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मज़ाक मज़ाक में : किशोर

Guest Post by Kishore
(Summary: Article is about recent  racial comments on a  actress  and channel’s response to it.Now a days there is increasing trend of serving any thing in the name of comedy. This article raises questions on comedy. Is purpose of comedy is just to make us laugh or it has any social resposibility)
 पिछले दिनों तानिष्ता चटर्जी के रंग पर की गयी टिप्पणी के बाद वह एक मशहूर कॉमेडी शो को बीच में छोड़ कर चली गयी. बाद में उन्होंने इस टिप्पणी को नस्लवादी करार दिया. दूसरी तरफ इस चैनल ने इस आरोप को गलत बताते हुए कहा है वह तो बस “रोस्ट” ( एक तरह की खिंचाई) कर रहे थे और रोस्ट करना उनके शो में व्यंग करने करने का तरीका है . साथ में यह भी कहा कि उन्हें पहले ही बता दिया गया था कि उन्हें “ रोस्ट” किया जाएगा. किसी के रंग पर उलटे सीधे व्यंग करना कैसी  खिंचाई है इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया.
इसके बाद मुझे ध्यान आया कि पिछले कुछ सालों में टेलीविजन पर कॉमेडी शो की बाढ़ सी आ गयी है जो खुद ही कुछ कह कर खुद ही हँसते है. इन शो में किसी का मजाक उड़ाना कॉमेडी समझा जाता और इनमे किसी स्थिति से हास्य पैदा करने का सामर्थ् नहीं है. इन शो में कई बार किसी व्यक्ति या समूह को नीचा दिखा कर मजाक उड़ाया जाता है. अगर मैं कॉमेडी को एक विधा समझता हूँ या मैं उस समुदाय से सम्बन्ध रखता हूँ तो इस व्यंग पर मुझे हंसी नहीं आएगी.
वैसे मुझ जैसे अज्ञानियो को इन जैसे कॉमेडी शो से ज्यादा हंसी ए इस पर दिखाए जाने वाले होरर शो पर आती है जो डराने के मकसद से बनाये जाते हैं. खैर यह दीगर बात हएै पर एक बात तो तय है कि यह शो  बहुत लोकप्रिय हुए हैं और इनको देखने वालों की संख्या लाखो में है. भले ही तानिष्ता को उनके व्यंग करने के तरीके पर एतराज हो पर लोग इस अंदाज को बहुत पसंद कर रहे हैं.
मुझे उन लोगों की बात भी याद आई जो, जो मन में आये वह कह देते हैं और फिर कहते हैं इस बात को इतनी संजीदगी से लेने की क्या जरूरत है , यह तो महज एक मजाक था. इसी तरह किसी खास समुदाय और औरतो को लेकर बहुत से चुटकले चलते हैं जिनमें बहुत खराब खराब बातें होती है, और लोग हँसते भी है . आलोचना करने  पर इतना कह  कर बात टाल देते हैं कि यह चुटकला ही तो है. आखिर हम लोग कब कॉमेडी को संजीदगी से लेना शुरू करेंगे.
कॉमेडी का एक साधारण सा नियम तो समझ आता है कि कॉमेडी में जो हंसी का पात्र बनता है या बनती है उसे खुद भी अपनी उस स्थिति पर वैसे ही हंसी आनी चाहिए जैसे  की किसी और को आ रही है.  अर्थार्थ हंसी उसके रंग रूप , आकार या नैन नक्श से निरपेक्ष उस कलाकार के हाव भाव या उस परिस्थिति से आनी चाहिए. यह स्पष्ट है कि हंसी का कारण रंग रूप , आकार या नैन नक्श नहीं है.
दूसरी बात कि हंसी का कारण किसी समुदाय विशेष के प्रति पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए. हम यह कह कर मुक्त  नहीं हो सकते कि यह तो एक मजाक है. वास्तविकता यह है कि इस तरह के मजाक पूर्वाग्रहों को मजबूती देते हैं. यकीन ना हो तो अपने आसपास नजर दौड़ा कर देख लो. क्या इन पूर्वाग्रहों के सुदृढ़ होने मैं इस तरह के मजाक का हाथ नहीं है? क्या औरतों और पत्नियों के प्रति होने वाले मजाक ने समाज में उनकी स्थिति को प्रभावित नहीं किया ?
इन शो में से अधिकतर शो में कलाकार अपने हाव भाव और बातों से हंसाया जाता है. अब कोई पूछ सकता है कि हाव भाव या बातों से हंसाने में बुराई क्या है. सभी महान हास्य कलाकार बातों और हाव भाव से ही तो हंसाते थे या हैं. तो यह शो उन हास्य शो या फिल्मों से अलग कैसे हुए?
अंतर है कि किन बातों या किस हाव भाव से हंसाया जा रहा है. उस बात की विषय वस्तु  क्या है. कोई हाव भाव या बात फूहड़ या अश्लील  भी हो सकती है और सौम्य  भी. अब प्रश्न यह उठता है कि यह कौन तय करेगा कि यह विषय वस्तु फूहड़ या अश्लील है या सौम्य? हर समाज में फूहड़ या सौम्य होने के कुछ मानदंड होते हैं और कॉमेडी शो कि विषय वस्तु भी उसी से तय होगी. पर यह कहने में मुझे एक खतरा दिख रहा है? जिस तरह से किसी भी चीज को अश्लील या अनैतिक बता कर उस पर हमले हो रहे और कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही  हैं उसमे इन शब्दों का प्रयोग बहुत संभल कर करना होगा.
मैं इस बात से आश्वस्त हूँ कि “ जाने भी दो यारों” नामक फिल्म में जो हास्य था वह उच्च कोटि का था और सौम्य था और जो मैं आजकल टी.वी. शो में देख रहा हूँ वह फूहड़ है. पर मैं यहाँ अपना तर्क गढ़ नहीं पा रहा कि क्या चीज “जाने भी दो यारों” को इन टी.वी. शो से अलग करती है. मेरा इस बात पे भी दृढ विशवास है  कि किसी के रंग रूप, नैन नक्श या किसी समुदाय के आधार मजाक उड़ाना गलत है . मैं पूरी तरह से इस शो के खिलाफ तानिष्ता का समर्थन करता हूँ.
बस मुझे बस इस बात पर संशय है कि किस आधार पर किसी बात को फूहड़ कहा जाएगा और किस आधार पर सौम्य?
(लेखक डेवलेपमेंट प्रोफेश्नल के रूप में  में कार्यरत हैं  और पिछले कई सालों से बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।)