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भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना : गौहर रज़ा

The next lecture ( 8 th one) in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series initiated by New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh) will be delivered by Gauhar Raza, Former Chief Scientist, Council of Scientific and Industrial Research, Documentary Filmmaker on Social Issues, Civil Rights Activist and a  Poet 

He will be speaking on ‘Indian Identity, Freedom Movement and Scientific Temper’ ( भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना) on Saturday, 10 th December, 2022  6 PM ( IST). 

Time: Dec 10, 2022 06:00 PM India

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Meeting ID: 827 1770 8928
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The lecture will also be live streamed on www.facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

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संधान व्याख्यानमाला : आठवां वक्तव्य 

विषय :  भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना

वक्ता :  गौहर रज़ा , पूर्व मुख्य वैज्ञानिक , कौन्सिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च , डॉक्युमेंटरी  फिल्म निर्माता , सामाजिक कार्यकर्ता और कवि  

शनिवार , 10  दिसंबर , शाम 6 बजे   
आयोजक :न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश )

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश ) 

विषय : ‘ भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के सामने दो बड़े सवाल रखे थे, पहला था ‘वैज्ञानिक चेतना’ का और दूसरा था ‘भारत माता कौन है’ यानी हमारी भारतीय पहचान का क्या अर्थ है.  इन दोनों सवालों पर आज फिर एक बार नज़र डालने की जरूरत है. आज एक तरफ़ तो  वैज्ञानिक चेतना पर बड़ा हमला है और दूसरी तरफ़ ‘सामूहिक भारतीय पहचान’ को बदलने की व्यापक कोशिश ने सामाजिक ढांचे को छिन्न भिन्न करने का ख़तरा खड़ा कर दिया है. 

ये व्याख्यान जंग-ए-आज़ादी के दौरान ब्रिटिश राज्य के दमन के ख़िलाफ़ गाढ़ी गयी ‘हिंदुस्तानी पहचान’ से जुड़े कुछ सवालों पर नज़र डालने की कोशिश करेगा. इस पहचान का गारा वैज्ञानिक चेतना से तैयार किया गया था, पर ये भी याद रखना चाहिए कि देश में वैज्ञानिक चेतना के खिलाफ़ शक्तियां हमेशा ही सक्रिय रही हैं, खास तौर से हिंदी पट्टी में. 2014 के बाद से इन शक्तियों की ताक़त बढ़ी है और साथ ही वैज्ञानिक चेतना और भारतीय पहचान पर हमले भी. 

कट्टरता के खिलाफ अज्ञेय: वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिंदी के ही नहीं वरन समूचे भारतीय साहित्य में निरंतर जिज्ञासा और पाठकीय आकर्षण पैदा करने वाले रचनाकार के रूप में देखे जाते हैं। विभिन्न किस्म की दासता-वृत्तियों, परजीवीपन और क्षुद्र खुशामद से भरे मुल्क में उनका स्वाधीनता बोध जितना गरिमावान लगता है, उतना ही चौंकाने वाला भी। इसी स्वाधीनता बोध ने अज्ञेय की दृष्टि को भारत के लोकतांत्रिक मिजाज के अनुसार ज्यादा खुला व अपने रचना संसार को स्वेच्छा से निर्मित करने लायक बनाया। उनके इस स्वाधीनता बोध का प्रभाव व्यापक रूप से सृजन के बहुत सारे आयामों पर पड़ा है।

अज्ञेय के साहित्य पर लिखने वाले कई आलोचकों ने इस प्रभाव के मूल्यांकन का प्रयास किया है। जैसे कि निर्मल वर्मा ने स्वाधीनता बोध से उत्पन्न उनकी इसी खुली, व्यापक दृष्टि को उनके संपादन कर्म से जोड़कर देखा था। अपने द्वारा संपादित पत्र प्रतीक व दिनमान  में उन्होंने मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह व सज्जाद जहीर को जोड़ा तो तार सप्तक के विविध खंडों में अपने से पूर्णतया भिन्न दृष्टिकोण वाले कवियों को। स्वाधीनता के प्रति तीव्र संवेदनशीलता को व्यक्तिवाद के दायरे में रखकर समझने की सरल चिंतन-प्रक्रिया साहित्य में बहुतायत से मौजूद रही है। ऐसा मानने वालों की सीमा प्रकट करते हुए निर्मल वर्मा ने कहा है कि स्वाधीनता के प्रति अत्यंत सचेत अज्ञेय के प्रति लोगों को झुंझलाहट उस समाज में स्वाभाविक थी जहां लोगों को हर समय किसी ‘ऊपर वाले’ का मुंह जोहना पड़ता है। इन ऊपर वालों में परिवार, जाति, रूढ़ि, पार्टी, विचारधारा, संगठन आदि सभी कुछ शामिल रहा है। यहां तक कि गांव में जातिवाद-परिवार की गुलामी करने वाले लोग जब शहर आए तो उन्होंने विभिन्न पार्टियों, संगठनों व विचारधाराओं की गुलामी को बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया। जिन्होंने नहीं स्वीकारा उन्हें कुलद्रोही, जनविरोधी, परंपराद्वेषी, धर्मविरोधी, व्यक्तिवादी आदि आरोपों का सामना करना पड़ा।

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