Tag Archives: हिन्दुत्व

विचार ही अब द्रोह !

(‘चार्वाक के वारिस : समाज, संस्कृति एवं सियासत पर प्रश्नवाचक ‘ की प्रस्तावना से)

कार्ल मार्क्‍स की दूसरी जन्मशती दुनिया भर में मनायी जा रही है।

दिलचस्प है कि विगत लगभग एक सौ पैंतीस सालों में जबसे उनका इन्तक़ाल हुआ, कई कई बार ऐसे मौके आए जब पूंजीवादी मीडिया में यह ऐलान कर दिया कि ‘मार्क्‍स इज डेड’ अर्थात ‘मार्क्‍स मर गया’; अलबत्ता, यह मार्क्‍स की प्रत्यक्ष मौत की बात नहीं थी बल्कि मानवमुक्ति के उस फलसफे के अप्रासंगिक होने की उनकी दिली ख्वाहिश को जुबां दिया जाना था, जो उनके नाम के साथ जाना जाता है। याद किया जा सकता है कि सोवियत रूस का विघटन होने के बाद और जिन दिनों पूंजीवाद की ‘अंतिम जीत’ के दावे कुछ अधिक जोर से उठने लगे थे, पूर्व सोवियत रूस के एक गणराज्य में बाकायदा एक पोस्टर मार्क्‍स की तस्वीर के साथ ‘‘मोस्ट वाटेंड’’ के नारे के साथ छपा था।

यह अलग बात है कि हर बार इस भविष्यवाणी को झुठला कर अग्निपक्षी/फिनिक्स की तरह मार्क्‍स राख से बार बार ‘नया जीवन’ लेकर उपस्थित होते रहे हैं। आलम तो यहां तक आ पहुंचा है कि 1999 में- अर्थात सोवियत रूस के विघटन के लगभग नौ साल बाद- बीबीसी के आनलाइन सर्वेक्षण में मार्क्‍स को सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा विचारक कहा गया था। Continue reading विचार ही अब द्रोह !

पवित्र गाय, त्याज्य लोग !

..बुलंदशहर की घटनाएं इस बात की ताईद करती हैं कि  हिंदुत्व वर्चस्ववाद का यह नज़रिया जिसमें मानवीय जीवन के प्रति गहरी असम्वेदनशीलता और असम्पृक्तता  टपकती है और जो एक चतुष्पाद को पूजनीय बनाती है, आज उरूज पर है।..

( Photo Courtesy : indianculturalforum.in)

कभी कभी एक अदद वक्तव्य किसी नेता की एकमात्र निशानी बन कर रह जाती है। विश्व हिन्दू परिषद के नेता गिरिराज किशोर इसका क्लासिकीय उदाहरण कहे जा सकते हैं जिनका नाम लेने पर अक्सर उनका विवादित वक्तव्य ही लोगों की जुबां पर आ जाता है। याद है कि उन्होंने कहा था कि ‘‘पुराणों में गाय को मनुष्य से अधिक पवित्रा समझा गया है।’’

वह अवसर बेहद शोकाकुल करनेवाला था, जब उनका वह वक्तव्य आया था। दिल्ली से बमुश्किल पचास किलोमीटर दूर दुलीना नामक स्थान पर पांच दलितों की भीड़ द्वारा पीट पीट कर हत्या कर दी गयी थी Continue reading पवित्र गाय, त्याज्य लोग !

द्वार पर नीरो !

नरम फासीवाद के सौंदर्यीकरण के वक्त़ में

(To be published in the next issue of ‘ Samakaleen Teesari Dunia’)

 

जनसंहार को अंजाम देने वाले लोग क्या बीमार मस्तिष्क और परपीड़क होते हैं।

अपनी बहुचर्चित किताब ‘आईशमैन इन जेरूसलेम: ए रिपोर्ट आन द बॅनालिटी आफ इविल’ में जर्मन-अमेरिकी दार्शनिक हाना अरेन्डट इस प्रश्न का जवाब देने की कोशिश करती हैं। एक नात्सी सैन्य अधिकारी एडॉल्फ आइशमैन जो हिटलर की हुकूमत में चली नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम के अग्रणी सूत्राधारों में से था, उस पर चले मुकदमे की चर्चा करते हुए वह बताती हैं कि किस तरह ऐसे घिनौने अपराधों को अंजाम देनेवाले अक्सर सामान्य, साधारण लोग होते हैं जो अपने काम को नौकरशाहाना दक्षता के साथ अंजाम देते हैं।

एक ऐसे समय में जबकि 2002 के स्याह दौर को – जब राज्य के कर्णधारों की अकर्मण्यता और संलिप्तता के चलते हजारों निरपराधों को जान से हाथ धोना पड़ा – और कुछ लाख लोग अपने मुल्क में ही शरणार्थी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो चले हैं, को भुला देने की, उनका साफसुथराकरण करने की कोशिशें तेज हो चली हैं, और विकास का एक ऐसा शगूफा खड़ा किया जा रहा है जिसके तले असहज करनेवाले तमाम प्रश्न दफन हो जाएं तो इन सारे सवालों से रूबरू होने की जरूरत बनती है।

इसी पृष्ठभूमि में हम 2014 के चुनावों की आजाद भारत के इतिहास में अहमियत पर गौर कर सकते हैं और इस बात को समझ सकते हैं कि क्यों उसकी तुलना जर्मनी के 1933 के चुनावों से की जा रही है, जिसने हिटलर के आगमन का रास्ता सुगम किया था।

वजह साफ है कि आज़ादी के बाद पहली बार ऐसी घड़ी आयी है जब तमाम अनुदारवादी, संकीर्णमना, असमावेशी ताकतें – जिन्होंने हमेशा ही संविधान के बुनियादी मूल्यों की मुखालिफत की है- आज नयी वैधता हासिल कर जनता के एक हिस्से को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब होती दिख रही हैं। और इस मुहिम की अगुआई वही शख्स कर रहा है जो खुद एक अकार्यक्षम मुख्यमंत्राी है जिसकी अकर्मण्यता या संलिप्तता के चलते उसका सूबा साम्प्रदायिक दावानल में झुलस गया था, और यह इल्जाम महज विपक्षी पार्टियों ने ही उसकी पार्टी के वरिष्ठतम नेता ने ही लगाया है कि वह कठिन समय में ‘राजधर्म’ निभाने में असफल रहा था। Continue reading द्वार पर नीरो !

आओ हम ढोएं हिन्दुत्व की पालकी


अस्सी के दशक में उत्तर भारत के कुछ शहरों में एक पोस्टर देखने को मिलता था। 

रामबिलास पासवान के तस्वीर वाले उस पोस्टर के नीचे एक नारा लिखा रहता था ‘मैं उस घर में दिया जलाने चला हूं, जिस घर में अंधेरा है।’ उस वक्त़ यह गुमान किसे हो सकता था कि अपनी राजनीतिक यात्रा में वह दो दफा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषंगिक संगठन भारतीय जनता पार्टी का चिराग़ रौशन करने पहुंच जाएंगे। 2002 में गुजरात जनसंहार को लेकर मंत्रिमंडल से दिए अपने इस्तीफे की ‘गलति’ को ठीक बारह साल बाद ठीक करेंगे, और जिस शख्स द्वारा ‘राजधर्म’ के निर्वाहन न करने के चलते हजारों निरपराधों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, उसी शख्स को मुल्क की बागडोर सम्भालने के लिए चल रही मुहिम मंे जुट जाएंगे।

मालूम हो कि अपने आप को दलितों के अग्रणी के तौर पर प्रस्तुत करनेवाले नेताओं की कतार में रामबिलास पासवान अकेले नहीं हैं, जिन्होंने भाजपा का हाथ थामने का निर्णय लिया है। Continue reading आओ हम ढोएं हिन्दुत्व की पालकी

साम्प्रदायिक फासीवाद की चुनौती – नयी ज़मीन तोड़ते हुए

यहुदी तथा ईसाई, हिन्दू तथा मुस्लिम ‘मूलवादी/बुनियादपरस्त’ श्रेष्ठ भिन्नता (सुपीरिअर डिफरेन्स) की बात करते हैं। हरेक का मुक़ाबला एक कनिष्ठ और डरावने अन्य से होता है। हरेक असमावेश की राजनीति में सक्रिय रहता है। इसलिए हरेक अपने दायरे में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए खतरे के तौर पर उपस्थित होता है।.. मुस्लिम मिलिटेण्ट के लिए ‘अन्य’ यहुदी होते हैं, कभी ईसाई होते हैं और दक्षिण एशिया में हिन्दू, ईसाई और अहमदी होते हैं। मैं ऐसे किसी धार्मिक-राजनीतिक संगठन को आज नहीं जानता जिसके सामने एक दानवीकृत, डरावना अन्य नहीं है।

अन्य हमेशा एक सक्रिय निषेध (active negation) होता है। ऐसे तमाम आन्दोलन नफरत की लामबन्दी करते हैं और अक्सर इसके लिए अभूतपूर्व सांगठनिक प्रयास करते हैं।..
हिंसा का सम्प्रदाय और दुश्मनों का विस्तार भिन्नता की विचारधाराओं में निहित होता है। सभी अन्य के प्रति अपनी नफरत को संगठित ंिहंसा के जरिए अभिव्यक्त करते हैं। सभी धर्म और इतिहास की दुहाई देते हुए अपनी हिंसा को वैधता प्रदान करते हैं। लगभग सभी मामलों में दुश्मनों की संख्या बढ़ती जाती है। पहले भारतीय परिवार के निशाने पर मुस्लिम अन्य रहता था और अब उसने ईसाइयों को उसमें शामिल किया है।
( प्रोफाइल आफ द रिलीजियस राइट – इकबाल अहमद, 1999)

1.
मुखौटा और आदमी

बच्चों की फन्तासियां अनन्त एवं अकल्पनीय होती हैं।

वह शेर का मुखौटा पहनेगा और अपने आत्मीयों को अपनी गुर्राहट से ‘डराने’ लगेगा और दूसरे ही क्षण वह स्पाइडरमैन का मुखौटा पहन कर कल्पना करेगा कि वह हवा में उड़ रहा है। आप ने किसी वयस्क को शायद ही कहीं देखा हो जो बच्चे की उन शैतानियों से परेशान हो उठे, भले ही उसके लिए वह बच्चा बिल्कुल अजनबी हो।

क्या होगा कि किसी अलसुबह आप को वयस्कों का एक समूह या उसी तरह शरीर से दृष्टपुष्ट लोग सड़कों पर घुमते मिलें जिन्होंने उसी किस्म के या वही मुखौटे पहनें हों ? आप निश्चित ही उन बुजुर्गों की मानसिक स्थिति को लेकर चिन्तित होंगे और उन्हें यह सलाह देना चाहेंगे कि वह नजदीकी मनोवैज्ञानिक से अवश्य मिल लें।

जनाब नरेन्द्र मोदी के सियासत में आगमन – पहले गुजराती हिन्दुओं के एक नेता के तौर पर, जिस वक्त ‘गुजरात का शेर’ के तौर पर उन्हें सम्बोधित किया जाता था और बाद में ‘भारत माता के शेर’ के तौर पर राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण – के साथ हम ऐसे ही मुखौटा पहननेवाले वयस्कों से रूबरू हैं जो एक ऐसे चेहरे में अपनी पहचान ‘विलीन’ कर देना चाहते हैं जो 21 वीं सदी में सबसे ध्रुवीकृत करनेवाली छवियों में शुमार की जाती है। Continue reading साम्प्रदायिक फासीवाद की चुनौती – नयी ज़मीन तोड़ते हुए