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हिन्दी फ़िल्म अध्ययन: ‘माधुरी’ का राष्ट्रीय राजमार्ग

(ये लेख स्रोत-चिंतन जैसा है, जिसे पीयूष दईया के कहने पर मैंने लोकमत समाचार, दीवाली विशेषांक, 2011 के लिए लिखा था। अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियों से नवाज़ेंगे तो अच्छा लगेगा।)

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बहुतेरे लोगों को याद होगा कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की फ़िल्म पत्रिका माधुरी हिन्दी में निकलने वाली अपने क़िस्म की अनूठी लोकप्रिय पत्रिका थी, जिसने इतना लंबा और स्वस्थ जीवन जिया। पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में अरविंद कुमार के संपादन में सुचित्रा नाम से बंबई से शुरू हुई इस पत्रिका के कई नामकरण हुए, वक़्त के साथ संपादक भी बदले, तेवरकलेवर, रूपरंग, साजसज्जा, मियाद व सामग्री बदली तो लेखकपाठक भी बदले, और जब नवें दशक में इसका छपना बंद हुआ तो एक पूरा युग बदल चुका था। [1] इसका मुकम्मल सफ़रनामा लिखने के लिए तो एक भरीपूरी किताब की दरकार होगी, लिहाजा इस लेख में मैं सिर्फ़ अरविंद कुमार जी के संपादन में निकली माधुरी तक महदूद रहकर चंद मोटीमोटी बातें ही कह पाऊँगा। यूँ भी उसके अपने इतिहास में यही दौर सबसे रचनात्मक और संपन्न साबित होता है। Continue reading हिन्दी फ़िल्म अध्ययन: ‘माधुरी’ का राष्ट्रीय राजमार्ग