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संस्कृति की ज़मीन, बदलाव के बीज : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha
1.
मार्क ट्वेन ने कभी कहा था – धूम्रपान की आदत छोड़ने में मैं ख़ासा माहिर हूँ; यह काम मैंने हज़ारों बार किया है.सन्धान की यह केवल तीसरी शुरुआत है. वह भी काग़ज़ पर छप कर नहीं. अभी केवल वेब-पेज़ के रूप में. अतः यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि हमलोग शुरुआत करने के विशेषज्ञ हो गए. बल्कि ये मनायें कि इस मामले में ट्वेन सरीखी महारत न हासिल हो. इरादा नयी शुरुआत का और हौसले दूर तक चलने के हों तो फिर से शुरू करने में कोई बुराई नहीं है.
हज़ारों साल पहले एक्लेसियास्टीज़ की किताब में कहा गया था – जो हो चुका है, वही फिर होगा. जो किया जा चुका है, वही फिर किया जायेगा. सूरज के तले कुछ भी नया नहीं है. लेकिन दूसरी तरफ़ हेराक्लिटस का कहना था – तुम एक ही नदी में दो बार पाँव नहीं रख सकते. पानी हर पल बदल चुका होता है. अगला पाँव नयी नदी में पड़ेगा.बुद्धिमानी शायद इसमें हो कि एक जेब में एक्लेसियास्टीज़ और दूसरी में हेराक्लिटस को रख कर चला जाय. एक कुछ बिल्कुल नया कर गुज़रने के घमण्ड को क़ाबू में रक्खेगा तो दूसरा नये का सामना करने की हिम्मत देगा. जो हो चुका है वही फिर होगा तो भी कुछ नया होगा. और, उम्मीद है, जो कहा जा चुका है वही फिर से कहा जाय तो भी कुछ नया कहा जायेगा और अर्थ कुछ नये निकलेंगें. समय की उसी नदी में आप दो बार पाँव नहीं रख सकते.
और, इस नदी में त्वरण है. समय के बदलने की रफ़्तार बदल चुकी है. पिछली एक सदी में जितना कुछ हुआ है, उतना पहले के हज़ार सालों में नहीं हुआ था. इन्सानी इतिहास का प्रवाह समय के उबड़-खाबड़ भूगोल से गुज़रा है. थोड़ी देर का समतल थके विजेताओं को उस असीम-अनन्त चरागाह की तरह दिखने लगता है जिसकी खोज में वे पाँच सौ या पाँच हज़ार साल पहले निकले थे. इतिहास के अन्त की घोषणाएँ होती हैं. लेकिन घोषणाओं की समाप्ति के पहले ही समय का समतल समाप्त होने लगता है. आगे कुछ के लिये ख़तरनाक ढलान है तो दूसरों के लिये कठिन चढ़ाई है.

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