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Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual : Virendra Yadav

Leading Writer and Critic Virendra Yadav will be delivering the fifth lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series’ ( in Hindi) on Saturday,14 th May,  2022, at 6 PM (IST).

He will be speaking on ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी’ ( Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual)

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

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Organised by :

NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh

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संधान व्याख्यानमाला – पांचवा वक्तव्य

विषय : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी 

वक्ता : अग्रणी लेखक एवं आलोचक वीरेंद्र यादव 

शनिवार, 14 मई , शाम 6 बजे 

सारांश :

1- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ मात्र एक राजनीतिक व्यूहरचना न होकर एक ऐसी अवधारणा है जिसकी गहरी जड़े पारम्परिक रूप से  हिंदू जनमानस में  मौजूद हैं।
2- 1857 से लेकर 1947 तक विस्तृत ‘स्वाधीनता’ विमर्श में इस हिन्दू मन की शिनाख्त की जा सकती है।
3- स्वाधीनता आंदोलन इस हिन्दू मन से मुठभेड़ की नीति न अपनाकर मौन सहकार की व्यावहारिकता की राह पर ही चला।
4- हिंदी क्षेत्र में तर्क, ज्ञान  व  वैज्ञानिक चिंतन की धारा भारतीय समाज की वास्तविकताओं में कम अवस्थित थीं, उनकी प्रेरणा के मूल में पश्चिमी आधुनिकता व वैश्विक प्रेरणा अधिक थी।
5- हिंदी क्षेत्र व समाज में ज़मीनी स्तर व हाशिये के समाज के बीच से जो तार्किक, अंधविश्वास विरोधी व विज्ञान सम्मत सुधारवादी प्रयास हुए उन्हें मुख्यधारा के चिंतन-विचार में शामिल नहीं किया गया।
6- ध्यान देने की बात है कथित ‘हिंदी नवजागरण’ विभेदकारी वर्ण-जातिगत सामाजिक संरचना की अनदेखी कर प्रभुत्ववादी मुहावरे में ही विमर्शकारी रहा।
7- संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्ष आधुनिक भारत की परियोजना में    भारतीय समाज की धर्म व जाति की दरारों के जड़मूल से उच्छेदन को प्रभावी ढंग से शामिल नहीं किया जा सका।
8-सारी आधुनिकता के बावजूद हिंदी बुद्धिजीवियों का वृहत्तर संवर्ग वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर   जनबुद्धिजीवी की भूमिका न अपना सका।
9- सामाजिक न्याय की अवधारणा का मन में स्वीकार भाव न होना, हिंदी बुद्धिजीवी की एक बड़ी बाधा है।
10- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने के हिंदी बुद्धिजीवी के उपकरण वही रहे जो हिंदू बुद्धिजीवियों के।
11- हिंदी बुद्धिजीवी के सवर्णवादी अवचेतन से उपजा दुचित्तापन ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने में एक बड़ी बाधा है।

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव NSI  ( हिंदी प्रदेश)

हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक : प्रोफेसर  सविता सिंह

The third lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala’ series  – initiated by New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh) will be delivered by Prof Savita Singh, leading poetess, feminist scholar and writer on Saturday 19 th February 2022, at 6 PM (IST). She will be speaking on ‘Hindi Literature and New Light of Feminist Thought   (हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक’ )

The focus of this lecture series – as you might be aware – is on the Hindi belt, especially, on literature, culture, society and politics of the Hindi region where we intend to invite writers, scholars with a forward looking, progressive viewpoint to share their concerns.

You are cordially invited to attend and participate in the ensuing discussion.

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

 Zoom Link

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Meeting ID : 898 5366 9536
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 New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh)

संधान व्याख्यानमाला – तीसरा वक्तव्य

वक्ता: प्रोफ़ेसर सविता सिंह
प्रसिद्ध कवयित्री, नारीवादी सिद्धांतकार और लेखिका

विषय: ‘हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक’

19 फरवरी शाम 6बजे

सारांश
स्त्रीवाद को लेकर हिंदी साहित्य में आजकल बहुत सारी बातें हो रही हैं। वे अपनी अंतर्वस्तु में नई भी हैं और पुरानी भी। यह भी कह सकते हैं की पितृसत्ता ने अपने भी स्त्रीवादी विमर्श तैयार किए हैं स्त्रियों के लिए। जब स्त्रियां इसे अपना लेती हैं, अपना कह कर इसे किसी वसन की तरह पहन लेती हैं  तो जरूरी हो जाता है इनपर गहनता और गहराई से बात करना। वह एक बात थी जब स्त्री लेखिकाओं ने अपने को स्त्रीवादी होने या कहे जाने से परहेज किया, और यह दूसरी जब स्त्रीवाद के अनेक रूप गढ़े गए। भारतीय परिवेश में स्त्री विमर्श के भीतर बहुलता और भिन्नता तो होनी ही थी। इसी विषय पर हम क्यों न इसपर बात करें। क्या हिंदी में स्त्रीवादी लेखन कोई नया समाज बनाने के संकल्प से लिखा जा रहा है या फिर अभी भी पितृसत्ता का सह उत्पादन ही हो रहा है, यह हमारे लिए चिंता और बहस का मुद्दा बनना ही चाहिए।