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अरुंधति का निर्वासन: वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

अरुंधति राय के खिलाफ अपशब्दों की, गाली-गलौच की, आरोपों की हिंसा ने हमें एक बार फिर यह प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया है – क्या हमने सचमुच अपने देश में सभ्यता व सहिष्णुता के महान मूल्यों की रक्षा करने के दायित्व से छुटकारा पा लिया है? कहीं हम पूरे राष्ट्र को ‘डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसआर्डर’ (खंडित व्यक्तित्व मनोरोग) का शिकार बनते तो नहीं देख रहे हैं जिसमें किसी व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के चरित्र में परस्पर विरोधी मूल्य इस प्रकार विषैले कांटों की तरह उग आते हैं कि राष्ट्र का पूरा व्यक्तित्व चरमराने या दिग्भ्रमित होने लगता है! एक सभ्य-लोकतांत्रिक देश के रूप में आत्मछवि और हिंसक बाहरी आचरण में जितना गहरा भेद पैदा हो जाता है, वह राष्ट्र की आत्मा मार देता है। जिसने भी स्वयं में अनूठी लेखिका को जीप के बोनट से बांधने की कल्पना की, उसे संभवतः अंदाजा भी नहीं था कि वह केवल एक वक्तव्य नहीं दे रहा है, बल्कि मनुष्यता के सभी संभव परिकल्पनाओं के विरुद्ध अपराध कर रहा है। ऐसी कल्पना में बीमार विचारशून्यता ही नहीं बल्कि भयानक सड़ांध, विकृति और मनोरोग की झलक मिलती है। परेश रावल के अरुंधति के विरोध में लिखे ट्वीट से उल्लसित सोशल मीडिया के एक समूह ने तो अरुंधति राय की सामूहिक ढंग से हत्या कर उनके शव को पाकिस्तान में दफनाने की वकालत भी कर डाली।

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अता मोहम्मद खान के लिए दो मिनट का मौन

एक ‘कब्र खोदनेवाले’ के जनाज़े में इतने लोग शायद पहले कभी नहीं जुटे हों। अलबत्ता पिछले दिनों जब 75 साल की उम्र में अटटा मोहम्मद खान का इन्तक़ाल हुआ, तब यही नज़ारा दिख रहा था।
उत्तरी कश्मीर के सीमावर्ती शहर उरी के चहाल बिम्बयार गांव के निवासी रहे अटटा मोहम्मद खान ने अपने घर में ही अंतिम सांस ली थी। लम्बे समय से वह अस्थमा से पीड़ित थे। सोचने की बात थी कि ऐसे शख्स के लिए इतने सारे लोग क्यों मातम में थे ?
असल बात यह है कि वह कोई मामूली ‘कब्र खोदनेवाले’ नहीं थे। वह कश्मीर के रक्तरंजित इतिहास के एक ऐसे साक्षी थे, जिन्होंने अपनी रेगिस्तानी आंखों में बहुत कुछ समेट कर रखा था। वह कश्मीर की सिविल सोसायटी में चर्चित चेहरा थे, जबसे उन्होंने सूबे में फैली अचिन्हित कब्रों (unmarked graves) को ढंूढने में इन संस्थाओं की सहायता की थी। और जब हुक्मरानों की तरफ से बुलावा आया तो किसी से बिना डरे खुल कर वह सबकुछ बयां किया था। कुछ साल पहले राजधानी से निकलने वाले एक अंग्रेजी अख़बार /’Tragedies buried in Kashmir’  , मेल टुडे ने 28 मार्च, 2008/ ने जब कश्मीर में दफनायी गयी इन तमाम त्रासदियांे को उकेरना चाहा, तो अनाम, अचिन्हित कब्रों की अपनी रिपोर्ट में अट्टा मोहम्मद खान से भी की गुफतगू शामिल थी। वर्ष 2013 में उन्होंने अपना बयान निबंधों की एक किताब में दर्ज किया था, जिसका संकलन स्थानीय पत्रकार फहद शाह ने किया था।

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