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निरंकुशता के स्रोत, प्रतिरोध के संसाधन : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

राजनीति का आम सहजबोध यह है कि सत्ता की निरंकुशता लोकतंत्र का निषेध है। लोकतंत्र राजनीतिक सत्ता का गठन तो करता है, लेकिन उसे निरंकुश नहीं होने देता। यदि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत निरंकुश सत्ता का उद्भव होता है तो उसे लोकतंत्रा की दुर्बलता, उसके विकार या उसमें किसी बाहरी अलोकतांत्रिक शक्ति के हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है। यदि लोकतंत्र का अर्थ यह है कि सत्ता के स्रोत लोक में स्थित हैं तो यह स्वयंसिद्ध है कि लोकतांत्रिक सत्ता निरंकुश नहीं हो सकती।

इसी तरह राजनीति का सहजबोध यह भी है कि सत्ता की निरंकुशता प्रतिरोध को जन्म देती है और प्रतिरोध की जड़ें लोक में स्थित होती हैं। निरंकुशता यदि लोकतंत्र का निषेध है तो यह भी स्वयंसिद्ध है कि लोक या जन ही प्रतिरोध के मूल आधार और उसके प्रमुख संसाधन हैं। यह दूसरी मान्यता पहली के साथ जुड़ी हुई है। यदि पहली मान्यता टिकती है तो दूसरी की सत्यता भी साबित होती है। यदि पहली संदेह के घेरे में आती है तो दूसरी के स्वयंसिद्ध होने पर भी प्रश्न खड़े होते हैं।

और, प्रश्न तो खड़े होते हैं। वास्तविकता की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह मान्यताओं की परवाह नहीं करती – बहुप्रचलित और स्वयंसिद्ध प्रतीत होने वाली मान्यताओं की भी नहीं। दूसरी तरफ़, मान्यताओं की – ख़ास तौर पर बहुप्रचलित मान्यताओं की – बनावट और उनकी ज़मीन ऐसी होती है कि वास्तविकताओं के उलट होने के बावजूद वे चलन में बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति में पहले तो यह देखना होता है कि वास्तविकता क्या है और संबंधित मान्यताओं से उसकी संगति बैठती है या नहीं। फिर यह अलग से देखना होता है कि मान्यताएं जब ग़लत होती हैं, तब भी उनके चलते रहने के कारण कहां पर स्थित हैं। एक तरह से यह सहजबोध की जांच-पड़ताल का समय होता है। और कभी-कभी नये सहजबोध के निर्माण का समय भी होता है।

भारत की आज की हक़ीक़त यह तो है ही कि मौजूदा सरकार के अधीन राज्य और राजनीतिक सत्ता निरंकुश हो चले हैं। संवैधानिक, संस्थागत तथा लोकतांत्रिक नियमों, नियंत्रणों और परंपराओं को रौंदा जा रहा है और व्यवस्था तथा समाज, दोनों क्षेत्रों में मनमानी की जा रही है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, असम से गुजरात तक, संसद से और भीमा कोरेगांव से तीस हज़ारी तक और तिहाड़ तक नंगी निरंकुशता के उदाहरण सभी के सामने हैं। लेकिन क्या सभी को यह सब दिखायी दे रहा है? Continue reading निरंकुशता के स्रोत, प्रतिरोध के संसाधन : रवि सिन्हा