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हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

( अकार, 51 – हिंदी समाज पर केंद्रित अंक में जल्द ही प्रकाशित)

‘देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश ! इसलिए क्या यहां सबकुछ अमर है ? वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर ! ..युग के बाद युग आए ! बड़े बड़े चक्रवर्ती आये ! ..दार्शनिक आए ! फिर भी   अस्पृश्यता  , विषमता अमर है ! ..यह सब कैसे हो गया ? किसी भी महाकवि, पंडित, दार्शनिक, सत्ताधारी सन्त की आंखों में यह अमानुषिक व्यवस्था चुभी क्यों नहीं ? ..बुद्धिजीवियों, संतों और सामर्थ्यवानों का यह अंधापन, यह संवेदनशून्यता दुनिया भर में खोजने पर भी नहीं मिलेगी ! इससे एक ही अर्थ निकलता है कि यह व्यवस्था बुद्धिजीवियों, सन्तों और राज करनेवालों को मंजूर थी ! यानी इस व्यवस्था को बनाने और उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों और शासकों का हाथ है।

– बाबुराव बागुल /17 जनवरी 1930 –  26 मार्च 2008/

जानेमाने मराठी लेखक

1.

वर्ष 2014 में हिन्दी की प्रथम दलित कविता कही जानेवालीे एक कविता ‘अछूत की शिकायत’ 1 के सौ साल पूरे हुए। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ पत्रिका के सितम्बर माह में प्रकाशित अंक में यह कविता छपी थी।

हीरा डोम द्वारा रचित इस कविता पर बहुत कुछ लिखा गया है, किस तरह यह कविता साहित्य में नयी जमीन तोड़ती है, धर्म, पूंजीवाद, सामाजिक गैरबराबरियों को वैधता प्रदान करती मौजूदा व्यवस्था को प्रश्नांकित करती है, ढेर सारी बातें लिखी गयी हैं। फिलवक्त़ न मैं इसकी तरफ आप का ध्यान दिलाना चाहता हूं, न इस बहस की तरफ कि क्या उसे प्रथम दलित कविता कहा जा सकता है या नहीं ! साहित्य के सुधी पाठक एवं प्रबुद्ध आलोचक इसके बारे में मुकम्मल राय दे सकते हैं। /इतनाही याद रखना जरूरी है कि पत्रिका में छपनेवाली रचनाओं के बारे में संपादक के तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी काफी सख्त माने जाते थे। उनकी इस सख्ती का अन्दाज़ा इस बात से लगता है कि निराला – जो बाद में महाकवि के तौर पर सम्बोधित किए गए – उनकी चन्द कविताएं भी शुरूआत में उन्होंने लौटा दी थीं। लाजिम है कि हीरा डोम की इस कविता को प्रकाशित करने में भी उन्होंने अपने पैमानों को निश्चित ही ढीला नहीं किया होगा।/

कल्पना की जाए कि सरस्वती के अंक में अगर उपरोक्त कविता छपी नहीं होती तो हीरा डोम नामक वह शख्स ताउम्र लगभग गुमनामी में ही रहते। कोई नहीं जान पाता कि उत्पीड़ित समुदाय में एक ऐसे कवि ने जन्म लिया है, जिसकी रचनाओं में जमाने का दर्द टपकता है। Continue reading हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

पवित्र किताब की छाया में आकार लेता जनतंत्र

भारतीय लोकतंत्र: दशा और दिशा को लेकर चन्द बातें

Never Be Deceived That the Rich Will Permit You To Vote Away Their Wealth
– Lucy Parsons

 

..लोग सोच रहे हैं कि आखिर जनतंत्र हर ओर दक्षिणपंथी हवाओें के लिए रास्ता सुगम कैसे कर रहा है, अगर वह ‘युनाईटेड किंगडम इंडिपेण्डस पार्टी’ के नाम से ब्रिटन में मौजूद है तो मरीन ला पेन के तौर पर फ्रांस में अस्तित्व में है तो नोर्बर्ट होफेर और फ्रीडम पार्टी के नाम से आस्टिया में सक्रिय है तो अमेरिका में उसे डोनाल्ड ट्रम्प के नाम से पहचाना जा रहा है। वैसे इन दिनों सबसे अधिक सूर्खियों में ब्रिटेन है, जिसने पश्चिमी जनतंत्र के संकट को उजागर किया है।

ब्रिटेन को यूरोपीयन यूनियन का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं इसे लेकर जो जनमतसंग्रह हुआ, जिसमें सभी यही कयास लगा रहे थे कि ब्रिटेन को ‘अलग हो जाना चाहिए’ ऐसा माननेवालों को शिकस्त मिलेगी, मगर उसमें उलटफेर दिखाई दिया है; वही लोग जीत गए हैं। और इस बात को नहीं भुला जा सकता कि जो कुछ हो हुआ है उसमें प्रक्रिया के तौर पर गैरजनतांत्रिक कुछ भी नहीं है। दक्षिणपंथ के झण्डाबरदारों ने ऐसे चुनावों में लोगों को अपने पक्ष में वोट डालने के लिए प्रेरित किया है, जो पारदर्शी थे, जिनके संचालन पर कोई सवाल नहीं उठे हैं।

( For full text of the article click here : https://sabrangindia.in/article/pvitra-kitab-ki-chaaya-mein-aakar-leta-hai-jantanta)

 

डा अम्बेडकर के नये मुरीद

selfie with ambedkar

(Image : Courtesy – http://www.tehelka.com)

शोषित-उत्पीड़ित अवाम के महान सपूत बाबासाहब डा भीमराव अम्बेडकर की 125 जयन्ति के बहाने देश के पैमाने पर जगह जगह आयोजन चल रहे हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि वक्त़ बीतने के साथ उनका नाम और शोहरत बढ़ती जा रही है और ऐसे तमाम लोग एवं संगठन भी जिन्होंने उनके जीते जी उनके कामों का माखौल उड़ाया, उनसे दूरी बनाए रखी और उनके गुजरने के बाद भी उनके विचारों के प्रतिकूल काम करते रहे, अब उनकी बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने के लिए तथा दलित-शोषित अवाम के बीच नयी पैठ जमाने के लिए उनके मुरीद बनते दिख रहे हैं।

ऐसी ताकतों में सबसे आगे है हिन्दुत्व ब्रिगेड के संगठन, जो पूरी योजना के साथ अपने अनुशासित कहे जानेवाली कार्यकर्ताओं की टीम के साथ उतरे हैं और डा अम्बेडकर – जिन्होंने हिन्दु धर्म की आन्तरिक बर्बरताओं के खिलाफ वैचारिक संघर्ष एवं व्यापक जनान्दोलनों में पहल ली, जिन्होंने 1935 में येवला के सम्मेलन में ऐलान किया कि मैं भले ही हिन्दु पैदा हुआ, मगर हिन्दू के तौर पर मरूंगा नहीं और अपनी मौत के कुछ समय पहले बौद्ध धर्म का स्वीकार किया /1956/ और जो ‘हिन्दु राज’ के खतरे के प्रति अपने अनुयायियों को एवं अन्य जनता को बार बार आगाह करते रहे, उन्हें हिन्दू समाज सुधारक के रूप में गढ़ने में लगे हैं। राष्टीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुखिया जनाब मोहन भागवत ने कानपुर की एक सभा में यहां तक दावा किया कि वह ‘संघ की विचारधारा में यकीन रखते थे’ और हिन्दु धर्म को चाहते थे।

इन संगठनों की कोशिश यह भी है कि तमाम दलित जातियां – जिन्हें मनुवाद की व्यवस्था में तमाम मानवीय हकों से भी वंचित रखा गया – उन्हें यह कह कर अपने में मिला लिया जाए कि उनकी मौजूदा स्थितियों के लिए ‘बाहरी आक्रमण’ अर्थात इस्लाम जिम्मेदार है। गौरतलब है कि मई 2014 के चुनावों में भाजपा को मिली ‘ऐतिहासिक जीत’ के बाद जितनी तेजी के साथ इस मोर्चे पर काम चल रहा है, उसे समझने की जरूरत है।

प्रस्तुत है दो पुस्तिकाओं का एक सेट: पहली पुस्तिका का शीर्षक है ‘ंहेडगेवार-गोलवलकर बनाम अम्बेडकर’ ( http://www.isd.net.in/Publication/Booklet/2015/Booklet-66.pdf) और दूसरी पुस्तिका का शीर्षक है ‘ हमारे लिए अम्बेडकर’। (http://www.isd.net.in/Publication/Booklet/2015/Booklet-67.pdf)

पहली पुस्तिका में जहां संघ परिवार तथा अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा डा अम्बेडकर को समाहित करने, दलित जातियों को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने, भक्ति आन्दोलन के महान संत रविदास के हिन्दूकरण तथा छुआछूत की जड़े आदि मसलों पर चर्चा की गयी है। वहीं दूसरी पुस्तिका में दलित आन्दोलन के अवसरवाद, साम्प्रदायिकता की समस्या की भौतिक जड़ें आदि मसलों पर बात की गयी है। इस पुस्तिका के अन्तिम अध्याय ‘डा अम्बेडकर से नयी मुलाक़ात का वक्त़’ में परिवर्तनकामी ताकतों के लिए डा अम्बेडकर की विरासत के मायनों पर चर्चा की गयी है।

सामाजिक मुक्ति की ज्ञानमीमांसा : स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द एवं महात्मा ज्योतिबा फुले के बहाने चन्द बातें

कल्पना की उड़ान भरना हर व्यक्ति को अच्छा लगता है।

कभी कभी मैं सोचता हूं कि आज से 100 साल बाद जबकि हम सभी – यहां तक कि इस सभागार में मौजूद अधिकतर लोग – बिदा हो चुके होंगे तो आने वाले समय के इतिहासलेखक हमारे इस कालखण्ड के बारेमें, जिससे हम गुजर रहे हैं, जिसकी एक एक घटना-परिघटना को लेकर बेहद उद्वेलित दिखते हैं, ‘हम’ और ‘वे’ की बेहद संकीर्ण परिभाषा को लेकर अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक फैसले लेते हैं, क्या कहेंगे ? आज हमारे लिए जो जीवन मरण के मसले बने हैं और जिनकी पूर्ति के नाम पर हम किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, उनके बारे में उनकी क्या राय होगी ? क्या वे इस सदी में सामने आए जनसंहारों के अंजामकर्ताओं को लेकर उतनीही अस्पष्टता रखेंगे और कहेंगे कि मारे गए लोग दरअसल खुद ही अपनी मौत के जिम्मेदार थे, जिन्होंने खुद मृत्यु को न्यौता दिया था ? क्या वह किसी वैश्विक मानवता के तब लगभग सर्वस्वीकृत फलसफे के तहत इस दौर की घटनाओं को देखेंगे और अपने अपने ‘चिरवैरियों’ के साथ हमारे रक्तरंजित संग्रामों पर एक अफसोस भरी हंसी हंस देंगे ?

स्पष्ट है कि स्थान एवं समय की दूरियां किसी विशाल कालखण्ड की वस्तुनिष्ठ आलोचना करने का मौका प्रदान करती हैं। दरअसल जब हम खुद किसी प्रवाह/धारा का हिस्सा होते हैं तब चाह कर भी बहुत वस्तुनिष्ठ नहीं हो पाते हैं, समुद्र की खतरनाक लगनेवाली लहरों पर सवार तैराक की तुलना में किनारे पर बैठा वह शख्स कई बार अधिक समझदार दिख सकता है, जिसे भले तैरना न आता हों, मगर जिसके पास लहरों का लम्बा अध्ययन हो।

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नाथद्वारा से मार्कण्डेय तक : भेदभाव के प्रार्थनास्थल

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(image courtesy : jaibheem.net)

21 वीं सदी की दूसरी दहाई में जबकि संविधान लागू हुए साठ साल बीत गया हो और अस्पृश्यता को उसके तमाम रूपों में समाप्त करने को लेकर आधिकारिक ऐलान किया गया हो, तब क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि किसी प्रार्थनास्थल पर बाकायदा बोर्ड लगा कर अनुसूचित तबके के लोगों के प्रवेश पर पाबन्दी की बात लिखी गयी हो। अपने विपुल रचनासंसार से एक अलग छाप छोड़ने वाले साहित्यकार एस आर हरनोट पिछले दिनों इसी मसले को लेकर चर्चा में आए, जब उन्होंने हिमाचल के एक चर्चित मन्दिर में ऐसे ही बोर्ड देखे।

देश के अग्रणी दैनिक (द हिन्दू) में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक श्री हरनोट ने बिलासपुर जिले के प्रख्यात मार्कण्डेय मंदिर के प्रबन्धन के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करानी चाही क्योंकि वह अनुसूचित जातियों के सदस्यों के साथ खुल्लमखुल्ला भेदभाव कर रहे थे । एक बयान में उन्होंने बताया कि मंदिर प्रबन्धन कमेटी ने दलितों के मंदिर प्रवेश पर पाबन्दी को लेकर बाकायदा बोर्ड लगाए हैं।

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