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भारत की कोरोना नीति के चंद नुक्सानदेह पहलू: राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

कोरोना से हमारा वास्ता अभी लम्बे समय तक चलने वाला है. काफिला पर छपे पिछले आलेखों में (यहाँ एवं यहाँ) में हम ने इस के सही और गलत, दोनों तरह के सबकों की चर्चा की थी पर भारत की करोना नीति की समीक्षा नहीं की थी.  आपदा और युद्ध काल में एक कहा-अनकहा दबाव रहता है कि सरकार को पूरा समर्थन दिया जाए और उस की आलोचना न की जाय पर कोरोना के मुकाबले के लिए भारत में अपनाई गई रणनीति की समीक्षा ज़रूरी है; यह समीक्षा लम्बे समय तक चलने वाली इस आपदा में रणनीति में सुधार का मौका दे सकती है. कोरोना से कैसे निपटना चाहिए इस में निश्चित तौर पर सब से बड़ी भूमिका तो कोरोना वायरस की प्रकृति की है- ये गर्मी में मरेगा या सर्दी में या नहीं ही मरेगा; बूढों को ज्यादा मारेगा या बच्चों को, इन तथ्यों का इस से निपटने की रणनीति तय करने में सब से बड़ी भूमिका है. इस लिए भारत में कोरोना की लड़ाई के मूल्यांकन से पहले हमें वायरस की प्रकृति के बारे में उपलब्ध जानकारी को रेखांकित करना होगा.

कोरोना वायरस के नए स्वरूप की बुनियादी प्रकृति

कोरोना किस्म के वायरस वैज्ञानिकों के लिए नए नहीं हैं. ये पहले भी उभरते रहे हैं और वैज्ञानिक इन का लगातार अध्ययन करते रहे हैं. परन्तु हाल में कोरोना किस्म के वायरस का एक नया स्वरूप सामने आया है, जिस से उत्पन्न होने वाली नयी बीमारी को कोविड नाम दिया गया है.  इस लिए कोरोना के इस नए वायरस के बारे में अभी सब कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. अभी इस की पड़ताल चल रही है.  फिर भी दुनिया भर के वैज्ञानिकों के मिले जुले काम से और कोरोना के पहले से उपलब्ध वायरसों के जीवन चक्र को ध्यान में रखते हुए कुछ बाते काफी हद तक स्पष्ट हैं.  इन के बारे में आम तौर पर वैज्ञानिकों में सर्वानुमति है. हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन को सर्वज्ञानी तो नहीं माना जा सकता परन्तु काफी हद तक इस द्वारा प्रदत जानकारी पर भरोसा किया जा सकता है.

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