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तूफानों की जिद देखने का वक्त़

(‘नवउदारवाद के दौर में हिन्दुत्व’ विषय पर अहमदाबाद में प्रस्तुत व्याख्यान का संशोधित एवं विस्तारित रूप)

‘आम लोग धर्म को सच मानते हैं, समझदार लोग झूठ मानते हैं और शासक लोग उपयोगी समझते हैं।’

– सेनेका / ईसापूर्व 4 वर्ष से ईसवी 65 तक/

..अपनों के बीच होने की एक सुविधा यह होती है कि आप इस बात से निश्चिंत रहते हैं कि किसी प्रतिकूल वातावरण का सामना नहीं करना पड़ेगा, जो सवाल भी पूछे जाएंगे या जो बातें भी कहीं जाएंगी वह भी अपने ही दायरे की होंगी। मगर फिलवक्त़ मैं अपने आप को एक अलग तरह की मुश्किल से घिरा पा रहा हूं।

मुश्किल यह है कि जिस मसले पर – ‘नवउदारवाद के दौर में हिन्दुत्व’ -बात करनी है उस मसले को सदन में बैठे हर व्यक्ति ने ‘सुना है, धुना है और गुना है’। और खासकर जो नौजवान बैठे हैं, – जिनकी पैदाइश सम्भवतः बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके पहले लागू किए जा रहे ‘नए आर्थिक सुधारों’ के दौर में हुई थी – उनको फोकस करें तो कह सकते हैं कि उनकी सियासी जिन्दगी की शुरूआत से ही यह दोनों लब्ज और उससे जुड़ी तमाम बातें महाभारत के अभिमन्यु की तरह उनके साथ रही हैं।

निश्चित ही ऐसे वक्त़ उलझनसी हो जाती है कि कहां से शुरू किया जाए।  Continue reading तूफानों की जिद देखने का वक्त़

द्वार पर नीरो !

नरम फासीवाद के सौंदर्यीकरण के वक्त़ में

(To be published in the next issue of ‘ Samakaleen Teesari Dunia’)

 

जनसंहार को अंजाम देने वाले लोग क्या बीमार मस्तिष्क और परपीड़क होते हैं।

अपनी बहुचर्चित किताब ‘आईशमैन इन जेरूसलेम: ए रिपोर्ट आन द बॅनालिटी आफ इविल’ में जर्मन-अमेरिकी दार्शनिक हाना अरेन्डट इस प्रश्न का जवाब देने की कोशिश करती हैं। एक नात्सी सैन्य अधिकारी एडॉल्फ आइशमैन जो हिटलर की हुकूमत में चली नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम के अग्रणी सूत्राधारों में से था, उस पर चले मुकदमे की चर्चा करते हुए वह बताती हैं कि किस तरह ऐसे घिनौने अपराधों को अंजाम देनेवाले अक्सर सामान्य, साधारण लोग होते हैं जो अपने काम को नौकरशाहाना दक्षता के साथ अंजाम देते हैं।

एक ऐसे समय में जबकि 2002 के स्याह दौर को – जब राज्य के कर्णधारों की अकर्मण्यता और संलिप्तता के चलते हजारों निरपराधों को जान से हाथ धोना पड़ा – और कुछ लाख लोग अपने मुल्क में ही शरणार्थी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो चले हैं, को भुला देने की, उनका साफसुथराकरण करने की कोशिशें तेज हो चली हैं, और विकास का एक ऐसा शगूफा खड़ा किया जा रहा है जिसके तले असहज करनेवाले तमाम प्रश्न दफन हो जाएं तो इन सारे सवालों से रूबरू होने की जरूरत बनती है।

इसी पृष्ठभूमि में हम 2014 के चुनावों की आजाद भारत के इतिहास में अहमियत पर गौर कर सकते हैं और इस बात को समझ सकते हैं कि क्यों उसकी तुलना जर्मनी के 1933 के चुनावों से की जा रही है, जिसने हिटलर के आगमन का रास्ता सुगम किया था।

वजह साफ है कि आज़ादी के बाद पहली बार ऐसी घड़ी आयी है जब तमाम अनुदारवादी, संकीर्णमना, असमावेशी ताकतें – जिन्होंने हमेशा ही संविधान के बुनियादी मूल्यों की मुखालिफत की है- आज नयी वैधता हासिल कर जनता के एक हिस्से को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब होती दिख रही हैं। और इस मुहिम की अगुआई वही शख्स कर रहा है जो खुद एक अकार्यक्षम मुख्यमंत्राी है जिसकी अकर्मण्यता या संलिप्तता के चलते उसका सूबा साम्प्रदायिक दावानल में झुलस गया था, और यह इल्जाम महज विपक्षी पार्टियों ने ही उसकी पार्टी के वरिष्ठतम नेता ने ही लगाया है कि वह कठिन समय में ‘राजधर्म’ निभाने में असफल रहा था। Continue reading द्वार पर नीरो !