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धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ – एक कल्पना का सच: सुशील चन्द्र

Guest post by SUSHIL CHANDRA

पिछले जयपुर साहित्योत्सव (हालांकि मैं उसे ‌‌‌तमाशा-ए-अदब कहना अधिक पसंद करूंगा) के दौरान अमर्त्य सेन ने अपनी सात अभिलाषाएं व्यक्त कीं। दिलचस्प यह है कि उनमें से एक अभिलाषा उलटबांसी अधिक नजर आती है – कि वह देश में एक धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ चाहते हैं । यह मासूम सी सदिच्छा न सिर्फ कई प्रश्न उठाती है बल्कि एक साथ कई सारी विवेचनाओं की मांग भी करती है। सच तो यह है कि यह कामना कोई नई बात नही है और पश्चिम की अधिकांश दक्षिणपंथी पार्टियां जैसे रिपब्लिकन पार्टी़, कंजरवेटिव पार्टी़, क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी इत्यादि इसी संकल्पना की उपज हैं। वस्तुत: यह संकल्पना इस अवधारणा से निकली है कि दक्षिणपंथ के धार्मिक-सामाजिक पक्ष (जिसकी परिणति कठमुल्लावादी रूढि़वाद में होती है) और आर्थिक पक्ष (जो अंतत: नव रूढि़वाद में प्रतिफलित होता है) बिल्कुल अलग अलग हैं और उनके बीच कोई पारस्परिक निर्भरता नहीं है।

पहली नजर में यह सही भी लगता है जहां फ्रांस में लंबे समय तक दक्षिणपंथी शासन के बावजूद प्रशासन राज्य और धर्म के बीच संपूर्ण अलगाव के प्रति समर्पित नजर आता है। यहां तक कि भारत में भी न सिर्फ स्वतंत्र पार्टी बल्कि मनमोहन सिंह सरकार भी अपने सारे नवउदारवादी आग्रहों के बावजूद धार्मिक रूढि़यों से मुक्त नजर आती थी। मैंने जानबूझ कर नजर आती शब्दों का इस्तेमाल किया है क्योंकि सचमुच ऐसा है या नहीं इसकी जांच अभी बाकी है। लेकिन इसके पहले कि हम इस बिंदु की पड़ताल करें, इन दो बहुचर्चित शब्दों ‍- वामपंथ और दक्षिणपंथ को समझना जरूरी है । जरूरी इसलिए है कि इन दो शब्दों का अर्थ संदर्भ के साथ बदलता जाता है । Continue reading धर्मनिरपेक्ष दक्षिणपंथ – एक कल्पना का सच: सुशील चन्द्र