Tag Archives: गोलवलकर

एक  नायक की तलाश में भाजपा 

दीनदयाल उपाध्याय: भाजपा के ‘गांधी’

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( Photo Courtesy : thewire.in)

एक पेड़विहीन देश में एक एरंड भी बड़ा पेड़ कहलाता है – एक  संस्कृत सुभाषित का रूपांतरण

/In a treeless country even castor counts for a big tree/

/संदर्भ: http://www.epw.in/journal/2006/12/

 

राष्ट्रपति कोविन्द ने इस बात को स्वीकारा कि ‘‘भारत की कामयाबी की कंुजी उसकी विविधता में है’’ और ‘‘हमारी विविधता ही वह केन्द्र है जो हमें इतना अनोखा बनाती है’’। अपने भाषण का अन्त उन्होंने समतामूलक समाज बनाने के आवाहन के साथ किया जैसी ‘‘कल्पना महात्मा गांधी और दीनदयाल उपाध्यायजी’’ ने की थी।… महात्मा गांधी के साथ दीनदयाल उपाध्याय का नाम लेने पर कांग्रेस ने एतराज जाहिर किया। कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि ‘‘राष्टपति को यह याद रखना चाहिए कि वह अब भाजपा के प्रत्याशी नहीं हैं। वह भारत के राष्ट्रपति हैं। उन्होंने दलीय राजनीति से ऊपर  उठना चाहिए।’’

(https://www.telegraphindia.com/1170726/jsp/frontpage/story_163934.jsp मूल अंग्रेजी से अनूदित )

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एक प्रतीक की खोज़

हिन्दु राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रयासरत जमातें – जो फिलवक्त़ दक्षिण एशिया के इस हिस्से में हुकूमत के सबसे उंचे मुक़ाम पर पहुंची है – वह अपने आप को एक विचित्र दुविधा में फंसी पाती है। Continue reading एक  नायक की तलाश में भाजपा 

‘नफरत के गुरूजी’

गोलवलकर के महिमामंडन से उठते प्रश्न

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संघ के सुप्रीमो जनाब मोहन भागवत की सूबा मध्य प्रदेश की बैतुल की यात्रा पिछले दिनों सूर्खियों में रही, जहां वह हिन्दू सम्मेलन को संबोधित करने पहुंचे थे। सूर्खियों की असली वजह रही बैतुल जेल की उनकी भेंट जहां वह उस बैरक में विशेष तौर पर गए, जहां संघ के सुप्रीमो गोलवलकर कुछ माह तक बन्द रहे।  इस यात्रा की चन्द तस्वीरें भी शाया हुई हैं। इसमें वह दीवार पर टंगी गोलवलकर की तस्वीर का अभिवादन करते दिखे हैं। फोटो यह भी उजागर करता है कि भागवत के अगल बगल जेल के अधिकारी बैठै हैं।

विपक्षी पार्टियों ने – खासकर कांग्रेस ने – इस बात पर भी सवाल उठाया था कि आखिर किस हैसियत से उन्हें जेल के अन्दर जाने दिया गया। उनके मुताबिक यह उस गोलवलकर को महिमामंडित करने का प्रयास  है, जिसे ‘एक प्रतिबंधित संगठन के सदस्य होने के नाते गिरफ्तार किया गया था। यह जेल मैनुअल का उल्लंघन भी है। केवल कैदी के ही परिजन एवं दोस्त ही जेल परिसर में जा सकते हैं और वह भी वहां जाने से पहले जेल प्रबंधन की अनुमति लेने जरूरी है।’

गौरतलब है कि संघ के तत्कालीन सुप्रीमो गोलवलकर की यह पहली तथा अंतिम गिरफतारी आज़ाद हिन्दोस्तां में गांधी हत्या के बाद हुई थी, जब संघ पर पाबन्दी लगायी गयी थी। प्रश्न उठता है कि आखिर गोलवलकर के इस कारावास प्रवास को महिमामंडित करके जनाब भागवत ने क्या संदेश देना चाहा।

( For full text of the article click here :https://hindi.sabrangindia.in/article/nafrat-ke-guruji-subhash-gathade

पहले वे यहुदियों के लिए आये ..

पेड़ खामोश होना चाहते हैं
मगर हवाएं हैं कि रूकती नहीं हैं
-जोस मारिया सिसोन
(फिलीपिनो इन्कलाबी एवं कवि)
क्या हमारे वक्त़ के तमाम अग्रणी बुद्धिजीवी, जो असहमति के आवाज़ों के पक्षधर रहते आए हैं, बरबस अवकाश पर चले गए हैं – अब जबकि कन्हैया कुमार जेल से बाहर निकल कर आया है ? या वह सोच रहे हैं कि जो तूफां उठा है वह अपने आप थम जाएगा।
दरअसल जिस किसी ने हमारे समय की दो बेहद उम्दा शख्सियतों – प्रोफेसर निवेदिता मेनन और गौहर रज़ा – के खिलाफ चल रही सार्वजनिक कुत्साप्रचार एवं धमकियों की मुहिम को नज़दीकी से देखा है, और उसके बाद भी जिस तरह की चुप्पी सामने आ रही है (भले ही एकाध-दो बयान जारी हुए हों या कुछ प्रतिबद्ध लेखको के लेख इधर उधर कहीं वेबपत्रिकाओं में नज़र आए हों ) उसे देखते हुए यही बात कही जा सकती है। प्रोफेसर निवेदिता मेनन को इस तरह निशाना बनाया गया है कि सन्दर्भ से काट कर उनके व्याख्यानों के चुनिन्दा उद्धरणों को सोशल मीडिया पर प्रसारित करके उन्हें ‘एण्टी नेशनल’ अर्थात राष्ट्रद्रोही साबित किया जा सके जबकि गौहर रज़ा पर गाज़ इसलिए गिरी है कि उन्होंने दिल्ली में आयोजित भारत-पाक मुशायरे में – जिसे शंकर शाद मुशायरा के तौर पर जाना जाता है –  न केवल शिरकत की बल्कि वहां धर्म और राजनीति के खतरनाक संश्रय पर  जो कविता पढ़ी, वह शायद ‘भक्तों’ को नागवार गुजरी है।

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हममें से देशद्रोही कौन नहीं है?

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राष्ट्रवाद या यूं कहें कि ऑफिशियल राष्ट्रवाद इन दिनों सुर्खियों में है. एक तरफ ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हुए और दूसरे ही सुर में मां-बहनों के नाम अपशब्दों की बौछार करते हुए लंपटों के गिरोह हर स्वतंत्रमना व्यक्ति को लातों-मुक्कों से, या जैसा कि बीते दिनों इलाहाबाद की कचहरी में देखने को मिला, लोग लाठियों की मार से राष्ट्रवाद का असली मतलब समझा रहे हैं. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ते दिख रहे इन निक्करधारी गिरोहों के साथ जगह-जगह खाकी वर्दीधारियों की भी मौन सहमति नजर आ रही है. और दिख रहा है कि आप अगर किसी को मार भी डालें और सफाई में यह कह दें कि वह पाकिस्तान जिंदाबाद कह रहा था तो उसे माफ कर दिया जाएगा.

विडंबना ही है कि इन दिनों देश की किस्मत के आका कहे जाने वाले लोग नकली ट्वीट की बैसाखी के सहारे ऐसे तमाम उत्पातों, उपद्रवों और उद्दंडता को वैधता का जामा पहनाते नजर आ रहे हैं. आए दिन हो रही संविधान की इस खुल्लमखुल्ला अनदेखी को लेकर संविधान को सबसे पवित्र किताब का दर्जा देने वाले वजीर-ए-आजम मोदी भी अपना मौन बनाए हुए हैं. अंधराष्ट्रवाद की आंधी चलाने की तेज होती कोशिशों को देखते हुए बरबस राजेश जोशी की बहुचर्चित कविता की पंक्तियां साकार होती दिख रही हैं कि ‘जो इस कोलाहल में शामिल नहीं होंगे मारे जाएंगे.’

(Read the rest of the article here : http://tehelkahindi.com/who-is-not-anti-national-among-us-opinion-by-social-scientist-subhash-gatade/?singlepage=1)

डा अम्बेडकर के नये मुरीद

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(Image : Courtesy – http://www.tehelka.com)

शोषित-उत्पीड़ित अवाम के महान सपूत बाबासाहब डा भीमराव अम्बेडकर की 125 जयन्ति के बहाने देश के पैमाने पर जगह जगह आयोजन चल रहे हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि वक्त़ बीतने के साथ उनका नाम और शोहरत बढ़ती जा रही है और ऐसे तमाम लोग एवं संगठन भी जिन्होंने उनके जीते जी उनके कामों का माखौल उड़ाया, उनसे दूरी बनाए रखी और उनके गुजरने के बाद भी उनके विचारों के प्रतिकूल काम करते रहे, अब उनकी बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने के लिए तथा दलित-शोषित अवाम के बीच नयी पैठ जमाने के लिए उनके मुरीद बनते दिख रहे हैं।

ऐसी ताकतों में सबसे आगे है हिन्दुत्व ब्रिगेड के संगठन, जो पूरी योजना के साथ अपने अनुशासित कहे जानेवाली कार्यकर्ताओं की टीम के साथ उतरे हैं और डा अम्बेडकर – जिन्होंने हिन्दु धर्म की आन्तरिक बर्बरताओं के खिलाफ वैचारिक संघर्ष एवं व्यापक जनान्दोलनों में पहल ली, जिन्होंने 1935 में येवला के सम्मेलन में ऐलान किया कि मैं भले ही हिन्दु पैदा हुआ, मगर हिन्दू के तौर पर मरूंगा नहीं और अपनी मौत के कुछ समय पहले बौद्ध धर्म का स्वीकार किया /1956/ और जो ‘हिन्दु राज’ के खतरे के प्रति अपने अनुयायियों को एवं अन्य जनता को बार बार आगाह करते रहे, उन्हें हिन्दू समाज सुधारक के रूप में गढ़ने में लगे हैं। राष्टीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुखिया जनाब मोहन भागवत ने कानपुर की एक सभा में यहां तक दावा किया कि वह ‘संघ की विचारधारा में यकीन रखते थे’ और हिन्दु धर्म को चाहते थे।

इन संगठनों की कोशिश यह भी है कि तमाम दलित जातियां – जिन्हें मनुवाद की व्यवस्था में तमाम मानवीय हकों से भी वंचित रखा गया – उन्हें यह कह कर अपने में मिला लिया जाए कि उनकी मौजूदा स्थितियों के लिए ‘बाहरी आक्रमण’ अर्थात इस्लाम जिम्मेदार है। गौरतलब है कि मई 2014 के चुनावों में भाजपा को मिली ‘ऐतिहासिक जीत’ के बाद जितनी तेजी के साथ इस मोर्चे पर काम चल रहा है, उसे समझने की जरूरत है।

प्रस्तुत है दो पुस्तिकाओं का एक सेट: पहली पुस्तिका का शीर्षक है ‘ंहेडगेवार-गोलवलकर बनाम अम्बेडकर’ ( http://www.isd.net.in/Publication/Booklet/2015/Booklet-66.pdf) और दूसरी पुस्तिका का शीर्षक है ‘ हमारे लिए अम्बेडकर’। (http://www.isd.net.in/Publication/Booklet/2015/Booklet-67.pdf)

पहली पुस्तिका में जहां संघ परिवार तथा अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा डा अम्बेडकर को समाहित करने, दलित जातियों को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने, भक्ति आन्दोलन के महान संत रविदास के हिन्दूकरण तथा छुआछूत की जड़े आदि मसलों पर चर्चा की गयी है। वहीं दूसरी पुस्तिका में दलित आन्दोलन के अवसरवाद, साम्प्रदायिकता की समस्या की भौतिक जड़ें आदि मसलों पर बात की गयी है। इस पुस्तिका के अन्तिम अध्याय ‘डा अम्बेडकर से नयी मुलाक़ात का वक्त़’ में परिवर्तनकामी ताकतों के लिए डा अम्बेडकर की विरासत के मायनों पर चर्चा की गयी है।

गांधी से नफरत, गोडसे से प्यार

 देश विभाजन के काफी पहले ही गांधीजी को मारने की साजिश रची गई थी।

( Photo by Mondadori Portfolio via Getty Images,  Courtesy – blogs.timesofindia.indiatimes.com

हिन्दू महासभा ने 15 नवंबर को बलिदान दिवस मनाने का फैसला किया है। इस दिन महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को फांसी हुई थी। पिछले साल हिन्दू महासभा ने देश भर में नाथूराम गोडसे के मंदिरों का निर्माण करने का ऐलान किया था। काफी हो-हल्ला मचने के बाद यह अभियान रुक गया। इस बार केंद्र सरकार हिन्दू महासभा के प्रति क्या रुख अख्तियार करती है, यह देखना दिलचस्प रहेगा। महात्मा गांधी की हत्या को लेकर एक बात अक्सर कही जाती है कि नाथूराम गोडसे गांधीजी से नाराज था, क्योंकि गांधीजी ने देश का बंटवारा होने दिया और वह पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने की बात किया करते थे।                                                                                                                                              

दरअसल इन दो तथ्यों की आड़ में उस लंबी साजिश पर पर्दा डाला जाता है जो हिन्दूवादी संगठनों ने रची थी। सचाई यह है कि गांधीजी को मारने की कोशिशें विभाजन के काफी पहले से शुरू हो गई थीं। आखिरी ‘सफल’ कोशिश के पहले उन पर चार बार हमले के प्रयास किए गए। चुन्नी भाई वैद्य जैसे सर्वोदयी के मुताबिक हिन्दूवादी संगठनों ने कुल छह बार उन्हें मारने की कोशिश की, जब न पाकिस्तान अस्तित्व में था और न ही पचपन करोड़ का मसला आया था। पिछले दिनों गांधीजी की हत्या पर ‘बियॉन्ड डाउट: ए डॉशियर ऑन गांधीज असेसिनेशन’ नाम से लेखों का संकलन (संपादन: तीस्ता सीतलवाड) प्रकाशित हुआ है, जो इस मामले की कई पर्ते खोलता है। Continue reading गांधी से नफरत, गोडसे से प्यार