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‘विश्व गुरु का सत्य’ और ज्ञान की दूसरी परम्परा : धीरेश सैनी

Guest Post by Dheeresh Saini – Review of ‘Charvak ke Vaaris’

 `चार्वाक के वारिस` को पढ़ते हुए ही मुझे हिंदी के आलोचक और जेएनयू के रिटायर्ड प्रोफेसर नामवर सिंह के निधन की ख़बर मिली। एक ऐसी किताब को, जो भारतीय समाज-संस्कृति में अतीत से लेकर आज तक ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न प्रगतिशील, विवेकवादी, तर्कवादी और विद्रोही धाराओं के प्रति वर्णवादी-ब्राह्मणवादी शक्तियों के हिंसक रवैये की पड़ताल करती हो, पढ़ते हुए विचलित होते चले जाना स्वाभाविक था। Continue reading ‘विश्व गुरु का सत्य’ और ज्ञान की दूसरी परम्परा : धीरेश सैनी

विचार ही अब द्रोह !

(‘चार्वाक के वारिस : समाज, संस्कृति एवं सियासत पर प्रश्नवाचक ‘ की प्रस्तावना से)

कार्ल मार्क्‍स की दूसरी जन्मशती दुनिया भर में मनायी जा रही है।

दिलचस्प है कि विगत लगभग एक सौ पैंतीस सालों में जबसे उनका इन्तक़ाल हुआ, कई कई बार ऐसे मौके आए जब पूंजीवादी मीडिया में यह ऐलान कर दिया कि ‘मार्क्‍स इज डेड’ अर्थात ‘मार्क्‍स मर गया’; अलबत्ता, यह मार्क्‍स की प्रत्यक्ष मौत की बात नहीं थी बल्कि मानवमुक्ति के उस फलसफे के अप्रासंगिक होने की उनकी दिली ख्वाहिश को जुबां दिया जाना था, जो उनके नाम के साथ जाना जाता है। याद किया जा सकता है कि सोवियत रूस का विघटन होने के बाद और जिन दिनों पूंजीवाद की ‘अंतिम जीत’ के दावे कुछ अधिक जोर से उठने लगे थे, पूर्व सोवियत रूस के एक गणराज्य में बाकायदा एक पोस्टर मार्क्‍स की तस्वीर के साथ ‘‘मोस्ट वाटेंड’’ के नारे के साथ छपा था।

यह अलग बात है कि हर बार इस भविष्यवाणी को झुठला कर अग्निपक्षी/फिनिक्स की तरह मार्क्‍स राख से बार बार ‘नया जीवन’ लेकर उपस्थित होते रहे हैं। आलम तो यहां तक आ पहुंचा है कि 1999 में- अर्थात सोवियत रूस के विघटन के लगभग नौ साल बाद- बीबीसी के आनलाइन सर्वेक्षण में मार्क्‍स को सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा विचारक कहा गया था। Continue reading विचार ही अब द्रोह !