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मौजूदा किसान आन्दोलन पर वक्तव्य : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

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किसानों के इस आन्दोलन को उसके तात्कालिक उद्देश्यों और सम्भावनाओं मात्र के सन्दर्भ में देखें तो भी यह ऐतिहासिक है. अपनी अंतिम और सम्भावित सफलता से स्वतन्त्र इसकी उपलब्धियाँ अभी ही ऐतिहासिक महत्त्व की साबित हो चुकी हैं. लेकिन इस आन्दोलन के अर्थ और इसकी सम्भावनायें और भी बड़ी हैं. भारत की दुर्दशा के इस घोर अँधेरे में, जहाँ अधिनायकवादी फ़ासिस्ट शक्तियों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की सम्भावनााओं को एक के बाद एक कुचल दिया जाता रहा है, यह आन्दोलन एक मशाल बनकर सामने आया है. किसानों से शुरू होकर यह आन्दोलन सिर्फ़ किसानों का नहीं रह गया  है. पंजाब और हरियाणा के किसानों के द्वारा दिल्ली को घेरने से शुरू हुई यह मुहिम अब दिल्ली की सत्ता को घेरने वाली चौतरफ़ा मुहिम का रूप लेती जा रही है. हम किसानों के इस आन्दोलन को सर्वप्रथम इसलिए समर्थन देते हैं और उसमें इस लिये शामिल हैं कि उनकी माँगें जायज़ हैं और इस सरकार द्वारा ज़बरदस्ती लाये गये तीनों क़ानूनों को लेकर उनकी आशंकायें वास्तविक हैं. और हम इस आन्दोलन को इसलिये सलाम करते हैं और इससे प्रेरणा लेते हैं कि यह अँधेरे में रौशनी की मशाल बनकर सामने आया है.

 अगर हम आंदोलन की तात्कालिक माँगों और उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा यहाँ नहीं करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि इनके जायज़ और ऐतिहासिक महत्त्व के होने में हमें कोई संदेह है. अब यह जगज़ाहिर है कि ये तीनों क़ानून उस शैतानी योजना का हिस्सा हैं जिसके तहत कृषि क्षेत्र को कारपोरेट पूँजी के प्रत्यक्ष आधिपत्य में ले जाने की तैयारी है. यह न केवल किसानों की रही-सही आर्थिक सुरक्षा को समाप्त करेगा, सरकार को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त करेगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा राज्य-संचालित मंडियों की व्यवस्था को तोड़ देगा, बल्कि यह पूरे देश की आम जनता की खाद्य-सुरक्षा – जितनी भी है और जैसी भी है – को ख़तरे में डाल देगा. साथ ही ये क़ानून भारत के संघीय ढाँचे के विरुद्ध भी हैं, और केन्द्र द्वारा राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण हैं. यह सब आप सभी को मालूम है और इन कारणों से ही इस आंदोलन का सूत्रपात हुआ है.

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