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सत्ता और हिंसा : बद्री नारायण

बद्री नारायण का यह लेख लखनऊ के एक हिंदी अख़बार को दिया गया था पर उन्होंने छापने से मना कर दिया.

शक्ति अपने संस्थागत रुप में सत्ता में तब्दील हो जाती है। सत्ता अपने मूल अर्थ में भय एवं हिंसा पर टिकी होती है। सत्ता का अभ्यांतरिकरण हो या सत्ता का प्रतिरोध, दोनों ही अर्थो में हिंसा उसके सह उत्पादक के रुप में दिखाई पड़ती है। जनतंत्र को एक ऐसी प्रक्रिया के रुप में परिकल्पित किया गया था जो सत्ता को उसके हिंसक पक्ष से मुक्त कराके सेवाभाव के एजेन्सी के रुप में सक्रिय रखे। यह माना जा रहा था कि जनतंत्र सत्ता को रेशनालाइज कर उसे सेवा-भावि प्रशासकीय स्वरुप में तब्दील कर देती है। यह काफी कुछ हुआ भी किन्तु अपने कार्य-प्रक्रिया में इस जनतांत्रिक समय में भी सत्ता हिंसा को उत्पादित करते रहने वाली शक्तिस्रोत के रुप में सामने आई है। सत्ता पहले अपने भीतर अपने ही कारणो से क्राइसिस को जन्म देती है, फिर उससे उबरने के लिए हिंसा रचती है। बंगाल, झारखण्ड, आन्ध्र के जंगलों में पहले तो बाजार शासित विकास के तहत आदिवासी जीवन के संसाधनों पर कब्जा कर उन्हे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेचना, फिर उसके विरोध में आदिवासी जनता का नक्सलवादी विचारों एवं नेतृत्व में हिंसक प्रतिरोध का बढ़ते जाना, पुनः उसे दबाने के लिए राज्य द्वारा की जाने वाली ज्यादा आक्रामक एवं खुंखार हिंसा को इसी रुप में देखा जा सकता है। Continue reading सत्ता और हिंसा : बद्री नारायण