Tag Archives: हिंदुत्व

सावरकर को भारत रत्न देना आज़ादी के नायकों का अपमान है

क्या ऐसा शख़्स, जिसने अंग्रेज़ सरकार के पास माफ़ीनामे भेजे, जिन्ना से पहले धर्म के आधार पर राष्ट्र बांटने की बात कही, भारत छोड़ो आंदोलन के समय ब्रिटिश सेना में हिंदू युवाओं की भर्ती का अभियान चलाया, भारतीयों के दमन में अंग्रेज़ों का साथ दिया और देश की आज़ादी के अगुआ महात्मा गांधी की हत्या की साज़िश का सूत्रसंचालन किया, वह किसी भी मायने में भारत रत्न का हक़दार होना चाहिए?

Narendra Modi Savarkar Facebook

वक्त की निहाई अक्सर बड़ी बेरहम मालूम पड़ती है. अपने-अपने वक्त के शहंशाह, अपने-अपने जमाने के महान रणबांकुरे या आलिम सभी को आने वालों की सख्त टीका-टिप्पणियों से रूबरू होना पड़ा है.

बड़ी से बड़ी ऐतिहासिक घटनाएं- भले जिन्होंने समूचे समाज की दिशा बदलने में अहम भूमिका अदा की हो- या बड़ी से बड़ी ऐतिहासिक शख्सियतें- जिन्होंने धारा के विरुद्ध खड़ा होने का साहस कर उसे मोड़ दिया हो – कोई भी कितना भी बड़ा हो उसकी निर्मम आलोचना से बच नहीं पाया है.

यह अकारण ही नहीं कहा जाता कि आने वाली पीढ़ियां पुरानी पीढ़ियों के कंधों पर सवार होती हैं. जाहिर है वे ज्यादा दूर देख सकती हैं, पुरानी पीढ़ियों द्वारा संकलित, संशोधित ज्ञान उनकी अपनी धरोहर होता है, जिसे जज्ब कर वे आगे निकल जा सकती हैं.

समाज की विकास यात्रा को वैज्ञानिक ढंग से देखने वाले शख्स के लिए हो सकता है यह बात भले ही सामान्य मालूम पड़े, लेकिन समाज के व्यापक हिस्से में जिस तरह के अवैज्ञानिक, पश्चगामी चिंतन का बोलबाला रहता है, उसमें ऐसी कोई भी बात उसे आसानी से पच नहीं पाती.

घटनाओं और शख्सियतों का आदर्शीकरण करने की, उन्हें अपने दौर और अपने स्थान से काटकर सार्वभौमिक मानने की जो प्रवृत्ति समाज में विद्यमान रहती है, उसके चलते समाज का बड़ा हिस्सा ऐसी आलोचनाओं को बर्दाश्त नहीं कर पाता.

वैसे बात-बात पर आस्था पर हमला होने का बहाना बनाकर सड़कों पर उतरने वाली हुड़दंगी बजरंगी मानसिकता भले ही ऐसी प्रकट समीक्षा को रोकने की कोशिश करे, लेकिन इतिहास इस बात का साक्षी है कि कहीं प्रकट- तो कहीं प्रच्छन्न रूप से यह आलोचना निरंतर चलती ही रहती है और उन्हीं में नये विचारों के वाहक अंकुरित होते रहते हैं, जो फिर समाज को नये पथ पर ले जाते हैं.

फिलवक्त विनायक दामोदर सावरकर- जिन्हें उनके अनुयायी ‘स्वातंत्रयवीर’ नाम से पुकारते हैं, जो युवावस्था में ही ब्रिटिश विरोधी आंदोलन की तरफ आकर्षित हुए थे, जो बाद में कानून की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए, जहां वह और रैडिकल राजनीतिक गतिविधियों में जुड़ते गए थे- इसी किस्म की पड़ताल के केंद्र में है.

( Read the full article here : http://thewirehindi.com/98705/vd-savarkar-bharat-ratna-indian-freedom-movement/)

मोदीनामा : हिंदुत्व का उन्माद

 

मई 2019 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी ने शानदार चुनावी जीत हासिल की।

यह जीत सामान्य समझ को धता बताती है – जीवन और आजीविका जैसी आधारभूत बातें इस चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं बन पाईं? ऐसा क्यों है कि सामान्य और सभ्य लोगों के लिए भी

हिंदुत्व के ठेकेदारों की गुंडागर्दी बेमानी हो गई? क्यों एक आक्रामक और मर्दवादी कट्टरवाद हमारे समाज के लिए सामान्य सी बात हो गई है? ऐसा क्यों है कि बेहद जरूरी मुद्दे आज गैरजरूरी हो गए हैं?

ये सवाल चुनावी समीकरणों और जोड़-तोड़ से कहीं आगे और गहरे हैं। असल में मोदी और भाजपा ने सिर्फ चुनावी नक्शों को ही नहीं बदला है बल्कि सामाजिकं मानदंडों के तोड़-फोड़ की भी शुरूआत कर दी है।

यह किताब प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के पिछले पांच वर्षों की यात्रा को देखते हुए आने वाले पांच वर्षों के लिए एक चेतावनी है।

978-81-940778-5-5

LeftWord Books, New Delhi, 2019

Language: Hindi, 131 pages, 5.5″ x 8.5″

Price INR 195.00 Book Club Price INR 137

(https://mayday.leftword.com/catalog/product/view/id/21471)

SUBHASH GATADE
Subhash Gatade is a left activist and author. He is the author of Charvak ke Vaaris (Hindi, 2018), Ambedkar ani Rashtriya Swayamsevak Sangh (Marathi, 2016), Godse’s Children: Hindutva Terror in India (2011) and The Saffron Condition (2011). His writings for children include Pahad Se Uncha Aadmi (2010).

कासगंज हिंसा- तिरंगे को हड़प जाएगा भगवा? वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

kasganj-uttar-pradesh-violence, image courtesy ndtv

पूरे हिंदी क्षेत्र में और विशेषकर उत्तरप्रदेश में ऐसे बडे, छोटे और मंझोले किस्म के नेताओं की बड़ी फौज पैदा हो गई है जिसकी नेतागिरी केवल सांप्रदायिक नारे लगाने और समाज में सांप्रदायिकता फैलाने पर टिकी है। सार्वजनिक जीवन पर इन संकीर्ण सोच वाले हिंदुत्व नेताओं की निरंतर मजबूत होती पकड़ ने सांप्रदायिक हिंसा को ‘न्यू नार्मल’ के रूप में मान्यता दिला दी है। हिंदू धर्म को कलंकित करने में इस नए जमाने के हिंदुत्व की क्या भूमिका है, यह अब किसी से छिपा नहीं है। एक समय था जब समाज पर समाजवादी और गांधीवादी विचारों के प्रभाव के कारण सांप्रदायिकता का सामना करना अपेक्षाकृत कम मुश्किल काम था। पर इन विचारधाराओं का प्रभाव कम हो जाने से सांप्रदायिक नेताओं-समूहों का तेजी से विस्तार हो रहा है। एबीवीपी, विहिप, हिंदू युवावाहिनी और बजरंग दल जैसे संगठन सामाजिक-राजनीतिक जीवन के पूरे परिदृश्य पर हावी हो चुके हैं।अक्सर साधारण परिवारों के युवक इन संगठनों की चपेट में इसलिए आ जाते हैं क्योंकि सांप्रदायिक संगठन समाज सेवा के मुखौटे के भीतर रहकर अपना काम करते हैं। वे दिखावे के तौर पर ब्लड डोनेशन या स्वच्छता मिशन या फिर शहीदों के सम्मान जैसी गतिविधियां करते हैं पर उनका असल मकसद समाज में सांप्रदायिकता का विचारधारा का विस्तार करना होता है। मुस्लिमों में भी सांप्रदायिकता है, पर वे उस प्रकार से संगठित सांप्रदायिकता को व्यक्त नहीं कर रहे हैं। Continue reading कासगंज हिंसा- तिरंगे को हड़प जाएगा भगवा? वैभव सिंह

हिंदुत्व और निजता का अधिकार : वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

सुप्रीम कोर्ट के द्वारा निजता के अधिकार संबंधी फैसले ने निजी बनाम सार्वजनिक, व्यक्ति बनाम समाज, सरकार बनाम नागरिक के द्वैत को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।ऐसा समाज जहां गली-मोहल्लों व गांव-देहातों में निजी जानकारी छिपाने की कोई धारणा न तो रही है, न उसका सम्मान रहा है, उसी समाज में बड़े कारपोरेशन, सरकारी तंत्र व राज्य ने जब निजी जानकारियों का दुरुपयोग करना आरंभ किया तो गहरी प्रतिक्रिया हुई। इसका मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि राज्य व बड़े कारपोरेशन्स समाज के लिए ‘बाहरी शक्ति’ के रूप में रहे हैं। वे पराए, अजनबी और अनजान तत्व हैं जो मनुष्य की निजी सूचना जुटा रहे हैं। उनके बाहरी शक्ति और विशाल संरचना होने के बोध ने निजी जानकारी के मुद्दें पर लोगों को उद्वेलित कर दिया। आधार कार्ड, सोशल साइट्स, सरकारी स्कीम आदि कई चीजें ऐसी रही हैं, जिनका सहारा लेकर नागरिकों की निजी जानकारियों मे बड़े पैमाने पर सेंध लगाई जा रही है और उन जानकारियों को निहित स्वार्थ वाले बेचेहरा व अज्ञात समूहों में शेयर किया जा रहा है। ऐसे माहौल में सुप्रीम कोर्ट का ‘राइट टु प्राइवेसी’ को स्वीकृति देते हुए यह कहना काफी मायने रखता है कि अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार की सार्थकता तभी है जब व्यक्ति की गरिमा और निजता की भी रक्षा की जाए। व्यक्ति को यह पता हो कि उसकी निजी जानकारियां किसे, कब और क्यों दी जा रही हैं। कानून या राज्य के पास निजता को समाप्त करने के मकसद से देश का विकास, प्रशासनिक मजबूरी या डेटा-कलेक्शन की जरूरत का तर्क देने का विकल्प नहीं है।कोर्ट ने अपने फैसले में ‘सेक्सुअल ओरियंटेशन’ के बारे में टिप्पणी करते हुए इसे भी निजता के दायरे में रखा है। Continue reading हिंदुत्व और निजता का अधिकार : वैभव सिंह

माँ भारती के वीर सपूतों की रेप फंतासियाँ

पेश हैं सोशल मीडिया से दो, फ़क़त दो, बानगियाँ उस नए संस्कारी राष्ट्रवादी नायक की जो  खुद को ‘माँ भारती’ का दीवाना सपूत बताता है. उसकी दीवानगी का आलम यह है कि वह अपनी माँ की खून की प्यास बुझाने के लिए किसी भी औरत से बलात्कार करने पर उतर आने को तैयार है. यह कौन माँ है इस पर तो हम थोड़ी देर में आयेंगे, पहले ज़रा इन सपूतों की करतूतों पर नज़र डाल लें.

Continue reading माँ भारती के वीर सपूतों की रेप फंतासियाँ

‘लव जेहाद’ की असलियत – इतिहास के आईने में: चारू गुप्ता

Guest post by CHARU GUPTA

लव जेहाद आंदोलन स्त्रियों के नाम पर सांप्रदायिक लामबंदी की एक समकालीन कोशिश है. बतौर एक इतिहासकार मैं इसकी जड़ें औपनिवेशिक अतीत में भी देखती हूँ. जब भी सांप्रदायिक तनाव और दंगों का माहौल मज़बूत हुआ है, तब-तब इस तरह के मिथक गढ़े गए हैं और उनके इर्द गिर्द प्रचार हमारे सामने आये हैं. इन प्रचारों में मुस्लिम पुरुष को विशेष रूप से एक अपहरणकर्ता के रूप में पेश किया गया है और एक ‘कामुक’ मुस्लिम की तस्वीर गढ़ी गयी है.

मैंने 1920-30 के दशकों में उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिकता और यौनिकता के बीच उभर रहे रिश्ते पर काम किया है. उस दौर में लव जेहाद शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ था लेकिन उस समय में भी कई हिंदू संगठनों — आर्य समाज, हिंदू महासभा आदि –- के एक बड़े हिस्से ने ‘मुस्लिम गुंडों’ द्वारा हिंदू महिलाओं के अपहरण और धर्म परिवर्तन की अनेकोँ कहानियां प्रचारित कीं. उन्होंने कई प्रकार के भड़काऊ और लफ्फाज़ी भरे वक्तव्य दिए जिनमें मुसलमानों द्वारा हिंदू महिलाओं पर अत्याचार और व्यभिचार की अनगिनत कहानियां गढ़ी गईं. इन वक्तव्यों का ऐसा सैलाब आया कि मुसलमानों द्वारा हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार, आक्रामक व्यवहार, अपहरण, बहलाना-फुसलाना, धर्मान्तरण और जबरन मुसलमान पुरुषों से हिंदू महिलाओं की शादियों की कहानियों की एक लंबी सूची बनती गई. अंतरधार्मिक विवाह, प्रेम, एक स्त्री का अपनी मर्जी से सहवास और धर्मान्तरण को भी सामूहिक रूप से अपहरण और जबरन धर्मान्तरण की श्रेणी में डाल दिया गया. Continue reading ‘लव जेहाद’ की असलियत – इतिहास के आईने में: चारू गुप्ता