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भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना : गौहर रज़ा

The next lecture ( 8 th one) in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series initiated by New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh) will be delivered by Gauhar Raza, Former Chief Scientist, Council of Scientific and Industrial Research, Documentary Filmmaker on Social Issues, Civil Rights Activist and a  Poet 

He will be speaking on ‘Indian Identity, Freedom Movement and Scientific Temper’ ( भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना) on Saturday, 10 th December, 2022  6 PM ( IST). 

Time: Dec 10, 2022 06:00 PM India

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संधान व्याख्यानमाला : आठवां वक्तव्य 

विषय :  भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना

वक्ता :  गौहर रज़ा , पूर्व मुख्य वैज्ञानिक , कौन्सिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च , डॉक्युमेंटरी  फिल्म निर्माता , सामाजिक कार्यकर्ता और कवि  

शनिवार , 10  दिसंबर , शाम 6 बजे   
आयोजक :न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश )

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश ) 

विषय : ‘ भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के सामने दो बड़े सवाल रखे थे, पहला था ‘वैज्ञानिक चेतना’ का और दूसरा था ‘भारत माता कौन है’ यानी हमारी भारतीय पहचान का क्या अर्थ है.  इन दोनों सवालों पर आज फिर एक बार नज़र डालने की जरूरत है. आज एक तरफ़ तो  वैज्ञानिक चेतना पर बड़ा हमला है और दूसरी तरफ़ ‘सामूहिक भारतीय पहचान’ को बदलने की व्यापक कोशिश ने सामाजिक ढांचे को छिन्न भिन्न करने का ख़तरा खड़ा कर दिया है. 

ये व्याख्यान जंग-ए-आज़ादी के दौरान ब्रिटिश राज्य के दमन के ख़िलाफ़ गाढ़ी गयी ‘हिंदुस्तानी पहचान’ से जुड़े कुछ सवालों पर नज़र डालने की कोशिश करेगा. इस पहचान का गारा वैज्ञानिक चेतना से तैयार किया गया था, पर ये भी याद रखना चाहिए कि देश में वैज्ञानिक चेतना के खिलाफ़ शक्तियां हमेशा ही सक्रिय रही हैं, खास तौर से हिंदी पट्टी में. 2014 के बाद से इन शक्तियों की ताक़त बढ़ी है और साथ ही वैज्ञानिक चेतना और भारतीय पहचान पर हमले भी. 

भारतीय फ़ासीवाद और प्रतिरोध की संभावना : आशुतोष कुमार

Leading Critic Ashutosh Kumar, Editor ‘Aalochana’ , who teaches at Department of Hindi, Delhi University will be delivering the sixth lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series’ ( in Hindi) on Saturday,13 th August,  2022, at 6 PM (IST).

He will be speaking on ‘ भारतीय फ़ासीवाद और प्रतिरोध की संभावना’ ( Indian Fascism and Possibility of Resistance) 

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

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Organised by :NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh 

संधान व्याख्यानमाला : छठा वक्तव्य 

विषय : भारतीय फ़ासीवाद : प्रतिरोध की संभावना 

वक्ता : अग्रणी लेखक एवं संपादक ‘आलोचना’

आशुतोष कुमार 

हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय 

शनिवार, 13 अगस्त, शाम 6 बजे 

सारांश :

भारतीय फ़ासीवादऔर प्रतिरोध की संभावना 

कुछ  प्रश्न:
क्या भारत की वर्तमान परिस्थिति को फासीवाद के रूप में चिन्हित किया जा सकता है? अथवा क्या इसे केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण , धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवाद की राजनीति के रूप में देखा जाना चाहिए? यह सवाल महत्वपूर्ण इसलिए है किस के जवाब पर इस परिस्थिति से मुकाबला करने की रणनीति निर्भर करती है।

अगर यह फासीवाद है तो इसके उद्भव और वर्तमान शक्ति-सम्पन्नता के आधारभूत कारण क्या हैं? क्या यह केवल वैश्विक वित्तीय पूंजीवाद के संकट की अभिव्यक्ति है, जैसा कि प्रभात पटनायक जैसे अर्थशास्त्री समझते हैं?

 क्या भारतीय फ़ासीवाद जैसी किसी अवधारणा के बारे में सोचा जा सकता है? या यह सिर्फ एक वैश्विक प्रवृत्ति है ?

अगर यह फ़ासीवाद नहीं है तो क्या यह पश्चिम और पश्चिमपरस्त राजनेताओं और बौद्धिकों द्वारा अन्यायपूर्ण ढंग से दबाए गए हिन्दू राष्ट्रवाद का उभार है, जैसा कि के भट्टाचार्जी जैसे सावरकरी टिप्पणीकार दावा करते हैं?

क्या यह संघ के बढ़ते लोकतंत्रीकरण के चलते उसके नेतृत्व में वंचित- उत्पीड़ित जन समुदाय द्वारा किया गया सत्ता परिवर्तन है, जिसने कुलीन वर्गों की कीमत पर अकुलीनों को शक्तिशाली बनाया है? जैसा कि अभय कुमार दुबे और बद्री नारायण जैसे सामाजिक लेखक संकेत करते हैं?

 क्या वर्तमान सत्ता संतुलन को बदला जा सकता है? इसे कौन कर सकता है और कैसे?

कुछ बातें

फ़ासीवाद का सबसे बड़ा लक्षण कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका के एक गठबंधन के रूप में काम करने की प्रवृत्ति है। लोकतंत्र में इन तीनों के अलगाव और इनकी स्वायत्तता पर इसलिए जोर दिया जाता है कि कोई एक समूह राजसत्ता का दुरुपयोग न कर सके। तीनों निकाय एक दूसरे पर नजर रखने और एक दूसरे को नियंत्रित करने का कार्य करें। इस व्यवस्था के बिना एक व्यक्ति और एक गुट की निरंकुश तानाशाही से बचना नामुमकिन है।

अयोध्या-विवाद से लेकर गुलबर्ग सोसाइटी जनसंहार  और छतीसगढ़ जनसंहार तक के मामलों में हमने सुप्रीम कोर्ट को संविधान-प्रदत्त नागरिक अधिकारों और न्याय की अवधारणा के विरूद्ध राज्य के बहुमतवादी फ़ैसलों के पक्ष में खड़े होते देखा है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धन-शोधन निवारण अधिनियम के अन्यायपूर्ण प्रावधानों के खिलाफ दी गई याचिका पर राज्य के पक्ष में फैसला दिया है. सीएए और धारा 370 के निर्मूलीकरण जैसे मामलों में चुप्पी साधकर भी उसने नागरिक अधिकारों के विरुद्ध राजकीय निरंकुशता का समर्थन किया है.

नाज़ी जर्मनी में ग्लाइसेशतुंग या समेकन के नाजी कानूनों के जरिए इसी तरह राज्य के सभी निकायों को सकेन्द्रित और एकात्म बनाया था.  हिटलर की तरह मुसोलिनी ने भी ‘राष्ट्र-राज्य सर्वोपरि’ के सिद्धांत के तहत न्यायपालिका को पालतू बनाने का काम किया था. भारत में भी हमने गृह मंत्री अमित शाह को सबरीमाला  मामले में  सुप्रीम कोर्ट को चेतावनी देते देखा है.

भारत में फ़ासीवाद के सभी जाने पहचाने लक्षण प्रबल रूप से दिखाई दे रहे हैं। एक व्यक्ति की तानाशाही और व्यक्ति पूजा का व्यापक प्रचार। मुख्य धार्मिक अल्पसंख्यक समूह के विरुद्ध नफरत, हिंसा और अपमान का अटूट सिलसिला। अल्पसंख्यकों के खिलाफ अधिकतम हिंसा के पक्ष में जनता के व्यापक हिस्सों का जुनून। विपक्ष की बढ़ती हुई असहायता। स्वतंत्र आवाजों का क्रूर दमन। दमन के कानूनी और ग़ैरकानूनी रूपों का विस्तार। मजदूरों और किसानों के अधिकारों में जबरदस्त कटौती। आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के सम्मान के संघर्षों का पीछे ढकेला जाना। शिक्षा पर भगवा नियंत्रण। छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का विलोपन। फ़ासीवादी प्रचार के लिए साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला, सिनेमा और दीगर कला-विधाओं के नियंत्रण और विरूपण को राज्य की ओर से दिया जा रहा संरक्षण और प्रोत्साहन।

अभी भी कुछ लोग भारत में फासीवादी निज़ाम से सिर्फ इसलिए इंकार करते हैं कि इस देश में गैस चैंबर  स्थापित नहीं किए गए हैं। उन्हें समझना चाहिए कि भारतीय फ़ासीवाद ने फ़ासीवाद अतीत से बहुत कुछ सीखा है। उसने समझ लिया है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण  देश में  भौतिक गैस चैंबर से कहीं अधिक असरदार और स्थायी  व्यवस्था है देश के भीतर सामाजिक और  मनोवैज्ञानिक गैस चैम्बरों का विस्तार।

लगभग समूचे देश को एक ऐसे सांस्कृतिक गैस चेंबर में बदल दिया गया है, जिसमें एक व्यक्ति और एक विचारधारा की गुलामी से इनकार करने वाले स्वतंत्रचेता जन अपने जीवित होने का कोई मतलब ही ना निकाल सकें।

यूरोप की लोकतांत्रिक परम्पराओं के कारण फ़ासीवादी राज्य की स्थापना के लिए कानूनी बदलावों की जरूरत थी. भारत में ‘भक्ति-परम्परा‘ की जड़ें बहुत गहरी हैं. शर्तहीन-समर्पण का संस्कार प्रबल रहा है. क्या यह भी एक कारण है कि भारत में यूएपीए और अफ्स्पा जैसे कुछ विशेष कानूनों के अलावा व्यापक कानूनी बदलावों की जरूरत नहीं पड़ी है?

फ़ासीवाद की मुख्य जीवनी शक्ति नफ़रत की भावना है। हमारे देश में वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा के कारण अपने ही जैसे दूसरे मनुष्यों से तीव्र नफरत का संस्कार हजारों वर्षों से फलता फूलता रहा है। वोट तंत्र ने इस नफरत को उसकी चरम सीमा तक पहुंचा दिया है। क्या भारतीय फ़ासीवाद नफरत के इस चारों ओर फैले खौलते हुए समंदर से उपजे घन-घमंड के रूप में ख़ुद को जनमानस में स्थापित कर चुका है?

इस बातचीत में मैं ऐसे ही कुछ सवालों के जरिए यह देखने की कोशिश करूंगा कि क्या हम ‘भारतीय फासीवाद’ की कोई व्यवस्थित  सैद्धांतिकी निर्मित करने के करीब पहुँच गए हैं. ऐसी किसी संभावित सैद्धांतिकी की रूपरेखा  क्या होगी और इस उद्यम से हम अपने किन सवालों के जवाब हासिल करने की उम्मीद कर सकते हैं. 

Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual : Virendra Yadav

Leading Writer and Critic Virendra Yadav will be delivering the fifth lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series’ ( in Hindi) on Saturday,14 th May,  2022, at 6 PM (IST).

He will be speaking on ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी’ ( Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual)

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Organised by :

NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh

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संधान व्याख्यानमाला – पांचवा वक्तव्य

विषय : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी 

वक्ता : अग्रणी लेखक एवं आलोचक वीरेंद्र यादव 

शनिवार, 14 मई , शाम 6 बजे 

सारांश :

1- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ मात्र एक राजनीतिक व्यूहरचना न होकर एक ऐसी अवधारणा है जिसकी गहरी जड़े पारम्परिक रूप से  हिंदू जनमानस में  मौजूद हैं।
2- 1857 से लेकर 1947 तक विस्तृत ‘स्वाधीनता’ विमर्श में इस हिन्दू मन की शिनाख्त की जा सकती है।
3- स्वाधीनता आंदोलन इस हिन्दू मन से मुठभेड़ की नीति न अपनाकर मौन सहकार की व्यावहारिकता की राह पर ही चला।
4- हिंदी क्षेत्र में तर्क, ज्ञान  व  वैज्ञानिक चिंतन की धारा भारतीय समाज की वास्तविकताओं में कम अवस्थित थीं, उनकी प्रेरणा के मूल में पश्चिमी आधुनिकता व वैश्विक प्रेरणा अधिक थी।
5- हिंदी क्षेत्र व समाज में ज़मीनी स्तर व हाशिये के समाज के बीच से जो तार्किक, अंधविश्वास विरोधी व विज्ञान सम्मत सुधारवादी प्रयास हुए उन्हें मुख्यधारा के चिंतन-विचार में शामिल नहीं किया गया।
6- ध्यान देने की बात है कथित ‘हिंदी नवजागरण’ विभेदकारी वर्ण-जातिगत सामाजिक संरचना की अनदेखी कर प्रभुत्ववादी मुहावरे में ही विमर्शकारी रहा।
7- संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्ष आधुनिक भारत की परियोजना में    भारतीय समाज की धर्म व जाति की दरारों के जड़मूल से उच्छेदन को प्रभावी ढंग से शामिल नहीं किया जा सका।
8-सारी आधुनिकता के बावजूद हिंदी बुद्धिजीवियों का वृहत्तर संवर्ग वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर   जनबुद्धिजीवी की भूमिका न अपना सका।
9- सामाजिक न्याय की अवधारणा का मन में स्वीकार भाव न होना, हिंदी बुद्धिजीवी की एक बड़ी बाधा है।
10- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने के हिंदी बुद्धिजीवी के उपकरण वही रहे जो हिंदू बुद्धिजीवियों के।
11- हिंदी बुद्धिजीवी के सवर्णवादी अवचेतन से उपजा दुचित्तापन ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने में एक बड़ी बाधा है।

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव NSI  ( हिंदी प्रदेश)

हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक : प्रोफेसर  सविता सिंह

The third lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala’ series  – initiated by New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh) will be delivered by Prof Savita Singh, leading poetess, feminist scholar and writer on Saturday 19 th February 2022, at 6 PM (IST). She will be speaking on ‘Hindi Literature and New Light of Feminist Thought   (हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक’ )

The focus of this lecture series – as you might be aware – is on the Hindi belt, especially, on literature, culture, society and politics of the Hindi region where we intend to invite writers, scholars with a forward looking, progressive viewpoint to share their concerns.

You are cordially invited to attend and participate in the ensuing discussion.

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

 Zoom Link

https://us02web.zoom.us/j/89853669536?pwd=OTVkZUNKejhNem5hODE5ZEsveGZTQT09

Meeting ID : 898 5366 9536
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 New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh)

संधान व्याख्यानमाला – तीसरा वक्तव्य

वक्ता: प्रोफ़ेसर सविता सिंह
प्रसिद्ध कवयित्री, नारीवादी सिद्धांतकार और लेखिका

विषय: ‘हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक’

19 फरवरी शाम 6बजे

सारांश
स्त्रीवाद को लेकर हिंदी साहित्य में आजकल बहुत सारी बातें हो रही हैं। वे अपनी अंतर्वस्तु में नई भी हैं और पुरानी भी। यह भी कह सकते हैं की पितृसत्ता ने अपने भी स्त्रीवादी विमर्श तैयार किए हैं स्त्रियों के लिए। जब स्त्रियां इसे अपना लेती हैं, अपना कह कर इसे किसी वसन की तरह पहन लेती हैं  तो जरूरी हो जाता है इनपर गहनता और गहराई से बात करना। वह एक बात थी जब स्त्री लेखिकाओं ने अपने को स्त्रीवादी होने या कहे जाने से परहेज किया, और यह दूसरी जब स्त्रीवाद के अनेक रूप गढ़े गए। भारतीय परिवेश में स्त्री विमर्श के भीतर बहुलता और भिन्नता तो होनी ही थी। इसी विषय पर हम क्यों न इसपर बात करें। क्या हिंदी में स्त्रीवादी लेखन कोई नया समाज बनाने के संकल्प से लिखा जा रहा है या फिर अभी भी पितृसत्ता का सह उत्पादन ही हो रहा है, यह हमारे लिए चिंता और बहस का मुद्दा बनना ही चाहिए।