लेआम करने वाले न सिर्फ आज़ाद घूम रहे हैं बल्कि मुख्य मंत्री, प्रधान मंत्री जैसे पदों पर पहुँच रहे हैं !

आज देशी-विदेशी कम्पनियों, लुटेरे धन्नासेठों को खुश करने के लिए सरकारें मज़दूरों से सारे श्रम अधिकार छीन रही हैं। न्यूनतम वेतन, फण्ड, बोनस, हादसों से सुरक्षा के इंतजाम तक लागू न करने वाले पूँजीपतियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, उन्हें कभी जेल में नहीं ठूँसा जाता। उलटा भाजपा, कांग्रेस से लेकर तमाम पार्टियों की सरकारें कानूनी श्रम अधिकारों में मज़दूर विरोधी बदलाव करके पूँजीपतियों को मज़दूरों की बर्बर लूट की और भी खुली छूट दे रही हैं। किसानों, छात्रों, नौजवानों, आदिवासियों, सरकारी कर्मचारियों के अधिकार कुचले जा रहे हैं। भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, आदि तमाम सरकारी सहूलतें छीनी जा रही हैं। इसके खिलाफ़ उठी हर आवाज को दबाने के लिए पूरा राज्य तंत्र अत्याधिक हमलावर हो चुका है। काले कानून बनाकर एकजुट संघर्ष के जनवादी अधिकार छीने जा रहे हैं। जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, कलाकारों तक का दमन हो रहा है, जेलों में ठूँसा जा रहा है। जन एकजुटता को तोडऩे के लिए धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर बाँटने की साजिशें पहले किसी भी समय से कहीं अधिक तेज़ हो चुकी हैं। जहाँ जनता को बाँटा न सके, जहाँ लोगों का ध्यान असल मुद्दों से भटकाया न जा सके, वहाँ जेल, लाठी, गोली से कुचला जा रहा है। यही मारूति-सुजुकी मज़दूरों के साथ हुआ है। लेकिन बर्बर हुक्मरानों को दीवार पर लिखा पढ़ लेना चाहिए। इतिसाह गवाह है- जेल, लाठी, गोली, बर्बर दमन जनता की अवाज़ न कभी दबी है न कभी देबेगी।

Remembering Chandu, Friend and Comrade: Kavita Krishnan

Chandrashekhar (Comrade Chandu)

Guest Post by Kavita Krishnan

It’s been twenty years since the assassin’s bullets took Chandu away from us, at 4 pm on 31 March 1997.

I still recall my sheer disbelief when a phone call from my party office at my hostel that evening informed me ‘Chandu has been killed.’ Chandrashekhar as well as youth leader Shyam Narayan Yadav had been shot dead while addressing a street corner meeting in Siwan – ironically at a Chowk named after JP – Jaiprakash Narayan, icon of the movement for democracy against the Emergency. A rickshaw puller Bhuteli Mian also fell to a stray bullet fired by the assassins – all known to be henchmen of the RJD MP and mafia don Mohd. Shahabuddin.

In the spring of 1997, as JNU began to burst into the riotous colours of amaltas and bougainvillea, Chandu bid us goodbye. He had served two terms as JNUSU President (I was Joint Secretary during his second stint) and had decided to return to his hometown Siwan, as a whole-time activist of the CPI(ML) Liberation. He had made the decision to be a whole-time activist a long time ago. Chandu’s friends know that for him, the decision to be an activist rather than pursue a salaried career was no ‘sacrifice.’ It was a decision to do what he loved doing and felt he owed to society.

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Slimes Group Vice-Chairman Ameer Jain accused of molesting SOI employee Aaj Faker Shah? Breaking Faking News: Shehla Rashid

Guest Post by Shehla Rashid

Mar 21, Delhi: In a shocking revelation that has triggered panic amongst the media fraternity, renowned media tycoon, Ameer Jain, who is Vice-Chairman of the prestigious Parrot, Caveman & Co. Ltd, has been accused of sexual harassment by an employee of The Slimes of India newspaper, namely Aaj Faker Shah. Parrot, Caveman & Co. Ltd. (PCCL) is the group that owns Slimes of India, Slimes Now, Economic Slimes, Radio Tirchi, Movies Now and Then, Dhoom, Navbharat Slimes, Mumbai Broken Mirror and numerous other media outlets.

After the sexual harassment case filed by an employee of a major news magazine against its high profile editor some years ago, this is the most high-profile case of sexual harassment at the workplace in the media fraternity and is likely to result in a public spectacle, as the complainant, Aaj Faker Shah, has taken to Twitter to publicly make serious accusations of sexual assault against Jain. Normally, in cases of sexual harassment, the complainant must be accorded due anonymity. However, Shah reasons that he was forced to take this extreme step because the Slimes Group, in total violation of the norms prescribed by the Sexual Harassment at the Workplace Act (2013), sat on his complaint, victimised him for speaking out against Jain and even threatened to sack him. This reflects the state of implementation of the Workplace Harassment Law, rules for which were notified in 2014. Continue reading “Slimes Group Vice-Chairman Ameer Jain accused of molesting SOI employee Aaj Faker Shah? Breaking Faking News: Shehla Rashid”

Free the Maruti Workers: Maruti Suzuki Workers Union

 

Guest Post by Maruti Suzuki Workers’ Union

[This is a statement and an appeal by the Maruti Suzuki Workers Union condemning the unjust handing down of a life sentence to 13 workers of the Maruti Suzuki Manesar Factory for a ‘murder’ (of an HR Manager) that the prosecution could not prove that they had committed. Here too, the prosecution, and the judgement, relies on a chimera, ‘the reputation of make-in-india’ to justify a harsh punishment. Those who have watched this space will recognize that this recourse to figures of speech in the absence of evidence is a familiar move. It has happened before – to satisfy the hunger of a ‘collective conscience’ when a so-called ‘temple of democracy’ was attacked. This time it has been invoked to defend the ‘fake-in-India temple that houses the deity of a rising GDP’, which would of course otherwise be besieged by insurgent workers.

This text contains a hyperlink to a detailed reading and rebuttal of the prosecution’s arguments, which demonstrates how money and muscle power can always be an adequate replacement for legal acumen in the State of Haryana. Please do follow that link. For the further edification of our readers, we append a short video interview by Aman Sethi of the Hindustan Times of the special public prosecutor, which spins some imaginative legal theory and also radically updates our sense of class struggle. Please do have the patience to view that video. We promise that this will be rewarded. – Kafila Admin.]

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UAPA – A Video Dossier: Media Collective, Arun Ferreira &Vernon Gonsalves

Video by Media Collective, Article by Arun Ferreira and Vernon Fernandes

Fifty Years of Unreasonable Restrictions

Arun Ferreira & Vernon Gonsalves 

Soon after its adoption, the Constitution of India was amended in 1951. At the time several progressive judgements[i] by the Judiciary held that laws which curb fundamental rights are essentially unconstitutional and fundamental freedoms could only be curbed in the most extreme of cases. The First Amendment, countered this by amending Article 19 to add the word ‘reasonable’ before restrictions and to add ‘public order’ as being one more ground for abridging Fundamental Rights.

The evolution of UAPA[ii] has to be seen in the background of this gradual but steady constriction of Article 19 which guarantees the fundamental freedoms of expression, assembly, association, etc. Continue reading “UAPA – A Video Dossier: Media Collective, Arun Ferreira &Vernon Gonsalves”

A Tale of Two and a Half Marches – Two for Azadi and a Half for Ghulami.

[Videos of song by Shehla Rashid and of speeches by Nivedita Menon, Kavita Krishnan, Umar Khalid and Jignesh Mevani, courtesy, Samim Asgor Ali]

February gives way to March and spring returns to Delhi. And what a spring it is. The right wing thugs of the ABVP choose the wrong time to attack, once again. They must really get themselves a better astrologer, or at least a better class of charlatan who can tell them if there ever is a right time to stage their goon show. I suspect there isn’t.

Spring in DU - Fight Back DU
Spring in DU – Fight Back DU

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In Solidarity with Adivasis in Bastar, Human Rights Defenders and Bela Bhatia in Bastar: Concerned Students in TISS, Mumbai

Guest Post by CONCERNED STUDENTS OF TATA INSTITUTE OF SOCIAL SCIENCES, MUMBAI

We, the concerned students of Tata Institute of Social Sciences (TISS), Mumbai condemn the continuing state repression of adivasis and recent attack on human rights activist Bela Bhatia in Bastar, Chhattisgarh.

On the 23rd of January, 2017, a group of 30-odd men attacked Bela where they barged into her house in Parpa, near Jagdalpur violently and threatened to burn the building down if she did not leave immediately. The mob also attacked her landlords and their children, threatening them with dire consequences if Bela was not evicted immediately. Despite Bela’s assurances that she would leave, the mob continued to be belligerent, in the presence of the police, and the Sarpanch. The mob has been identified with the right-wing vigilante group Action Group for National Integrity (AGNI).

In last one year alone a number of vigilante groups like the now disbanded Samajik Ekta Manch, Naxal Peedith Sangharash Samiti and the newly formed group AGNI have been used by Kalluri and the Bastar police, to harass and intimidate everyone living and working in the area, be it lawyers, journalists, local leaders, researchers who are exposing these cases of atrocities and calling the state to account. Many of these vigilante groups are formed by ex Salwa Judum leaders. An all-out war has been launched against the people of Bastar by the security forces. These state forces are hell bent on ensuring that this becomes ‘A war without any witnesses’.

In the present scenario, the adivasis in Bastar are putting up a tough fight against State’s attempt to dispossess them. It is an attempt to finish off adivasi community, their culture and their existence all together so that the mineral rich land and jungles of central region of the country could be easily handed off to the Corporates.  In this war between the state and people of Bastar, all those who have tried to stand with the adivasis  in their fight, exposing this State-Corporate nexus have been equally targeted and threatened. The background to the recent attack on Bela comes from her involvement in exposing state crimes especially incidents of mass sexual assaults in Bastar. Towards the end of February 2016, Bela along with teams of Women against State Violence and Sexual Assault (WSS), Jagdalpur Legal Aid Group (JagLAG) and Activist Soni Sori exposed three incidents of mass sexual violence by police and security forces in the villages of Pedagellur, Belam Nendra and Chinnagelur, Bijapur District of Bastar region, Chhattisgarh. Together with the victims, they managed to file FIRs, one on November 1, 2015, and another on January 21, 2016 against Security forces. These were the first instances of the use of Section 376(2)(c) IPC providing for indictment of state and central security forces for sexual violence. Within eight days of the filing of the FIRs, the revengeful action towards Bela and others started, leading to a rally being organised against her in Bijapur district by the vigilante group Naxal Peedit Sangharsh Samiti. Bela, due to the mounting pressure vacated her house in Jagdalpur and moved to Parpa, a village near Jagdalpur. However, the hounding and harassment has continued, and unfortunately intensified enough to make her vacate her Parpa House as well after she accompanied the team of NHRC along with Soni Sori to Pedagellur to record testimonies of women who have been victims of sexual violence.

The attack on Bela is not the first one. In past year, women advocates of JagLAG have been threatened by an alleged criminal complaint, journalist Malini Subramaniam was hounded out of Bastar, Nandini Sundar and Manju Kawasi have been charged in false murder cases, Laxmi Hidme, mother of encountered Madkam Hidme and  Kawasi Hidme, who after years of torture in prison, now fights alongside Soni Sori, a tribal activist who was attacked with chemicals on her face. By calling the lawyers and activists as ‘Safed posh naxalis’ the state has tried its best to criminalize them and made sure that an obstacle is created in them lending any support to the people.

Appeals of accountability from the police have led to a venomous vitriol being unleashed by Inspector General SRP Kalluri where he has responded by saying most objectionable, vulgar and threatening things to these women along with giving a free hand to officials under him to rape and kill the adivasis. Mission 2016 is conveniently being carried out on the principle of clear-hold-build. IG Kalluri’s role in perpetuating violence against the adivasis with complete impunity and lawlessness has been especially notorious. In a recent NDTV interview, he said, “Activists are enemies because they incite people against democracy, and question the sovereignty and universality of India. We oppose their anti-national brigade.” It is important to especially pay attention to the last statement that he makes, that ‘activists are anti-nationals’. That activists are anti-nationals is the propaganda used by the right-wing BJP government, its student wing ABVP and their media stooges like Zee TV & Times Now. IG Kalluri is the iron heel used by the right wing fascist government in Chhattisgarh and Centre. He has scant regard for constitutional principles or Rule of Law and is the perpetrator of fake encounters, torture, mass sexual assault against adivasis. A number of these incidents have been investigated and documented by  human rights & lawyers groups like PUCL, WSS, JagLAG, as well as by  ST Commission and the Editors’ Guild of India. There has been a sudden spurt in crimes against adivasis of Bastar and activists working in that area ever since Mr. SRP Kalluri took charge as Inspector General (Bastar Range) in 2014. As the incidents of mass sexual assaults were filed in February, recently NHRC testified to the truth of these statements saying that security forces have raped 16 women.

People like Bela are a hindrance to such a war. Bela who is a researcher, activist, ex-alumni and ex-faculty member of TISS, has been working in the area since past two years. As students of TISS, we clearly remember the difference that Bela made to the lives of many students on the campus. She was teaching courses in the Dalit and Tribal Studies Department of Social Work at TISS. She was regularly taking courses in Foundation Courses on Social Movements. She was quite vocal about issues on campus and was always a supportive voice when it came to student’s issues. In the light of the organic relationship that Bela shared with her students and her teaching of the principles of justice and equality, we as TISS students demand an immediate stop to the harassment that she has been subjected to.

We stand by the people of Bastar in this war that the state has waged against them and condemn in strongest terms the erosion of democracy and heinous way in which adivasis are being pushed out of Bastar to dispossess and alienate them from their rights over jal, jangal and jameen.