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सामाजिक मुक्ति की ज्ञानमीमांसा : स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द एवं महात्मा ज्योतिबा फुले के बहाने चन्द बातें

कल्पना की उड़ान भरना हर व्यक्ति को अच्छा लगता है।

कभी कभी मैं सोचता हूं कि आज से 100 साल बाद जबकि हम सभी – यहां तक कि इस सभागार में मौजूद अधिकतर लोग – बिदा हो चुके होंगे तो आने वाले समय के इतिहासलेखक हमारे इस कालखण्ड के बारेमें, जिससे हम गुजर रहे हैं, जिसकी एक एक घटना-परिघटना को लेकर बेहद उद्वेलित दिखते हैं, ‘हम’ और ‘वे’ की बेहद संकीर्ण परिभाषा को लेकर अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक फैसले लेते हैं, क्या कहेंगे ? आज हमारे लिए जो जीवन मरण के मसले बने हैं और जिनकी पूर्ति के नाम पर हम किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, उनके बारे में उनकी क्या राय होगी ? क्या वे इस सदी में सामने आए जनसंहारों के अंजामकर्ताओं को लेकर उतनीही अस्पष्टता रखेंगे और कहेंगे कि मारे गए लोग दरअसल खुद ही अपनी मौत के जिम्मेदार थे, जिन्होंने खुद मृत्यु को न्यौता दिया था ? क्या वह किसी वैश्विक मानवता के तब लगभग सर्वस्वीकृत फलसफे के तहत इस दौर की घटनाओं को देखेंगे और अपने अपने ‘चिरवैरियों’ के साथ हमारे रक्तरंजित संग्रामों पर एक अफसोस भरी हंसी हंस देंगे ?

स्पष्ट है कि स्थान एवं समय की दूरियां किसी विशाल कालखण्ड की वस्तुनिष्ठ आलोचना करने का मौका प्रदान करती हैं। दरअसल जब हम खुद किसी प्रवाह/धारा का हिस्सा होते हैं तब चाह कर भी बहुत वस्तुनिष्ठ नहीं हो पाते हैं, समुद्र की खतरनाक लगनेवाली लहरों पर सवार तैराक की तुलना में किनारे पर बैठा वह शख्स कई बार अधिक समझदार दिख सकता है, जिसे भले तैरना न आता हों, मगर जिसके पास लहरों का लम्बा अध्ययन हो।

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