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आज़ाद जनतंत्र में सत्तर साल बाद भी वेल्लोर से विरमगाम तक श्मशान भूमि से वंचित हैं दलित

क्या कोई जानता है 21वीं सदी की शुरुआत में चकवारा के दलितों के एक अहम संघर्ष को? जयपुर से बमुश्किल पचास किलोमीटर दूर चकवारा के दलितों ने गांव के सार्वजनिक तालाब पर समान हक पाने के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाया था। अठारह साल का वक्फा गुजर गया जब दलितों ने इस संघर्ष में जीत हासिल की थी, जिसमें तमाम मानवाधिकार संगठनों एवं प्रगतिशील लोगों ने भी उनका साथ दिया था। (सितम्बर 2002)

विश्लेषकों को याद होगा कि इस संघर्ष में तमाम लोगों को डॉ. अम्बेडकर द्वारा शुरू किए गए ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह की झलक दिखायी दी थी जब मार्च 1927 में हजारों दलित एवं अन्य मानवाधिकारप्रेमी महाड़ के चवदार तालाब पर जुलूस की शक्ल में गए थे और वहां उन्होंने पानी पीया था। जानवरों को वहां पानी पीने से कोई मना नहीं करता था, मगर दलितों को रोका जाता था। (ज्‍यादा जानकारी के लिए देखें: Mahad – The Making of the First Dalit Revolt – Dr Anand Teltumbde, Navayana)

चकवारा में बाद में क्या हुआ इसके बारे में तो अधिकतर लोग नहीं जानते होंगे।

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बरवक्त यहां ‘गाय’ कानून तोड़ने का सुरक्षित तरीका

cow politics

..उना, गुजरात की इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है. पिछले दिनों इस मसले पर बात करते हुए गुजरात सरकार के चीफ सेक्रेटरी जीआर ग्लोरिया ने गोरक्षा के नाम पर चल रही गुंडागर्दी को रेखांकित किया. उन्होंने बताया कि समूचे गुजरात में दो सौ से ज्यादा ऐसे गोरक्षा समूह उभरे हैं जो ‘अपने हिंसक व्यवहार के चलते और जिस तरह वो कानून को अपने हाथ में लेते हैं, उसके चलते कानून और व्यवस्था का मसला बन गए हैं.’

ग्लोरिया ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि ऐसे समूहों के खिलाफ हम सख्त कार्रवाई करनेवाले हैं क्योंकि भले ही यह ‘स्वयंभू गोभक्त हों मगर वास्तव में गुंडे हैं.’ शहर से गांव तक फैले उनके नेटवर्क तथा स्थानीय पुलिस के साथ उनकी संलिप्तता आदि बातों को भी उन्होंने रेखांकित किया.

ध्यान रहे कि यह पहली दफा नहीं है जब गोरक्षा के नाम पर बढ़ रही असामाजिक गतिविधियों की तरफ संवैधानिक संस्थाओं या उनके प्रतिनिधियों की तरफ से ध्यान खींचा गया हो. अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इसी बात को रेखांकित किया था.

अदालत का कहना था कि ‘‘गोरक्षा की दुहाई देकर बने कथित प्रहरी समूह जिनका गठन राजनीतिक आंकाओं एवं राज्य के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की शह पर हो रहा है, जिनमें पुलिस भी शामिल है, वह कानून को अपने हाथ में लेते दिख रहे हैं.’..

( Click here for complete article : http://hindi.catchnews.com/india/protection-of-cow-violation-of-law-1469285844.html/fullview)

अल्पसंख्यक अधिकार और राज्य हिंसा

 अगर मैं नहीं जलता

अगर आप नहीं जलते 

हम लोग नहीं जलते

फिर अंधेरे में उजास कौन करेगा
– नाजिम हिकमत

1.
कुछ समय पहले एक अलग ढंग की किताब से मेरा साबिका पड़ा जिसका शीर्षक था ‘रायटर्स पुलिस’ जिसे ब्रुनो फुल्गिनी ने लिखा था। जनाब बुल्गिनी जिन्हें फ्रांसिसी संसद ने पुराने रेकार्ड की निगरानी के लिए रखा था, उसे अपने बोरियत भरे काम में अचानक किसी दिन खजाना हाथ लग गया जब दो सौ साल पुरानी पैरिस पुलिस की फाइलें वह खंगालने लगे। इन फाइलों में अपराधियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा लेखकों एवं कलाकारों की दैनंदिन गतिविधियों का बारीकी से विवरण दिया गया था। जाहिर था कि 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में महान लेखकों पर राजा की बारीकी निगरानी थी।

जाहिर है कि अन्दर से चरमरा रही हुकूमत की आन्तरिक सुरक्षा की हिफाजत में लगे लोगों को यह साफ पता था कि ये सभी अग्रणी कलमकार भले ही कहानियां लिख रहे हों, मगर कुलीनों एवं अभिजातों के जीवन के पाखण्ड पर उनका फोकस और आम लोगों के जीवनयापन के मसलों को लेकर उनके सरोकार मुल्क के अन्दर जारी उथलपुथल को तेज कर रहे हैं। उन्हें पता था कि उनकी यह रचनाएं एक तरह से बदलाव के लिए उत्प्रेरक का काम कर रही हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि कानून एवं सुरक्षा के रखवालों द्वारा विचारों के मुक्त प्रवाह पर बन्दिशें लगाने के लिए की जा रही वे तमाम कोशिशें बेकार साबित हुई और किस तरह सामने आयी फ्रांसिसी क्रान्ति दुनिया के विचारशील, इन्साफपसन्द लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन कर सामने आयी।

या आप ‘अंकल टॉम्स केबिन’ या ‘लाईफ अमंग द लोली’ नामक गुलामी की प्रथा के खिलाफ अमेरिकी लेखिका हैरिएट बीचर स्टोव द्वारा लिखे गए उपन्यास को देखें। इसवी 1852 में प्रकाशित इस उपन्यास के बारे में कहा जाता है कि उसने अमेरिका के ‘‘गृहयुद्ध की जमीन तैयार की’। इस किताब की लोकप्रियता का अन्दाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 19 वीं सदी का वह सबसे अधिक बिकनेवाला उपन्यास था। कहा जाता है कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, जिन्होंने गुलामी की प्रथा की समाप्ति के लिए चले गृहयुद्ध की अगुआई की, जब 1862 में पहली दफा हैरिएट बीचर स्टोव से मिले तो उन्होंने चकित होकर पूछा ‘‘ तो आप ही वह महिला जिन्होंने लिखे किताब ने इस महान युद्ध की नींव रखी।’ Continue reading अल्पसंख्यक अधिकार और राज्य हिंसा

Appeal to all Voters to Protect Democracy – People’s Alliance for Democracy and Secularism

Dear fellow citizens

Sixty seven years ago, independent India adopted a democratic constitution that created a platform for equality and justice by ensuring the participation of all. Our constitution-makers were concerned to maintain a secular society free from any divisions of caste, sect and religion. 

What has become of that vision? A large part of the population lives in extreme poverty. Millions of Indians are denied their fundamental rights. There are strong linkages amongst powerful capitalists, biased officials and unscrupulous political representatives. The political system is in danger of being taken over and run for the benefit of the rich, rather than for the vast bulk of the Indian people. Communal forces of all colours thrive in our society. Their growth has been evident since the Delhi carnage of 1984. Biased behavior has appeared in the media, police, bureaucracy and executive. We are witnessing the criminalisation of the state. One example of this is the operation of private armies all over the country.

The Sixteenth Lok Sabha elections are an opportunity for us to preserve democracy. The RSS has emerged as a direct participant, discarding its ‘cultural’ mask. Continue reading Appeal to all Voters to Protect Democracy – People’s Alliance for Democracy and Secularism